बुधवार, 30 मई 2012

स्वर्णनगरी में घरौंदा




जैसलमेर: स्वर्णनगरी जैसलमेर में लोगों का अपना आशियाना बनाने का सपना जल्द ही पूरा होगा। नगर परिषद और राजस्थान आवासन मंडल ने लोगों की मांग पर शीघ्र ही जवाहरनगर आवासीय योजना शुरू करने की योजना बनाई है। जैसलमेर के शांत वातावरण से अभिभूत होकर जैसलमेर के अलावा संभाग के बाशिंदे भी यहां अपना घरौंदा बनाना चाहते हैं। नगर परिषद के अध्यक्ष अशोक तंवर ने बताया कि हमारी कोशिश है कि जैसलमेर में कोई भी ऐसा परिवार न हो, जिसके पास अपना खुद का घर न हो।
नगर परिषद इसी दिशा में काम कर रहा है। आने वाले दिनों होने वाली बोर्ड मीटिंग में जवाहर नगर आवासीय योजना का प्रारूप रखा जाएगा। मंजूरी मिलते ही अगले महीने से योजना क्रियान्वयन का काम शुरू कर दिया जाएगा। उन्होंने बताया कि रामगढ़ रोड पर बनने वाली प्रस्तावित कालोनी में करीब 1300 भूखंड काटे जाएंगे, जिनकी दर भी मध्यम स्तरीय वर्ग के मुताबिक रखी जाएगी।राजस्थान आवासन मंडल की ओर से भी बाडमेर रोड पर 221 बीघा भूमि अधिग्रहण के प्रयास चल रहे हैं। जिनके शीघ्र पूरा हो जाने की उम्मीद है। मंडलइस जमीन पर करीब दो हजार मकान बनाएगा, जिनमें अल्प व मध्यम आय वर्ग के लोगों का खास ख्याल रखा जाएगा। bराजस्थान आवासन मंडल सूत्रों के अनुसार अफोर्डेबल योजना के तहत 84 फ्लैटस के लिए आवेदन लेने का काम जारी कर रखा है। यह आवेदन यूनियन बैंक के माध्यम से लिए जा रहे है। 30 मई के बाद इन आवेदनों की जांच कर लाटरी निकाली जाएगी। ये फ्लैट तीन मंजिले होंगे। वर्तमान में यहां आवासन मंडल की कालोनी में 422 मकान बने हुए हैं । जिनमें से 193 मकान आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्ग व 93 मकान अल्पआय वर्ग के लोगों को आवंटित किए गये हैं।

नहीं चल रहा राहुल का जादू




सोनिया का उत्तराधिकारी राहुल गांधी को जहां भी कोई जिम्मा दिया गया उनका जादू नहीं चला। उल्टे उस प्रदेश में कांग्रेस पार्टी की किरकिरी हो गयी। उत्तर प्रदेश इसका जीवंत उदाहरण है। पार्टी को पुनर्जीवित करने की कोशिश में राहुल झारखंड दौरे पर भी आये, लेकिन उनका जादू झारखंड में भी नहीं चला। निगेटिव प्रभाव यह हुआ कि प्रदेश में सदस्यों की संख्या दिन-प्रतिदिन घटती गयी। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि क्या राहुल का करिश्मा असर नहीं कर रहा? क्या कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी का करिश्मा खत्म हो रहा है। भारतीय युवा कांग्रेस की हालत को देखकर तो ऐसा ही लग रहा है। राहुल गांधी की लाख कोशिशों के बावजूद युवा कांग्रेस को उतने नए सदस्य नहीं मिल रहे हैं जितने की उम्मीद की जा रही थी। गुजरात में नए सदस्यों की संख्या में एक तिहाई की गिरावट आई है। गौरतलब है कि गुजरात में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं। झारखण्ड और तमिलनाडु में भी सदस्यों की संख्या काफी कम हुई है। राहुल गांधी ने पांच साल पहले युवा कांग्रेस की कमान संभाली थी। उन्होंने आंतरिक लोकतंत्र और राजनीतिक चरित्र में बदलाव की बातें कर काफी उम्मीदें जगाई थी लेकिन शायद उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पाए हैं। गुजरात में हालिया सदस्यता अभियान में सिर्फ 2.5 लाख सदस्य ही जोड़े जा सके जबकि 2010 में युवा कांग्रेस से 10 लाख सदस्य जुड़े थे। तमिलनाडु में 2010 में युवा कांग्रेस को 14 लाख नए सदस्य मिले थे लेकिन 23 अप्रेल से 23 मई तक राज्य में चलाए गए सदस्यता अभियान के दौरान सिर्फ 1.5 लाख सदस्य ही मिले. ये आंकड़े हुगली में 31 मई को होने वाली युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से न पहले आए हैं।

मंगलवार, 29 मई 2012

गले में घंटी बंधेगी कैसे?




अभी पूरी तरह साफ नहीं है कि सांसदों-विधायकों, राजपत्रित अधिकारियों और 50 हजार रुपए से ज्यादा मासिक आमदनी वाले परिवारों को रसोई गैस की सब्सिडी से वंचित करके पांच हजार करोड़ रुपए सालाना की बचत का सपना देख रही केंद्र सरकार इस दिशा में अपने कदम कैसे उठाएगी? हालांकि, आम लोगों पर पेट्रोल बम बेहिचक फोड़ दिया गया है।
अभी रसोई गैस आपूर्ति की जो व्यवस्था है, उसमें सांसदों, विधायकों व अधिकारियों का इतना दखल है कि वे जिसे भी चाहें, चुटकियां बजाते सिलेंडर या कनेक्शन दिला देते हैं। इस व्यवस्था को इतना कैसे बदला जाएगा कि गैस एजेंसी वाला इनके द्वारा खुद के लिए सिलेंडर की मांग किए जाने पर बेझिझक कह दे कि हुजूर, आपको कमर्शियल दर पर साढ़े 19 किलो वाला सिलेंडर खरीदना पड़ेगा, सब्सिडी वाला तो दूसरों के लिए है, उनके लिए, जिनकी सिफारिश आप गाहे-बगाहे करते रहते हैं।
आपूर्ति व्यवस्था को इतना बदले बिना स्थिति में कोई बदलाव आएगा, तो केवल इतना कि सासंद-विधायक, अफसर अपने किचन की गरीब काम वाली-काम वाले के असली या नकली नाम पर जारी सिलेंडरों का उपभोग करने लगेंगे। आखिरकार, यह वह देश है, जिसमें गरीबों के राशन कार्ड तक उनके पास नहीं रहने दिए जाते।
सरकार का दो चरणों में रसोई गैस-सब्सिडी घटाने का मंसूबा आम होते ही सांसदों की ओर से जो प्रतिक्रियाएं आई हैं, उनसे लगता नहीं कि वे खुशी-खुशी सस्ते सिलेंडर का लोभ त्याग देंगे। हालांकि, यह त्याग उन सुविधाओं के सामने कहीं नहीं ठहरता, जो गरीबों के इस देश के अमीर जनसेवकों के तौर पर उनको उपलब्ध हैं। देश में ऐसा मानने वालों की भी बड़ी जमात है कि सांसदों, विधायकों व अधिकारियों को भी स्याह-सफेद करने के जितने अधिकार (साथ ही अपरिभाषित विशेषाधिकार) हैं, वे प्राप्त रहें, तो बिना किसी वेतन के भी उनके दायित्वों का निर्वाह घाटे का सौदा नहीं।
ऐसे में बेहतर होता कि कम से कम सांसद और विधायक इस सब्सिडी त्याग के लिए खुद आगे आते। इससे जनप्रतिनिधि के तौर पर उनका सम्मान बढ़ता ही, लेकिन इधर उन्होंने अपने सम्मान के मानदंड बदल लिए हैं। वे सादगी से रहने और लालबत्ती की मांग न करने की सोनिया गांधी की नसीहत नहीं मान सकते, क्योंकि उन्हें तब सम्मान का अनुभव होता है, जब उनका वेतन सबसे बड़े सरकारी अधिकारी के वेतन से कम से कम एक रुपया ज्यादा हो जाए। साथ ही ढेर सारा ऐश्वर्य और विधायिका के साथ-साथ कार्यपालिका के भी तमाम अधिकार उनकी मुट्ठी में रहें। शायद इसीलिए यह अपमान उनको अपमान नहीं लग रहा कि भले ही उनको अपने वेतन-भत्ते खुद बढ़ाने का अधिकार है और इस अधिकार का वे दुरुपयोग की हद तक इस्तेमाल करते हैं, पर गैस सब्सिडी रोकने के बारे में सरकार को सोचना पड़ रहा है। जिस जिलाधिकारी के भ्रष्टाचार के खिलाफ कभी वे आवाजें उठाया करते थे, सांसद-विधायक निधि जुटा लेने के बाद की स्थिति में उसे ही निधि के संरक्षक के रूप में उन पर अंकुश का अधिकार मिल गया है, यह भी उन्हें अपमानजनक कहां लगता है?
जहां तक आम आदमी की बात है, उसे यह सोचकर कलेजे में ठंडक जरूर पड़ती है कि जिन नेताओं और अधिकारियों, जिनके गठजोड़ पर देश की सबसे बड़ी अदालत कई बार चिंता जता चुकी है, ने अपने घरों में महंगाई के प्रवेश के सारे रास्ते बंद कर रखे हैं और इसी कारण ये जनता के त्रास का अनुभव नहीं करते, उनके घरों में महंगे सिलेंडर का प्रवेश एक नई शुरुआत सिद्ध होगी और हो सकता है कि यह उनको 'डैमचीप साहबोंÓ की मानसिकता से मुक्ति की ओर ले जाए। प्रसंगवश, अंग्रेजों के जमाने में ऐसे 'डैमचीपÓ साहब लखनऊ के दुकानदारों में बहुत लोकप्रिय थे। बेचारे गरीब भारतीय ग्राहक आते, तो चीजों के दाम सुनकर पहले तो दांतों तले उंगली दबाते, फिर मोल-भाव पर उतरते और रियायतों की मांग करते। इसलिए कि बढ़ती महंगाई और घटती आमदनी से उनका बुरा हाल होता था, लेकिन संपन्न और सत्ता की हनक से भरे अंग्रेज ग्राहक आते, तो भाव सुनकर खुश होते। कहते कि डैमचीप-डैमचीप (इतना सस्ता, इतना सस्ता!) और सामान खरीद लेते।
बाद के दिनों में दुकानदार मोल-भाव करने वाले भारतीय ग्राहकों को ताना मारते हुए कहने लगे थे कि रहने दो, इतनी महंगी चीजें खरीदना तुम्हारे वश की बात नहीं। अभी डैमचीप साहब आएंगे और सब खरीद लेंगे। भूमंडलीकरण की आंधी और छठे वेतन आयोग की सौगातों ने हमें जो दुखदायी गैर-बराबरी भेंट की है, उसने देश में ऐसे डैमचीप साहबों की संख्या अच्छी-खासी बढ़ा दी है। महंगाई से पीडि़त आम लोग इस संख्या को कभी निराश होकर, तो कभी गुस्से में देख रहे हैं। जिन बाजारों में वे मुट्ठी में पैसे लेकर जाते हैं, उन्हीं में ये डैमचीप साहब अपना सूटकेस खोले पहुंच जाते हैं।
प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन ने इसी को लक्ष्य करते हुए छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू किए जाने से पहले सरकार को लिखा था कि वह एक अध्ययन करा ले कि कर्मचारियों और अधिकारियों के वेतन बढऩे का उन लोगों पर क्या असर होगा, जो सरकारी नौकरियों या सुभीते के रोजगारों में नहीं हैं। मगर, सरकार ने ऐसा कोई अध्ययन नहीं कराया। चूंकि देश में नई-नई आई बड़ी कंपनियों को उनके माल की खरीदारी के लिए ग्राहक चाहिए थे, इसलिए उसने झट आयोग की सिफारिशें लागू कीं और बाद में उन्हीं की आड़ में सांसदों और विधायकों ने भी अपना वेतन मनमाफिक बढ़ा लिया। इन डैमचीप साहबों को रसोई गैस सब्सिडी से वंचित करने की ही तर्ज पर उन बाजारों में (जहां सामान्य लोग चीजें खरीदते हैं) खरीदारी करने से रोककर महंगाई पीडि़तों को बड़ी राहत दी जा सकती है।
इन साहबों को सब्सिडी वाले सिलेंडर की ही तरह सब्सिडी वाला पेट्रोल, डीजल या दूसरी चीजें भी क्यों मिलें? क्या सिर्फ इसलिए कि उनका लोभ अब कोई सीमा मानने को तैयार नहीं है और वे ऐश्वर्य में बड़े हिस्से के साथ-साथ देश के सारे संसाधनों पर भी अपना हक चाहते हैं? यहां तक कि सरकारी अस्पतालों में निर्धनों की दवाएं भी नहीं छोड़ते। क्या सरकारी सब्सिडी उन्हीं के लिए नहीं होनी चाहिए, जिन्हें उसकी सबसे ज्यादा जरूरत है? मगर, सवाल है कि ऐसा करेगा कौन?
सरकार तो कहती है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना लागू होने के बाद से मजदूरों की जेब में इतना पैसा आ गया है कि उसके प्रभाव में खाने-पीने की चीजें महंगी होती जा रही हैं। इस दृष्टिकोण के साथ योजनाएं लागू की जाएंगी, तो उनसे अच्छे फल की आशा वैसी ही होगी, जैसे कोई बबूल का पेड़ बोकर उसमें आम के फल लगने की उम्मीद करने लगे।
- कृष्ण प्रताप सिंह

`गली गली चोर है` में बुकी ने लगाया था पैसा!




मुंबई : अन्ना हजारे के आंदोलन से प्रेरित फिल्म `गली गली चोर है` में कालाधन लगे होने की खबर है। मुंबई पुलिस का कहना है कि फिल्म में बुकी प्रकाश चंदलानी का पैसा लगा था। इस संबंध में मुंबई पुलिस ने फिल्म निर्माता नितिन मनमोहन से पूछताछ की है। मुंबई पुलिस के मुताबिक, प्रकाश चंदलानी के अंडरवर्ल्ड से भी रिश्ते हैं। उसके खिलाफ लुक आउट नोटिस जारी किया गया है। प्रकाश चंदलानी फिल्म का सह-निर्माता है। मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने सोमवार को फिल्म निर्माता नितिन मनमोहन से पूछताछ की है। पूछताछ में मनमोहन ने बताया कि उसे प्रकाश चंदलानी के बुकी होने के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। उसने प्रकाश का पैसा वापस कर दिया था। मनमोहन ने बताया कि चंदलानी उससे बतौर फाइनेंसर मिला था। मनमोहन ने अन्ना हजारे के लिए उनके गांव में इस फिल्म की स्पेशल स्क्रीनिंग की थी। फिल्म अन्ना को बेहद पसंद आई थी और इसे देखने के बाद उन्होंने विवादास्पद बयान दे दिया था कि भ्रष्टाचारियों को तमाचा मार कर ठीक करने का उपाय ही अब बाकी रह गया है। इस बयान पर सियासी दलों में अन्ना के अहिंसा धर्म का खूब मजाक उड़ाया गया था।

भारत से थाइलैंड तक जा सकेंगे ड्राइव करके




नेपीडॉ (म्यांमार)।। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और म्यांमार के राष्ट्रपति थीन सीन ने दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार के लिए बुनियादी सुविधाओं की स्थापना में तेजी लाने के लिए रेल, जहाजरानी और सड़क संपर्क बनाने के लिए 2016 की डेडलाइन तय की है। खास बात यह है कि यह सड़क संपर्क थाइलैंड तक बढ़ाया जाएगा, जो म्यांमार के रास्ते होकर जाएगा। ऐसा हुआ तो 2016 तक भारत से थाइलैंड तक सड़क के रास्ते जाया जा सकेगा। म्यांमार के राष्ट्रपति थीन सीन से प्रधानमंत्री सिंह की मुलाकात के बाद विदेश सचिव रंजन मथाई ने यह घोषणा की कि 2016 तक दोनों देशों के बीच रेल, जहाजरानी और रोड कनेक्टिवटी स्थापित करने की कोशिश की जाएगी।

दोनों देशों के प्रतिनिधि मंडल की बातचीत से पहले प्रधानमंत्री सिंह ने राष्ट्रपति सीन से मुलाकात की और कहा कि भारत तामू-कलेवा फ्रेंडशिप रोड के 71 पुलों की मरम्मत का काम देखेगा। गौरतलब है कि भारत ने इस रोड को बनाने में म्यांमार की मदद की थी। अब भारत की योजना है कि इस रोड को यार्गी में भारत के मोरे से और थाइलैंड के मेसो से जोड़ा जाए।

मथाई ने कहा, 'दोनों नेताओं ने फैसला किया है कि 2016 तक भारत कलेवा-यार्गी मार्ग की मरम्मत कर उसे हाइवे स्तरीय बनाएगा, जबकि म्यांमार यार्गी-मोनीवा मार्ग को हाइवे जैसा बनाएगा।' उन्होंने कहा कि दोनों नेताओं ने त्रिपक्षीय हाइवे बनाने के लिए जॉइंट टास्क फोर्स को फिर से बनाए जाने का भी स्वागत किया है। भारतीय अधिकारियों का मानना है कि यह हाइवे भारत और आसियान देशों के बीच एक पुल का काम करेगा। गौरतलब है कि आसियान देशों में सिर्फ म्यांमार ही है जिसके साथ भारत की साझा सीमा है।

इस वार्ता में दोनों नेताओं ने एक जॉइंट वर्किंग ग्रुप बनाए जाने का भी फैसला किया है, जो दोनों देशों के बीच क्रॉस-बॉर्डर रेल संपर्क और सीधे जहाजरानी संपर्क बनाने के लिए तकनीकी और व्यावसायिक जरूरतों पर काम करेगा। यही नहीं, म्यांमार के देवाई बंदरगाह जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रॉजेक्ट्स के विकास के लिए भारतीय मदद की संभावनाओं पर भी विचार हुआ।

हालांकि इस संयुक्त बयान में भारत के उत्तर-पूर्वी हिस्से को म्यांमार से जोड़ने वाले प्रॉजेक्ट का खास जिक्र नहीं किया गया। भारत के महत्वकांक्षी प्रॉजेक्ट (कलादन मल्टिमॉडल ट्रांसपोर्ट प्रॉजेक्ट) के जरिए नॉर्थ-ईस्ट को म्यांमार के सितवे बंदरगाह से जोड़ने की योजना है। बयान में इस प्रॉजेक्ट पर जारी काम पर संतुष्टि जताई गई और कहा गया कि हम जानते हैं कि मिजोरम तक सड़क बनाने का काम में देरी हो रही है।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह म्यांमार की यात्रा पर हैं और करीब 25 साल में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली म्यांमार यात्रा है। भारत ने द्विपक्षीय सहयोग की दिशा में नई यात्रा की शुरुआत करते हुए सोमवार को म्यांमार को 50 करोड़ डॉलर उधार देने की घोषणा की। प्रधानमंत्री की इस ऐतिहासिक यात्रा के दौरान दोनों देशों ने व्यापार, ऊर्जा, यातायात संपर्क जैसे क्षेत्रों में सहयोग के कुल 15 समझौते किए।

अंधविश्वासः वर्जिन गर्ल्स के साथ सेक्स से ठीक होता है एड्स




आज के मॉर्डन युग में भी दुनिया के कई देशों के कुछ हिस्से अंधविश्वास से ऐसे घिरे हुए हैं कि कई मासूम इसकी भेंट चढ़ रही हैं। जवान और कुंआरी लड़की के साथ सेक्स करने पर एचआईवी एड्स जैसी गंभीर बीमारी खत्म हो सकती है। इस अंधविश्वास ने साउथ अफ्रीका के ग्रामीण ईस्टर्न केप इलाके में इन दिनों जोर पकड़ लिया है। इसी चक्कर में कई जवान लड़कियों का अपहरण किया जा रहा है और उन्हें एड्स मरीजों के साथ शादी करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। कुछ ऐसे भी केस देखे गए कि इन मासूमों के साथ जबरन शादी के लिए किडनैपर्स इन मासूमों के माता-पिता को पैसे भी दे रहे हैं। साउथ अफ्रीका के जोशा इलाके में इस प्रथा को उखुतवाला नाम से जाना जाता है।

जब इस बारे में वहां के स्थानीय लोगों से बात की जाती है तो उनका कहना होता है कि इस बारे में ज्यादा जागरूकता नहीं है कि क्या हो रहा है और इसका परिणाम क्या होगा। कई का तो यह भी कहना है कि उन्हें नहीं पता कि यह प्रथा गलत है। हालांकि इसे लेकर जोशा में जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। इसमें इलाके के भी कुछ पढ़े-लिखे लोग शामिल हैं। उन्हें एचआईवी के बारे में बताया जा रहा है और यह भी कि इस चल रही गलत प्रथा से इस बीमारी का इलाज संभव नहीं है।

लोगों को यह भी बताया जा रहा है कि इससे बीमारी ठीक नहीं होगी, बल्कि उस लड़की को भी यह बीमारी हो सकती है। एक पीडि़त लड़की ने अपने इंटरव्यू में बताया कि एक दिन उसके पास एक महिला आई और उसने पूछा कि क्या तुम शादी करना चाहती हो। लड़की ने जब इनकार किया तो उसने कहा कि अगर तुम तैयार नहीं होगी तो तुम्हें इसकी सजा मिलेगी। फिर वह कुछ दिन बाद आई और अपने साथ नदी के किनारे ले गई। वहां 6 से 7 लोग मौजूद थे, जो उसे साथ लेकर गए। उन्होंने एक घर में जाने को कहा। घर में एक अधेड़ व्यक्ति था जिसने अपने साथ सोने के लिए जबरदस्ती की। हालांकि कुछ ऐसी लड़कियों को वापस उनके घर वाले अपना लेते हैं, लेकिन ज्यादातर छोड़ दी जाती हैं।

सैफीना की अक्टूबर में नहीं होगी शादी!




बॉलीवुड में अभिनेता सैफ अली खान और अभिनेत्री करीना कपूर की शादी की चर्चा जोरो पर है। खबरें मिली थी कि दोनों 16 अक्टूबर को शादी के बंध में बंध जाएंगे। पर अब इसे सिर्फ अफवाह बताया जा रहा है। फिलहाल करीना अपनी शादी को लेकर कुछ भी कहना नहीं चाहती। करीना इस समय टर्की में सैफ के साथ हैं। वह जुलाई में फिल्म ‘हिरोइन’ की शूटिंग पूरी करेंगी और उसके बाद भंसाली की फिल्म ‘राम-लीला’ के लिए गुजरात चली जाएंगी। सैफ और करीना बार-बार सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि वो पहले काम पर ध्यान देंगे और बाद में शादी करेंगे।

धोनी के लिए रोजलीन खान हुई टॉपलेस




बिकनी गर्ल पूनम पांडे ने शाहरुख व कोलकाता नाइट राइडर्स की जीत की खुशी में न्यूड होकर काफी सुर्खियां बटोर ली है। पूनम पांडे के नक्शे-कदम पर ही मॉडल रोजलीन खान भी चल पड़ी हैं और हारने वाली टीम चेन्नई सुपर किंग्स और कैप्टन महेंद्र सिंह धोनी को सपोर्ट करने के लिए टॉपलेस फोटोशूट करवा लिया है। धोनी की टीम के हारने रोजलीन का सपना टूट गया और वह टॉपलेस होकर टीम के लिए अपने सहानुभूति का इजहार करना चाहती हैं। रोजलीन ने कहा, 'मैं यकीन के साथ कह सकती हूं कि टीम अगले सिरीज में फिर वापस लौटेगी और आईपीएल में इतिहास रचेगी। मैं तो बस उनके प्रोत्साहन के लिए एक छोटा सा काम कर रही हूं।' इतना ही नहीं, किसी क्रिकेटर के साथ डेट करके वह कंट्रोवर्सी क्वीन बनना चाहती हैं।

जगनमोहन रेड्डी पर सुनवाई 31 मई तक टली




हैदराबाद : वाईएसआर कांग्रेस प्रमुख जगनमोहन रेड्डी की जमानत पर सीबीआई कोर्ट ने सुनवाई 31 मई तक के लिए टाल दिया है। उधर, जगनमोहन रेड्डी की मां और वाईएसआर पार्टी की मानद प्रमुख वाईएस विजया ने मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी से आग्रह किया है कि लोकतंत्र के व्यापक हित में उनके बेटे को रिहा करने के निर्देश सीबीआई को दिए जाएं।
सीबीआई ने कडप्पा के सांसद जगन मोहन रेड्डी को 14 दिन तक हिरासत में रखने की मांग करते हुए सोमवार को कहा कि आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति रखने के मामले में उनसे और पूछताछ करना जरूरी है। 39 वर्षीय जगन को सोमवार को सीबीआई की अदालत में पेश किया गया था। उन्होंने आंध्र प्रदेश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की भी मांग की।
कुरैशी को लिखे पत्र में विजया ने आरोप लगाया कि उनके बेटे को 12 जून को होने वाले उपचुनावों से कुछ दिन पहले एक साजिश के तहत गिरफ्तार किया गया ताकि उन्हें चुनाव में हिस्सा लेने से रोका जा सके और सत्तारुढ़ कांग्रेस उम्मीदवारों को फायदा पहुंचे। पत्र की प्रतिक्रिया में आंध्र प्रदेश के मुख्य चुनाव अधिकारी भंवर लाल ने कहा कि चुनाव आयोग इस बाबत विचार करेगा।

गंभीर चुनौती है जनसंख्या वृद्धि




जनसंख्या का मसला अकसर चर्चा में रहता आया है। बढ़ती जनसंख्या, घटते संसाधन और समाज में बढ़ती अराजकता की बात प्राय: चलती रहती है। पिछले दिनों प्रकाशित 'वल्र्ड-वाइड लाइफ फंडÓ की रिपोर्ट समस्या की गंभीरता एवं व्यापकता की तरफ नए सिरे से इशारा करती है। वह बताती है कि जनसंख्या जितनी तेजी से बढ़ रही है, उसके हिसाब से 2030 तक यदि दो धरतियां ले आएं, तो भी हमारी जरूरतें पूरी नहीं होंगी।
'लिविंग प्लॅनेट रिपोर्ट-2012Ó नाम से प्रकाशित इस रिपोर्ट में विश्व के पर्यावरण व बायोडायवर्सिटी-जैव विविधता का लेखा-जोखा है। 20 से 22 जून के बीच ब्राजील के रिओ-डी-जिनेरियो शहर में सस्टेनेबल डेवलपमेंट (दीर्घकालीन विकास) पर बैठक होनी है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि किसी भी देश की सरकारें दीर्घकालीन विकास के मुद्दे पर गंभीर नहीं हैं। यद्यपि इस सम्मेलन का फोकस तो इंसानों की बढ़ती जरूरते हैं, मगर इंसानों की बढ़ती संख्या भी अपने आप में एक बड़ा मुद्दा है।
गौरतलब है कि इस बीच भारत में जनसंख्या वृद्धि को लेकर एक खबर यह आई है कि पहली बार भारत में समग्र जनन-क्षमता दर (टोटल फर्टिलिटी रेट) 2.1 तक पहुंची दिखती है। यह दर किसी काल्पनिक महिला के संदर्भ में उसके जनन-क्षमता जीवनकाल के संदर्भ में तय होती है। जनसंख्या का विश्लेषण करने वाले बताते हैं कि अविकसित देशों में यह दर ज्यादा होती है, तो विकसित होने वाले देशों में यह कम होने लगती है। एक स्थूल अनुमान के हिसाब से देखें, तो यदि यह दर दो तक पहुंचती है और लंबे समय तक स्थिर रहती है, तो उसका मतलब होता है कि देश की आबादी अब स्थिर हो गई है या घटने वाली है। रजिस्ट्रार जनरल की रिपोर्ट के आधार पर शहरी भारत में, जहां कुल आबादी का लगभग 30 फीसदी हिस्सा रहता है, वहां समग्र जनन-क्षमता दर 1.9 तक पहुंच चुकी है, जबकि ग्रामीण भारत में यह दर इस वक्त 2.8 है, जो एक दशक पहले 3.4 थी। यानी, एक दशक में इसमें 0.6 की गिरावट आई है, पर यह पर्याप्त नहीं।
इस मामले में उत्तर व दक्षिण भारत के आंकड़ों में भी भिन्नता है। जहां दक्षिण के राज्य जनन-क्षमता कम करने में सफल हुए दिखते हैं, तो वहीं उत्तर के राज्यों को इस मुकाम तक पहुंचने की और कोशिश करनी है। स्पष्ट है कि 2011 की जनगणना के बाद हमें यह तो पता चला है कि जनसंख्या वृद्धि में गिरावट आई है, पर वह जितनी तेजी से कम होनी चाहिए, उसमें कुछ दशक और लग जाएंगे। इस बीच हमें यह भी विश्लेषण करना चाहिए कि सरकारी स्तर पर छोटे परिवार को लेकर जागरूकता फैलाने का जो प्रयास था, वह लगभग थम-सा क्यों गया है? सामाजिक स्तर पर भी जनसंख्या वृद्धि कोई समस्या नहीं है, ऐसा विचार सुनने को मिल रहा है।
यह सही है कि धीरे-धीरे लोगों में स्वत: जागरूकता आ रही है, पर विचारणीय यह है कि इसे समस्या नहीं मानने के विचार के पीछे क्या तर्क है? लोगों के एक हिस्से की तरफ से यह विचार आता है कि सरकारी नीतियां अगर सही रहीं, तो सभी को सब कुछ मिल जाएगा, पर कब तक? दूसरी बात सरकारी प्रयास की है। इंदिरा गांधी के समय का जबरन परिवार नियोजन का प्लान इतना बदनाम हुआ कि कांग्र्रेस को चुनाव में ऐसी मात खानी पड़ी कि इससे सबक लेकर कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक दलों ने भी इस प्रयास से बचना ही मुनासिब समझा।
पहले रेडियो-दूरदर्शन पर बड़े परिवारों में बंटती जमीन के टुकड़े या खत्म होते संसाधनों पर केंद्रित प्रचार दिखाया जाता था, आज वह लगभग ठप हो गया है। दूसरा नुकसान हुआ, सांप्रदायिक ताकतों द्वारा इसे दो समुदायों के बीच का मुद्दा बना देने से। समझने वाली बात यह है कि हिंदू-मुस्लिम या किसी भी धर्मावलंबी में यह आसानी से देखा जा सकता है कि पढ़ा-लिखा या समृद्ध हो चला तबका अपने बच्चों की संख्या कम रखता है। फिर, क्या वजह है कि गरीब तबके को ही, जहां बच्चों को पालने का खर्च मुश्किल होता है, वहीं जनसंख्या अधिक होती है? यदि सभी को बराबर के अवसर तथा जीवन में स्थायित्व का अहसास होने लगे, तो सभी परिवार को सीमित रखने का फायदा समझने लगेंगे।
- अंजलि सिन्हा

गौरव का विषय है महंगाई का बढऩा




पेट्रोल के दाम क्या बढ़े, देशभर में इसका विरोध हो रहा है। सरकार पर आरोप लगाया जा रहा है कि दाम उसी ने बढ़ाए। जब सरकार ने पेट्रोल को अपने नियंत्रण से ही मुक्त कर दिया, तो वह दाम कैसे बढ़ा सकती है? तेल कंपनियां घाटे में चल रही थीं, इसलिए उन्होंने दाम बढ़ाए, तो इसमें गलत क्या है? कोई कंपनी घाटे में तो चलेगी नहीं। इस मूल्य वृद्धि के बाद भी वे घाटे में ही चल रही हैं! मगर, लोग यह कहकर विरोध कर रहे हैं कि इससे महंगाई की आग और भड़क जाएगी। भला पेट्रोल का महंगाई से क्या लेना-देना? ट्रांसपोर्टिंग तो ट्रक जैसे भारी वाहनों से होती है और इन भारी वाहनों में डीजल का इस्तेमाल होता है। अगर डीजल के दाम बढ़ते, तो यह तर्क समझ में आता भी। मगर, पेट्रोल मूल्य वृद्धि से महंगाई बढ़ जाएगी, यह बात समझ से परे है।
फिर भी, पेट्रोल मूल्य वृद्धि से यदि महंगाई बढ़ जाएगी, तो यह भी हमारे लिए फायदे का ही सौदा है। देखा जाए, तो महंगाई बहुत मजेदार चीज है। भाव बढ़ते हैं, चीजों के, इंसानों के और सरकार के, लेकिन इज्जत बढ़ती है, सबकी। महंगाई से हर माल और इंसान की इज्जत में अभूतपूर्व इजाफा हो जाता है। सस्ताई में रखा ही क्या है? किसी शायर ने कहा है-'अच्छी सूरत भी क्या बुरी है, जिसने भी डाली, बुरी नजर ही डाली।Ó इसी प्रकार सस्ताई भी बुरी चीज है। जो भी डालता है, बुरी नजर ही डालता है। जब सब तरफ सब कुछ सस्ता हो, तो जनजीवन बुझा-बुझा-सा लगता है।
देश गतिशून्य होने लगता है। सरकार भी सोती हुई-सी दिखती है। न कोई हड़ताल, न बवाल। लोग सोचते हैं कि जब सब सस्ता है, तो कभी भी खरीद लेंगे, लेकिन अब देखिए, जब से पेट्रोल के दाम बढ़े हैं, तब से जनजीवन में उत्साह और उमंग का अभूतपूर्व वातावरण बन गया है। केवल विपक्षी दलों को ही नहीं, मीडिया वालों के साथ ही साथ देश के आम नागरिकों को भी बैठे-बिठाए एक काम मिल गया है। जमकर धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं। सड़कों पर जाम लगाए जा रहे हैं। सरकार के पुलते फूंके जा रहे हैं। मीडिया वाले पेट्रोल मूल्य वृद्धि पर चर्चाएं-परिचर्चाएं आयोजित कर रहे हैं। मूल्य वृद्धि को लेकर देश के गुस्से को दिखा रहे हैं।
पेट्रोल मूल्य वृद्धि से एक-दो दिन पहले ही प्रधानमंत्री ने कहा था कि देश बहुत गुस्से में है। इसी का फायदा उठाकर तेल कंपनियों ने पेट्रोल के दामों में इजाफा कर दिया। जब देश गुस्से में है ही, तो इस मूल्य वृद्धि से थोड़ा और गुस्से में आ जाएगा। जब देश कम गुस्से में था, तब भी वह किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सका, तो ज्यादा गुस्से में होने पर वह किसी का क्या बिगाड़ लेगा? मान लो कि सरकार ने ही दाम बढ़ाए, तो लोग उसका क्या बिगाड़ लेंगे? यानी, यह विरोध-प्रदर्शन उचित नहीं। दरअसल, महंगाई का बढऩा तो देश की प्रगति का प्रतीक है। महंगाई से जब गरीबों का खात्मा हो जाएगा, तो देश विकसित हो जाएगा। अगर महंगाई बढ़ती रही, तो हमारी गिनती विकसित देशों में होने लगेगी। यानी, इस मूल्य वृद्धि के विरोध का कोई औचित्य नहीं। महंगाई बढऩे दीजिए और विकसित देश होने का सुख भोगने के लिए तैयार रहिए।
- एसएस मानसी

आधी आबादी के साथ न्याय नहीं




महिलाओं के प्रतिनिधित्व की स्थिति जानने के लिए मीडिया स्टडीज ग्रुप द्वारा किया गया एक देशव्यापी सर्वे चौंकाने वाला है। लैंगिक असमानता को दिखाने वाला सर्वे बताता है कि मीडिया में महिलाओं का देशव्यापी औसत प्रतिनिधित्व मात्र 2.7 प्रतिशत है। इसमें छह राज्य व दो केंद्र शासित प्रदेश ऐसे हैं, जहां जिला स्तर पर महिला पत्रकारों का औसत शून्य है, जबकि आंध्र-प्रदेश में जिला स्तर पर कार्यरत महिला पत्रकार और संपादकों की संख्या सबसे ज्यादा (107) है।
लोकतंत्र के विभिन्न स्तंभों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की जब भी बात होती है, मीडिया महिलाओं के सशक्तिकरण के सवाल बहुत जोर-शोर से उठाता है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि खुद मीडिया में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की स्थिति बेहद खराब है।
सर्वे के लिए सूचना का स्रोत सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 को बनाया गया है। मीडिया स्टडीज ग्रुप ने पूरे भारत के 600 से अधिक जिलों से सूचना के अधिकार के तहत जिला स्तर पर कार्यरत पत्रकारों के बारे में जानकारी हासिल की। इस सर्वे में 28 प्रदेशों व केंद्र शासित राज्यों के 255 जिलों से मिली सूचनाएं शामिल की गई हैं। सर्वे में शामिल जिले पूरे भारत के करीब 40 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करते हैं। मीडिया स्टडीज ग्रुप को भारत के 255 जिलों से 14278 मान्यता प्राप्त पत्रकारों की सामाजिक पृष्ठभूमि के बारे में सूचनाएं मिली हैं।
इधर, भारतीय मीडिया के विस्तार के बारे में तथ्य यह है कि उसका तेजी से विस्तार हुआ है। आंकड़े बताते हैं कि भारतीय मीडिया और मनोरंजन व्यवसाय वर्ष-2011 में 11 प्रतिशत की दर से बढ़ा और इसका कुल व्यवसाय 72800 करोड़ रुपए का हो गया। वर्ष-2012 के लिए भी यह अनुमान है कि मीडिया की वृद्धि दर 13 प्रतिशत रहेगी और यह पूरा व्यवसाय 2016 तक अच्छी गति से विकास करता रहेगा। तब तक मीडिया और मनोरंजन का व्यवसाय 145700 करोड़ रुपए का हो जाएगा। इस तरह, पांच सालों में मीडिया की कुल विकास दर 15 प्रतिशत की होगी। मगर, यहां लैंगिक असमानता बहुत है।
भारतीय मीडिया में जिला स्तर पर औसतन सिर्फ 2.7 प्रतिशत महिलाएं ही काम कर रही हैं। सर्वे के आंकड़ों के अनुसार छह राज्यों व दो केंद्र शासित प्रदेशों में जिला स्तर पर कार्यरत महिला पत्रकारों, संवाददाताओं और संपादकों का प्रतिशत शून्य है। इन राज्यों में असम, झारखंड, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश, उड़ीसा और मणिपुर शामिल हैं। केंद्र शासित प्रदेशों में पुडुच्चेरी, दमन और दीव शामिल हैं। इन प्रदेशों से प्राप्त सूचना के अनुसार जिला स्तर पर यहां कोई मान्यता प्राप्त महिला पत्रकार नहीं है। संवाददाताओं और संपादकों के बारे में ये सूचना मणिपुर के चार, अरुणाचल के छह, उड़ीसा के दो, असम के दस, नगालैंड के तीन, झारखंड के छह तथा दमन व दीव और पुडुच्चेरी के एक-एक जिलों से मिली जानकारी पर आधारित है। सर्वाधिक महिला मान्यता प्राप्त संपादकों तथा संवाददाताओं वाले राज्यों में उत्तर-पूर्व के सिक्किम और मेघालय हैं। इन राज्यों में जिला स्तर पर कार्यरत मान्यता प्राप्त महिलाओं का प्रतिशत 16.66 है।
जिला स्तर पर कार्यरत महिला संवाददाताओं और संपादकों की हिस्सेदारी बिहार में 9.56 व छत्तीसगढ़ में 9.38 प्रतिशत है। इनमें बिहार के 22 और छत्तीसगढ़ के आठ जिलों से मिली जानकारी को शामिल किया गया है। बिहार में कुल 251 संवाददाताओं और संपादकों में 24 महिलाएं हैं और छत्तीसगढ़ में कुल 32 पत्रकारों में तीन महिलाएं हैं। इस सर्वे में 16 जिलों से प्राप्त जानकारी को शामिल नहीं किया गया, क्योंकि इन जिलों से मिली सूचना में मान्यता प्राप्त महिला और पुरुष संवाददाताओं के बारे में अलग-अलग जानकारी नहीं थी। इस तरह, इन 16 जिलों के 2099 पत्रकारों, संवाददाताओं, संपादकों को अलग कर दिया गया है। इस सर्वे में राज्य स्तर से राज्यों के मुख्यालयों में मान्यता प्राप्त संवाददाताओं-संपादकों की संख्या भी शामिल नहीं है। इसमें राजधानी दिल्ली में कार्यरत और केंद्र सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त पत्रकारों की सूचनाएं भी शामिल नहीं हंै।
दरअसल, सर्वे का उद्देश्य जिला स्तर पर कार्यरत मान्यता प्राप्त महिला पत्रकारों की जानकारी जुटाना था। राज्य मुख्यालयों में भी जिला स्तर पर मान्यता प्राप्त संवाददाताओं-संपादकों के बारे में जो सूचनाएं मिली हैं, उन्हें सर्वे में शामिल किया गया है। आंध्रप्रदेश में कुल मान्यता प्राप्त संवाददाताओं-संपादकों की संख्या 9392 है। इनमें 7761 के बारे में सूचना है। इनमें 107 महिलाएं हैं। आंध्रप्रदेश के गुंटूर जिले में कुल मान्यता प्राप्त संवाददाताओं की संख्या 967 है। उनमें केवल एक महिला है। चित्तूर में कुल 1146 मान्यता प्राप्त संवाददाताओं में 29 महिलाएं हैं। कडप्पा में कुल 1041 मान्यता प्राप्त संवाददाताओं में चार महिलाएं हैं, तो करीम नगर में कुल 1035 मान्यता प्राप्त संवाददाताओं में मात्र आठ महिलाएं हैं। आंध्रप्रदेश से संबंधित ये आंकड़े इसीलिए यहां दिए जा रहे हैं कि यहां देश के सर्वाधिक मान्यता प्राप्त संवाददाता और संपादक हैं।
सर्वे के आंकड़ों के अनुसार मीडिया में जिला स्तर पर काम करने वाली महिला संवाददाताओं की संख्या मुख्यधारा से बाहर के मीडिया के मान्यता प्राप्त प्रतिनिधियों की तुलना में बेहद कम है। सर्वे में शामिल जिलों से मिली सूचनाओं के अनुसार अधिकतर मुख्यधारा का दर्जा प्राप्त मीडिया में भी जिला स्तर पर कार्यरत महिला पत्रकारों की संख्या नहीं के बराबर है। इस संदर्भ में सार्वजनिक क्षेत्र के मीडिया संस्थान प्रसार भारती के ऑल इंडिया रेडियो की स्थिति सबमें बेहतर है। जिला स्तर पर उसके मान्यता प्राप्त महिला संवाददाताओं की संख्या छह पाई गई है। आंकड़ों के अनुसार देशभर में दो महिला पत्रकारों को स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर मान्यता है। इनमें से एक स्वतंत्र फोटोग्राफर है।
वर्ष-2006 में मीडिया स्टडीज ग्रुप ने मीडिया कर्मियों की सामाजिक पृष्ठभूमि पर एक अध्ययन किया था। यह बताता है कि निर्णय लेने वाले पदों पर महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 17 प्रतिशत है। अंग्रेजी का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया यहां बेहतर स्थिति में था, जहां निर्णय लेने वाले पदों पर 32 प्रतिशत महिलाएं थीं। मीडिया स्टडीज ग्रुप ने यह सर्वे दिल्ली स्थित 37 मीडिया संस्थानों में निर्णय लेने वाले 315 महत्वपूर्ण पदों को दायरे में रखते हुए किया था। इसमें हर संस्थान में ऊपर से 10 पदों के बारे में अध्ययन किया गया था। गांवों के मुकाबले शहरों में महिलाओं के लिए शिक्षा और रोजगार के अवसर ज्यादा हैं। इस आधार पर यदि 2006 के सर्वे से वर्तमान सर्वे की तुलना की जाए, तो मीडिया में महिलाओं का प्रतिनिधित्व निराश करता है। हमारा मानना है कि मीडिया संस्थानों को आधी आबादी के समुचित प्रतिनिधित्व के लिए ज्यादा सचेत होकर काम करने की जरूरत है।
- अनिल चमडिय़ा

'प्रेम अंडा' में सन्नी लगाएंगी ठुमके!




सन्नी लियोन बॉलीवुड क्या टॉलीवुड में भी हॉट टॉपिक बनी हुई हैं। सब तरफ सन्नी की चर्चा हो रही है। तभी तो हर डायरेक्टर उन्हें अपनी फिल्म में लेना चाहता है। खबर है कि सन्नी जल्द ही कन्नड़ फिल्म 'प्रेम अंडा' में स्पेशल डांस करने जा रही हैं। यह सन्नी का पहला आइटम नंबर होगा, जिसमें वह सोलो डांस करेंगी। फिल्म के डायरेक्टर महेश बाबू ने बताया, 'सनी उनकी फिल्म में एक स्पेशल डांस करेंगी और उनका रोल भी बिल्कुल अलग होगा। चूंकि सन्नी ने फिल्म में काम करने की हामी भर दी है, इसलिए अब बस डेट फाइनल होनी बाकी है। जैसे ही वह डेट फाइनल करती हैं, हम तुरंत शूटिंग शुरू कर देंगे।'


अपने दम पर मुकाम
हाल ही में आई फिल्म इशकजादे में अपने काम के लिए प्रशंसा बटोर रहे अभिनेता अर्जुन कपूर का कहना है कि उन्होंने फिल्म उद्योग में स्वयं को स्थापित करने के लिए कभी भी अपने पिता निर्माता बोनी कपूर के नाम का सहारा नहीं लिया है। आज उन्होंने बॉलीवुड में जो कुछ पाया है अपनी मेहनत और लगन के बलबूते पर पाया है। उन्होंने कहीं पर अपने चाचा अनिल कपूर के नाम का इस्तेमाल नहीं किया। सिनेमाई परदे पर आने से पहले मैंने सिनेमा को समझा। बतौर सहायक निर्देशक यशराज कैंप के साथ जुड़ा। सिनेमा की एबीसीडी मैंने वहीं से सीखी। अर्जुन कपूर का कहना है कि वह लोगों की उम्मीदों पर खरे उतरेंगे और अपने किरदारों के साथ नए प्रयोग करेंगे। अर्जुन कपूर ने कहा कि वह नई नई विधाओं में काम करना चाहते हैं। अर्जुन ने बताया मैंने कभी यह नहीं सोचा है कि मुझे क्या करना है और किससे बचके रहना है। मैं खुद को एक ऐसे अभिनेता के रूप में देखना चाहता हूं जो सब कुछ कर सके। मैं एक रोमांटिक फिल्म से लेकर मसाला फिल्म भी करना चाहूंगा। अर्जुन का मानना है कि बॉलीवुड में ब्रेक मिलने में उनके पिता के नाम का हाथ नहीं है और फिल्म जगत में टिकने के लिए प्रतिभा ही जरूरी है। उन्होंने कहा ऐसा नहीं है कि आप एक निर्माता के बेटे हैं तो आपके लिए राहें आसान हैं। दर्शक ऐसा नहीं सेाचते हैं। वे समझदार हैं और उन्हें फर्क नहीं पड़ता है कि आप किसके बेटे या बेटी हैं।
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सनी लियोन के ठुमके
सनी लियोन इन दिनों सिर्फ बॉलीवुड ही नहीं, बल्कि टॉलीवुड में भी हॉट टॉपिक बनी हुई हैं। तभी तो हर डायरेक्टर उन्हें अपनी फिल्म में लेना चाहता है। खबर है कि सनी जल्द ही कन्नड़ फिल्म प्रेम अडा में स्पेशल डांस करने जा रही हैं। यह सनी का फस्र्ट आइटम नंबर होगा, जिसमें वह सोलो डांस करेंगी। फिल्म के डायरेक्टर महेश बाबू ने बताया, सनी उनकी फिल्म में एक स्पेशल डांस करेंगी और उनका रोल भी बिल्कुल अलग होगा। चूंकि सनी ने फिल्म में काम करने की हामी भर दी है, इसलिए अब बस डेट फाइनल होनी बाकी है। जैसे ही वह डेट फाइनल करती हैं, हम तुरंत शूटिंग शुरू कर देंगे। आपको बता दें कि हाल में वीना मलिक ने भी अपनी कन्नड़ फिल्म डर्टी पिक्चर की शूटिंग शुरू की है। अब देखने वाली बात यह होगी कि दर्शकों को वीना और सनी में से किसके ठुमके ज्यादा पसंद आते हैं!
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मेंटर बने उदय
इन दिनों उदय चोपड़ा ऐक्ट्रेस परिणीति चोपड़ा के मेंटर बने हुए हैं। वह न सिर्फ करण जौहर की पार्टी में परिणीति को टिप्स देते नजर आए, बल्कि अगले दिन प्रियंका चोपड़ा की पार्टी में भी कुछ इसी अंदाज में दिखे। पार्टी में मौजूद एक आइविटनेस ने बताया कि परिणीति साढ़े नौ बजे पहुंची और उदय 11 बजे उसके 20 मिनट बाद प्रियंका भी पार्टी में पहुंच गईं और पार्टी शुरू हुई। गौरतलब है कि इन दिनों परिणीति यशराज बैनर की फेवरिट स्टार बनी हुई हैं। शायद इसलिए उदय पार्टी में पूरे टाइम परिणीति के मेंटर बने दिखाई दिए। वैसे, उदय और परिणीति आपस में क्या बात कर रहे थे, यह तो सुनाई नहीं दिया, लेकिन परिणीति उदय को उदय सर जरूर कह रही थीं। आपको बता दें कि इशकजादे की प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी उदय ज्यादा ऐक्टिव थे। हालांकि इसकी वजह आदित्य चोपड़ा का मीडिया फ्रेंडली ना होना है। सोर्स की मानें, तो आदित्य बिल्कुल भी मीडिया फ्रेंडली नहीं हैं, जबकि उदय मीडिया को बहुत ही अच्छे से हैंडल करना जानते हैं। यही वजह है कि वह इशकजादे के प्रमोशन में भी परिणीति के मेंटर के तौर पर ज्यादा नजर आएं। अब देखने वाली बात यह होगी कि उदय के टिप्स परिणीति को कितना फायदा पहुंचाते हैं!
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घर पर मनाया जश्न
हॉलीवुड की स्टार जोड़ी एंजलीना जोली और ब्रैड पिट ने अपने ब्रिटेन स्थित घर पर संगीत की धुन पर परिवार के साथ आनंद मनाया। सन ऑनलाइन की रिपोर्ट के अनुसार, इस जोड़ी ने सूरी में स्थित अपने घर पर अपने परिवार को संगीत के करीब लाने के लिए एक थिएटर कंपनी को बुलाया था। हालांकि यह विचार वास्तव में उनके बच्चे पैक्स, नॉक्स, विविएन, शिलोह, मैडोक्स और जारा को संगीत सिखाने के लिए था, लेकिन पिट और जोली ने भी माइक्रोफोन पकडऩे में शर्मिंदगी नहीं दिखाई। सूत्रों ने बताया कि ब्रैड को बच्चों के सामने धुन बजाना पसंद है। एंजलीना के अनुसार, बच्चों के लिए गाने का यह अभ्यास काफी मस्ती भरा रहा और थिएटर समूह ने भी काफी मदद की। हालांकि उन्होंने इसके लिए काफी कम समय बिताया लेकिन ब्रैड और एंजी ब्रिटेन में रहने के दौरान इसे हमेशा करना चाहते हैं। बच्चों ने गाने के लिए अपने मनपसंद पॉप गानों को चुना जबकि 47 वर्षीय पिट और 36 वर्षीय जोली ने पुराने क्लासिक पॉप धुनों को चुना। यह परिवार ब्रिटेन में दो साल तक रहने की योजना बना रहा है, जबकि एंजलिना वहां एक के बाद एक तीन फिल्मों की शूटिंग करने वाली हैं।
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टिम्बरलेक-बील की सगाई
अभिनेता जस्टिन टिम्बरलेक और जेसिका बील ने एक समारोह में परिवार और दोस्तों की मौजूदगी में सगाई की। टिम्बरलेक और बील ने कैलीफोर्निया के होममिंट कोलाबोरेटर स्टी स्टैंनले हाउस में सगाई का जश्न मनाया। 31 वर्षीय अभिनेता टिम्बरेलक ने चार वर्ष तक एक-दूसरे के साथ समय बिताने के बाद पिछले वर्ष दिसंबर में बील के सामने शादी का प्रस्ताव रखा था। सगाई वाले दिन टिम्बरलेक ब्लैक सूट और फेडोरा पहने हुए थे, जबकि 30 वर्षीया उनकी मंगेतर ने लियोपार्ड प्रिंट की ड्रेस के साथ गुलाबी रंग की जूते व बेल्ट पहन रखी थीं।
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करण- एकता का मिलन
करण कपूर ने बालाजी फिल्म्स की लोकप्रियता और सफलता को देखते हुए इसकी सीईओ एकता कपूर के साथ हाथ मिलाते हुए एक नई फिल्म बनाने की घोषणा की है। बॉलीवुड में करण जौहर का एकता कपूर से हाथ मिलाना आगामी वर्षो में कुछ ऐसी फिल्मों का संकेत दे रहा है जिसमें पारिवारिक चाशनी के साथ सेक्स को भुनाया और दिखाया जाएगा। करण कपूर अब तक पारिवारिक माहौल की फिल्में बनाते रहे हैं और एकता कपूर अपने बैनर तले अब तक सिर्फ सेक्स को प्रमोट करती रही हैं। कहा जा रहा है कि करण जौहर ने इस फिल्म के साथ ही एक और आश्चर्यजनक कदम उठाते हुए अपने बैनर के साथ इमरान हाशमी को जोड़ा है। यह पहला मौका होगा जब बॉलीवुड में हमेशा नकारात्मक दृष्टिकोण से देखे जाने वाले लेकिन 100 प्रतिशत सफल फिल्में देने वाले इमरान हाशमी को किसी बडे बैनर ने अपने साथ जोडा है। करण जौहर व एकता कपूर अपने इस संयुक्त उपक्रम के लिए करीना कपूर को बतौर नायिका लेना चाहते थे लेकिन तारीखों की समस्याओं के चलते या यूं कहें कि इमरान हाशमी के साथ काम न करने के कारण करीना कपूर ने इस फिल्म में काम करने से इंकार कर दिया। इसके करण जौहर ने बॉलीवुड की दूसरी व्यस्त नायिका और युवाओं में तेजी से उभरती दीपिका पादुकोण को अपनी फिल्म के लिए एप्रोच किया है। जब दीपिका को यह रोल ऑफर किया गया तो वे इमरान के साथ काम करने में थोडा हिचक रही थीं लेकिन जब उन्होंने देखा कि इमरान की फिल्म जन्नत-2 ने बॉक्स ऑफिस पर पहले ही दिन करीब 10 करोड़ का बिजनेस किया है तो दीपिका को यकीन हो गया कि इमरान उभरते हुए कलाकार हैं जिनका भविष्य बहुत उज्जवल है।
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मैन इन ब्लैक
पिछले हफ्ते रीलिज हुई हॉलीवुड फिल्म मैन इन ब्लैक 3 ने दो हफ्तों में रिलीज हुई सारी बॉलीवुड फिल्मों को पीछे छोड़ दिया। पहले ही दिन फिल्म मैन इन ब्लैक 3 का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन कुल 3.25 करोड़ रिकॉर्ड हुआ। न्यूयार्क में भी मैन इन ब्लैक 3 ने हाल में रिलीज हुई फिल्म- दि एवेन्जर्स को पीछे छोड़कर हर शहर में कुल 202 मिलियन डॉलर का बिजनेस किया है। इसके साथ ही रिलीज हुई यू टीवी मोशन पिक्चर्स और वॉल डिजनी की एनिमेटेड फिल्म अर्जुन: दि वॉरियर और हेमेन्द्र आरन की ये खुला आसमान का बॉक्स ऑफिस पर पहला दिन बहुत ही ठंडा रहा। और मैन इन ब्लैक 3 के आगे ये फिल्मे दूर दूर तक कहीं नजर नहीं आईं।
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खत्म हो रहा एक्शन
हॉलीवुड के एक्शन स्टार सिलवेस्टर स्टालोन का कहना है कि एक्शन फिल्मों का दौर धुंधला पड़ता जा रहा है क्योंकि वर्तमान फिल्मों में सुपरहीरो को विशेष शक्तियों से युक्त दिखाया जाता है। सूत्रों के अनुसार, रैंबो और रॉकी जैसी एक्शन फिल्मों के लिए मशहूर 65 वर्षीय अभिनेता जल्दी ही एक्सपेंडेबलस 2 में एक्शन करते दिखेंगे। स्टालोन का कहना है, दु:ख की बात है कि एक्शन का दौर धुंधला पड़ता जा रहा है। आजकल आपके पास ऐसे सुपरहीरो हैं जिनमें तमाम विशेष शक्तियां हैं, वह पलक झपकाते हैं और काम हो जाता है। यह बहुत अच्छा है। और दूसरी ओर हम हैं जो अभी भी हाथ से या खुद से किए जाने वाले एक्शन को फॉलो करते हैं। एक्सपेंडेबलस 2 के 17 अगस्त को रिलीज होने की संभावना है।
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छवि बरकरार रखूंगा
विकी डोनर के स्टार अभिनेता आयुष्मान खुराना का मानना है कि उनकी एक आम लड़के की छवि ने ही उन्हें दर्शकों के बीच मशहूर बनाया है। इसलिए वे अपनी इस छवि को अपने एक्टिंग कैरियर में बनाए रखेंगे। वीजे से अभिनेता बने 27 साल के आयुष्मान को बनावटी व्यवहार में यकीन नहीं है। वे कहते है कि वे नेचुरल बने रहने में यकीन रखते हैं इसलिए अपने आने वाले प्रोजेक्ट्स में कोई अलग छवि बनाने के इच्छुक नहीं हैं। आयुष्मान कहते हैं, मैंने अपने लिए कोई सीमाएं नहीं तय की हैं। मेरा यकीन नेचुरल बने रहने में है। विकी डोनर में भी मैंने अपने प्रोफाइल के बारे में नहीं सोचा। मैं एक कोरे कागज की तरह रहा। मैंने दिल्ली की बोलचाल की भाषा अपनाई और हर दृश्य के सार को समझ लिया। आपका स्वाभाविक बने रहना जरूरी है, चूंकि मैं एक एंकर हूं इसलिए मुझे इसकी आदत है। अपने कदमों को जमीं पर रखे रहना ही मेरी खासियत है। आयुष्मान हमारा बजाज नाम की फिल्म में भी काम कर रहे हैं जो कि एकआगरा से आए एक संघर्षरत अभिनेता की कहानी है। इसके अलावा आयुष्मान का सबसे हालिया प्रोजेक्ट 8 जून को सिंगापुर में होने वाले आईफा रॉक्स को चित्रांगदा सिंह के साथ होस्ट करने का है। आयुष्मान का मानना है कि स्वाभाविक बने रहना आपके भीतर से आता है। आयुष्मान का स्वाभाविक बने रहना आईफा रॉक्स में उन्हें काफी मदद करेगा।
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उमराव जान 2 में रेखा !
निर्देशक मुजफ्फ अली अपनी फिल्म उमरावजान के सीक्वल उमराव जान 2 के लिए भी रेखा को ही चाहते हैं। 1981 में इस फिल्म ने रेखा को राष्ट्रीय पुरस्कार दिलवाया और साथ ही यह गाना भी बहुत लोकप्रिय हुआ। सूत्रों के मुताबिक रेखा भी सीक्वल में काम करने के लिए मनाया जा रहा है। मुजफ्फर बॉलीवुड में वापसी करना चाहते हैं और उन्होंने उमराव जान के पटकथा लेखक से उमरावजान 2 की पटकथा भी लिखने को कहा है। सिद्दीकी ने भी पटकथा लिखने की पुष्टि की और कहा कि हम 30 साल बाद एकसाथ काम करेंगे।
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65 लाख डॉलर का बंगला
पॉप सिंगर जस्टिन बीबर ने कैलिफोर्निया के उपनगर कैलाबसस में 65 लाख डॉलर का एक बंगला खऱीदा है। यह बीबर का खरीदा हुआ पहला बंगला है। सूत्रों की माने तो, 18 वर्षीय बीबर ने यह बंगला कार्डेशियन परिवार से खरीदा है। इस बंगले का मालिकाना कभी हक एडी मरफी की पूर्व पत्नी निकोल मिशेल के पास था। इसका निर्माण वर्ष 2005 में हुआ था। 10,000 वर्ग फुट में फैले इस बंगले में आठ बाथरूम्स , एक लाइब्रेरी , स्टेडियम की सुविधा वाला एक सिनेमाघर, एक बार और 1.3 एकड़ क्षेत्र में फैला एक तालाब है। इसके अलावा बंगले में एक बड़ा सा गेस्टरूम, एक गेम्सरूम और विशाल गैराज भी है। आपको बता दे कि बीबर इस बंगले में कुछ अत्याधुनिक गैजेट लगाना चाहते हैं।
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गुरुवार, 24 मई 2012

कांग्रेस को सबक सिखाओ



- राजकुमार सोनी



भोपाल। मध्यप्रदेश की आम जनता ने कहा है कि कांग्रेस को भारत की जनता ही सबक सिखा सकती है। साथ ही उन्होंने कहा कि विपक्ष की यह जिम्मेदारी बनती है कि सत्तारूढ़ केन्द्र सरकार को तत्काल उखाड़ फेंके। यदि एक साल ऐसा ही चलता रहा तो महंगाई के बोझ तले आम जनता दबकर रह जाएगी। महंगाई विरोधी जनजागरण समिति के अध्यक्ष रमेशचंद्र श्रीवास्तव ने कहा कि पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस के दाम बढ़ाने, सब्जियों, गेंहू, दालें, खाद्य तेल, देसी घी, यूरिया, बिजली की दरें बढऩे से लोगों की कमर टूट चुकी है। ऐसे में उसका जीवन जीना मुहाल हो गया है। नगर निगम भोपाल कर्मचारी यूनियन के प्रमुख अशोक वर्मा ने कहा कि इस बार कांग्रेस को ऐसा सबक सिखाओ कि पुन: वह कभी भी सत्ता में न आने पाए। क्योंकि लम्बे कार्यकाल के लिए कांग्रेस को सत्ता चलाने का आशय यह नहीं है कि आम जनता की जरूरतों का ख्याल ही नहीं रखा जाए। महंगाई दर लगातार बढऩे से सबसे ज्यादा बोझ आम जनता पर ही पड़ता है। उपभोक्ता जन मंच के शिरीष गोस्वामी का कहना है कि पेट्रोल महंगा होने तथा राज्यों में वैटकर 27 से 35 फीसदी होने से पेट्रोल की गाडिय़ां चलाना क्या बंद हो जाएंगी। रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने, ऑफिस आने-जाने के लिए बिना वाहन कैसे जाया जा सकता है। अब रसोई गैस, डीजल पर तीव्र बढ़ोत्तरी की जा रही है। गोस्वामी का कहना है कि ये वही वित्तमंत्री हैं जो उदारीकरण की नीति लाए थे। इस वजह से ऐसा हाल है और अब चुप्पी साधकर सारा तमाशा खुद देख रहे हैं। बड़े व्यापारियों, उद्योगपतियों, मुनाफाखोरों, दबंगों को हमेशा फायदा पहुंचाना कांग्रेस की नीति रही है। इससे आम जनता तो रो रही है, उसे अब न तो मरना आ रहा है न जीना आ रहा है।

सभी ने किया विरोध
इधर, प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पेट्रोल की कीमतें लगातार बढऩे का, केंद्र सरकार का जबरदस्त विरोध किया है। उन्होंने कहा है कि इससे आम जनता बुरी तरह प्रभावित होगी। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष प्रभात झा ने कहा कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी को आम जनता का ख्याल रखना चाहिए, लेकिन वहब ऐसा नहीं कर रही है।









बुधवार, 23 मई 2012

कृषक बीमा योजना में अब मिलेंगे 5 लाख रुपए




उत्तर प्रदेश सरकार ने बुधवार को दिए एक महत्वपूर्ण फैसले में कृषक बीमा दुर्घटना योजना की राशि एक लाख से बढ़ाकर पांच लाख रुपए कर दी है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल की बैठक में इस आशय का निर्णय लिया गया। किसान की दुर्घटना में मृत्यु हो जाने पर उसके परिजनों को पांच लाख रुपए मिलेंगे। सरकार ने यह योजना तत्काल प्रभाव से लागू कर दी है। इसके अलावा मंत्रिमंडल ने सभी राजस्व अदालतों के कंप्यूटरीकरण का भी निर्णय लिया। अदालतों के कंप्यूटरीकरण से अभिलेखों के रखरखाव में मदद मिलेगी।

पेट्रोल 7.50 रुपये् महंगा,महंगाई की मार से जनता परेशान




नई दिल्ली।। महंगाई की मार से जूझ रही जनता पर बड़ी मार पड़ी है। तेल कंपनियों ने बुधवार की शाम को पेट्रोल की कीमत में 7.50 रुपये प्रति लीटर बढ़ोतरी की घोषणा की है। बढ़ी हुई कीमतें बुधवार आधी रात से लागू हो जाएंगी। अब दिल्ली में पेट्रोल का दाम 73.14 रुपये प्रति लीटर हो जाएगा।
डॉलर के मुकाबले रुपये के लगातार गिरते स्तर का प्रभाव पेट्रोल की कीमतों पर पड़ ही गया। तमाम राजनीतिक दबावों को दरकिनार कर तेल कंपनियों ने पेट्रोल की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी की है। पेट्रोल बुधवार आधी रात से 7.50 रुपये प्रति लीटर महंगा हो जाएगा। डीजल और एलपीजी दाम नहीं बढ़ाए गए हैं, लेकिन माना जा रहा है कि इनकी कीमतों में कभी भी बढ़ोतरी हो सकती है। गौरतलब है कि बुधवार को रुपया डॉलर के मुकाबले रेकॉर्ड 56 रुपये के पार पहुंच गया। अर्थशास्त्रियों ने आशंका जताई है कि रुपये में और कमजोरी आ सकती है। यह प्रति डॉलर 60 रुपये के स्तर तक गिर सकता है। बुधवार को एक वक्त रुपया एक डॉलर के मुकाबले 56.21 रुपये के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया था, जो अब तक की रुपये की सबसे बड़ी गिरावट है। तेल कंपनियों को अब पेट्रोल पर करीब 12 रुपये और डीजल पर 15 रुपये प्रति लीटर का घाटा हो रहा है। 2011-12 में तेल कंपनियों को 1,38,541 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था। सरकार ने 83,500 करोड़ की भरपाई की। सरकार ने वर्ष 2010 में तेल की कीमतों पर से नियंत्रण हटा लिया था जिसके बाद से पेट्रोल की कीमतें बाज़ार के हिसाब से तय होती हैं. पिछले साल नवंबर में तेल की कीमतें बढ़ती थीं. अब तक पिछले दो वर्षों में तेल की कीमतों में 14 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो चुकी है. रुपए की कीमत में गिरावट इसका एक बड़ा कारण है. डीजल, केरोसीन और कुकिंग गैस की कीमतें पिछले साल जून में बढ़ाई गई थीं. जयपाल रेड्डी का कहना था, ‘‘ अगर रुपए की कीमती गिरती रहती है तो हमारी तेल कंपनियों को भारी नुकसान होता रहेगा. अभी ही रुपया 55 के स्तर पर पहुंच गया है. तेल कंपनियों को करोड़ों का नुकसान हो चुका है. कुछ करना जरुरी है. तेल की कीमतें बढ़ानी जरुरी हैं.’’ पिछले कुछ वर्षों में तेल कीमतें बढ़ी तो हैं लेकिन शायद ये पहली बार है जब तेल की कीमतों में एक ही बार में साढ़े सात रुपए की बढ़ोतरी की गई है. माना जाता है कि इसके कारण महंगाई बढ़ने के भी आसार रहेंगे. पहले से ही मंहगाई की मार झेल रही आम जनता पर भी इसके बुरे असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है.

डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर




मुंबई: आयातकों की डॉलर मांग बढऩे से रुपया आज अमेरिकी करेंसी के मुकाबले 5 पैसे कमजोर होकर 54.47 पर खुला। अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में शुक्रवार को डॉलर के मुकाबले रुपया 5 पैसे की मजबूती के साथ 54.42 पर बंद हुआ था। कारोबारियों के अनुसार मुख्य रूप से आयातकों की डॉलर मांग बढऩे से रुपए पर असर पड़ा। इधर, बंबई शेयर बाजार का सेंसेक्स 76.53 अंक या 0.47 प्रतिशत की बढ़त के साथ 16,229.28 अंक पर खुला।

कार पर लालबत्ती नहीं: सोनिया गांधी




नई दिल्ली: संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) और कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपनी कार पर लाल बत्ती लगाने से मना कर दिया है। कांग्रेस संसदीय दल की कार्यकारी समिति की बैठक में पार्टी के कुछ नेताओं ने यह निर्णय लिया था और वे कांग्रेस अध्यक्ष से इस पर हरी झंडी चाहते थे। लेकिन सोनिया ने इससे इंकार कर दिया। केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक सदस्य ने कहा, ‘‘उन्होंने दृढ़तापूर्वक इससे इंकार कर दिया है। यह हमारे लिए आदेश की तरह है।’’ सूत्र के अनुसार, सोनिया ने कहा, ‘‘मैं इसकी अनुमति कैसे दे सकती हूं?’’ सोनिया ने हालांकि सांसदों को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में लाल बत्ती इस्तेमाल करने की अनुमति देने वाले किसी भी अधिसूचना को ना कह दिया है, लेकिन उन्होंने यह भी कहा है कि राज्य इस सम्बंध में अपने अनुसार निर्णय ले सकते हैं। पिछले साल दिसम्बर में नैतिकता मामलों पर संसदीय समिति ने सांसदों को अपनी गाड़ी पर लाल बत्ती लगाने देने की अनुमति मांगी थी। सांसदों की दलील थी कि यदि विधायक और पंचायत के सादस्य अपने वाहनों पर लाल बत्ती का इस्तेमाल कर सकते हैं तो वे ऐसा क्यों नहीं कर सकते?

2000 हजार रुपए के आगे हार गई ममता




कोलकाता - कई बार गरीबी व्यक्ति को इतना ज़्यादा मजबूर कर देती है कि उसे अपने दिल पर पत्थर रख कर बहुत ही कठिन फ़ैसले लेने पड़ते हैं। इस तरह का ही एक मामला पश्चिमी बंगाल के नादिया जिले में देखने को मिला है, जहाँ एक माँ ने अपनी 7महीनों की मासूम बच्ची को 2000 रुपए में बेच दिया। रिंकू दास नाम की इस औरत के पति की कुछ समय पहले मौत हो गई थी और उस के 2बच्चे हैं। गरीब होने के कारण वह अपनी दूसरी बच्ची का पालन -पोषण करने में असमर्थ थी, जिस कारण उस ने बच्ची को अपने पड़ोसी के पास बेच दिया, जिस के घर कोई बच्चा नहीं था। फि़लहाल पुलिस ने इस मामलो में दख़ल देते हुए बच्ची वापस करने के लिए कहा है। पुलिस का तर्क है कि बेशक ही माँ के लिए बच्ची को पालना मुश्किल है, परन्तु फिर भी यह बच्ची की भलाई के लिए ज़रूरी है कि वह अपनी माँ के साथ रहे। अब रिंकू दास तो बच्ची वापस लेने के लिए तैयार है, परन्तु पड़ोसी बच्ची वापस नहीं करना चाहता।

इलाहाबाद में ब्लास्ट, 6 की मौत




इलाहाबाद।। उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में हुए बम ब्लास्ट में 6 लोगों की मौत हो गई है। हादसे में करीब 20 लोगों के घायल होने की खबर है। इलाहाबाद के एसपी का कहना है कि यह ब्लास्ट देसी बम से हुआ है। इलाहाबाद के करेली इलाके में बुधवार को करीब 3 बजे एक ब्लास्ट हुआ। इस ब्लास्ट में 6 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई है। मरने वालों में 4 बच्चे और 2 महिलाएं शामिल हैं। हालांकि, अभी प्रशासन ने सिर्फ 4 लोगों की मौत की पुष्टि की है। सूत्रों के मुताबिक, ब्लास्ट कूड़े के ढेर में हुआ है। प्रशासन राहत एवं बचाव कार्य जोरों पर चला रहा है। जिला प्रशासन अभी ब्लास्ट के बारे में कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं है। करेली इलाके में बड़ी संख्या में झुग्गी बस्ती वाले रहते हैं। यह अल्पसंख्यक बहुल इलाका है। यहां बड़ी संख्या में बांग्लादेशी रहते हैं। यह इलाका यमुना नदी के किनारे है। साथ ही यहां की गलियां भी तंग हैं। ब्लास्ट के बाद यूपी के आला अधिकारियों की बैठक लखनऊ में चल रही है। मामले की पूरी जांच के लिए एक विशेष टीम को लखनऊ से इलाहाबाद के लिए रवाना कर दिया गया है। इस ब्लास्ट की पूरी जानकारी केंद्रीय गृह मंत्रालय ने यूपी सरकार से मांगी है। केंद्रीय जांच एजेंसियों को इस इलाके में इंडियन मुजाहिदीन के मॉड्यूल के होने का अंदेशा है। यूपी पुलिस के आला अधिकारी मौके पर पहुंचे हैं। शहर के सभी थानों की पुलिस को सतर्क कर दिया गया है। सूबे की राजधानी लखनऊ में पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने आपात बैठक की है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस घटना के बारे में यूपी पुलिस से रिपोर्ट मांगी है। धमाके की सूचना के बाद यूपी पुलिस के आला अधिकारियों ने मौके पर पहुंच कर स्थिति का जायजा लिया। लखनऊ में भी पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस संबंध में आपात बैठक बुलाई है। गृह मंत्रालय ने उत्तर प्रदेश सरकार से इस संबंध में जानकारी मांगी है।




करिश्मा कपूर लेंगी तलाक



करिश्मा के लिए यह इश्क वाकई डेंजरस रहा। उनकी फिल्म 'डेंजरस इश्क' भी नहीं चली और इश्क के डेंजर से उनकी मैरिड लाइफ भी बर्बाद हो गई। खबर है कि उनके हज़्बंड संजय कपूर इन दिनों किसी और के प्यार में गिरफ्तार हैं और उससे शादी भी करना चाहते हैं। बता दें कि करिश्मा ने 2003 में दिल्ली के बिजनेसमैन संजय कपूर से शादी की थी, लेकिन दोनों की आपस में ज्यादा बनी नहीं। काफी लड़ाई-झगड़ों के बाद करिश्मा अपने दोनों बच्चों के साथ मुंबई में रह रही हैं, तो संजय यहीं दिल्ली में हैं और बताया जा रहा है कि इन दिनों वह प्रिया चटवाल को लेकर सीरियस हैं। हालांकि इस वजह से कपूर कपल में काफी टाइम से दिक्कत चल रही है, लेकिन अब संजय के प्रिया के साथ अपना रिलेशन ओपन करने की वजह से सारी बातें साफ हो ही चुकी हैं।

गौरतलब है कि करिश्मा से शादी से पहले फैशन डिजाइनर नंदिता मेहतानी से भी संजय का डिवॉर्स हो चुका था। करिश्मा के एक करीबी सूत्र ने बताया कि संजय इन दिनों प्रिया से शादी करने की सोच रहे हैं, तो इसका यही मतलब है कि करिश्मा से वह लीगल तौर पर अलग होना चाहते हैं।

वैसे भी, दोनों के अलग होने की अटकलें तो काफी समय से चल रही थीं और इस बारे में पूछने पर करिश्मा ने कभी सीधे तौर पर जवाब नहीं दिया। हालांकि, इंडस्ट्री में यह चर्चा जोरों पर थी कि 'डेंजरस इश्क' की मेकिंग के दौरान ही लोलो ने डिवॉर्स के लिए अप्लाई कर दिया था। वहीं, दोनों परिवार इस मामले को पूरी गंभीरता से ले रहे हैं और अंदर की कोई भी बात वे पब्लिक नहीं होने देना चाहते।

कौन हैं प्रिया
मॉडल-सोशलाइट प्रिया न्यू यॉर्क बेस्ड होटेलियर विक्रम चटवाल की एक्स-वाइफ हैं। उनसे उन्हें एक बच्चा भी है। जब से प्रिया और विक्रम के बीच टेंशन आई, तभी से संजय के साथ उनकी करीबियां बढ़नी शुरू हो गईं और इसी के साथ करिश्मा की परेशानियां भी बढ़ने लगीं। फिलहाल संजय अपना पास्ट भुलाकर प्रिया के साथ नई जिंदगी की शुरुआत करना चाहते हैं।

मंगलवार, 22 मई 2012

यूपीए सरकार किसी भी वक्त गिर सकती है: बीजेपी



नई दिल्ली।। यूपीए-2 सरकार के 3 साल पूरा होने के अवसर पर मंगलवार को बीजेपी ने दावा किया कि यह सरकार किसी भी समय गिर सकती है, क्योंकि इस गठबंधन के घटक दल कांग्रेस से खुश नहीं हैं। बीजेपी संसदीय दल की मंगलवार को हुई साप्ताहिक बैठक में यूपीए के शासन पर चर्चा के दौरान इसके 3 साल पूरे होने की खुशी में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ओर से आयोजित रात्रि भोज में तृणमूल कांग्रेस द्वारा आने से इनकार किए जाने पर यह बात कही गई। पार्टी के प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने कहा, यूपीए के घटक दल खुश नहीं हैं। 2 घटक दल तो साथ मिल कर भोज तक करने को तैयार नहीं है। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा, मैं हैरान हूं कि ऐसे में खाने का जायका कैसा होगा। पार्टी के प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने कहा कि यूपीए के घटक दल खुश नहीं हैं। एक घटक दल तो साथ मिल कर भोज तक करने को तैयार नहीं है। आप रिश्तों को हाल समझ सकते हैं, यूपीए के घटक साथ मिल कर भोजन तक करने को तैयार नहीं है। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि मैं हैरान हूं कि ऐसे में खाने का जायका कैसा होगा। यूपीए के तीन साल के शासन के बारे में उन्होंने कहा कि इसे काले अक्षरों में ही लिखा जा सकता है।शाहनवाज ने कहा कि यह सरकार किसी भी समय गिर सकती है। सरकार 272 के बहुमत का दावा करती है। लेकिन वास्तविक संख्या सिर्फ 227 ही है। इसके अलावा उसके घटक दल भी खुश नहीं है। संसदीय दल की बैठक में वर्तमान शासन की असफलताओं पर भी चर्चा हुई। वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने बजट शासन के दौरान अपने सांसदों के प्रदर्शन पर उन्हें शाबाशी दी। शाहनवाज ने कहा कि वर्तमान सत्र में मुख्य विपक्षी दल सरकार को कई अवसरों पर घेरने में सफल रहा।

वक्त का सितम- यूपीए-2 से पूछो




नई दिल्ली । वक्त का सितम कैसा होता है, कोई यूपीए-2 से पूछे। यूपीए-1 की किस्मत तो ऐसी थी कि मानो पत्थर भी छुएं तो सोना बन जाए। अच्छी किस्मत के पीछे एक मजबूत टीम वर्क, फोकस के साथ काम और लोगों का सरकार पर विश्वास भी था। उसी सरकार ने संकट के वक्त में, चाहे वह मंदी का रहा या आतंकवाद का, मजबूती से मुकाबला किया। लेकिन यूपीए-2 जब आज सरकार में लगातार आठवें साल और दूसरी पारी का तीसरा साल पूरा कर रही है तो हालात बदले-बदले से हैं।

आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 2014 के चुनाव में सरकार जीत की हैट-ट्रिक लगा पाएगी? दबी जुबां में यह सवाल भी कि क्या यह सरकार पांच साल की पूरी पारी चला भी पाएगी या नहीं? क्या इस बार वापसी का तिलिस्म बरकरार रहेगा?

ऐसे मौके पर सरकार के लिए यह आत्मविश्लेषण का वक्त है। अगर गिरती साख को बचाना है तो सरकार को जीरो से फिर एक नई शुरुआत लेनी होगी। सिर्फ तीन साल नहीं, आठ साल के सफर को देखना होगा, कहां चूके, कहां फिसले। उन्हीं 8 साल के सफर और इसके मेक-ब्रेक मोमेंट्स को समेटने की एक कोशिश....

कैसे बीते सरकार के 8 साल

2005- जो काम करेगा उसी का नाम होगा
इस साल तक देश के पिछड़े राज्यों में शुमार बिहार में धारा के विपरीत विकास की हवा बह रही थी। बावजूद इसके कि देश की राजनीति में इस राज्य का हमेशा अहम रोल रहा था। 2005 में लालू प्रसाद और रामविलास पासवान राजनीति के ऐसे दो खिलाड़ी थे, जो दिल्ली के खेल को बनाने-बिगाड़ने का माद्दा रखते थे। लेकिन इसी साल नीतीश कुमार ने बिहार में लालू प्रसाद के 15 साल के शासन को सुशासन के नारे से समाप्त किया। फिर बिहार ने विकास की रफ्तार पकड़ी। बिहार ट्रेंड सेटर राज्य बनने लगा। गर्वनेंस के आधार पर राजनीति और वोटबैंक का नया चलन शुरू। बिहार में कांग्रेस और पीछे हुई। लालू और रामविलास जैसे क्षेत्रीय क्षत्रप कमजोर हुए। इन तमाम उठा-पटक का असर बाद के सालों में दिल्ली की सत्ता पर दिखा।

2006- नो लेफ्ट-राइट
यूपीए-1 के गठबंधन में लेफ्ट शामिल था, लेकिन तत्कालीन अमेरिकी प्रेजिडेंट जार्ज बुश के एक दौरे ने यहां की राजनीति की दिशा बदल दी। परमाणु डील के मुद्दे पर लेफ्ट सरकार से लाल हुई और अपना रास्ता आने वाले समय में अलग कर लिया। 123 ट्रीटी सरकार के लिए महज एक अटॉमिक डील भर नहीं थी, बल्कि इससे नए राजनीतिक डील का भी रास्ता खुला। इसके बाद राजनीति में नए ध्रुवीकरण का दौर चला। तृणमूल और ममता बनर्जी के रूप में सरकार को नया साथ मिला। इस बदले हालत का असर आगे भी देखा गया। इसके कुछ खट्टे, कुछ मीठे अनुभव भी रहे। अब इस साल ऐसे संकेत मिले कि राष्ट्रपति चुनाव के बहाने लेफ्ट यूपीए सरकार के नजदीक फिर जा सकती है।

2007- हममें है दम

इसी साल प्रतिभा पाटिल देश की पहली राष्ट्रपति बनीं। उनके बनने से बड़ी बात यह थी कि सरकार और सोनिया गांधी ने बेहद मजबूती के साथ उन्हें इस पद पर आसीन किया। यह इस बात को दर्शाने का आदर्श उदाहरण था कि उस वक्त सोनिया गांधी की पॉजिशन न्यूमेरो यूनो वाली थी। आज पांच साल बाद वही हालात बदले हुए हैं और प्रतिभा पाटिल का उत्तराधिकारी चुनने में सरकार अपने इर्द-गिर्द मदद की गुहार लगा रही है। क्षेत्रीय पार्टियां अपना दम-खम दिखा रही हैं।

2008- हमले ने बदला देश
26/11 मुंबई हमले ने देश को बदल डाला। यूपीए-1 सरकार के लिए यह पहली सबसे बड़ी चुनौती थी। इस हमले से न सिर्फ आतंकवाद का नया और खतरनाक चेहरा सामने आया, बल्कि इसने यूपीए 1 सरकार की संरचना को भी बदल दिया। गृहमंत्री के रूप में शिवराज पाटिल को इस्तीफा देना पड़ा। वित्त मंत्री के रूप में महारत हासिल कर चुके पी. चिदंबरम को गृहमंत्री की भूमिका दी गई। प्रणव मुखर्जी को वित्त मंत्री बनाया गया। इस घटना के बाद सरकार को नई शुरुआत लेनी पड़ी। सरकार ने आतंकवाद निरोधी कानून एनसीटीसी कानून लाने की पहल की। बाद में यही कानून सरकार के लिए बड़ी परेशानी का कारण बना। विपक्ष तो दूर अपने सहयोगियों ने भी इस बिल का समर्थन नहीं किया। इसी कानून के विरोध की आड़ में नए राजनीतिक समीकरण बने।

2009-मंदी को किया बेअसर
यूपीए ने आम चुनाव में शानदार जीत हासिल की। वापसी के तिलिस्म पर लोग हैरान हुए। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य, जहां कांग्रेस की हालत कमजोर थी, वहां पार्टी को अप्रत्याशित कामयाबी मिली। श्रेय पार्टी के नए युवराज राहुल गांधी को मिला। मनमोहन सिंह को यूपीए का परफेक्ट सीईओ कहा गया। उन्हें बेहतर काम का इनाम मिला। सोनिया बतौर मेंटर असरदार साबित हुई। उम्मीदों के साथ यूपीए-2 की पारी शुरू हुई। इस बार उम्मीदें और ज्यादा थीं। हालात अनुकूल भी हो रहे थे। विपक्ष कमजोर हो चला था। मंदी से दुनिया निबटने लगी थी। राहुल गांधी के रूप में कांग्रेस को नया युवराज मिल चुका था, जिसने पहली बार अपना असर दिखाया था। यूपीए-2 ने नई ऊंचाइयों के साथ कामकाज शुरू किया। तब अगले पांच साल तक सरकार को कहीं चुनौती मिलती नहीं दिख रही थी।

2010- घोटालों ने मारा
कहा जा रहा था कि यूपीए सरकार के पास मिदास टच है, लेकिन वक्त के साथ किस्मत ने करवट बदला। यूपीए-2 ने बदली सूरत में सच का सामना किया। सीडब्ल्यूजी घोटाला, 2जी घोटाला...सरकार के दामन पर जो दाग लगने शुरू हुए, वे अब तक जारी हैं। हर दाग के साथ सरकार अपना उजाला खोने लगी। विपक्ष को संजीवनी मिली। सरकार की चमक फीकी होने लगी। वह बचाव की मुद्रा में बैकफुट पर आ गई। काम-काज से अधिक प्राथमिकता दामन और कुर्सी बचाने को मिलने लगी।

2011- ये पब्लिक है, सब जानती है

सरकार की नींव हिल चुकी थी। यूपीए-1 से चला सात सालों का लंबा हनीमून पीरियड समाप्त होने लगा था। अगर कुछ बचा तो खुद सरकार के तमाम आत्मघाती कदमों ने काम तमाम कर दिया। इन सबके बीच अन्ना हजारे ने देश (खासकर शहरी मध्य वर्गों) को एक मंच पर खड़ा कर किया। लोकपाल बिल की मांग की। लोकपाल इनके जगने का, नए ऐक्टिविज्म का प्रतीक बना। मौका देख विपक्ष के हमले और तेज हो गए। आम लोगों के बीच सरकार कठघरे में आ गई। आम लोगों ने सरकार पर सीधा हमला बोला। सरकार ने इन मुद्दों पर हल निकालने का रास्ता न चुन कर, टकराव का रास्ता चुना। यह सरकार को और मुश्किलें दे गई।

2012-इस रात की सुबह नहीं
यूपीए-2 के लिए सबसे बड़ी विडंबना यह बनी कि उसे विपक्ष के हमलों से ज्यादा अपनों से परेशानी रही। गठबंधन धर्म की पीड़ा ने इस सरकार को कई जख्म दिए। उसी पीड़ा का दंश आम लोगों तक पहुंचा। सरकार का हर काम लगभग ठप सा हो गया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर उनके आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु तक देश से लेकर विदेश तक दुहाई देने लगे कि गठबंधन में उनके हाथ बंध गए। इससे और गलत संदेश जाने लगा। यूपीए सरकार पूरी तरह एक बिखरी टीम जैसी दिखने लगी, जिसमें हैट्रिक तो दूर दूसरी पारी पूरे पांच साल तक चलने पर गंभीर सवाल उठने लगे। बाकी की कसर यूपी चुनाव में करारी हार ने पूरी कर दी, जिसने राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवालिया निशान खड़े हुए। एक ऐसे वक्त में सरकार पहुंची, जहां इस रात की सुबह नहीं.. जैसे हालात दिखने लगे।

यूपीए की 8 बड़ी गलतियां
1. घोटालों पर कार्रवाई के लिए फैसले लेने में हर बार देरी हुई। दाग सरकार के दामन पर लगा।
2. अन्ना आंदोलन को कमतर आंका। आम लोगों की आवाज को दबाने की कोशिश। मिडल क्लास और शहरी लोगों की उपेक्षा के संदेश दिए। आईटी ऐक्ट और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सेंसरशिप के संकेत दिए, जिसका विरोध हुआ।
3. महंगाई के मुद्दे पर बहुत देर से कदम उठाए। इस मुद्दे को नजरअंदाज कर सरकार ने बड़ी गलती की।
4. गठबंधन के नाम पर सहयोगियों के सामने पूरी तरह समर्पण। जरूरी फैसलों को भी टाला, जिससे देश-विदेश हर जगह छवि एक कमजोर-बेबस सरकार के रूप में बनी।
5. आर्थिक स्तर पर सुधर के तमाम अजेंडों को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
6. सरकार टीम के बजाय खेमों में नजर आने लगी। प्रणव और चिदंबरम के बीच लेटर विवाद इसका एक उदाहरण बना।
7. सेनाध्यक्ष के उम्र विवाद जैसे सेसेंटिव मुद्दों पर बेहद कैजुअल अप्रोच दिखा।
8.अलग-अलग संवैधानिक संस्थाओं-चुनाव आयोग और सीएजी से सीधा टकराव हुआ। इसका गलत संदेश लोगों के बीच गया।

यूपीए की ऊंचाई के 8 पल
1.यूपीए 1 का शानदार कार्यकाल। मंदी से निबटने में सफल हुए।
2. 26/11 के हमले के बाद सरकार ने मजबूती से प्रतिकार किया।
3. मनरेगा योजना को लागू करना। यूपीए-1 की फिर वापसी में इस योजना का लाभ मिला।
4. शिक्षा और सूचना के अधिकार को कानूनी मान्यता।
5. देश को पहली महिला राष्ट्रपति देना।
6. 26/11 आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान पर दबाव बनाया। अभी पिछले दिनों दोनों देशों में फिर नए रिश्ते की शुरुआत।
7. इन आठ सालों में देश की जीडीपी को आठ फीसदी के इर्द-गिर्द बरकरार रखा।
8. काले धन पर श्वेत पत्र को पेश करना।

यूपीए के 8 बड़े कन्फ्यूज़न
1. खाद्य सुरक्षा बिल पर कोई सहमति नहीं हो सकी।
2. आधार कार्ड को आधार नहीं मिल सका। इस कार्ड के वजूद पर खुद सरकार के अंदर से सवाल उठे।
3. आकाश टैब्लेट स्टडेंट्स को कब मिलेंगे, इसे लेकर उलझनें बनी रहीं।
4. आईआईटी टेस्ट का आने वाले समय में क्या होगा, इसे लेकर बेवजह लंबा खींचा जा रहा। कोई सहमति नहीं हो रही। स्टूडेंट परेशान।
5. पेट्रोल की कीमत कहां जाकर रुकेगी?
6. गरीबी की असल परिभाषा क्या होगी? इसकी तलाश में सरकार की कई बार फजीहत हो चुकी है।
7. लोकपाल कभी पास होगा या नहीं? भले आठ साल पूरे होने से ठीक एक दिन पहले राज्यसभा में पेश जरूर कर दिया लेकिन हकीकत में पास होना अभी भी दूर।
8. केंद्र और राज्य में बैलेंस कहां? इन दिनों केंद्र और राज्य सरकार के बीच अधिकारों का बैलेंस कैसे बरकरार रहे, इस मुद्दे पर सरकार कई बार मुसीबतों में फंस चुकी है।

8 चीजें जिन्हें ठीक करने की जरूरत
1. विकास के ठप हो चुके सिस्टम बटन को रिस्टार्ट करने की जरूरत।
2. जरूरत के लिहाज से आम लोगों के हित में फैसले लेना। महंगाई पर रोक के लिए ठोस मेकनिज़म अपनाने की जरूरत।
3. गठबंधन धर्म के नाम पर अगुवा सरकार की इमेज को दूर करना होगा।
4. आर्थिक स्तर पर कड़े फैसले (मसलन, रिटेल में एफडीआई) लेने होंगे। निवेशकों को भरोसा दिलाना होगा कि भारत की सफलता की कहानी अभी जारी है।
5. नई पीढ़ी के नेताओं को सामने आकर सरकार को मजबूती देनी होगी।
6. नियमों और नीतियों की आड़ में ऐसे कानून बनाने की प्रवृत्ति से बचना होगा, जिसका संदेश गलत जाए। हाल में कई ऐसे फैसले सरकार ने लिए।
7. सरकार टुकड़ों में नहीं, बल्कि एकजुट कर काम रही, इसे साबित करना होगा अहम फैसलों में।
8. करप्शन के खिलाफ लड़ाई में सरकार को निर्णायक भूमिका के लिए सामने आना होगा।

यूपीए के 8 प्लेयर
सोनिया गांधी-यूपीए अध्यक्ष
स्टेटस अपडेट- मेंटर की भूमिका जारी। पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य कारणों से कम सक्रिय रहीं। लेकिन यूपी चुनाव हार के बाद दो टूक साफ संकेत दिए कि अब कुछ करने का वक्त। अतीत गवाह है कि उन्होंने वापसी करने का माद्दा दिखाया है और ऐन मौके पर अप्रत्याशित कदम उठा कर चौंका सकती हैं।

डॉक्टर मनमोहन सिंह-प्रधानमंत्री स्टेटस अपडेट-यूपीए 1 वाली चमक फीकी पड़ी। विवादों में पीएमओ भी आया। फैसले लेने में कमजोर होने का आरोप। प्रतिकूल हालात।

राहुल गांधी-कांग्रेस नेता स्टेटस अपडेट-यूपी हार के बाद विनम्रता से इसकी जिम्मेवारी ली। उनके फ्रंट से लीड करने के अभियान पर ब्रेक लगा। राहुल यूपीए के अहम फैसले के हिस्सेदार रहते हैं। अब भी यूपीए के लिए सत्ता की हैट्रिक लगाने की लड़ाई में ट्रंप कार्ड।

प्रणव मुखर्जी-वित्त मंत्री स्टेटस अपडेट-यूपीए 2 में सरकार के लिए संकटमोचक। जब भी सरकार फंसती है, दादा हैं ना..। अहमियत इतनी कि राष्ट्रपति के लिए सरकार इन्हें न छोड़ने का मूड दिखा रही क्योंकि फिर आगे कौन नैया पार लगाएगा।

पी. चिदंबरम-गृह मंत्री स्टेटस अपडेट- वित्त मंत्री और फिर गृह मंत्री के तौर पर प्रभावशाली भूमिका निभाई। लेकिन पिछले कुछ दिनों से उतने अच्छे नहीं। 2 जी घोटाले में विपक्ष के निशाने पर।एनसीटीसी में भी वे तमाम सीएम के निशाने पर आए। मुसीबतों से घिरे हैं। दुखी भी हैं। जिसकी पीड़ा खुद उन्होंने बयां की- खंजर मार दो लेकिन ऐसे आरोप न लगाओ।

ममता बनर्जी -
तृणमूल नेता स्टेटस अपडेट-यूपीए 2 की मजबूत स्तंभ हैं। लेकिन उनकी गतिविधि देख तय करने में मुश्किल कि वह सरकार के साथ हैं या विपक्ष में। पिछले कुछ सालों में विपक्ष के कारण भी उतनी परेशानी नहीं आई, जितनी ममता बनर्जी के कारण। लव-हेट रिलेशनशिप कब तक चलेगी, इसे कहना मुश्किल।

शरद पवार-एनसीपी प्रमुख स्टेटस अपडेट-कमोबेश सरकार के अब तक भरोसेमंद साथी। जब खुद उनकी पार्टी के नेता पीए संगमा राष्ट्रपति चुनाव में दावेदारी दे रहे तो पवार ने गठबंधन धर्म को तरजीह दी।

करुणानिधि
-डीएमके प्रमुख स्टेटस अपडेट-2 जी घोटाले में पार्टी के नेताओं के फंसने पर यूपीए को परेशानी में रखा। सरकार को खतरे में नहीं रखा लेकिन कुछ ऐसे फैसलों से सरकार की साख को नुकसान पहुंचाया। 2 जी सबसे अहम।

कई लोगों ने रेप किया



नई दिल्ली। एक महिला के साथ शुक्रवार की रात कई लोगों ने रेप किया और बाद में उसे नेहरू प्लेस पर छोड़ दिया गया। पुलिस ने बताया कि महिला को एम्स में भर्ती कराया गया है और रविवार की शाम तक 4 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया था। सूत्रों ने बताया कि महिला काम के बाद साउथ-ईस्ट दिल्ली में जैतपुर से लौट रही थी। शाम को करीब साढ़े सात बजे वह नजफगढ़ जाने वाली बस का इंतजार कर रही थी। उसे एक ग्रामीण सेवा वैन के मालिक ने लिफ्ट दी। नजफगढ़ ले जाने के बजाय वह आदमी उसे नेहरू प्लेस में एक सुनसान जगह पर ले गया और अपने 2 दोस्तों के साथ उससे रेप किया। उसके दोनों दोस्त रास्ते में मिले थे। जब रेप हो रहा था तो ड्राइवर पहरेदारी कर रहा था।

एक और दोस्त के साथ मिलकर ये चारों महिला को साउथ दिल्ली में मदनपुर खादर के एक घर में लेकर गए और वहां पांचों आदमियों ने उससे रेप किया। इसके बाद कथित तौर पर वे लोग सुबह से थोड़ा पहले ही महिला को वैन में बिठा कर छोड़ने के लिए वापस आए। नेहरू प्लेस के पास एक पहिया पंक्चर हो गया। शोर सुनकर एक ट्रक ड्राइवर वहां पहुंच गया। कथित तौर पर उसने उन लोगों को धमकी दी कि अगर उसे महिला से रेप नहीं करने दिया जाता तो वह इस बारे में सबको बता देगा।

इसके बाद आरोपी महिला को एक रिक्शे पर बिठाकर भाग गए। महिला ने रिक्शे वाले की मदद से पुलिस को मामले की जानकारी दी। सूत्र ने बताया, 'एम्स की मेडिकल जांच में रेप की पुष्टि हुई है। गैंग रेप, जबरदस्ती ले जाने और धमकी देने के लिए केस दर्ज कर लिया गया है।'

रुपये में ऐतिहासिक गिरावट, 55.44 के स्तर पर पहुंचा




मंगलवार को रुपया तगड़ी गिरावट के साथ 55 के मनोवैज्ञानिक स्तर के पार 55.44 रुपये प्रति डॉलर के रिकॉर्ड न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया। पिछले कारोबारी दिवस को यह 55.04 के स्तर पर बंद हुआ था। मुद्रा विनिमय बाजार के डीलरों के मुताबिक, लगातार चौथे कारोबारी दिन रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर तक टूट गया।
हालांकि डीलरों को उम्मीद थी कि मंगलवार को रुपए की गिरावट को रोकने के लिए रिजर्व बैंक मुद्रा बाजार खुलते ही इसमें हस्तक्षेप करेगा। आईडीबीआई बैंक के ट्रेजरी प्रमुख एनएस वेंकटेश का कहना है कि रुपए का 55 के स्तर से नीचे जाना बेहद चिंताजनक है। हालांकि उम्मीद करते हैं कि सरकार रुपए को संभालने के लिए जल्द ही आवश्यक कदम उठाएगी।

जरूरत पड़ी तो आरबीआई दखल देगा: प्रणब
आयातकों और बैंकों की ओर से डॉलर की तेज मांग के बीच रुपये में आ रही जबरदस्त गिरावट पर केंद्रीय वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने मंगलवार को कहा कि डॉलर की तुलना में रुपये की कीमत बाजार ही तय कर रहा है। उन्होंने कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) दखल देगा।

मोइनुद्दीन चिश्ती के उर्स पर अजमेर में रौनक




सूफी संत मोइनुद्दीन चिश्ती की पुण्यतिथी के मौके पर अजमेर में उर्स का उत्सव मनाया जा रहा है
अजमेर। सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के ८००वें सालाना उर्स पर आज तड़के यहां स्थित उनकी दरगाह का जन्नती दरवाजा जायरीनों के लिये खोल दिया गया। तड़के लगभग चार बजे दरगाह में स्थित जन्नती दरवाजा के खुलते ही जायरीनों की भीड़ उमड़ पड़ी। इस दरवाजे में प्रवेश के लिये दूर-दूर से भारी संख्या में आये अकीदतमंद बीती रात से ही कतारें लगा कर खड़े थे। दरवाजा खुलते ही लोगों में उसे चूमने और वहां से गुजरने की होड़ मच गयी। दरगाह की धाॢमक रस्म के अनुसार जन्नती दरवाजा साल में चार बार विशेष मौकों पर ही खुलता है। सालाना उर्स के दौरान यह दरवाजा छह दिन खुलता है। इसके अलावा ''गरीब नवाजÓÓ के गुरू उस्मान हारूनी के उर्स ईदुलफितर और इदुलजुहा पर एक एक-दिन के लिये दरवाजा खोला जाता है। मान्यता है कि इस दरवाजे से सात बार गुजरकर जियारत करने वाला व्यक्ति जन्नत का हकदार होता है। दरगाह के दीवान जैनुअल आबेदीन ने बताया कि मुस्लिम धर्मावलंबी पश्चिम की ओर रूख कर नमाज अदा करते हैं और जन्नती दरवाजे का रूख भी इसी दिशा में होने के कारण इसे विशेष धाॢमक महत्व मिला हुआ है। धाॢमक स्थल मक्का के इसी दिशा में होने से जन्नती दरवाजे को ''मक्की दरवाजेÓÓ के नाम से भी जाना जाता है। इस दरवाजे का निर्माण ख्वाजा हुसैन नागौरी ने करवाया था तथा मुगल बादशाह शाहजहां ने सन १६४३ में इसे मुकम्मल करवाया था।

बच्चों के मोबाइल पर निगरानी




अभिभावक अपने बच्चों के मोबाइल फोन पर एक सिम कार्ड के जरिए नियंत्रण रख पाएंगे.

वोडाफोन के नेटवर्क के लिए बेमिलो सिस्टम नाम की इस सेवा की मदद से मां-बाप बच्चों को ऑनलाइन होने से रोक सकेंगे. साथ ही किसी निर्धारित समय पर वो उन्हें एसएमएस मेसेज भेजने और कॉल करने पर रोक भी लगा सकेंगे.

साथ ही बच्चे इस सेवा को बंद नहीं कर सकेंगे. इंग्लैंड में परिवार से जुड़ी एक संस्था का कहना है कि इस सिम कार्ड से बच्चों को डराने-धमकाने या तंग करने वाले कॉल और मेसेज पर रोक लगाई जा सकेगी. यह सिम कार्ड कम्पयूटर के जरिए काम करता है.
सेफ्टी पैक

इस सेवा को इंग्लैंड में शुरु किया गया है. सेवा लेने के लिए अभिभावकों को एक सेफ्टी पैक खरीदना होगा जिसके अंदर सिम कार्ड होगा. इस सिम को बच्चों के मोबाईल फोन पर डाला डाएगा और इसके लिए कम से कम 2.95 पाउंड हर महीने खर्च करने पड़ेंगे.

"मां-बाप किसी के कॉल को अनुमति दे सकते हैं और जिन्हें वो नहीं चाहते कि वो उनके बच्चों से बात करें ऐसी कॉल पर रोक भी लगा सकते हैं."

बेमिलो के संस्थापक और चेयरमैन साइनल गॉफ

बेमिलो के संस्थापक और चेयरमैन साइनल गॉफ ने बीबीसी से कहा, "यह किसी भी सामान्य सिम की तरह ही है लेकिन इससे मां-बाप को बच्चों की सुरक्षा के लिहाज से पूरा नियंत्रण मिलता है. मां-बाप किसी के कॉल को अनुमति दे सकते हैं और जिन्हें वो नहीं चाहते कि वो उनके बच्चों से बात करें ऐसी कॉल पर रोक भी लगा सकते हैं."

अगर अभिभावक चाहते हैं कि स्कूल के समय बच्चे फोन पर व्यस्त न हो तो वो कम्प्यूटर में लॉग करके बच्चों के फोन को दूर से ही बंद कर सकते हैं.

वो बच्चों के मेसेज भी पढ़ सकते हैं.
रोक

ब्रिटेन की एक रिपोर्ट के मुताबिक वहां कम उम्र की लड़कियों पर दबाव बढ़ता जा रहा है कि वो अपनी अश्लील तस्वीरें मेल करें या टेक्स्ट करें.

बेमिलो के एक 2000 मां-बाप पर कराए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार आठ वर्ष से 16 वर्ष के उम्र तक के 40 फीसदी बच्चे कभी न कभी मोबाईल पर धौंस का शिकार हुए हैं.

लेकिन इस नई तकनीक से मां-बाप बच्चों के फोन पर नजर रख पाएंगे.

साथ ही ये सेवा बच्चों को वयस्कों के वेबसाइट पर जाने से भी रोक सकता है.

यूपीए-2 सरकार के तीन साल





मुझे लगता है कि ये सरकार तीन साल पुरानी है लेकिन आठ साल बूढ़ी है. बुजुर्गियत की नहीं बल्कि बुढ़ापे की छाया इस सरकार पर शुरु से ही रही है.

यूपीए गठबंधन के तौर पर पहली बार चुनाव जीतने से कांग्रेस खुद थोड़ा हैरान थी, वाम मोर्चे का दबाव था, इस वजह से पहले कार्यकाल में कुछ काम हुए भी.



लेकिन यूपीए की दूसरी पारी में न तो नये विचार दिखाई दिये न इसके लिए ऊर्जा नजर आई. संसद के भीतर और बाहर कोई रणनीति या कौशल दिखाई नहीं दिया.

इस सरकार में केवल आर्थिक सुधारों को लेकर पॉलिसी पैरालिसिस नहीं है. सरकार न बाजार को खुश कर सकी न निवेशकों को. सरकार आम आदमी के लिए भी कुछ नहीं कर पाई है.

तेलंगाना का मुद्दा हो या फिर कश्मीर की दिक्कत, सरकार कोई दिशा-बोध तय नहीं कर पाई है. ये सरकार की चहुंमुखी असफलता है.

'कौशल की कमी'

प्रणब मुखर्जी ने यूपीए सरकार में कई मौकों पर संकट-मोचक की भूमिका निभाई है

गठबंधन सरकार की मजबूरी पॉलिसी बनाने में कमी की वजह नहीं है. गठबंधन सरकार पहली भी बनी है. ये सरकार गठबंधन पर उतनी निर्भर नहीं है.

समस्या गठबंधन नहीं, गठबंधन चलाने के कौशल की कमी है. सत्तारूढ़ दल की रणनीति और समझ में कमी है. गठबंधन के सहयोगियों पर ठीकरा फोड़ना सही नहीं होगा.

सरकार की छवि पर असर पड़ा है. उसकी चमक कम हुई है. सरकार पर आम लोगों का भरोसा डगमगाया है. शहरी क्षेत्रों में कांग्रेस को जो समर्थन मिला था, उसमें कमी आई है. ये हम सर्वेक्षण के आधार पर भी कह सकते हैं.

ताकत और कमजोरी

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ताकत ही धीरे-धीरे उनकी कमजोरी बनती जा रही है. ताकत ये है कि ईमानदार छवि के व्यक्ति हैं, किसी बुरे काम में उनका नाम नहीं है.

लेकिन कमजोरी ये है कि खुद निर्णय नहीं ले सकते. यही उनके लिए एक नकारात्मक पक्ष बनता जा रहा है. लोगों में भावना आ रही है कि इस ईमानदारी का क्या करें. इस ईमानदारी से भी निकलकर कुछ तो आना चाहिए.

"तमाम कमजोरियों के बाद भी ये सरकार संसद में बहुत कमजोर नहीं है और इस सरकार पर फौरी तौर पर कोई संकट नहीं है. इसलिए सरकार गिरती नजर नहीं आती न सरकार खुद समय से पहले चुनाव चाहेगी. मध्यावधि चुनाव की बात में कयास ज्यादा है हकीकत कम."

योगेंद्र यादव


बाकी बचे दो सालों में यूपीए सरकार के सामने चुनौतियां ही चुनौतियां हैं. क्या ये सरकार खुद अपनी चुनौतियों को समझ सकती है, यही उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती है.

इस सरकार की कारगुजारियों को देखने के बाद नहीं लगता है कि इन चुनौतियों को समझने की क्षमता भी कांग्रेस पार्टी में है. कांग्रेस पार्टी में जान फूंकना एक चुनौती है. चुनौती वर्ष 2014 में होने वाले इम्तिहान की तैयारी करने की है.

संसदीय लोकतंत्र का इतिहास बताता है कि समय से पहले चुनाव वो ही सरकार कराती हैं जो चुनाव जीतने के प्रति आश्वस्त होती हैं, जो सरकार बहुत मजबूत होती है. आमतौर पर कमजोर सरकारें वक्त से पहले चुनाव नहीं करवातीं.

तमाम कमजोरियों के बाद भी ये सरकार संसद में बहुत कमजोर नहीं है और इस सरकार पर फौरी तौर पर कोई संकट नहीं है. इसलिए सरकार गिरती नजर नहीं आती, न सरकार खुद समय से पहले चुनाव चाहेगी. मध्यावधि चुनाव की बात में कयास ज्यादा है हकीकत कम.

आईआईटी टॉपर अर्पित




अर्पित अग्रवाल ने अभी अपने लिए कोई लक्ष्य तय नहीं किया है

एक ओर जहाँ सत्यम कुमार ने 12 वर्ष की उम्र में आईआईटी की परीक्षा पास करके नया रिकॉर्ड बनाया है, तो फरीदाबाद में रहने वाले 17 वर्षीय अर्पित अग्रवाल इस साल आईआईटी के टॉपर बने हैं.

अर्पित अग्रवाल मूल रूप से उत्तर प्रदेश के झाँसी जिले के रहने वाले हैं. उनके पिता सिविल इंजीनियर हैं. आईआईटी में वे इसलिए आना चाहते थे क्योंकि उनकी रुचि विज्ञान और खासकर गणित में काफी थी.
अर्पित अग्रवाल ने बताया कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि वे आईआईटी जैसी परीक्षा में टॉप आएँगे.

अर्पित ने कहा, "उम्मीद तो मैंने नहीं की थी, लेकिन हो गया. अपनी ओर से मैंने पूरी कोशिश की थी और इसके लिए मेहनत भी की थी."
रणनीति



आईआईटी के लिए अर्पित ने बहुत पहले से कोई रणनीति नहीं बनाई थी. बस स्कूल की पढ़ाई और कोचिंग की पढ़ाई पर वे ध्यान केंद्रित रखते थे. लेकिन घर पर आकर हर चीज को दोहराना उनकी आदत थी.

अर्पित का कहना है कि सफलता का मूल मंत्र है एकाग्रचित्त पढ़ाई और अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखना.

वे कहते हैं, "शुरुआत में मैं कुछ खास नहीं करता था. लेकिन बाद में हर विषय को समय देने की रणनीति बनाई. समय प्रबंधन काफी अहम होता है और मैंने इसका पालन किया."

आईआईटी या इस जैसी प्रतियोगी परीक्षा के लिए अर्पित के पास खास टिप्स हैं. अर्पित कहते हैं कि नींद के साथ अन्याय नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये आपकी तैयारी के लिए घातक हो सकता है.

अर्पित बताते हैं, "नींद के साथ कभी भी समझौता नहीं करना चाहिए. अगर आपको लगता है कि आपको छह या सात घंटे सोना चाहिए, तो आपको इतने घंटे सोना चाहिए. ऐसा नहीं है कि कम सोने से आप ज्यादा पढ़ लेंगे."
लक्ष्य

"शुरुआत में मैं कुछ खास नहीं करता था. लेकिन बाद में हर विषय को समय देने की रणनीति बनाई. समय प्रबंधन काफी अहम होता है और मैंने इसका पालन किया"

अर्पित अग्रवाल


उनके पास एक और खास टिप्स है. अर्पित कहते हैं कि कभी भी लेटकर पढ़ाई नहीं करनी चाहिए. हर किसी को बैठकर ही पढ़ाई करनी चाहिए, क्योंकि परीक्षा भी तो बैठकर ही देना है.

आईआईटी में टॉप आने के बाद अर्पित कहाँ नामांकन कराएँगे, इस बारे में उन्होंने कुछ सोचा नहीं है, लेकिन ज्यादा संभावना यही है कि वे दिल्ली आईआईटी में पढ़ेंगे.

अपने लक्ष्य के बारे में भी वो फिक्रमंद नहीं. अर्पित कहते हैं अभी उन्होंने ये तय नहीं किया है आगे चलकर क्या करना है.

वे कहते हैं, "अभी इसके बारे में बहुत ज्यादा मैंने नहीं सोचा है. आईआईटी में जो चार साल मुझे मिलेंगे, उन चार सालों में मैं सबसे बातचीत करके अपने बारे में कुछ तय करूँगा."

पढ़ाई में चैम्पियन अर्पित को गाना सुनने का शौक है, वे फेसबुक पर समय बिताते हैं और बैडमिंटन भी खेलते हैं. फिल्में देखने का उन्हें पहले शौक था, लेकिन अब नहीं है.

हालाँकि ये अलग बात है कि परीक्षा की पूर्व संध्या पर उन्होंने फिल्म हम आपके हैं कौन देखी थी. अर्पित को तनाव तो नहीं था, लेकिन दिमाग में परीक्षा का ख्याल तो बार-बार आता ही थी, इसलिए उन्होंने फिल्म देखकर अपने दिमाग का बोझ कुछ हल्का किया.

"नींद के साथ कभी भी समझौता नहीं करना चाहिए. अगर आपको लगता है कि आपको छह या सात घंटे सोना चाहिए, तो आपको इतने घंटे सोना चाहिए. ऐसा नहीं है कि कम सोने से आप ज्यादा पढ़ लेंगे"

अर्पित अग्रवाल

सोमवार, 21 मई 2012

थमी हुई सरकार के तीन साल




संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने तीन साल पहले जब अपनी दूसरी पारी शुरू की थी, तब यह माना गया था कि पिछली बार की तुलना में वह कहीं अधिक मजबूती से काम करेगी और निवेश के साथ ही आर्थिक सुधारों को गति देगी। इसकी वजह भी थी, क्योंकि इसके सबसे बड़े घटक कांग्रेस को पिछले चुनाव की तुलना में 61 सीटें ज्यादा तो मिली ही थीं; यूपीए के साथ भारत-अमेरिका परमाणु समझौते को लेकर पिछली सरकार से नाता तोड़ने वाले वामपंथी भी नहीं हैं। मगर यह अफसोसनाक है कि निरंतर आठ साल से देश की कमान बेदाग छवि के प्रबुद्ध अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह के हाथों में होने के बावजूद यूपीए की सरकार आगे बढ़ती नहीं दिख रही है।

शिक्षा का अधिकार देने वाले कानून को लागू किए जाने का श्रेय बेशक इस सरकार को जाता है, लेकिन खाद्य सुरक्षा, भूमि अधिग्रहण, पुनर्स्थापन एवं पुनर्वास, महिला आरक्षण और लोकपाल के साथ ही वित्तीय सुधारों से संबंधित महत्वपूर्ण विधेयक संसद में लटके हुए हैं। इनमें से कुछ विधेयकों के लिए वह अपने घटक दलों और विपक्ष की आड़ ले सकती है, लेकिन खासतौर से लोकपाल और भूमि अधिग्रहण कानून को लेकर उसका जो रवैया है, वह उसकी नीयत पर सवाल खड़ा करता है।

अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान संसद की संयुक्त बैठक में सरकार ने देश को एक मजबूत लोकपाल विधेयक देने का आश्वासन दिया था, मगर अब ऐसा लगता है कि वह जानबूझकर इस विधेयक को लटका रही है। खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश का फैसला चाहे उसे खुद के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए टालना पड़ा हो, मगर महंगाई के मोरचे पर वह नाकारा साबित हुई है। इन तीन वर्षों में सामने आए 2 जी स्पेक्ट्रम, राष्ट्रमंडल खेल, आदर्श सोसाइटी जैसे घोटालों ने भी इस सरकार की विश्वसनीयता को प्रभावित किया है, जिसकी पुष्टि विधानसभा चुनावों और उप चुनावों के नतीजों से की जा सकती है।

इनमें उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव भी शामिल है, जहां खासतौर से राहुल गांधी की प्रतिष्ठा दांव पर थी। यूपीए सरकार की स्थिरता को भले ही फौरन किसी तरह का खतरा नजर नहीं आता, लेकिन उसकी आगे की राह आसान नहीं है। वक्त आ गया है, जब उसे राजनीतिक और आर्थिक, दोनों ही मोरचों पर कड़े फैसले लेने की जरूरत है।
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रोते किसान, हंसती सरकार




अपने कृषि-प्रधान देश में भूमंडलीकरण की आर्थिक वृद्धि पर जोर देने वाली नीतियों का बोलबाला क्या हुआ, किसान होने का मतलब ही बदल गया। जो किसान आजादी के बाद शुरू की गई पंचवर्षीय योजनाओं में देश के विकास की सभी सोचों का केंद्रीय विषय और अर्थव्यवस्था की रीढ़ था, वह खुले व उदार बाजार में ठीक-ठाक उपभोक्ता तक नहीं माना जाता, न ही इस रूप में उसका कोई दबाव स्वीकार किया जाता।
दूध, सब्जियों, अनाजों-दालों और पेट्रोलियम समेत आम उपभोग की कई वस्तुओं की महंगाई के विरुद्ध संसद से सड़क तक तलवारें चमकाने वाली पार्टियों, संगठनों और समूहों को इसीलिए किसानों के काम आने वाले बीजों व उर्वरकों की कमरतोड़ महंगाई जरा भी नहीं सताती। उनकी कीमतें दो साल में दो गुनी से ज्यादा बढ़कर खून के आंसू रुलाने लगें, तो भी उनका त्रास झेलने के लिए किसान को अकेला छोड़ दिया जाता है। किसी को याद तक नहीं आता कि अभी एक-डेढ़ दशक पहले तक किसान राजनीति देश को दिशा दिया करती थी।
जानना होगा कि महंगाई की सबसे ज्यादा कीमत भी किसान ही चुकाता है, प्रत्यक्ष और परोक्ष, दोनों रूपों में। एक लीटर डीजल खरीदने के लिए उसे साढ़े चार किलो गेहूं बेचना पड़ता है, जबकि एक लीटर पेट्रोल के लिए सात किलो। 2010 में सरकार ने यूरिया को छोड़कर डीएपी, एमएपी और एनपीके आदि पोटेशियम और फास्फेट वाले उवर्रकों की कीमतों पर दी जा रही सब्सिडी घटाते हुए उन्हें सरकारी नियंत्रण से हटाकर बाजार के हवाले कर दिया। तब राजनीतिक दलों ने उसका औपचारिक विरोध-प्रदर्शनों से ज्यादा नोटिस नहीं लिया। इससे उत्साहित सरकार ने अब उन पर ढुलाई सब्सिडी भी खत्म कर दी है। नतीजा यह है कि दो साल पहले जो डीएपी की बोरी 468 रुपए में बिक रही थी, अब कई बार वह 1015 रुपए में बिकने लगी है। उसकी कीमतों में यह वृद्धि 117 प्रतिशत है।
इसी तरह, एमएपी की कीमत 223 रुपए बोरी से बढ़कर 602 रुपए बोरी हो गई है। इस वृद्धि का प्रतिशत 170 है। कोढ़ में खाज यह कि ये उर्वरक इस बढ़ी हुई कीमत पर भी जरूरत के समय उपलब्ध नहीं होते। कालाबाजार में ज्यादा कीमत पर या फिर नकली और मिलावटी मिलते हैं। इधर इसी से जुड़ा हुआ एक चौंकाने वाला तथ्य यह भी सामने आया है कि वित्त वर्ष-2011-12 में इनकी खपत में 28 प्रतिशत की कमी आई और 2002-03 के बाद ऐसा पहली बार हुआ है। इनकी अनुपलब्धता, उनमें मिलावट या किसानों की क्रय शक्ति से बाहर हो जाने के कारण खपत में होने वाली गिरावट खेती-किसानी की जानकारी रखने वालों के लिए एक बड़े खतरे का संकेत है, क्योंकि यह ऐसे उवर्रक हैं, जिनकी कृषि भूमि के पोषक तत्वों को बढ़ाने में बड़ी भूमिका है और इनकी खपत घटने का अर्थ है, पोषक तत्वों की कमी से भूमि की शक्ति का ह्रास।
ऐसे ह्रास की भरपाई यूरिया जैसे नत्रजन वाले उर्वरकों से नहीं हो सकती। वैसे, यूरिया की कीमतें भी सरकारी नियंत्रण में होने के बावजूद बढ़ ही रही हैं, क्योंकि सरकार कृषि सब्सिडी को अर्थव्यवस्था पर बोझ बताकर घटा रही है। दरअसल, उर्वरकों पर निर्भरता घटाने व उनकी महंगाई के बोझ से किसानों को बचाने की कोई नीति उसके पास नहीं है। उसके नीतिगत सुधारों व बदलावों को पूंजी-घराने किसानों से ज्यादा प्रभावित करते हैं। उनके प्रभाव में ही किसान को परंपरागत बीजों के इस्तेमाल से विरत करके हाईब्रिड बीजों के जाल में फंसा दिया गया है, जहां बीज कंपनियां उससे बीजों की ही नहीं, उन पर बढ़ती निर्भरता की कीमत भी वसूल रही हैं।
दुर्भाग्य से उर्वरक व बीज मूल्य वृद्धि और इसके कारण खाद्यान्न उत्पादन की बढ़ती लागत प्रचार माध्यमों में चर्चा का विषय तक नहीं है। फिर, कौन और कैसे समझाए कि बढ़ी हुई लागत पर उत्पादित खाद्यान्न किसी भी हालत में महंगाई को रोकने वाला नहीं सिद्ध हो सकता। अगर सरकार का देश को महंगाई से राहत दिलाने का जरा भी इरादा है, तो उसे समझना होगा कि इसका सबसे अच्छा रास्ता किसान की फसलों की लागत घटाने से होकर ही गुजरता है। लागत बढ़ती जाएगी, तो दाम भी चढ़ेंगे ही।
- कृष्ण प्रताप सिंह

अर्थव्यवस्था का इलाज




डालर के मुकाबले रुपए की गिरती कीमतों की मुश्किलों की चौतरफा चर्चा हो रही है, क्योंकि विगत दिनों यह गिरकर 54.60 के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया था। रिजर्व बैंक के हस्तक्षेप से कुछ संभलने के बाद अब भी रुपए के मूल्य का संकट बरकरार ही है। सरकारी और गैर-सरकारी विशेषज्ञ अपने-अपने आवरण में घरेलू तथा बाहरी कारणों पर गिरते रुपए की जिम्मेदारी डालकर उसके नित नए स्तर को नियति मानकर बैठने जैसी मशक्कत करते नजर आ रहे हैं।
सरकार जनता और निवेशकों को गठबंधन के खूंटे में बांधकर हवाई आश्वासन देती हुई दिखाई देती है, तो रिजर्व बैंक तात्कालिक सहारे के साथ एक बार पुन: अपनी मौद्रिक नीति की मुश्कें कसने की परिस्थितियों से दो-चार होगा। नीतिगत उपायों के उथले प्रयोग और इस पर होने वाली बौद्धिक छीछालेदर के बीच गिरते रुपए के प्रत्येक स्तर को स्वीकार्य बनाते हुए हर अगले पड़ाव पर हो-हल्ला मचाना और फिर अगले झटके तक का मौन भी शायद हमारी नियति बनता जा रहा है।
रुपए के मूल्य की गिरावट को थामने के लिए वास्तव में जिन दीर्घकालीन उपायों पर चलने की हिम्मत जुटाना आवश्यक है, उनके प्रति गंभीरता कहीं दिखाई नहीं देती। आज इन्हीं उपायों का जायजा लेना बेहद आवश्यक है। दरअसल, भारत को उभरती हुई अर्थव्यवस्था के दर्जे के साथ चीन के बाद भविष्य की बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की संभावनाओं के लिए रुपए का गिरता मूल्य एक बड़ा झटका हो सकता है। फरवरी-2012 के बाद रुपए में 10.24 की गिरावट आ चुकी है। यह चीन, इंडोनेशिया, कोरिया और रूस की मुद्राओं की तुलना में काफी अधिक है। इन देशों की मुद्राएं इतनी नहीं गिरी हैं।
यह तथ्य सही है कि यूरो जोन के संकट ने विनियोजकों को डालर में निवेश के बढ़ते रुझान की ओर प्रेरित किया और इससे रुपए की कीमत लुढ़कने को गति मिली, लेकिन पिछले दिनों सरकार के आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु द्वारा उजागर किए गए अनचाहे सत्य के साथ चालू खाते तथा राजकोषीय घाटे जैसे वृहत आर्थिक संकेतकों की प्रतिकूलता भी कम जवाबदेह नहीं है।
देश की लगभग 70 प्रतिशत कच्चे तेल की खपत जब आयात से पूरी होती है और कुल आयात बिल का 20 प्रतिशत भाग तेल का होता है, तो यह डालर की मांंग पर दबाव बढ़ाने वाला सबसे बड़ा तत्व हो जाता है। यह चालू खाते के घाटे के संकट को बढ़ाने के साथ-साथ राजकोषीय घाटे को भी प्रभावित कर रहा है, क्योंकि सरकार पेट्रोलियम पदार्थों की नियंत्रित कीमतों की नीति से मुक्त होने का साहस नहीं कर पा रही है। यदि ब्रिक्स देशों के इस दोहरे घाटे की तुलना भारत से की जाए, तो हमारी स्थिति कमजोर लगती है। भारत का चालू खाता घाटा जीडीपी का चार प्रतिशत है, तो राजकोषीय घाटा 8.4 प्रतिशत के आसपास है, जबकि चीन, इंडोनेशिया, कोरिया तथा रूस जैसे देशों में चालू खाता इन दोनों के पक्ष में है तथा राजकोषीय घाटा भी दो प्रतिशत के नीचे ही है। इन आंकड़ों के साथ भारत की अर्थव्यवस्था को अधिक मजबूत बताना न्यायसंगत नहीं लगता।
हमारी सरकार यह अवश्य कहती है कि परिस्थितियां चिंताजनक नहीं हैं और इन पर नियंत्रण भी कर लिया जाएगा, लेकिन इस प्रतिबद्धता के पीछे उपयुक्त तर्क दिखाई नहीं देते। क्या सरकार पेट्रोलियम उत्पादों को नियंत्रण मुक्त करने और ऐसा करने के बाद इन उत्पादों पर करों के बोझ को कम करके जनता को आश्वस्त करने तथा सब्सिडी बिल को घटाने जैसे निर्णय लेने की हिम्मत कर सकती है? क्या 70 प्रतिशत कच्चे तेल की निर्भरता की स्थिति में सार्वजनिक परिवहन को मजबूत बनाने की नीति के स्थान पर ऑटोमोबाइल उद्योग को बढ़ावा देकर जीडीपी विकास दर हासिल कर खुश होना उचित है? क्या अमेरिकी दबाव के बाद ईरान के तेल आयात का रुपए में भुगतान करने का विकल्प मानकर अन्य तेल आयातक देशों को भी इसके लिए मनाया नहीं जाना चाहिए? ऐसा करके डालर पर दबाव कम किया जा सकता है।
अगर तेल निर्यातक देशों को तेल की कीमत के बदले में निर्यात को सब्सिडी देने की नीति पर चला जाए, तो दुहरा लाभ उठाया जा सकता है। मगर, यह होगा तब, जब सरकार तेल उत्पादक देशों पर अपनी पकड़ बनाएगी, जिसके आसार अभी दूर-दूर तक दिखाई नहीं देते। ईरान को तेल के मूल्य का भुगतान रुपया में इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि अमेरिका उस पर प्रतिबंध थोपने को उतावला है और इस कारण ईरान को हमारी तथा हमें ईरान की जरूरत है। तेल के दूसरे निर्यातकर्ता देशों को रुपए में भुगतान देने की योजना सरकार कब बनाएगी?


डालर की उपलब्धता में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) सबसे सुरक्षित और आवश्यक पूंजी प्रवाह का माध्यम माना जाता है और वर्ष-2011 की आखिरी दो तिमाहियों में इसमें अंतरराष्ट्रीय कारणों से भले ही कमी आई हो, लेकिन वर्ष-2012 की प्रथम तिमाही की महत्वपूर्ण तेजी को सरकार अपने नीतिगत सुधारों पर निर्णय न लेने के कारण बरकरार नहीं रख सकी और इसी कारण रुपए पर भारी दबाव पडऩे लगा है।
गार (जनरल एंटी एवायडेंस रूल्स) जैसे कदमों ने सरकार के प्रति अविश्वास में इजाफा ही किया है। संस्थागत विदेशी निवेश तो वैसे भी उडऩछू पूंजी के रूप में जाने जाते हैं और इनके झटके शेयर बाजार और विदेशी मुद्रा बाजार में निरंतर ही देखने को मिलते हैं। इनसे होने वाला लाभ अल्पकालीन ही होता है, लेकिन सरकार की नीतियों का निवेशकों में विश्वास ही रुपए को मजबूत बनाने में सहायक हो सकता है। मगर, हमारी सरकार निवेशकों का भरोसा नहीं जीत पा रही है।
अब यदि रुपए के मूल्य में गिरावट के परिणामों पर गौर करें, तो इससे निर्यात सस्ते अवश्य होते हैं, लेकिन इसका लाभ विदेशी व्यापार असंतुलन के कारण कम ही होता है। जो लाभ होता भी है, वह सूचना तकनीक उद्योगों को ही होता है। इसके विपरीत, आयातों के महंगे होने से उन सभी उद्योगों पर इसका असर होता है, जिनके उत्पाद आयातित माल पर निर्भर हैं। समेकित रूप से महंगाई बढऩे का प्रभाव तो चौतरफा पड़ता है, जिसके लिए रिजर्व बैंक और सरकार, दोनों ही चिंतित रहते हैं।
पिछले दिनों रिजर्व बैंक ने जो थोड़ी-बहुत राहत दी थी, उसकी संभावना भी अब क्षीण हो गई है। वास्तव में अब समय आ गया कि सरकार अर्थव्यवस्था को कड़ी दवा पिलाने में परहेज न करे, लेकिन इस संबंध में वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का बयान नाकाफी है। सरकार को जनता की जेब में हाथ डालते समय उसकी जेब की एक-एक पाई के प्रति जिम्मेदार उपयोग का विश्वास भी दिलाना होगा। वरना, जनता का आक्रोश अब बहुगुणित होने की स्थिति में आ रहा है। सरकार इसके प्रति वास्तव में चितिंत होगी, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए।
- डॉ. जीएल पुणतांबेकर