शनिवार, 10 सितंबर 2016

भोपाल की यंग वूमेन का जज्बा


भोपाल की यंग वूमेन का जज्बा


हर क्षेत्र में समाजसेवा

किसी देश की तरक्की में महिलाओं का बहुत बड़ा योगदान होता है। परिवार को संभालने वाली महिलाएं आज समाज और देश को नई दिशा दे रही हैं। ये सिलसिला आजादी के बाद से अब तक अनवरत चल रहा है। चाहे जितनी मुश्किलें हो लेकिन आगे बढऩे और खुद को स्थापित करने का जज्बा महिलाओं को कामयाब बना रहा है। ऐसी ही भोपाल की यंग वूमेन के एक ग्रुप ने हर क्षेत्र में समाजसेवा करने का संकल्प दो साल पहले लिया था। अब तक यह वूमेन हजारों गरीबों की मदद, कैंसर पीडि़त, ब्लड डोनेशन व वस्त्र वितरण, बच्चों की काउंसिलिंग सहित कई तरह की सेवाएं करने हमेशा तत्पर रहती है।

- राजकुमार सोनी


भारतीय समाज में महिलाओं का विशिष्ट स्थान रहा हैं। पत्नी को पुरूष की अर्धांगिनी माना गया है। वह एक विश्वसनीय मित्र के रूप में भी पुरुष की सदैव सहयोगी रही है। लेकिन पुरुष वर्चस्व मानसिकता वाले समाज ने महिलाओं को घर की दहलीज से बाहर कदम रखने पर पाबंदी लगाता रहा है। महान लेखिका महादेवी वर्मा ने कहा था कि ''नारी केवल एक नारी ही नहीं अपितु वह काव्य और प्रेम की प्रतिमूर्ति है। पुरुष विजय का भूखा होता हैं और नारी समर्पण की। शायद इसीलिए अपने सुनहरे भविष्य के सपने देखने वाली महिलाएं अब कामयाबी की सीढिय़ां चढ़ती जा रही हैं।

सशक्त होती महिलाएं
19वीं सदी में जब पुनर्जागरण शुरू हुआ तो महिलाओं के कल्याण के कई आंदोलन हुए। भारत की आजादी की लड़ाई में महिलाओं की गौरवमयी भागीदारी रही। कस्तूरबा गांधी, विजयलक्ष्मी पंडित, कमला नेहरु, सुचेता कृपलानी, सरोजिनी नायडू जैसी महिलाओं ने भारत की आजादी के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। बीसवीं सदी की शुरुआत में महिलाएं अपनी प्रगति की नई इबारत लिखना शुरू किया, वे शिक्षा से चिकित्सा के क्षेत्र में खुद को स्थापित करने में लगीं। उनकी यह पहल समाज में महिलाओं की बदलती भूमिका को प्रतिस्थापित कर रहा था। आजादी के बाद से महिलाएं राजनीति में नया मुकाम बनाना शुरू किया, वे लोकसभा, राज्यसभा, विधान सभाओं तथा स्थानीय निकायों का सशक्त नेतृत्व करने की भूमिका में आईं। महिला सशक्तिकरण के इस युग में महिलाओं को आगे बढऩे के लिए सरकारी प्रयास भी सफल होने लगे, महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए महिला आरक्षण भी इस प्रयास का हिस्सा है। आज बिजनेस, इंजीनियरिंग, विज्ञान-अनुसंधान, खेले के क्षेत्र महिलाएं पुरुषों से किसी स्तर पर कम नहीं हैं। पर सवाल यह है कि आज भी महिलाओं को बढऩे की आजादी समाज क्यों नहीं देता है? जबकि महिलाओं ने ये दिखा दिया कि प्रकृति रूप से पुरुष और महिला के बीच भेद वाले हजारों वर्षों की विचारधारा को झुठलाकर खुद को मजबूत और कामयाब बनाया है। लोकतंत्र सभी नागरिकों को रोजगार, सम्मान से जीने का अधिकार और सुरक्षा प्रदान करने का अधिकार देता है। लेकिन महिलाओं पर बढ़ रही हिंसा और लगातार महिलाओं के सम्मान और उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले लोग भी इसी समाज का हिस्सा हैं। महिलाओं को भोग की वस्तु समझने वाले कथित ऐसे पुरुष मानसिकता के खिलाफ कब समाज जागेगा? महिलाओं की संरक्षा के लिए चाहे जितने कानून बना दिया जाए लेकिन सबसे बड़ी जरूरत है, महिलाओं के प्रति समाज के नजरिए में बदलाव आना।

बिजनेस में बढ़ती महिलाओं की भागीदारी
एक सर्वे के अनुसार भारतीय महिलाओं की भागीदारी कुल उद्योगों में दस प्रतिशत हैं और यह भागीदारी निरंतर गतिशील हो रही है। बैंकिग, केंद्र सरकार, राज्य सरकार, कॉर्पोरेट जगत, स्वयंसेवी संस्थाओं तकनीकी क्षेत्र आदि में स्किल से लैस महिलाएं भारतीय अर्थव्यवस्था को बढ़ा रही हैं। महिलाओं के काम करने की क्षमता जैसे, नेटवर्किंग की क्षमता, काम प्रति समर्पण, सहयोगियों के साथ मधुर व्यवहार, सीखने की जिज्ञासा, सकारात्मक सोच के इन्हीं गुणों के कारण महिलाएं आज इन क्षेत्रों में सफल नेतृत्व भी कर रही हैं।

9 लाख 95144 लघु उद्योग
दूसरे सर्वे के अनुसार भारत में कुल 9 लाख 95144 लघु उद्योग उद्यमशाील महिलाओं द्बारा संचालित हैं। स्वयं सहायता समूह बनाकर महिलाएं दूसरी सैकड़ों महिलाओं को अत्मनिर्भर बना रही हैं। केरल में ऐसे स्वयं सहायता समूह के कारण आज वहां सौ प्रतिशत महिलाएं साक्षर हैं और अपने अधिकारों के लिए सजग हैं।

परिवार में खुशहाली और आर्थिक तंगी होती है दूर
रिसर्च से ये बात सामने आया है कि महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने से परिवार में खुशहाली और आर्थिक तंगी भी दूर होती है, क्योंकि उस परिवार में अभी तक पुरुष ही कमाते थे और परिवार की बढ़ती जरूरतों को बमुश्किल से पूरा कर पाते हैं। ऐसे में महिलाएं का आत्मनिर्भर बनना, बच्चों को अच्छी शिक्षा और अच्छा पोषण दोनों उपलब्ध होता है। मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में ये तथ्य सामने आए हैं।

समाज सेवा को बनाया मिशन

नीलम विजयवर्गीय, समाजसेविका
नीलम विजयवर्गीय, समाजसेविका

सुख समर्पण संस्था की चेयरमैन नीलम विजयवर्गीय का मानना है कि महिलाओं को आर्थिक रूप से भी निर्भर होना चाहिए। परिवार का सही और सुचारू रूप से संचालन करने के लिए महिलाओं को हर माह बचत अवश्य करना चाहिए जो परिवार के किसी भी सदस्य के बुरे समय काम आ सकती है। दूसरों की सेवा करने से जो आत्मसंतोष व पॉजीटिव ऊर्जा मिलती है उसे हम शब्दों से बयां नहीं कर सकती। हमने दो साल पहले सुख समर्पण संस्था को बहुत छोटे पैमाने पर शुरु किया था। आज संस्था में 700 से अधिक महिलाएं समाजसेवा का काम बेहतर ढंग से कर रही हैं। संस्था गरीबों को मदद ब्लड डोनेशन, बच्चों की काउंसिलिंग में मदद करती है।

एकल परिवार धैर्य से काम लें

संगीता खुराना, व्यवसायी


पहले संयुक्त परविार हुआ करते थे आज अधिकांश एकल परिवार चल रहे हैं। यह एक बड़ी कमी है। अगर पति-पत्नी या बच्चे किसी समस्या में उलझ जाएं तो हल करना मुश्किल हो जाता है। हम पिछले दो साल से अपने व्यवसाय के साथ ही समाजसेवा से जुड़ी हूं। हमने यह देखा कि झुग्गी बस्ती के बच्चों की, सरकारी प्राइवेट अस्पतालों में मरीजों की, बुजुर्गों आदि की सेवा करने वाला कोई नहीं है।

 

 

संगठन में शक्ति है

नीलम मनचंदा, गृहणी

पुरुष की कामयाबी में स्त्री का हाथ होता है, उसी तरह स्त्री की कामयाबी में पुरुष का बड़ा योगदान है। महिलाओं को संगठित होकर कार्य करना चाहिए तभी सही मायने में महिला सशक्तिकरण का वजूद टिक पाएगा। मप्र व केंद्र सरकार ने महिलाओं को आत्म निर्भर बनाने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं जिनका लाभ वूमेन को अधिक से अधिक उठाना चाहिए। हमें समाजसेवा का कार्य करना बहुत अच्छा लगता है।

महिलाएं हो रहीं जागरुक

वैशाली रतनानी, टीचर

जागरुकता के कारण महिलाएं आज हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। इसमें संचार क्रांति का महत्वपूर्ण योगदान है। भोपाल में गैस कांड के पीडि़तों को अभी तक उचित मदद नहीं मिल पा रही है, जबकि ऐसे पात्रों को मदद मिल रही है जिनका इस कांड से वास्ता ही नहीं है। सही गैस पीडि़तों को अगर समय पर आर्थिक मदद व इलाज हो जाए तो काफी परेशानियां उन परिवारों की दूर हो जाएं जो ये दंश कई सालों से झेल रहे हैं। मेरा ऐसा मानना है कि हर महिला को गरीब, बेसहारा, जरूरत मंद लोगों की समय-समय पर मदद करते रहना चाहिए जिससे उनका भरण-पोषण हो सके।

 

बेटियों को आगे बढ़ाएं

शालिनी जैन, गृहणी

देशभर में महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। यह भारत के निवासियों के लिए सुखद पहलू है। मेा मानना है कि अभिभावक बेटों की तरह ही बेटियों को घर में सम्मान दें और उन्हें भी हर क्षेत्र में आगे बढऩे के लिए प्ररित करें। अगर ऐसा होगा तो भारत ही नहीं पूरी दुनिया में बेटों के साथ बेटियों का भी डंका बजेगा। आज भले ही वूमेन अपने आपको घर या बाहर असुरक्षित महसूस समझती हो लेकिन उसे याद रखना चाहिए कि नारी शक्ति दुर्गा भी है और काली भी है। स्त्रियों की शक्ति को किसी भी तरह से कम नहीं आंका जा सकता। बेटियों को उच्च शिक्षित करें और समाज में उनका नाम रोशन करें। हां एक बात यह कि परिवार की गाड़ी को सामंजस्य से जिंदगी भर चलाएं, आपको अपार खुशियां मिलेंगी।

दो साल में सेवा

स्लम एरिया
5200

लड़के-लड़कियों को आर्थिक सहायता, खाद्य सामग्री, वस्त्र वितरण
कैंसर हास्पिटल
115
बच्चों को आर्थिक सहायता, खाद्य सामग्री, वस्त्र वितरण
ब्लड डोनेट
225
महिला ग्रुप के सदस्यों द्वारा
नेत्रदान
50
महिला ग्रुप के सदस्यों द्वारा सेवा सदन के माध्यम से
काउंसिलिंग
450
मन में खुदकुशी का भाव नहीं आने पाए ऐसे बच्चों को काउंसिलिंग के जरिये उन्हें जीने की प्रेरणा दी।