मंगलवार, 20 सितंबर 2011

भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ जल्दी ही एक बड़ी कामयाबी

भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ जल्दी ही एक बड़ी कामयाबी जुड़ सकती है। दरअसल जानकारों का यह अनुमान है कि भारत इसी साल जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का खिताब हासिल कर सकता है। जानकारों का यह अनुमान पीपीपी यानी परचेजिंग पावर पैरिटी पर आधारित है। आपको बता दें कि जापान की अर्थव्यवस्था साल 2010 के दौरान 4.31 लाख करोड़ डॉलर की थी। वहीं पिछले साल भारतीय इकनॉमी 4.06 लाख करोड़ डॉलर की थी। जबकी इस साल मार्च महीने में जापान की अर्थव्यवस्था पर सुनामी और भूकंप के चलते काफी बुरा असर पड़ा। इससे वहां की अर्थव्यवस्था का आकार घटने की आशंका है। वहीं वित्त वर्ष 2012 में भारतीय अर्थव्यवस्था के 7 से 8 फीसदी की रफ्तार से बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि अगर जापान के उपर भूकंप और सुनामी की मार नहीं पड़ती तो भारत को उसे पछाड़ने में कम से कम और 2-3 साल का वक्त लग जाता।

विश्व में शांति स्थापना आज भी दूर की कौड़ी



अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस




विश्व के देशों में आगे निकलने मची होड़ के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘शांति’ कायम करने का लक्ष्य अब भी अधूरा है.

मौजूदा समय में विचारधारा के स्तर पर मतभेद और संसाधनों के लिए हो रहे संघर्ष की वजह से विश्व में अशांति का माहौल है. दुनिया की कुछ ताकतें अपनी सर्वोच्चता कायम करने के लिए विश्व हित की बजाय स्वहित को अधिक तरजीह दे रही हैं.

अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस पर विशेष

विश्व शांति को सबसे बड़ा खतरा साम्राज्यवादी आर्थिक और राजनीतिक चाल से है. विकसित देश अमेरिका के नेतृत्व में युद्ध की स्थिति उत्पन्न करते हैं ताकि उनके सैन्य साजो-समान बिक सके. आज सैन्य साजो-सामान उद्योग विश्व में बड़े उद्योग के तौर पर उभरा है. इसके जरिये विकसित देश अकूत संपत्ति जमा कर रहे हैं.

इसके अलावा विकसित देश अपने संकट को तीसरी दुनिया के देशों पर डाल रहे हैं. इससे उत्पन्न असंतोष से वैश्विक शांति भंग हो रही है.

कम्युनिस्ट नेता अतुल अनजान ने कहा कि विश्व शांति को दोहरी चालों से खतरा है. कोई देश एक ओर शांति की बात कर रहा होता है, वहीं दूसरी ओर आर्थिक हित के चलते उसके विरूद्ध कोई भी चाल चलने से बाज नहीं आता. आज लगभग पूरी दुनिया आतंकवाद से पीड़ित है और इसकी वजह से भी विश्व में हिंसा, अशांति का माहौल है. बकौल हक ‘यह कोई पांच प्रतिशत भटके हुए लोगों की करामात है. कुछ खुदगर्ज लोग विश्व में आतंकी गतिविधियों के जरिये अशांति का माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं.’

अतुल अनजान ने दुनिया में दौलत के असमान वितरण, शोषण और धार्मिक-जातीय भेदभाव को आतंकवाद के फलने फूलने के लिए जिम्मेदार ठहराया.

लखनऊ विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर एसके द्विवेदी ने इस मुद्दे पर कहा कि मुनष्य एक नैतिक और विवेकशील प्राणी है. हिंसा में शामिल लोगों को भी इसके नतीजे के बारे में पता होता है. आज सामाजिक, राजनैतिक संस्थाएं जिसमें परिवार, मीडिया भी शामिल हैं, अपनी भूमिका का निर्वाह ठीक ढंग से नहीं कर पा रही हैं. इनकी भूमिका पर आत्म चिंतन करने और इन्हें सशक्त, सबल और पारदर्शी बनाने की जरूरत है.

हक ने इस चुनौती के समाधान के लिए कहा कि अधिक से अधिक संवाद और नागरिकों के स्तर पर मेलेजोल की जरूरत है. इसके माध्यम से शांति स्थापित करने में समय लग सकता है लेकिन इसके जरिये आयी शांति स्थायी होगी.

संयुक्त राष्ट्र ने 1981 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति और सौहार्द स्थापित करने के लिए 21 सितंबर को शांति दिवस के तौर पर मनाने की घोषणा की थी.

गुरुवार, 15 सितंबर 2011

राइट टू रिकॉल राइट टू रिजेक्ट





-राजकुमार सोनी


निश्चित ही भारत बड़ा और सफल प्रजातांत्रिक देश है। हर भारतवासी को इस पर गर्व है, लेकिन वर्तमान में प्रजातंत्र की सफलता पर खुश होने से इसके भविष्य की सफलता सुनिश्चित नहीं हो सकती। प्रजातंत्र के उज्जवल भविष्य के लिए सतत प्रयास करने होंगे, नए कानून लाने होंगे और राजनीतिक दलों, नेताओं व जनता को अपने निजी स्वार्थ छोड़कर आदर्शों का पालन करते हुए प्रबल इच्छाशक्ति से काम करना होगा। यहां हम बात कर रहे हैैं राइट टू रिकॉल और राइट टू रिजेक्ट की। इन कानूनों का क्या मतलब है, ये कानून कैसे लागू हो सकते हैं, कैसे काम कर सकते हैं, इन्हें लागू करने में क्या दिक्कतें आएंगी और इससे देश और जनता को क्या फायदा होगा, इन्हीं सवालों पर आधारित है यह आवरण कथा।

राइट टू रिकॉल वास्तव में जनता को सशक्त बनाता है। यह कानून जनता के लिए लाभदायक है, लेकिन राजनेताओं के लिए परेशानी से कम नहीं क्योंकि इससे जनप्रतिनिधियों की जवाबदारी तय होती है। राइट टू रिकॉल यानी जनता का वह अधिकार जिसके तहत यदि वह अपने किसी चुने हुए प्रतिनिधि के कार्य से संतुष्ट नहीं है और उसे हटाना चाहती है तो तय प्रक्रिया के मुताबिक उसे वापस बुला सकती है या हटा सकती है। राइट टू रिजेक्ट का मतलब मतदाताओं को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में वह सुविधा और अधिकार देना जिसका इस्तेमाल करते हुए वे उम्मीदवारों को नापसंद कर सकें। यदि मतदाता को चुनाव में खड़ा कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं हो तो वह इस विकल्प को चुन सकता है। राइट टू रिजेक्ट का प्रतिशत अधिक होने पर चुनाव खारिज हो जाता है। यह ऐसे कानून हैैं, जिन्हें लागू करने से प्रजातांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारियां जनता के प्रति और बढ़ जाती हैैं। वे जनता के हितों को दरकिनार नहीं कर सकते। यही वजह है किआज देश के नेता पूरी तरह से इन कानूनों के पक्ष में नहीं हैैं। विभिन्न मतभेदों के चलते देश के राजनीतिक दल इन कानूनों को लेकर अपना मत स्पष्ट करने की स्थिति में भी नहीं हैं। हाल के दिनों में बढ़ते भ्रष्टाचार केमामलों से जनता का भरोसा नेताओं पर से उठ रहा है। इसलिए जनता ऐसे कानूनों के पक्ष में दिखती नजर आ रही है। हालांकि किसी तरह ये कानून लागू भी हो जाएं तो वे कितने व्यवहार में आ पाएंगे यह कह पाना मुश्किल है।
बात जारी है पेज-10 और 11 पर

यूनान की देन है राइट टू रिकॉल
स्विटजरलैंड, अमेरिका, वेनेजुएला और कनाडा में राइट टू रिकॉल कानून लागू है। अमेरिका में इस कानून की बदौलत ही कुछ गर्वनरों और मेयरों को हटाया जा सका है। पुरातन समय में यूनान में एंथेनियन लोकतंत्र में राइट टू रिकॉल कानून लागू था। बाद में कई देशों ने इसे अपनाया। सबसे पहले स्विटजरलैंड ने इसे अपनाया। स्विटजरलैंड की संघीय व्यवस्था में छह प्रांतों बर्न, सॉलोथर्न, थर्गाऊ, उड़ी और अन्य ने इस कानून को मान्यता दे रखी है। फिर यह अमेरिकी प्रांतों में चलन में आया। 1903 में अमेरिका के लॉसएंजिल्स,1908 में मिशिगन और ओरेगान में पहली बार राइट टू रिकॉल प्रांत के अधिकारियों के लिए लागू किया गया। हालांकि अमेरिका में 1631 में ही मैसाचुसेट्स बे कॉलोनी की अदालत में इस कानून को मान्यता मिल गई थी, लेकिन इसे पहली बार मिशिगन और ओरेगान में लागू किया गया। कनाडा ने 1995 में इस कानून को लागू किया। कनाडा में नियम है कि एक सीमा के बाद जनप्रतिनिधि के खिलाफ याचिकाएं आती हैं तो अध्यक्ष उस प्रतिनिधि की सेवा समाप्ति की घोषणा कर उपचुनाव करवाता है। वेनेजुएला में भी यह कानून लागू है। जर्मनी में भी वर्तमान सरकार इसी कानून के तहत बनी है।
वास्तव में हर देश की जरूरते अलग-अलग हैैं। इसलिए जिन देशों में राइट टू रिकॉल लागू है वहां इसे लागू करने के कारण भी अलग-अलग हैैं। अमेरिका के सात प्रांतों में कुछ खास कारणों से रिकॉल किया जा सकता है। इन प्रांतों में रिकॉल तब किया जा सकता है जब जनप्रतिनिधि अपना काम सही तरह से नहीं कर रहा हो या फिर उस पर सीमा से अधिक भ्रष्टाचार के आरोप हों या फिर पद संभालते समय ली गई शपथ का उसने उल्लंघन किया हो, जनप्रतिनिधि के अशालीन व्यवहार, मानसिक व शारीरिक अक्षमता के मामलों में भी रिकॉल किया जा सकता है।
अमेरिका में उत्तरी डाकोटा के गवर्नर लिन जे फ्रेजर राइट टू रिकॉल के पहले शिकार बने थे। उन्हें 1921 में सरकारी उद्योगों पर हुए विवाद के बाद रिकॉल किया गया था। दूसरे कैलिफोर्निया के गवर्नर ग्रे डेविस थे। उन्हें 2003 में प्रांत के बजट का कुप्रबंधन करने पर वापस बुला लिया गया था।
कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत में रीप्रेजेंटेटिव रीकॉल लॉ यानी चुने गए प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का कानून 1995 में अधिनियमित किया गया। कोलंबिया प्रांत के मतदाता सरकार के प्रमुख प्रधानमंत्री सहित पदासीन किसी प्रतिनिधि को उसके पद से हटाने के लिए याचिका ला सकते हैं। यदि पर्याप्त पंजीकृत मतदाता याचिका पर हस्ताक्षर कर देते हैं तो विधायिका के अध्यक्ष सदन के सामने सदस्य को रिकॉल करने और उसकी जगह नए सदस्य को चुनने के लिए जल्द से जल्द उपचुनाव करने की घोषणा करते हैं। जनवरी 2003 में रिकॉर्ड 22 रिकॉल किए गए थे, हालांकि तकनीकी रूप से किसी को भी रिकॉल नहीं किया गया। वेनेजुएला के 1999 में बने संविधान के अनु'छेद 72 के तहत चुने गए प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार दिया गया है। इस अधिकार का प्रयोग वेनेजुएला में 2004 में रिकॉल जनमत संग्रह के दौरान किया गया था। इसके बाद राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज को राष्ट्रपति पद छोडऩा पड़ा था।

अभी है दोषपूर्ण व्यवस्था
हमारे देश में जन प्रतिनिधित्व कानून 1951 में चुनाव में खड़े होने और वोटिंग के संबंध में विस्तृत व्यवस्था दी गई है। सरकार ने 1961 में चुनाव संहिता की व्यवस्था की। इसमें मतदान की प्रक्रिया तय की गई और ऐसे प्रावधान किए गए कि निर्वाचन की गोपनीयता बनी रहे। नियम 49(एम) में इवीएम के माध्यम से मतदान में गोपनीयता और प्रक्रिया सुनिश्चित करने के प्रावधान हैं। हालांकि भारत में नकारात्मक वोटिंग का भी प्रावधान है, लेकिन इससे मतदाता की पहचान उजागर हो जाती है। नियम 49(ओ) के मुताबिक कोई मतदाता अपना वोट देना नहीं चाहता तो उसे पीठासीन अधिकारी द्वारा प्रपत्र 17 पर टिप्पणी दर्ज करनी चाहिए और इस पर मतदाता के हस्ताक्षर कराने चाहिए। यह प्रक्रिया इसलिए दोषपूर्ण है कि हस्ताक्षर करने से मतदाता की पहचान उजागर हो जाती है। यह गोपनीयता के साथ मतदान के मूल अधिकार का उल्लंघन है। इस दोष को दूर करने के लिए यह जरूरी है कि ईवीएम में ही नकारात्मक वोटिंग के लिए बटन हो। इस असंगति को ध्यान में रखते हुए चुनाव आयोग 2001 से लगातार केंद्र सरकार को ईवीएम व्यवस्था में उम्मीदवार के नकार के लिए स्थान बनाने को लिख रहा है। यानी अब नए सिरे से वोटिंग मशीन में एक और बटन बढ़ाने की बात हो रही है। इसके जरिये मतदाता पर किसी उम्मीदवार को बेवजह चुनने का दबाव नहीं रहेगा।
सरकार द्वारा कार्रवाई न करने पर पीयूसीएल ने 2004 में सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी कि अदालत केंद्र सरकार को नियम 49(ओ) में बदलाव का आदेश पारित करे। याचिका पर दो जजों की पीठ ने विचार करने के बाद इसे 2009 में बड़ी पीठ को सौंप दिया।

एक से ज्यादा वोट देने का अधिकार:

देश में श्रेष्ठतावार मतदान का विकल्प भी काफी अहम हो सकता है। इसका मतलब किसी मतदाता को एक से अधिक वोटिंग का अधिकार देना है। मतदाता सबसे अधिक किसे पसंद करता है, उसे अधिक तरजीह दी जाएगी। हालांकि यह जटिल प्रक्रिया है और इसे लागू करने में दिक्ततें सामने आ सकती हैैं।


भारत में राइट टू रिकॉल

हमारे देश में राइट टू रिकॉल की बात सबसे पहले लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने 4 नवंबर 1974 को संपूर्ण क्रांति के दौरान कही थी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार म्यूनिसपल एक्ट को संशोधित कर उसमें राइट टू रिकाल को शामिल किया है। बिहार के पंचायती राज सिस्टम में निर्वाचित मुखिया को वापस बुलाए जाने का अधिकार पहले से ही यहां है। यहां नगर निकायों के लिए लागू राइट टू रिकाल में यह प्रावधान है कि किसी निर्वाचित निकाय प्रतिनिधि से संबंधित वार्ड के पचास फीसदी से अधिक मतदाताओं को एक हस्ताक्षरित आवेदन नगर विकास विभाग को देना होगा। विभाग को उस हस्ताक्षरित आवेदन की मेरिट को देखना होगा। अगर विभाग इस बात से सहमत है कि संबंधित वार्ड काउंसलर ने दो तिहाई मतदाताओं का विश्वास खो दिया है तो वह उक्त कांउसलर को हटा सकता है।
मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ सहित कुछ प्रदेशों में पंचायती राज व्यवस्था में चुने गए प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार है, लेकिन यह सांसद और विधायक पर लागू नहीं होता है। छत्तीसगढ़ में सीधे लोकतंत्र को स्थापित करने की दिशा में तीन शहरी निकायों के चुनावों में राइट टू रिकॉल शामिल किया गया। इस प्रदेश में जवाबदेही निश्चित करने के लिए जनमत संग्रह और राइट टू रिकॉल महत्वपूर्ण घटक है।
जाहिर है भारत में यह कानून कुछ प्रदेशों में नगर निकायों और पंचायती राज व्यवस्था में यह कानून लागू है, लेकिन अब देश में यह बात उठने लगी है कि इस कानून को लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में भी लागू किया जाए।

कैसे लागू होंगे नए कानून:
देश के चुनाव आयोग का मनना है कि चुनाव रिफॉर्म होने चाहिए, लेकिन इस दिशा में अंतिम रूप से कदम सरकार को ही उठाने होंगे। भारत में होने वाले चुनावों में राइट टू रिकॉल और राइट टू रिजेक्ट कानूनों को शामिल करने के लिए लोक प्रतिनिधित्व कानून में व्यापक बदलाव करने होंगे। राइट टू रिजेक्ट के तहत ईवीएम में तमाम उम्मीदवारों के नकार का प्रावधान करने के लिए उम्मीदवारों की लिस्ट के अखिर में नकार या अस्वीकृत का बटन मर्ज करना होगा। अगर नकार को तमाम उम्मीदवारों के बीच सबसे अधिक वोट मिलेंगे तो कोई भी विजेता नहीं होगा। ऐसी स्थिति में नए उम्मीदवारों के साथ फिर से चुनाव कराया जाएगा। अगर नकार को सबसे अधिक वोट मिलने के कारण मतदान रद्द होने और फिर दोबारा चुनाव करने का प्रावधान लागू करना है तो इसके लिए विधेयक लाने की जरूरत पड़ेगी।

क्या कहते है कृष्णमूर्ति :

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएस कृष्णमूर्ति का मनना है कि देश की वर्तमान चुनाव पद्धति में अहम बदलाव होने चाहिए। इससे भ्रष्टाचार पर काबू पाने में मदद मिलेगी। सबसे जरूरी है चुनाव खर्च पर लगाम। इसके साथ ही, भ्रष्ट, विकास न करने वाले या अक्षम जनप्रतिनिधियों को उनके पांच साल के भीतर बुलाने के लिए राइट टू रिकॉल तथा साफ-सुथरे, काबिल उम्मीदवार न होने पर राइट टू रिजेक्ट जैसे कानून जोडऩे होंगे। इसके अलावा श्रेष्ठता संबंधी मतदान का अधिकार भी देना होगा। उल्लेखनीय है कि श्री कृष्णमूर्ति ने अपने कार्यकाल में चुनाव सुधारों से जुड़े तमाम सुझाव सरकार को दिए थे लेकिन उन पर आज तक अमल नहीं हो सका।
कैसे होता है रिकॉल:

जनप्रतिनिधि को चुनने के बाद जब मतदाता उसके कार्य से संतुष्ट नहीं होते तब वे राइट टू रिकॉल का इस्तेमाल कर सकते हैैं। इसके लिए मतदाताओं को एक याचिका पर हस्ताक्षर करने होते हैं। यदि पिछले चुनाव के मतदाताओं का अधिक प्रतिशत जनप्रतिनिधि को हटाने के लिए हस्ताक्षर कर देता है तो उस जनप्रतिनिधि को पद से हटना होता है। वास्तव में मतदाताओं का राइट टू रिकॉल जनप्रतिनिधियों के लिए मौलिक कर्तव्यों की रूपरेखा बनाता है, जिसमें वह मतदाताओं के प्रति जवाबदेह होता है।
जनप्रतिनिधियों को यह तय करना होता है कि वे जो भी काम करने जा रहे हैं, उसमें से जनता के लिए क्या सही है या जनता को उस कार्य से क्या लाभ मिलेगा। इससे दीर्घकालिक योजनाएं बनाते समय अल्पकालिक विचारों को भी उन्हें ध्यान में रखना होता है। जाहिर है आम लोगों के हित की सरकारी नीतियां बनेंगी। हालांकि इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि बड़े वित्तीय संस्थान इस कमी का फायदा उठाकर अपने पक्ष के लिए नीति बनाने का दबाव बना सकते हैं। ऐसे में यह लोकतांत्रिक टूल स्थाई सरकार के लिए खतरा भी बन सकता है।
एक बात और रिकॉल और महाभियोग में भिन्नताएं हैं। रिकॉल एक राजनीतिक प्रक्रिया है,जबकि महाभियोग एक कानूनी प्रक्रिया होती है। रिकॉल प्रक्रिया को शुरू करने के लिए जनमत संग्रह भी किया जा सकता है, जो प्रभाव में कानूनी तौर पर बाध्यकारी होगा।
चुनाव सुधार सतत प्रक्रिया:
लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव सुधार काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। चुनाव सुधार एक सतत चलने वाली लंबी प्रक्रिया है और परिस्थितियों के हिसाब से इसमें लगातार परिवर्तन आते रहेंगे। राइट टू रिजेक्ट और राइट टू रिकॉल के अलावा भी कई ऐसे मामले है जिन पर ध्यान देने की जरूरत है। देश में आज भी जमीनी स्तर पर चुनाव प्रक्रिया को दुरूस्त करना बेहद जरूरी है। सबसे बड़ा सवाल है कि अपराधियों को चुनाव लडऩे से कैसे रोका जा सकता है। इसका हल ढूंढने में वक्त लग सकता है, लेकिन यह हमारे लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है। इसके अलावा एक बड़ी चुनौती है लगातार महंगे हो रहे चुनाव। एक अनुमान के अनुसार 2009 के आम चुनाव में 2,100 करोड़ रूपए फूंके गए, जबकि 2004 केआम चुनाव में 1,300 करोड़ रूपए खर्च हुए थे। मतदाताओं को प्रलोभन देने की प्रवृत्ति पर पाबंदी लगाने की भी जरूरत है। काम के सिलसिले में बाहर रहने वाले लोगों के लिए ऑनलाइन वोटिंग प्रणाली भी शुरू की जानी चाहिए। साथ ही मतदान को अनिवार्य किया जाना चाहिए ताकि अधिक से अधिक मत पड़ सकें और बेहतर जनप्रतिनिधि चुनकर आ सकें। आचार संहिता को और अधिक कठोर बनाया जाए ताकि किसी भी तरीके के दुरूपयोग को रोका जा सके। चुनाव आयोग को और अधिक अधिकार देने होंगे।

कई देशों में अनिवार्य है मतदान :

अर्जेंटीना, आस्ट्रेलिया, ब्राजील, बेल्जियम, चिली, साइप्रस, इक्वेडोर, फिजी, यूनान, लक्जमबर्ग, सिंगापुर, स्वीटजरलैंड, पेरु, नौरु, उरुग्वे, तुर्की जैसे दुनिया के 32 देशों में अनिवार्य मतदान संबंधी कानून मौजूद है। हालांकि इनमें से केवल 19 देशों में इस कानून का पालन कराने के लिए थोड़ी-बहुत सख्ती बरती जाती है। आस्ट्रेलिया और ब्राजील में स्वास्थ्य जैसे किसी मान्य कारण का हवाला देकर नागरिक मतदान करने से बच सकते हैं। बगैर किसी मान्य कारण के आस्ट्रेलिया में मतदान नहीं करने वाले नागरिकों पर 20 डॉलर का जुर्माना लगाया जाता है, जिसे 21 दिनों के भीतर चुकाना अनिवार्य होता है, अन्यथा जुर्माने की राशि बढ़ा दी जाती है। अनिवार्य मतदान संबंधी कानूनी प्रावधान के कारण ही आस्ट्रेलिया में औसतन 90-95 प्रतिशत मतदान होता है। बेल्जियम में मतदान करने से एकाधिक बार चूकने वाले नागरिकों से मतदान करने का अधिकार ही छीन लिया जाता है। पेरू और यूनान में मतदान नहीं करने वाले नागरिकों को सरकार से प्राप्त होने वाली सहायता और सेवा से वंचित कर दिया जाता है। बोलिविया में मतदान नहीं करने वाले नागरिकों को अपने बैंक खाते से तीन महीने तक वेतन आदि निकालने पर पाबंदी लगा दी जाती है। तुर्की में मतदान नहीं करने वाले नागरिकों पर तीन अमेरिकी डॉलर का जुर्माना लगाया जाता है।

भारत में मतदान अनिवार्य क्यों नहीं

वर्ष 1951 में अंतरिम संसद में लोक प्रतिनिधित्व विधेयक पर चर्चा के दौरान जब अनिवार्य मतदान का प्रस्ताव लाया गया था तब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने इस विचार पर सैद्धांतिक सहमति दिखाई थी, लेकिन व्यावहारिक कठिनाइयों के कारण वयस्क मताधिकार के साथ अनिवार्य मतदान का प्रावधान कानून में उस समय शामिल नहीं किया जा सका। उसके बाद से कई संसद सदस्य और राजनीतिज्ञ मतदान को अनिवार्य बनाए जाने के लिए कानून बनाए जाने का मुद्दा उठाते रहे हैं। संसद में कई बार गैर-सरकारी विधेयकों के रूप में अनिवार्य मतदान विधेयक को पेश भी किया गया है और उन पर विस्तृत चर्चा भी हुई है। हर बार सरकार इस तरह के कानून को लागू करने में पेश आ सकने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों और नागरिकों के मौलिक अधिकारों में हस्तक्षेप की बात कहकर इस प्रस्ताव को खारिज करती रही है।

बहुत जरूरी है चुनाव सुधार:
देश की जनता और राजनीतिक दलों को देश के मौजूदा माहौल को समझते हुए चुनाव सुधारों की दिशा में आगे बढऩा चाहिए। सभी को यह समझना होगा कि जब राजनीति ही साफ-सुथरी नहीं होगी तो फिर वह देश का भला कैसे कर सकेगी? राइट टू रिकॉल और राइट टू रिजेक्ट एक शुरुआत हो सकती है, लेकिन जनता और राजनीतिक दलों को सुनिश्चित करना होगा कि चुनाव व्यवस्था में जो भी खामियां हैैं उन्हें दूर करने के लिए वे संपूर्ण संकल्प शक्ति के साथ काम करें ताकि लोकतंत्र को और मजबूत किया जा सके।

विवादों की आइटम गर्ल राखी सावंत





- राजकुमार सोनी


ड्रामा क्वीन राखी सावंत बॉलीवुड में एक ऐसी एक्ट्रेस हैं जो शायद बोलने से पहले कुछ नहीं सोचती। तभी हमेशा वह विवादों में फंस, जाती हैं। कभी उनका दिल रामदेव बाबा पर आ जाता है तो कभी अन्ना हजारे को सच्चा मर्द बता करा चर्चाओं में रहती हैं।


बालीवुड की आइटम गर्ल राखी सावंत को हमेशा सुर्खियों में बने रहने का हुनर आता है। राखी सावंत और विवादों का चोलीदामन का साथ रहा है। कभी उन के बॉयफ्रेंड अभिषेक से उन का ब्रेकअप के कारण तो कभी मीका के चुम्बन विवाद से वे हमेशा लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचती रही हैं।
राखी ने फिल्मों में काम करने के बाद टीवी का रुख करते हुए कई शो किये, जिन से उन की लोकप्रियता खूब बढ़ी। लेकिन राखी का स्वयंवर शो के बाद घर-घर में उन की चर्चा शुरू हो गई। यहां तक की उन्होंने टीवी पर स्वयंवर रचाने की नई प्रथा की शुरुआत की। राखी सावंत में दूसरों का ध्यान आकर्षित करने की योग्यता हासिल है।



राखी का परिचय
राखी का जन्म 25 नवम्बर 1978 को मुंबई में हुआ। उनका नाम पहले कुट्टी सावंत था।
उन्होंने अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत 1997 में अग्निचक्र के साथ की। राखी के लिये यह कहना गलत नहीं होगा की हिट आइटम नंबरों और अलबमों में डांस की वजह से राखी आईटम डांसर के नाम से मशहूर हुईं। इसके बाद फिल्मों में आइटम डांस के जरिये उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बना ली।




चर्चाओं में रहना चाहती हैं राखी
राखी सावंत का सबसे विवादस्पद मुद्दा राखी और मीका चुम्बन रहा, जिसके बाद से विवादों ने उन का साथ नहीं छोड़ा। इससे पहले राखी का विवाद उनके बॉयफ्रेंड अभिषेक को लेकर रहा। काफी लम्बे समय तक राखी का अभिषेक के साथ अफेयर आखिरकार नच बलिए शो के बाद खत्म हो गया। बिग बॉस रियलिटी शो में राखी सावंत का विवाद कश्मीरा शाह के साथ शुरू हुआ, जो अब तक चला आ राह है। अपने बडबोलेपन और तेज स्वभाव की वजह से आए दिन राखी किसी न किसी नए विवाद को जन्म दे देती हैं।




रामदेव बाबा बनाम राखी
टीवी शो में बाबा रामदेव ने राखी सावंत को उनके बारे में ओछी बातें न कहने की नसीहत क्या दी, कि राखी उन पर और फिदा हो गई हैं। राखी के मुताबिक बाबा रामदेव ने ओछी बात कह कर एक तरह से प्यार का इजहार कर दिया है। स्वामी रामदेव की वर्जिनिटी भंग कर दूंगी उन्होंने कहा, मैं स्वामी रामदेव को अपने साथ बिग बॉस के घर में आने का चैलेंज देती हूं। मेनका बनकर मैं उनकी तपस्या भंग कर दूंगी। मुझे पूरा विश्वास है कि बाबा मेरी अदाओं से अपनी वर्जिनिटी खो देंगे। राखी ने कहा कि मेरी ख्वाहिश है कि कलर्स चैनल बिग बॉस-5 में बाबा रामदेव के साथ वाइल्ड कार्ड ऐंट्री दे। फिर मैं उन्हें अपनी क्षमताएं दिखा दूंगी।
दिल गधी पर आया तो परी क्या चीज : राखी ने कहा कि मुझसे कई लोगों ने कहा कि उन्हें रामदेव बदसूरत लगते हैं। लेकिन दिल लगा गधी से तो परी क्या चीज है। मैं इसके बावजूद उनसे प्यार करती हूं। आखिर वह करप्शन से लड़ रहे हैं और मैंने अपना वेट उनके योग की बदौलत ही कम किया है। स्वामी रामदेव को गर्व होना चाहिए कि एक हॉट आइटम गर्ल उनके इश्क में दीवानी है।
आइटम गर्ल राखी सावंत इन दिनों योग गुरु बाबा रामदेव को दिल दे बैठी हैं। वो ऐसा क्यों करना चाहती हैं किसी को नहीं पता लेकिन आइटम गर्ल राखी के बारे में लोग इतना तो जानते हैं कि वह पब्लिसिटी पाने के लिए कुछ भी कर सकती हैं। इनका बाबा से शादी का यह पैंतरा भी एक पब्लिसिटी स्टंट हो सकता है, ऐसा लोगों का मानना है। बहरहला राखी बाबा रामदेव को अपना जीवनसाथी बनाना चाहती है। एक कार्यक्रम के दौरान राखी सावंत ने कहा कि अगर बाबा रामदेव शादी करने के लिए सहमति दे दें तो वह बाबा से सात फेरे लेने को तैयार हैं। राखी ने कहा कि वह पहले कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी से विवाह करना चाहती थी। लेकिन सोनिया गांधी के रहते यह संभव नहीं है। अब राखी का दिल बाबा रामदेव पर आ गया है। राखी बाबा रामदेव के साथ स्वंयवर रचाना चाहती हैं। राखी ने इसके लिए एक चैनल से संपर्क किया है और कहा है कि चैनल बाबा से इस संबंध में बात करे।
रामदेव की दाढ़ी मुंड़वा दूंगी
स्वामी रामदेव के लिए राखी के पास कई तरह के प्लान हैं। राखी ने कहा कि उन्हें बाबा रामदेव की दाढ़ी पसंद नहीं है। मैं देखना चाहती हूं कि वह दाढ़ी के बगैर कैसे दिखते हैं। एक दिन मैं उनकी दाढ़ी मुड़वा दूंगी।

बाबा रामदेव का राखी को जबाव
योग गुरु बाबा रामदेव ने आइटम गर्ल राखी सावंत के शादी के प्रपोजल को खारिज करते हुए उन्हें नसीहत दे डाली। एक टीवी रिऐलिटी शो में पहुंचे बाबा ने कहा कि अगर आप किसी से प्यार करते हैं तो उसका नाम अपनी जुबां पर नहीं लाते। आपको याद होगा कि जब राखी अपने शो के सिलसिले में पिछले दिनों दिल्ली में आई थीं, तब उन्होंने कहा था कि वह रामदेव को पसंद करती हैं और उनसे शादी करना चाहती हैं। बहुत दिनों से रामदेव इस मामले में कुछ कह नहीं रहे थे। लेकिन रामदेव जब एक शो में पहुंचे तो वह इस सवाल से बच नहीं सके। स्वामी रामदेव ने यह भी कहा कि मुझे लगता है कि किसी भी शो को प्रमोट करने के लिए किसी संत को टारगेट नहीं करना चाहिए। मुझे कई लोग प्यार करते हैं और मुझे सबसे ज्यादा प्यार करने वाली जनता है। अब देखना होगा कि स्वामी जी की इस प्रतिक्रिया का जवाब राखी कैसे देती हैं। क्या एक और प्रेस कॉंफ्रेंस के जरिए या फिर सीधे हरिद्वार जाकर।

असली मर्द हैं अन्ना हजारे
अभी कुछ दिन पहले, योग गुरु बाबा रामदेव से शादी की इच्छा जता चुकी राखी का पूरा ध्यान अब अन्ना हजारे पर आ गया है। अब इनका कहना है कि अन्ना ही असली मर्द हैं। राखी सावंत छोटे या बड़े पर्दे पर कुछ ना कुछ धमाल करती ही हैं उन्हें सुर्खियों में छाये रहना अच्छा लगता है। इससे पहले राखी ने राहुल गांधी के साथ भी शादी करने की इच्छा जताई थी। आयटम गर्ल राखी आजकल इमेजिन टीवी के चैट शो गजब देश की अजब कहानियां में ये नजर आ रहीं हैं और हाल ही में इन्होंने एक टीवी चैनल में यह कहा कि मेरा झुकाव अन्ना की तरफ इसलिए है क्योंकि आज वो सबके रोल मॉडल बन चुके हैं। एक मराठी मानुष ने सारे देश को एक कर दिया है। वो आज भ्रष्टाचार के खिलाफ आम आदमी की आवाज बन कर सामने आए हैं। अन्ना ही असली भारतीय हैं जो खुद के बारे में ना सोचकर सारे देश के बारे में सोचते हैं। राखी कहती हैं कि मैं उनकी फैन हो गयी हूं बॉस! मेरी तरह वो भी गलत बात के खिलफा आवाज उठा रहे हैं, और मैं इस बात की इज्जत करती हूं।

अन्नाराम, केजरी रावण
दिल्ली के रामलीला मैदान में करप्शन के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन पर आइटम गर्ल राखी सावंत ने अन्ना हजारे की तुलना राम से की थी
राखी ने किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण पर कहा कि इनके रवैये से ही काम बन नहीं बन पा रहा है। ये तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा वाले आदमी हैं। जब भी आंदोलन की वजह से काम बनता दिखाई देता है, इन्ही तीनों की वजह से काम बनते बनते रह जाता है।
पुलिस में शिकायत: भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन में अन्ना हजारे के सबसे विश्वसनीय सलाहकार अरविंद केजरीवाल पर अवांछनीय टिप्पणी के लिए इस बार राखी सावंत के खिलाफ पुलिस में शिकायत की गई है। इससे नाराज आरटीआई कार्यकर्ता मनोज कड़वासरा व आशीष जैन ने पुलिस अधीक्षक को दी शिकायत में कहा है कि राखी सावंत ने अरविंद केजरीवाल को न केवल रावण की संज्ञा दी, वरन यह भी कहा कि वह राजनीति में आना चाहते हैं। उन्होंने राखी सावंत के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। केजरीवाल हिसार जिले के सिवानीमंडी के रहने वाले हैं। पुलिस अधीक्षक विवेक शर्मा ने कहा कि राखी सावंत के खिलाफ शिकायत को जांच के लिए सिविल लाइन थाना पुलिस को भेज दिया है। मामले की जांच के बाद कानूनी कार्रवाई की जाएगी।




सब कुछ दिखाने को बेताब

टीवी चैट शो गजब देश की अजब कहानी में राखी सावंत के बेहद सेक्सी लटके-झटकों ने शो के प्रड्यूसरों को हैरान-परेशान कर दिया है। प्रड्यूसरों को समझ नहीं आ रहा है कि वह राखी को हैंडल करें तो करें कैसे। शो में राखी अपने ऐसेट्स दिखाने के लिए इस कदर बेताब हैं कि अब प्रड्यूसरों को भी पसीना आ रहा है। उन्हें दर्शकों की ढेरों शिकायतें मिल रही हैं।
चैनल और प्रड्यूसर राखी से कई मिन्नतें कर चुके हैं, लेकिन वह कुछ सुनने को तैयार नहीं हैं। सूत्रों के मुताबिक राखी ने अपने डिज़ाइनर को साफ निर्देश दे रखा है कि वह ऐसी ड्रेस डिज़ाइन करे, जिसमें उनके ऐसेट्स स्क्रीन पर ठीक से नजर आएं। राखी अपने डिजाइनर से किसी को बात तक नहीं करने दे रही हैं। शो को होस्ट करने के दौरान राखी जान बूझकर इस तरह तरह के लटके-झटके दिखाती हैं कि स्क्रीन पर उनके ऐसेट्स हाइलाइट हो जाएं। यही नहीं एपिसोड दर एपिसोड राखी की ड्रेस भी छोटी होती जा रही है।



राखी का बोल्ड अंदाज
राखी के इस बेहद बोल्ड अंदाज से चैनल के पास दर्शकों की ढेरों शिकायतें आ रही हैं। उधर, राखी कुछ भी सुनने के मूड में नहीं हैं। राखी चाहती हैं कि यह शो ट्रेंडसेटर बन जाए। राखी दरअसल विदेशी स्टाइल को कॉपी करना चाह रही हैं।

बढ़ गए राखी के भाव
सुनने में आया है कि एक शो के लिए राखी सावंत के कॉस्ट्यूम्स और विग्स का बिल करीब 72 लाख रुपये आया है। गजब देश की अजब कहानियां नाम के इस शो में राखी के नखरे चैनल से संभल नहीं रहे हैं। चैनल ऑफिशल्स ने राखी से रिक्वेस्ट किया है कि वह अपना खर्च आधा कर दें , क्योंकि इतने ज्यादा अमाउंट की पेमेंट उनके लिए मुश्किल है। लेकिन राखी ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया। यह शो राखी के पहले वाले शो राखी का इंसाफ का ही दूसरा नाम है।



बन गईं बिजनस वुमन
अब राखी सावंत ने पूरी तरह तय कर लिया है कि वह बिजनस वुमन बनकर रहेंगी। हाल ही में स्पा का बिजनस शुरू कर चुकीं राखी अब प्रॉडक्शन हाउस, डांस अकैडमी और रेकॉर्डिंग स्टूडियो खोलने जा रही हैं। उन्होंने मुंबई के अंधेरी इलाके में एक बड़ा रेकॉर्डिंग स्टूडियो खरीदा है। तीन हजार स्क्वॉयर फीट के इस स्टूडियो को लेकर अब राखी बड़े-बड़े सपने देख रही हैं। जगह अच्छी है, जाहिर है राखी ने इसमें बहुत पैसा लगाया होगा। इस स्टूडियो की कीमत पूछने पर राखी कहती हैं, यह सच है कि मैंने बिल्डिंग का पूरा छठा फ्लोर स्टूडियो बनाने के लिए खरीद लिया है, लेकिन मैं इसकी कीमत नहीं बता सकती। हालांकि आज इसकी प्राइस करोड़ों में है, लेकिन यह मैंने तब खरीदा था, जब इस बिल्डिंग की नींव पड़ी थी। मैं हमेशा से ही अपना पैसा प्रॉपर्टी में इन्वेस्ट करती आई हूं और इसकी वजह से मेरा इतना बड़ा फायदा हुआ है। स्टूडियो के इस बिजनस में मैं 70 प्रतिशत की पार्टनर हूं। हम इस स्टूडियो के लिए सभी मशीनें विदेश से मंगवा रहे हैं। दरअसल, मैं चाहती हूं कि हमारे यहां की तकनीकें भी हॉलिवुड के लेवल की हों। इसकी ओपनिंग अप्रैल में होगी।
इससे पहले राखी ब्यूटी के बिजनस में कदम रख चुकी हैं। उन्होंने एक स्पा खोला है। वह कहती हैं, मैं जो कुछ भी शुरू कर रही हूं, वह अपने पैसों से शुरू कर रही हूं। मैं अपनी तुलना किसी से नहीं करना चाहती। मैंने तय कर लिया है कि मैं बिजनस में बहुत मेहनत करूंगी और भगवान की कृपा रही तो सफल भी रहूंगी।

टीवी के लिए प्रॉडक्शन हाउस
यही नहीं, राखी अब टीवी के लिए अपना एक प्रॉडक्शन हाउस भी खोलने जा रही हैं। इसके लिए उन्होंने अंधेरी की एक बड़ी बिल्डिंग में फर्स्ट और सेकंड फ्लोर खरीद लिया है। जाहिर है, वह टीवी पर रिऐलिटी शो और सीरियल्स का निर्माण करेंगी। बाइबल पर सीरियल बनाने का फैसला वह कर चुकी हैं। हालांकि इतने सारे बिजनस के बीच वह अपने शौक को बिल्कुल नहीं भूली हैं। जल्द ही वह एक डांस अकैडमी भी शुरू करने वाली हैं।

डांस एकेडमी
खबर को स्वीकारते हुए राखी बताती हैं, मैं एक डांस एकेडमी भी शुरू करने जा रही हूं। हालांकि इसमें अभी थोड़ा वक्त है, लेकिन डांस मेरा पहला शौक है और इसके लिए अकैडमी खोलने की इच्छा काफी पहले से थी। इस अकैडमी में इंटरनैशनल डांस सिखाया जाएगा। राखी ने एक टीवी चैनल पर स्वयंवर रचाकर इतिहास बनाया था। हालांकि अब वह इलेश से शादी नहीं करने जा रही हैं। अगर आप सोच रहे हैं कि राखी स्वयंवर कर पछता रही हैं, तो आप गलत हैं। राखी का तो मानना है कि अगर कोई चैनल उनके दूसरे स्वयंवर की प्लानिंग करता है, तो वह खुशी खुशी तैयार हैं। दिक्कत बस यह है कि फिलहाल उनके स्वयंवर पार्ट टू के लिए कोई चैनल तैयार नहीं हो रहा। क्या पता जल्दी ही कोई चैनल इसके लिए तैयार हो जाए!




बॉडीगार्ड की तलाश
कंट्रोवर्सी क्वीन राखी सावंत एक बार फिर से खबरों में बनी हुईं हैं। इस बार इस आइटम गर्ल ने कुछ अनोखा ही काम किया है। वे अपने विभिन्न बॉडी पार्ट्स का इंश्योरेंस करवाना चाहती हैं। यह कंट्रोवर्सी क्वीन उन हॉलीवुड ब्यूटीज से इंस्पायर्ड है जिन्होंने अपने बॉडी पार्ट्स को इंश्योर्ड करवाया है। और वह उत्साहपूर्वक इन विदेशी सुंदरियों को कॉपी करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। राखी कहती हैं, मैं हॉलीवुड स्टार्स की तरह ही अपने बॉडी पार्ट्स का इंश्योरेंस करवाना चाहती हूं। मैंने अपनी लाइफ और एक्सीडेंट इंश्योरेंस करवा रखा है लेकिन अब मैं अपने चेहरे, बाल, क्लीवेज और बट की भी सुरक्षा चाहती हूं। हालांकि राखी को भारत में ऐसी किसी भी कंपनी के बारे में नहीं पता है जो उनके बॉडी पार्ट्स को इंश्योर्ड करने में मदद करे। इस बारे में राखी कहती हैं, लेकिन मुझे पता नहीं है कौन सी भारतीय बीमा कंपनी इसमें मेरी मदद कर सकती है। मुझे विदेशी बीमा कंपनियों से संपर्क करने में भी कोई परेशानी नहीं है लेकिन मैं अब और ज्यादा इंतजार नहीं कर सकती। मेरा चेहरा, बाल और मेरे अन्य बॉडी पार्ट्स मेरी रोजी-रोटी हैं और मुझे ग्लैमरस लुक देते हैं। मैं अपने खुशहाल करियर और लाइफ के लिए अपनी इस प्रॉपर्टी के लिए सुरक्षा कवच चाहती हूं। शरीर का इंश्योरेंस कराके मैं टेंशन फ्री होना चाहती हूं।



अब सेक्स की शिक्षा देंगी
हमेशा विवादों में रहने वाली राखी सावंत अब सेक्स शिक्षा देती नजर आएंगी। इस बार चर्चा है कि राखी सावंत एक फिल्म में सेक्स टीचर रोल अदा करेंगी। राखी निर्देशक अशफाक मकरानी की फिल्म कसम से कसम से में सेक्स टीचर का रोल अदा कर रही हैं। अब ये देखने वाली बात होगी कि छात्र राखी से सेक्स का ज्ञान लेते हैं या सेक्सी टीचर को निहारते ही रहेंगे। राखी फिल्म में बेहद सेक्सी ड्रेसेज में नजर आने वाली हैं। उनके सेक्सी कॉस्ट्यूम्स तैयार करने के लिए फैशन डिजाइनर टैन्जी को लिया गया है।

बिग बी को चुनौती
राखी सावंत ने अब अपना फोकस स्मॉल स्क्रीन पर ही कर लिया है। वे एक रियेलिटी शो ही होस्ट के रूप में नजर आ रही हैं। वे टीआरपी के लिए काफी मेहनत भी कर रही हैं। हाल ही में एक इंटरव्यू में राखी ने कहा कि मेरा शो रात 10 बजे आता है तब तक बिग बी का शो खत्म हो जाता है।
मेरे शो की किसी से कोई प्रतियोगिता नहीं है। आप लोगों को एक करोड़ जीतने के लिए बुला सकते हैं, उन्हें खाना बनाना सीखा सकते हैं, उन्हें कुछ रियेलिटी दिखा सकते हैं लेकिन मेरे शो में जैसी कहानियां दिखाई जाती हैं वे बहुत मनोरंजक होती हैं। राखी की इस बात से लगता है कि वे बिग बी को चुनौती दे रही हैं।



राखी का स्वयंवर
अपेक्षा के अनुरूप राखी सावंत ने रविवार 2 अगस्त 2010 की रात करोड़ों टीवी दर्शकों के सामने इलेश पारुजनवाला को अपना वर चुन लिया था । मुंबई स्थित एक होटल में हुए स्वयंवर में राखी के सामने क्षितिज जैन, मानस कत्याल और इलेश पारुजनवाला खड़े थे। राखी नर्वस थीं। उन्होंने निर्णय लेने के पहले भगवान को याद किया, प्रार्थना की और अंत में इलेश के गले में वरमाला डाल दी। बाद में दोनों ने एक-दूसरे को अँगूठी पहनाकर सगाई की रस्म पूरी की। इलेश और राखी का मानना है कि दोनों को एक-दूसरे को समझने के लिए थोड़ा और समय चाहिए इसलिए वे कुछ दिनों बाद शादी करेंगे। राखी की शादी का सीधा प्रसारण होगा, ऐसी घोषणा की गई। इस कार्यक्रम में तीनों उम्मीदवारों के परिवार के सदस्य भी मौजूद थे। इलेश को चुनने की वजह बताते हुए राखी ने कहा था कि वे ऐसे व्यक्ति हैं, जिनमें पति बनने के सारे गुण मौजूद हैं। राखी ने उन पर कड़ी नजर रखी और कई बार परीक्षा भी ली। राखी ने कहा था कि वे इलेश का साथ निभाने के लिए हरसंभव कोशिश करेंगी। इलेश ने कहा था कि राखी ने सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति को चुना है। वे राखी के आगे या पीछे नहीं बल्कि साथ चलेंगे। बाद में इलेश अपने देश कनाडा चले गए थे। और राखी का स्वयंवर सिर्फ सपना रह गया था।


राखी सावंत की मां काम की तलाश में
'ड्रामा क्वीननÓ राखी सावंत की मां को काम की तलाश है। एक तरफ राखी अपने नए रिएल्टी शो 'अजब देश की गजब कहानीÓ से खूब सुर्खियां बटोर रही हैं वहीं दूसरी तरफ उनकी मां जया सावंत काम की तलाश में हैं। दरअसल जया सावंत एक बार फिर अपनी बेटी राखी सावंत से परेशान हैं, वे चाहती हैं कि राखी एक बार फिर उनकी मदद करें लेकिन फिलहाल उन्हें राखी की तरफ से कोई मदद नहीं मिल रही है। जया सावंत काम की तलाश में रियल्टी शो के प्रोडेक्शन हाउस के चक्कर काट रही हैं।

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

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स्केच और अपराधी

- राजकुमार सोनी

हाईटेक युग में भी पुलिस द्वारा जारी किया जाने वाला स्केच अपराधियों को पकडऩे में सहायक नहीं हो रहा। पुलिस के रिकार्ड में स्केच से शायद ही किसी अपराधी को सफलता मिली हो। अक्सर आधे-अधूरे स्केच या अधूरी जानकारी अपराधी को सामने नहीं ला पाती, जिससे आम आदमी उसकी पहचान कर पुलिस को सूचना दे सके। इसी पर केंद्रित है आज की कवर स्टोरी।


दिल्ली हाईकोर्ट में हुए बम विस्फोट के बाद दो संदिग्ध आतंकवादियों के स्केच पुलिस ने जारी किए हैं। इसी तरह धौला कुआं गैंगरेप केस में पुलिस ने तीन स्केच जारी किए थे। पांचों मुल्जिम गिरफ्तार कर लिए गए। शिनाख्त परेड में दो को लड़की ने पहचान लिया, जबकि बाकी तीन ने परेड से इनकार कर दिया। क्या स्केच मुल्जिमों से मिलते-जुलते हैं? क्या स्केच ने इस केस को सुलझाने में कोई योगदान दिया? यह सवालिया निशान सभी के जेहन में उलझ रहा है।

स्केच की रवायत
पिछले सालों में हाई प्रोफाइल केसों में मुल्जिमों के स्केच जारी करने की रवायत पड़ गई है। 13 सितंबर 2008 को सीरियल बम ब्लास्ट के बाद आतंकवादियों के स्केच जारी किए गए थे। बाराखंभा रोड पर बम रखने वाले प्लांटर का स्केच गुब्बारे बेचने वाले एक बच्चे के बयान पर बना था। पुलिस का दावा है कि बटला हाउस एनकाउंटर की शाम एक टीवी चैनल के दफ्तर से गिरफ्तार जीशान अहमद का चेहरा-मोहरा स्केच से मिलता-जुलता है। धौला कुआं गैंगरेप केस-2 से पहले 2005 में धौला कुआं गैंगरेप केस-1 में भी एक स्केच जारी किया गया था।

राजीव गांधी हत्याकांड से शुरुआत
भारत में अपराधियों के स्केच जारी होने की चर्चा राजीव गांधी हत्याकांड में नलिनी और मुरुगन के स्केच निकलने के बाद शुरू हुई थी। हालांकि, नलिनी की गिरफ्तारी में स्केच नहीं, बल्कि मुखबिरी का हाथ था। पिछले दशक में मुरादाबाद के गजरौला में नन गैंगरेप कांड में बलात्कारियों के स्केच वारदात के दो साल बाद यूपी पुलिस ने

अखबारों में छपवाए थे। उस बहुचर्चित केस में स्केच के आधार पर संदिग्ध मुल्जिम गिरफ्तार किए गए थे।

शर्मा परिवार हत्याकांड
13 जनवरी 1996 को सी-2, वसंत कुंज में शर्मा परिवार के चारों सदस्यों और एक नौकर की हत्या उन्हीं के नौकर टीकाराम ने कर दी थी। टीकाराम का कोई फोटो नहीं था। पड़ोसियों के बयान पर उसका स्केच बनवाया गया। इस केस के साथ दिल्ली में किसी अपराधी के स्केच जारी करने की प्रक्रिया चर्चा में आई थी। चार महीने बाद टीकाराम को नेपाल से लाया गया, लेकिन उसकी गिरफ्तारी में स्केच का कोई योगदान नहीं था। स्विस डिप्लोमेट रेप केस में पीडि़त महिला ने नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के ऑफिस में बड़ी मेहनत से स्केच बनवाया था, लेकिन अपराधी का सुराग आज तक नहीं मिला।
दिल्ली पुलिस वॉन्टेड अपराधियों के स्केच आम तौर पर एनसीआरबी के एक्सपर्ट से बनवाती रही है। हालांकि, अब पुलिस अफसर अपने पोर्टेट एक्सपर्ट से स्केच बनवा रहे हैं। इस सॉफ्टवेयर में हजारों जाने-अनजाने अपराधियों के चेहरे होते हैं, जिनके बाल, नाक, कान, माथा, चिन्ह आदि को अलग-अलग लेकर अरबों कंप्यूटराइज्ड चेहरे बनाए जा सकते हैं। 1991 से पहले यह प्रक्रिया इंसानी हाथों से की जाती थी।

याददाश्त पर निर्भर
अपराधी की गिरफ्तारी में स्केच की नाकामी के लिए पोट्र्रेट ड्रॉइंग सिस्टम को पूरी तरह जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। दरअसल, स्केच पीडि़त या किसी गवाह की याददाश्त पर तैयार किया जाता है। अपराधी के चेहरे से स्केच का मिलान उस याददाश्त पर भी निर्भर है। एक पहलू यह भी है कि मुल्जिम का चेहरा स्केच से मिल जाए, तो पोर्टेट एक्सपर्ट को कोर्ट में बयान देने जाना भी पड़ सकता है। एनसीआरबी की पूर्व पोट्र्रेट एक्सपर्ट सुरेखा सोनी 2005 के दिवालों धमाकों के केस में कोर्ट में तारीखों पर जा रही हैं। उनका बनाया स्केच एक मुल्जिम से हूबहू मिलता है।

महज औपचारिकता
यह कहना गलत नहीं होगा कि स्केच जारी करना मात्र औपचारिकता है, जिसे किसी भी अपराधी द्वारा वारदात करने के बाद पूरा किया जाता है। खुद पुलिस को भी स्केच पर अधिक भरोसा नहीं है। आला अधिकारियों का मानना है कि अपराधी के बारे में अगर पूरी जानकारी नहीं होगी तो स्केच बनाने में दिक्कत आना स्वाभाविक है। गलत स्केच का फायदा अपराधी भी उठा लेते हैं, क्योंकि उन्हें पता होता है कि स्केच सही बना ही नहीं।

पुलिस अधिकारियों के अनुसार हुलिया देने वाला
ही स्केच की पहचान करता है, जिसे पीडि़त द्वारा बताए गए हुलिए के आधार पर बनाया जाता है। ऐसे में वह व्यक्ति अपराधी का हुलिया कितना सही बताता है, यह तय नहीं किया जा सकता। अधिकारी यही मानते हैं कि स्केच पर यकीन कर अपराधी को ढूंढऩा उनकी मजबूरी है, क्योंकि उनके पास इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं होता।
स्केच से मिलने वाली उपलब्धि पर अगर गौर फरमाएं तो पिछले दो दशक से पुलिस विभाग ने सैकड़ों स्केच जारी किए, लेकिन परिणाम शून्य ही रहे। लूट, डकैती व खूंखार अपराधियों के स्केच जारी करने के लिए जिला मुख्यालय पर कंप्यूटर ब्रांच खोली गई है। आधुनिक साफ्टवेयर व प्रशिक्षित कर्मचारियों के अभाव के कारण पुलिस को अभी तक कोई बड़ी उपलब्ध स्केच से हासिल नहीं हुई है।

प्रॉपर्टी डीलर पत्नी हत्याकांड
सेक्टर सात की कोठी नंबर 1464 में बदमाशों ने दिनदहाड़े प्रापर्टी डीलर की पत्नी से चाकू की नोक पर 5.30 लाख लूट लिए। पुलिस ने पीडि़त महिला से लूटपाट करने वाली महिला का हुलिया जानने के बाद स्केच भी जारी किया। जिला मुख्यालय पर बने कंप्यूटर सेंटर में महिला का स्केच बनाने वाला प्रशिक्षित कर्मी नहीं होने के कारण एससीआरबी मधुबन से स्केच बनवाया गया। स्केच को सभी थानों व चौकियों के अलावा सार्वजनिक स्थानों पर चस्पाया गया, लेकिन पुलिस को अभी तक कोई सफलता नहीं मिली। तफ्तीश अधिकारी स्वयं मानते हैं कि स्केच जारी करवाना मात्र औपचारिकता है, लेकिन उनका यह भी तर्क है कि अगर कोई बड़ी वारदात होती है तो पीडि़त इतना सहम जाता है कि उसे बदमाश का हुलिया ठीक से ध्यान में नहीं रहता।

60 फीसदी गलत साबित
किसी भी संगीन अपराध के बाद पुलिस तफ्तीश को आगे बढ़ाने के लिए सबसे पहले अपराधी का स्केच बनवाती है। आमतौर पर ये स्केच 60 फीसदी गलत होते हैं। किसी का पोट्र्रेट बनाने में और किसी के बयान के आधार पर अपराधी का स्केच बनाने में फर्क है। यह दावा है पोट्र्रेट मेकर आरएम सिंह का। सिंह कहते हैं कि स्केच के आधार पर किसी आतंकवादी या अपराधी के पकड़े जाने के मामले 10 फीसदी से भी कम हैं। वह कहते हैं, पोट्र्रेट तीन तरह से बनाए जाते हैं- सामने बिठाकर, फोटो से या फिर इमेजिनेशन के आधार पर। देखी गई किसी सूरत को इमेजिनेशन के आधार पर बनाना सबसे मुश्किल है। पुलिस या दूसरी जांच एजेंसियां भी इसी आधार पर स्केच बनवाती हैं, लेकिन इसमें चूक की गुंजाइश भी

रहती है। सिंह कहते हैं कि पुलिस जांच के लिए स्केच बनाने की प्रक्रिया तीन स्तर से गुजरती है, ऐसे में खामी रह जाना स्वाभाविक है।
सबसे पहले यह ध्यान में रखना होता है कि चश्मदीद ने कितनी देर तक और कितनी देर पहले आरोपी को देखा है। यह भी जरूरी है कि स्केच बनाने वाला चश्मदीद के ऑब्जर्वेशंस को ठीक से समझ सके। हो सकता है कि चश्मदीद को चेहरा बिल्कुल याद है, लेकिन वह ठीक से स्पष्ट नहीं कर पा रहा। सिंह कहते हैं कि इसके लिए चश्मदीद की मेमोरी, कम्युनिकेशन बहुत मजबूत होना चाहिए।
यहां यह महत्वपूर्ण है कि वह स्केच बनाने वाले को उस चेहरे की एनाटॉमी की डिवीजन कितने सही तरीके से बताता है। इस प्रक्रिया से गुजरने के बाद स्केच 40 फीसदी से ज्यादा सही नहीं बनता। इसीलिए स्केच के आधार पर पकड़े जाने वाले अपराधियों के मामले भी 10 फीसदी से ज्यादा नहीं। सिंह कहते हैं कि अब जांच एजेंसियां डिजिटल पोट्र्रेट मेकिंग के जरिए स्केच बनवाती हैं, जो काफी हद तक मेल खा सकते हैं। हालांकि यहां भी सब कुछ चश्मदीद की आब्जर्वेशन पर निर्भर करता है।

कब मिलती है सफलता
बड़ी वारदातों के बाद पुलिस द्वारा अपराधियों का संभावित स्केच जारी करना कितना कारगर और क्यों नाकाम जैसे बिंदुओं पर की गई पड़ताल में चौंकाने वाली जानकारियां सामने आई हैं। ये बताती हैं कि ये स्केच मददगार तो हो सकते हैं, लेकिन इसके लिए वारदात के वक्त भुक्तभोगी का पूरे होशो-हवास में रहना जरूरी है। ऐसा आमतौर पर हो नहीं पाता। इसमें सबसे अहम यह है कि पीडि़त पक्ष अपराधी का हुलिया सही-सही बताए। कारण-इसके ही सहारे कंप्यूटर एक्सपर्ट से पुलिस स्केच बनवाती है। ये एक्सपर्ट महकमे के भी होते हैं और कभी-कभार बाहर से भी बुलाए जाते हैं। यही एक्सपर्ट पीडि़त पक्ष के बताने के मुताबिक चेहरा डिजाइन कर देते हैं। वारदात के वक्त लोग इतने घबरा जाते हैं कि सही हुलिया नहीं बता पाते। इससे गड़बड़ होती है। अपने अनुभवों के आधार पर बताया-अक्सर देखा गया है कि पीडि़त अगर कोई महिला है तो ज्यादा सटीक हुलिया मिलता है। शायद इसलिए कि महिलाओं में संकट के समय संयत रहने की क्षमता ज्यादा है। मालदार लोग कुछ ज्यादा ही सहम जाते हैं। इस नाते सही चेहरा जेहन से उतर जाता है। अनजाने में ही वह काल्पनिक चेहरा बनवा देते हैं।


नया सॉफ्टवेयर तैयार
भारतीय मूल के वैज्ञानिक की अगुवाई वाले दल ने

नया सॉफ्टवेयर और कलन विधियां विकसित की हैं। इनके जरिए हाथों से बनाए चेहरों के स्केच खुद ब खुद पुलिस के पास मौजूद डाटाबेस से मिलान हो जाएंगे। अमेरिका की मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी (एमएसयू) के शोधकर्ताओं का कहना है कि एक बार इस्तेमाल करने पर उनके प्रोग्राम के निहितार्थ काफी बड़े होंगे। यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग के प्रोफेसर अनिल जैन ने इस शोध में मुख्य भूमिका निभाई है। यह शोध आइईईई ट्रांसेक्शन ऑन पैटर्न एनालिसिस एंड मशीन इंटेलीजेंस जर्नल में प्रकाशित हुआ है। एमएसयू में शोध छात्र ब्रेंडन क्लारे ने बताया कि आमतौर पर चश्मदीद द्वारा बताई गई जानकारी के आधार पर आर्टिस्ट स्केच बनाते हैं। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से अक्सर ऐसे स्केच में अपराधी के रूप का सटीक चित्रण नहीं हो पाता है। कुछ ऐसे सॉफ्टवेयर भी हैं, जो चश्मदीद द्वारा बताए गए विवरण के आधार पर स्केच बना देते हैं। ये भी हालांकि प्रशिक्षित फोरेंसिक आर्टिस्ट के बनाए स्केच की अपेक्षा कम सटीक होते हैं। एमएसयू परियोजना पर कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग की पैटर्न रिकॉगनिशन एंड इमेज प्रोसेसिंग (पीआरआइपी) लैब में काम किया गया है। यह पहला बड़े स्तर पर किया गया प्रयोग है, जिसमें फोटोग्राफ के साथ फोरेंसिक स्केच का मिलान किया गया और अभी तक इसके परिणाम बेहतरीन रहे हैं। क्लारे ने कहा कि हमने चेहरों की पहचान करने वाली शीर्ष प्रणालियों में से एक में उल्लेखनीय सुधार किया है।

सुरक्षाबलों की जरूरत
देश में घटने वाली आतंकी घटनाएं हों या आपराधिक वारदातें, इनके सूत्रधारों की धरपकड़ के लिए ज्यादा से ज्यादा प्रशिक्षित सुरक्षाबलों की जरूरत पर काफी जोर दिया जा रहा है। सुरक्षाबलों का विशेष प्रशिक्षण आज समाज और समय की मांग है। प्रशिक्षण का एक महत्वपूर्ण पहलू फॉरेंसिक साइंस से जुड़ा है। इस साइंस का जानकार व्यक्ति आतंकवादी वारदात या अपराध से जुड़े लोगों को पकड़वाने में खासा मददगार होता है। आतंकवादियों या अपराधियों का स्केच तैयार करने में भी फॉरेंसिक साइंस के एक्सपर्ट ही मददगार होते हैं। अदालत भी कानून में इसी साइंस की मदद लेकर जांच को आगे बढ़ाती है। आशय यह कि आतंकी वारदातों की गुत्थियां हों या किसी की रहस्यात्मक मौत, इसे सुलझाने में फॉरेंसिक साइंस खासा मददगार है। यह वारदात या घटना-स्थल से प्राप्त साक्ष्यों का मुआयना और परीक्षण करती है। फॉरेंसिक साइंटिस्ट से प्राप्त इनपुट को लेकर ही इंवेस्टिगेटिंग ऑफिसर अदालत के समक्ष हाजिर होता है। जरूरत पडऩे पर फॉरेंसिक साइंटिस्ट घटना-स्थल का भी निरीक्षण करता है, ताकि

साक्ष्यों का पता लगाया जा सके।
फॉरेंसिक साइंस को लेकर आज तीन तरह के कोर्स चल रहे हैं। पहला सर्टिफिकेट कोर्स है। इसमें फॉरेंसिक के विभिन्न पहलुओं के बारे में प्रारंभिक स्तर का ज्ञान दिया जाता है। उसके बारे में रुचि और समझ पैदा की जाती है। इसमें साइंस के विभिन्न रूपों मसलन भौतिकी, केमिस्ट्री, टॉक्सिकोलॉजी, जूलॉजी, एंथोपोलॉजी, बॉटनी, मनोविज्ञान और मेडिसिन आदि के बारे में बताया जाता है। इसके अलावा छात्रों को फोटोग्राफी व हैंड राइटिंग परीक्षण के बारे में प्रशिक्षित किया जाता है। थियोरॉटिकल के साथ उन्हें प्रैक्टिकल भाग के बारे में बताया जाता है। वे क्रिमिनल लॉ और दूसरे डिग्री कोर्स यानी बीएससी स्तर के तीन वर्षीय कोर्स में सर्टिफिकेट, क्रिमिनोलॉजी के बारे में भी कुछ जानकारी हासिल करते हैं। डिप्लोमा में जो पढ़ाया जाता है उसका विस्तार होता है। इसके लिए कोर्स को छह सेमेस्टर में बांटा जाता है। सभी सेमेस्टर में थ्योरी के साथ-साथ प्रैक्टिकल शामिल होता है। इसके अलावा छात्र डिग्री लेवल पर दो सबसीडरी विषय जैसे केमिस्ट्री, भौतिकी, मैथ्स या बॉयोलॉजी पढ़ते हैं।


नया तरीका खोजा
वैज्ञानिकों ने बीमारियों के इलाज, अपराध अनुसंधान और खाद्य एवं पेय पदार्थों की शुद्धता बरकरार रखने के लिए नया तरीका खोज लिया है। इसके के उपयोग की गई तकनीक में शोधकर्ताओं ने रोशनी और विद्युत क्षेत्र के जरिए जीवाणु, विषाणु और डीएनए से युक्त छोटे कणों को विभिन्न स्थानों पर स्थानांतरित किया है। पदर्यू विश्वविद्यालय के मैकेनिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर स्टीवन टी. वेरले ने कहा कि इस नई तकनीक के जरिए हम माइक्रोलीटर से लेकर नैनोलीटर तक के आकार वाले कणों को एक जगह से दूसरी जगह पर स्थानांतरित कर सकते हैं। मौजूदा तकनीक के जरिए जीवाणु या विषाणु का पता तभी चलता है, जब वे मशीन के सेंसर के सामने होते हैं। लेकिन इस नई तकनीक से मशीन के सेंसर को तेजी से जगह बदलने वाले अणुओं की पहचान करने में सक्षम बनाया जा सकेगा। इस शोध में शामिल विश्वविद्यालय के छात्र आलोक कुमार ने कहा कि इस तकनीक के जरिए सेंसर को अति आधुनिक बनाया जा सकेगा। यह तकनीक भविष्य की प्रयोगशालाओं को एक माइक्रोचिप में समेट लेने की क्षमता रखती है, इस चिप से सभी तरह के बायोलॉजिकल टेस्ट किए जा सकेंगे।
इस तकनीक से बने सेंसर्स को खून, मूत्र और अन्य जांचों के लिए उपयोग किया जा सकेगा। इससे दवाओं की जांच, पितृत्व परीक्षण, हृदय धमनियों से संबंधित बीमारी की पहचान, ट्यूमर

और अन्य अनेक बीमारियों की पहचान की जा सकेगी। वेरले ने कहा कि इस तकनीक का उपयोग डीएनए टेस्ट और अपराधियों की पहचान करने भी में किया जा सकेगा।



सात नई तकनीकें

ब्रैन फिंगरप्रिंटिंग
फिंगरप्रिंटिंग के बारे में सब जानते हैं, लेकिन ब्रैन फिंगरप्रिंटिंग क्या है? यह तकनीक शातिर अपराधियों को भी अपने गुनाह कबूल करने पर मजबूर कर देती है। ब्रैन फिं गरप्रिंटिंग में अपराधी को कम्प्यूटर पर कुछ तस्वीरें दिखाई जाती हैं। इनमें से कुछ तस्वीरें आम होती हैं, लेकिन कुछ तस्वीरें अपराध से जुड़ी होती हैं। अपराधी हैडबैंड लगाए हुए रहता है और उसके दिमाग की हलचल इलेक्ट्रोइंसफेलोग्राफ तकनीक की मदद से पढ़ी जाती हैं। अपराध की तस्वीरें देखने पर अपराधी का दिमाग अलग तरह से व्यवहार करता है और इससे पता चल जाता है कि अपराधी का संबंध उक्त घटना से रहा है।

नकली माल की पहचान
नकली माल की पहचान कैसे हो इसके कई तरीकें हैं, लेकिन अब एक नया और आधुनिक तरीका भी जुड़ गया है, जो काफी सटीक है। वह है पौधों के डीएनए का कोड। किसी भी वास्तविक उत्पाद में इस्तेमाल होने वाले पौधों के कणों को एक विशेष कोड दे दिया जाता है, जो उस पौधे के डीएनए सिक्वेंस पर आधारित होता है। जब भी कभी उस उत्पाद से मिलते-जुलते नकली उत्पाद की पहचान करना होती है तो जांच एजेंसी को मात्र विशेष स्कैनर की मदद से उत्पाद के कोड की जांच करना होती है।

शू प्रिंटिंग
शू प्रिंटिंग मतलब जूतों के निशान। जूतों के खोल के निशान जांच एजेंसियों की मदद करती है। अमूमन हर अपराधी अपराध स्थल पर अपने जूतों के निशान छोड़ जाता है। जूतों के इन निशानों की जांच पहले भी होती थी, लेकिन तब यह जांच इंसानों द्वारा ही की जाती थी और इतनी सटीक नहीं होती थी। लेकिन अब ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने एक ऑटोमेटेड सिस्टम विकसित कर लिया है, जो अपराध स्थल पर मौजूद जूतों के निशान का मिलान संदिग्ध के जूतों के निशान से करता है। इसमें तलवे पर लगे लोगो के निशान का मिलान भी शामिल है। ब्रिटेन ने अब शू प्रिंटिंग को डीएनए

और फिंगरप्रिंटिंग की ही तरह कानूनी मान्यता दी है।

शोट स्पॉटिंग
शोट स्पॉटिंग यानी कि गोली चलने की आवाज की पहचान। यदि कहीं अपराध हुआ हो और उसकी खबर तेजी से पुलिस तक पहुंच जाए तो अपराधी को पकडऩा आसान हो जाता है। शोट स्पॉटिंग तकनीक ध्वनि तरंगों की पहचान करती है। जहां कहीं भी गोली चलती है, इसका सेंसर सिस्टम ध्वनि तरंगों की पहचान कर जीपीएस रीसिवर के माध्यम से उस इलाके की पहचान कर लेता है, जहां से वह आवाज आई है। इसके बाद आपातकालिन सेवाओं और पुलिस को सतर्क कर दिया जाता है।
यह तकनीक वाशिंगटन में प्रायोगिक स्तर पर शुरू की गई है।

नई त्रिआयामी तकनीक
जब भी कभी कहीं अपराध होता है तो अपराध स्थल की तस्वीरें ली जाती हैं। ये तस्वीरें द्विआयामी होती हैं, लेकिन यदि त्रिआयामी या 3डी तस्वीरें ली जाएं तो घटनास्थल के बारे में काफी अधिक जानकारियां मिल सकती हैं। जैसे कि गोली का त्रिआयामी स्वरूप उसकी पहचान करने में काफी मददगार साबित होता है।

कुछ फोरेंसिक साइंस इंस्टिट्यूट अब डाटा स्पेयर- 3000 एक्सडी साइंस डिजीटीजर सॉफ्टवेर के माध्यम से अपराध स्थल के त्रिआयामी चित्र तैयार करते हैं। जहां अपराध होने की सम्भावना हो या आतंकी हमले का भय हो उस स्थान के त्रिआयामी चित्र पहले से ही संग्रहित कर रख लिए जाते हैं। इससे अपराध से लडऩे में काफी सहायता प्राप्त होती है।

अपनी जगह की पहचान
कुत्ते जैसे कई अन्य जानवर अपने मूत्र के द्वारा अपने इलाके की पहचान चिह्नित करते हैं। अब हम इंसान भी ऐसा कर सकते हैं, लेकिन हमें यह तरीका अपनाने की आवश्यकता नहीं है। ब्रिटेन में अब स्मार्टवाटर उपलब्ध है। यह एक तरह का विशेष रसायन है, जिसे आप अपने घर की कीमती चीज वस्तुओं पर छिड़क सकते हैं। भविष्य में यदि कभी वह वस्तु चोरी हो जाती है तो जांच अधिकारी उस वस्तु की पहचान विशेष रसायन बारकोड से कर सकते हैं। इससे चोर यह नहीं कह पाता कि यह तो मात्र एक संयोग है कि उसके जैसी चीज मेरे पास भी है।

शरीर की गंध
जी हां, शरीर की गंध से भी अपराधियों की पहचान हो सकती है। चीन में तो बकायदा एक डेटाबेस

तैयार किया जा रहा है, जहां सम्भावित अपराधियों
और असामाजिक तत्वों की शरीर की गंध की
पहचान कर उससे संबंधित आंकड़े संग्रहित किए जा रहे हैं। भविष्य में अपराध होने पर अपराधस्थल पर मौजूद गंध की पहचान उस डेटाबेस से कर अपराधी को पकड़ा जा सकेगा।



नए यंत्र से लेस होगी पुलिस
ब्रिटेन में जल्द ही पुलिस बल को हाथ से संचालित होने वाले एक खास परीक्षण यंत्र से लैस किए जाने की तैयारी है। यह कवायद गली-मोहल्ले व सड़क की भीड़ में लोगों की आकस्मिक पहचान के लिए की जा रही है। कार्य के अनुरूप ही यंत्र का नाम मोबाइल फिंगर प्रिन्ट स्केनर (गतिशील अंगुली-छाप परीक्षण यंत्र) दिया गया है। नया यंत्र सशंकित अपराधियों की शीघ्र पहचान करने में पुलिस को सक्षम बनाएगा।

सचेत होने का संकेत
मोबाइल फिंगर प्रिन्ट स्कैनर से पहले हर व्यक्ति की अंगुली के निशान की तस्वीर ली जाती है। तस्वीरों को फेसियल मैपिंग तकनीक की सहायता से परिष्कृत किया जाता है। साथ ही अंगुली के निशान को कम्प्यूटराइज्ड फेसियल रिकॉग्निशन तकनीक द्वारा उक्त व्यक्तिके चेहरे से भी मैच कर देखा जाता है। इस तकनीक की खासियत यह है कि अपराधी के चेहरे का मैच होते ही, वहां लगा सीसीटीवी (क्लोज सर्किट टीवी) कैमरा पुलिस को चौकस होने का संकेत देना शुरू कर देता है।

मिडास परियोजना का हिस्सा
वास्तव में यह पहल प्रोजेक्ट मिडास का हिस्सा है। आपराधिक मामलों की तहकीकात में पुलिस की त्वरित कार्रवाई के लिए एक ऑपरेशन के तहत इस परियोजना को शुरू किया गया है, जिसके पहले चरण में देश के हर नागरिक की तस्वीर व फिं गर प्रिन्ट लिया जाएगा। इस अभियान को फेसियल इमेज्स नेशनल डाटाबेस प्रोजेक्ट के नाम से चलाया जाएगा। परियोजना के उद्देश्य को पूरा करने के क्रम में फिंगर प्रिन्ट यंत्र के अलावा पुलिस बल को स्मार्टफोन से भी सुसज्जित किया जाएगा।

उठ रहे विवाद भी
हालांकि मिडास परियोजना का लक्ष्य क्रि मिनल जांच में तेजी लाना है, लेकिन नई तकनीक को लेकर विवाद भी उठ रहे हैं। लोगों को संदेह है कि उनके अंगुली के निशान का अन्यत्र कहीं दुरुपयोग भी हो सकता है। फिलहाल, पुलिस व नागरिक अधिकार संगठनों के बीच प्रोजेक्ट पर तालमेल बिठाने की कोशिशें जारी हैं। उम्मीद है जल्द ही

बीच का कोई बेहतर विकल्प निकाल लिया जाएगा, जिसमें व्यक्ति की पहचान अपराधी के तौर पर नहीं होने पर उसके फिंगर प्रिन्ट मिटा दिए जाने की शर्त भी शामिल है।

छोटी कारों का जलवा



- राजकुमार सोनी

कार ऊंचे लोगों की सवारी मानी जाती है। लेकिन कुछ वर्षों पूर्व आई नैनो ने यह धारणा बदल दी है। अब भारत छोटी कारों का हब बनने जा रहा है।

भारत में छोटी कारों का बाजार गुलजार है। लगातार 4 महीनों से कार कंपनियां बिक्री में जबरदस्त तेजी देख रही हैं और यहां बिकने वाली कारों में दो तिहाई से ज्यादा छोटी कारें ही होती हैं। इसीलिए दुनिया भर की कंपनियां इस बाजार के ट्रैक पर रफ्तार भरने को आमादा हैं। नतीजा यह है कि छोटी कारों के ग्राहकों के सामने एक से बढ़कर एक विकल्प आ गए हैं। कार उपभोक्ताओं के लिए इससे बेहतर समय पहले नहीं रहा होगा और हां, आगे तो स्थितियों में और सुधार होने वाला है। बाजार में कारों के बड़ी संख्या में आने वाले मॉडलों ने लोगों को असमंजस की स्थिति में डाल दिया है। लोग पसोपेश में हैं कि आखिर किस कार को चुना जाए। भारत में छोटी कारों का बाजार मध्य वर्ग की खर्च योग्य आमदनी में इजाफे के साथ बड़ा होता जा रहा है। इस वजह से कार बनाने वाली कंपनियों के लिए इस बाजार में बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं। रेनॉ-निसान और फॉक्सवैगन जैसी ग्लोबल ऑटो कंपनियां और टाटा मोटर्स जैसी घरेलू फर्म तेजी से इस सेगमेंट पर नजर गड़ाए हुए हैं।


फोर्ड की नई कार
केवल प्रीमियम कार बनाने वाली नामी अमेरिकी कंपनी फोर्ड ने भी भारत में अपनी छोटी कार पेश कर दी। उसकी कार फिगो में 1200 सीसी का पेट्रोल इंजन तो है ही, प्रीमियम कार की तमाम खूबियां भी हैं। लेकिन सबसे अलग है इस कार की कीमत। कंपनी केवल 3.49 लाख रुपए में यह कार अपने ग्राहकों को मुहैया करा रही है। फोर्ड इंडिया के प्रमुख माइकल बोनहम भी मानते हैं कि कीमत के साथ फीचर्स इस कार को औरों से अलग करेंगे।

दिग्गजों की कतार
फोर्ड ही नहीं, पिछले कुछ महीनों में छोटी कारों के बाजार में जनरल मोटर्स, फोक्सवैगन, निसान, होंडा और टोयोटा जैसी कंपनियों ने दिलचस्पी दिखाई है। इनमें जनरल मोटर्स पहले ही स्पार्क के साथ इस बाजार में मौजूद थी, लेकिन बीट पेश कर उसने इसमें अपनी पैठ और मजबूत करने की कोशिश की है। फोक्सवैगन ने पोलो बाजार में उतार दी है और निसान ने माइक्रा नाम की कार बाजार में उतारी है।

राजा बने ग्राहक
इस तरह ग्राहकों की चांदी हो गई है। छोटी कारों के कई नायाब मॉडल उनके सामने हैं, जो मर्जी हो चुन लीजिए। इनमें तकरीबन सभी कारों के इंजन 1200 सीसी के हैं। कुछ में अलग खूबियां जरूर हैं, जो उनकी कीमत में दिखाई देती हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात इस वर्ग की कारों की कीमत ही है। इस मामले में बाजी तो जनरल मोटर्स इंडिया की बीट ही मार ले जाती है, जिसका एक्स शोरूम मूल्य केवल 3.34 लाख रुपए है।

मारुति पहले से ही
मारुति ने हालांकि कोई नई कार इस वर्ग में पेश नहीं की है, लेकिन उसकी रिट्ज और स्विफ्ट पहले ही काफी नाम कमा चुकी हैं। रिट्ज की कीमत लगभग 3.98 लाख रुपए है और स्विफ्ट 4 लाख रुपए से शुरू होती है।

कम बजट में ड्राइव का सुख
सबसे दिलचस्प बात यह है कि बजट में उत्पाद शुल्क में किए इजाफे का इस वर्ग की कारों पर कम फर्क पड़ रहा है। इनकी कीमत में अमूमन 4 से लेकर 10 हजार रुपए तक का इजाफा हुआ है। उसमें भी हाल ही में पेश किए गए मॉडलों की कीमत कंपनियां नहीं बढ़ा रही हैं। यानी अगर ग्राहक हाल ही में बाजार में उतारे गए मॉडलों को पसंद करता है, तो उसे कारों की कीमत में हो रहे इजाफे का धक्का भी नहीं सहना पड़ेगा।

ब्याज का असर नहीं
छोटी कारों के मामले में ब्याज दर के मोर्चे पर भी फायदा मिल सकता है। बैंकरों के मुताबिक कार ऋण की दरों में इजाफा करने पर भी 5 साल के कर्ज की सूरत में मासिक किस्त में महज कुछ 100 रुपए का इजाफा होता है। इसके उलट बड़ी कारों के मामले में इजाफा कई हजार रुपए में हो सकता है। जाहिर है, सारे समीकरण छोटी कारों का पलड़ा ही भारी कर

रहे हैं और शायद यही वजह है कि कार कंपनियां भी
इसी बाजार पर हमला बोल रही हैं।

कंपनियों ने कसी कमर
पिछले कुछ समय से 4 से 6 लाख रुपए की कारों के सेग्मेंट में बेहद हलचल मची रही। स्विफ्ट, आई-10, पोलो और फिगो जैसी कारों के इस सेग्मेंट में लगभग हर कार कंपनी मौजूद है। यही नहीं कुछ कंपनियों ने थोड़े प्राइस वैरिएशन के साथ इस सेग्मेंट में एक से ज्यादा मॉडल भी उतार रखे हैं। यही वजह है कि इस सेग्मेंट में सबसे ज्यादा तेजी देखी जा रही है। लेकिन इन सबके बीच एंट्री लेवल कारों के सेग्मेंट को बिल्कुल भुला ही दिया गया, जबकि इसी दौरान मारुति की किफायती कार ऑल्टो दुनिया की सबसे ज्यादा बिकने वाली हैचबैक बन गई।
ज्यादा डिस्पोजिबल इनकम वाले मिडिल क्लास के फेवरिट प्रीमियम हैचबैक सेग्मेंट में तो इस वक्त करीब 12-13 मॉडल मौजूद हैं, लेकिन एंट्री लेवल सेग्मेंट में सिर्फ तीन ही कारें हैं, मारुति की ऑल्टो व 800 और टाटा की नैनो। इनमें से भी 800 बड़े शहरों में नहीं बिकती और लखटकिया कार नैनो खुद को प्रूव करने के प्रोसेस में है। अल्ट्रा लो कॉस्ट कार के कॉन्सेप्ट के तहत उतारी गई नैनो को फिलहाल उम्मीद के मुताबिक ग्राहक नहीं मिल पा रहे हैं। फिलहाल हर महीने 3-4 हजार नैनो बिक रही हैं, जबकि मारुति का ऑल्टो को हर महीने करीब 35-36 हजार ग्राहक मिलते हैं। मारुति ने भी पहले से ही कमर कसनी शुरू कर दी है। कंपनी एक छोटी कार पर काम कर रही है, जो 2012 तक मार्केट में उतर सकती है। जहां तक मारुति 800 की बात है तो इस बारे में कंपनी का कहना है कि इस कार को रिवैम्प करने का कोई इरादा नहीं है। लगभग 20 साल तक कार मार्केट पर राज करने वाली 800 फिलहाल टियर टू शहरों में ही बिक रही है। 2014 में जब सभी शहरों में भारत-4 नाम्र्स लागू हो जाएंगे तो यह कार कहीं नहीं बिक सकेगी। लेकिन मारुति की नई छोटी कार उससे काफी पहले ही मार्केट में आ जाएगी। जहां तक नैनो की बात है तो टाटा ने इस बात का इशारा दिया है कि नैनो के लिए डीजल इंजन विकसित करने पर काम चल रहा है। ऐसे में अगर टाटा बेहतरीन माइलेज वाला डीजल इंजन उतार पाती है तो यकीनन नैनो का काफी फायदा होगा।


टाटा नैनो
भारत में सस्ती कारों का जिक्र हो तो सबसे पहले जो नाम सामने आता है वो है टाटा नैनो। इस कार के शुरुआती मॉडल की एक्स शोरूम कीमत 1.40 लाख रुपए है। और नैनो को भारत ही नहीं, बल्कि

दुनिया की सबसे सस्ती कार होने का रुतबा हासिल है। इस कार में 642 सीसी की इंजन लगा है। फिलहाल इसका पेट्रोल मॉडल ही उपलब्ध है। लेकिन कंपनी जल्दी ही इसे डीजल इंजन के साथ भी पेश करने की तैयारी कर रही है।

मारुति 800
सस्ती कारों के मामले में टाटा नैनो के बाद नंबर है मारुति 800 का। इस कार की शुरुआती कीमत है 1.95 लाख रुपए (एक्स शोरूम)। हालांकि देश में बीएस 4 मानक के लागू होने के बाद भारत के 13 शहरों में इसकी बिक्री नहीं की जा रही है। यह कार एक लीटर पेट्रोल में 20 किमी चलती है।

मारुति ऑल्टो
मारुति सुजुकी की छोटी कार ऑल्टो का नाम भारत में सबसे ज्यादा बिकने वाली कारों की लिस्ट में शुमार है। इसके शुरुआती मॉडल की एक्स शोरूम कीमत 2.32 लाख रुपए है। इस कार में 796 सीसी का इंजन लगा हुआ है।

सैंट्रो जिंग
हुंदई मोटर्स की छोटी कार सैंट्रो जिंग को भी भारतीय बाजार में सस्ती कारों की श्रेणी में रखा जाता है। इसके एंट्री मॉडल की एक्स शोरूम कीमत 2.80 लाख रुपए है।

एलबिल नॉज बड़ी कैब
नॉर्वे की यह इलेक्ट्रिक कार केवट जेनरेशन की छठी कार है जो 1991 में लॉन्च हुई थी। 2440 एमएम लंबी यह कार 80 किलोमीटर की रफ्तार से चल सकती है। हालांकि यह कार केवल टू सीटर है। 18 देशों में बिक चुकी इस कार की कीमत 6,30,000 रुपए है।

लूमन्स मेरा
यह फ्रेंच कार 2500 एमएम लंबी है और एक नजर से देखें तो ऐसा लगता है कि यह कार और स्कूटर का मिलाजुला रूप है। यह 130 किलोमीटर की रफ्तार से दौड़ सकती है। वैसे अगर आप इस खूबसूरत कार को खरीदना चाहते हैं तो इसकी कीमत पड़ेगी 15,00,000 रुपए!

टैंगो
अमेरिका की कार निर्माता कंपनी कम्यूटर्स कार्स ने टैंगो का धड़ल्ले से उत्पादन 2005 में शुरू कर दिया था। तब से इस 2570 एमएम कार के कई वर्जन निकाले जा चुके हैं। कार की स्पीड है 240 किलो, वैसे कार की कीमत सुन कर आपको थोड़ा अचंभा

होगा, क्योंकि यह आपको 9 लाख रुपए से लेकर 50 लाख रुपए तक की पड़ेगी। गूगल के सह संस्थापक लैरी पेज के पास भी यही इको फ्रेंडली कार है।

रेवा
यह है एक और इंडिया में बनने वाली कार। बेंगलुरू की महिन्दार रेवा इलेक्ट्रिक वीकल्स प्राइवेट लिमिटेड ने इस 2600 एमएम लंबी कार को बनाया है। भारत में ग्रीन कार की जन्मदाता है यह कार। कार की रेंज है 120 किलोमीटर और कई देशों में यह बिक चुकी है। इस देसी खूबसूरती की कीमत है 4 लाख 50 हजार रुपए।

कैंडी कोको
1036 एमएम लंबी यह टू सीटर कार है, जो किसी गोल्फ कोर्ट जैसी लगती है। इसकी छत रिक्शे जैसी है। इसकी स्पीड है 40 किलोमीटर चीन में बनी इस कार की कीमत आपको पड़ेगी 4 लाख 75 हजार रुपए।

स्मार्ट फॉर टू
स्मार्ट फॉर टू का इलेक्ट्रिक वर्जन 2500 एमएम लंबा है। इस कार का मास प्रॉडक्शन 2012 में होगा। कार की स्पीड है 100 किलोमीटर। कार की एक खूबी यह है कि यह 0 से 60 किलोमीटर की रफ्तार मात्र 6.5 सेकंड्स में पकड़ लेती है। कार को खरीदना चाहते हैं तो आपको इसकी कीमत बता दें- 5 लाख रुपए से 6 लाख रुपए के बीच पड़ेगी यह बेस्ट कार।

थिंक सिटी
अमेरिका की यह कार थिंक सिटी फिलहाल 8 देशों में बिक रही है। इसे आप टू सीटर से 4 सीटर बना सकते हैं। नैनो से जरा ही लंबी है और इसकी कीमत 19 लाख रुपए है।

इटियॉस लीवा
विश्व की सबसे बड़ी कार कंपनी टोयोटा ने बहुप्रतीक्षित छोटी कार इटियॉस लीवा को पेश किया था। इसकी एक्स शो रूम कीमत 3.99 लाख रुपए से 5.99 लाख रुपए के बीच है। इस कार को मारुति सुजूकी स्विफ्ट, हुंडई आई20, फोक्सवैगन पोलो और फोर्ड फिगो की श्रेणी में रखा जा रहा है।
फोर्ड फिगो के बाद लिवा इस श्रेणी की सबसे सस्ती कार है। फोर्ड फिगो की कीमत 3.59 लाख रुपए से शुरू होती है। लीवा 18.31 किलोमीटर प्रति लीटर माइलेज के साथ अपनी श्रेणी में सबसे अधिक माइलेज देने वाली कार है। इस श्रेणी के कारों का

औसत माइलेज 15 से 17.7 किलोमीटर प्रति लीटर
है। लेकिन, लीवा को डीजल इंजन के साथ नहीं
उतारा गया है।

निसान माइक्रा
यह एक ऐसी कार है, जो सिर्फ भारत के लिहाज से ही विशेष तौर पर नहीं बनाई गई है। निसान माइक्रा चेन्नई की कंपनी में बनेगी। भारत में बेचे जाने के अलावा इसका आयात यूरोप और दुनिया भर के अन्य देशों से किया जाएगा। उम्मीद की जा रही है कि माइक्रा रूमी होगी। इसका इंटीरियर और स्टाइल युवा उपभोक्ताओं को लुभाएगा। निसान अपने डीलर के नेटवर्क का विस्तार करने में लगी है। पहले ही दिन से इसका लक्ष्य है कि इसमें लोकल कंटेंट की मात्र ज्यादा है - तकरीबन 80 प्रतिशत तक। संभावित कीमत 4 से 5.5 लाख रहने की संभावना है। इसे मार्च 2012 में लांच किया जाएगा।

फॉक्सवेगन पोलो
इस मॉडल के बारे में काफी जिक्र हो चुका है और इसने फॉक्सवेगन की काफिले में एक प्रमुख जगह बना ली है। फॉक्सवेगन का दावा है कि यह कार भारत में बतौर ब्रेक मॉडल के तौर पर लांच की गई है। भारत में फॉक्सवेगन ब्रांड की कारें दिखने लगी हैं और बीटल और टाउरेग मॉडल लांच किए जा चुके हैं। यह कार पेट्रोल और डीजल इंजन के विकल्प के तौर पर उपलब्ध है। इसका ट्रांसमिशन मैनुअल होगा और इंटीरियर इक्विपमेंट लाजवाब। इस कार के नए संस्करण का लोग बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
इसकी संभावित कीमत 4 से 6 लाख है।

शेवरले बीट
नई कारों की एग्रसिव थीम को जेहन में रखते हुए शेवरले बीट पर गौर करें। यह अन्य कारों की तुलना में जरा छोटी है। बीट एक तरह से स्पार्क का रिप्लेसमेंट है। जनरल मोटर्स स्मार्ट तरीके से काम कर रहा है। वह सफल स्पार्क को प्रवेश के दौरान बरकरार रख रहा है। बीट का इंजन 1.2 लीटर का है जिसमें 5 स्पीड मैनुअल गियर बॉक्स लगा हुआ है। इसकी ड्राइविंग बढिय़ा है। इसका गियरशिफ्ट वी-शेप का है और दिखने में यह आकर्षक है, खासकर पीछे से। इसमें क्लाइमेट कंट्रोल और इन-डेश म्यूजिक सिस्टम लगा हुआ है जो उपभोक्ताओं को आकर्षित करेगा। कीमत के लिहाज से कार दिखने में आकर्षक है। इसमें कीलैस एंट्री या इलेक्ट्रिक मिरर जैसे फीचरों को शामिल नहीं किया गया है। इसका मतलब ये है कि हम वाजिब कीमतों वाली कार की उम्मीद कर सकते हैं। इसकी कीमत 3.5 से 4.5 लाख है।


छोटी कारों का हब भारत
भारत में कार शौकिनों की संख्या में इजाफा होता जा रहा है। जिस तरह पिछले दो वर्षों में भारतीय बाजार और सड़कों पर कारों की संख्या बढ़ी है, उससे तो यह साफ है कि बहुत जल्द भारत कार कंपनियों के लिए साफ्ट टारगेट बन जाएगा। नैनो के लॉन्च होने के बाद भारतीय बाजार में छोटे कारों की बाढ़ सी आ गई। उसके बाद से सभी कंपनियों ने अपना ध्यान छोटी कारों की तरफ केन्द्रित कर दिया।

ग्राहकों और कंपनियों को फायदा
कई कार कंपनियों ने अपनी छोटी कारों को मार्केट में पेश किया और जमकर फायदा कमाया। ऐसे में अमरिका की कार निर्माता कं पनी फोर्ड मोटर ने अपनी छोटी कार फिगो को मार्केट में लॉन्च किया और कार ऑफ द इयर का पुरस्कार प्राप्त किया। ऐसे में कार जानकारों का कहना है कि भारत जल्द ही फोर्ड मोटर्स के छोटी कारों का हब बन जायेगा। वर्ष 2015 से कंपनी की कॉम्पैक्ट कारों की यहां से लॉचिंग भी शुरू हो जाएगी। फोर्ड इंडिया के अधिकारियों ने बताया कि भारत पहला बाजार है जहां फिगो के साथ छोटी कारों के संस्करण में खासा प्रभावित किया है।

हिस्सेदारी 70 फीसदी
भारत में कुल कारों की बिक्री में कॉम्पैक्ट कार संस्करण की हिस्सेदारी लगभग 70 फीसदी है और अपनी उपस्थिति को मजबूत करने के लिए हम भविष्य में इस श्रेणी की कई कारें लॉन्च करेंगे। बीते साल मार्च में लॉन्चिंग के बाद से भारत में फिगो की 80,000 इकाइयां बिक चुकी हैं। अगले 4 साल के दौरान घरेलू बाजार में फोर्ड इस संस्करण के 8 नए मॉडल पेश करने की तैयारी कर रही है। इनमें से पहला मॉडल सिडैन फिएस्टा का उन्नत वर्जन होगा, जो इसी साल भारतीय सड़कों पर दिखने लगेगा।


आगामी पांच सालों में आने वाली कारें
मर्सडीज
मर्सडीज का नाम सुनकर सबके जेहन में शानदार, बड़ी और लग्जरी कारें आ जाती है, लेकिन अब जल्द ही मर्सडीज भारतीय बाजार में छोटी कारों को पेश करने वाली है। जर्मन की कार निर्माता कंपनी मर्सडीज ने इससे पूर्व भारतीय बाजार में एक से बढ़कर एक लग्जरी कारों को पेश किया है, जो कि भारतीय बाजार में सफलतापूर्वक प्रर्दशन कर रही है। मर्सडीज अपनी इन कारों को आगामी 2012 तक भारतीय बाजार में उतारने की योजना बना रही है।

15 से 20 गाडिय़ां आएंगी
देश की सबसे बड़ी कार कंपनी मारुति सुजुकी अगले पांच सालों में 15-20 नई गाडिय़ां पेश करने की तैयारी में है। यह जानकारी मामले से जुड़े लोगों ने ईटी को दी है। कारोबारी लिहाज से प्रतिस्पर्धा में बने

रहने और अपनी बाजार हिस्सेदारी बनाए रखने की खातिर दिग्गज कंपनी कम लागत वाले वाहनों पर अपना ध्यान केंदित रखेगी। कंपनी आने वाले समय में जो गाडिय़ां बाजार में उतारेगी, उनमें से 70-80 फीसदी गाडिय़ां छोटी कार सेगमेंट से जुड़ी होंगी। नई कारों के अलावा इनमें से कुछ गाडिय़ां तो मौजूदा मॉडलों के ढांचे और डिजाइन में बदलाव के साथ पेश की जाएंगी और कुछ अन्य वैरिएंट होंगे। कंपनी ने नए प्रॉडक्ट्स लॉन्च करने की जो योजना बनाई है, उसमें से पांच गाडिय़ां विकास के चरण में काफी आगे पहुंच चुकी हैं। कंपनी ने दिल्ली में साल 2012 में होने वाले ऑटो एक्सपो में चार मीटर से छोटी स्विफ्ट डिजायर लॉन्च करने की योजना भी बनाई है। इसके बाद कंपनी की आर-3 कॉन्सेप्ट पर आधारित एक मल्टी पर्पज वीकल लॉन्च करने की योजना है। वहीं, साल 2013 की शुरुआत में कंपनी की ए स्टार फेसलिफ्ट, रिट्ज बैकलिफ्ट और अगली पीढ़ी की ऑल्टो 800 लॉन्च करने की योजना है। कंपनी अगले तीन से पांच सालों के दौरान प्रॉडक्ट्स डेवलपमेंट में 1,000-1,500 करोड़ रुपए का निवेश करेगी। इसमें रोहतक में बनने वाली आरएंडडी यूनिट भी शामिल है। रोहतक में तैयार हो रही यूनिट में साल 2014 की पहली छमाही में कामकाज शुरू हो जाएगा।

पोलो हैचबेक
अगले वर्ष फॉक्सवेगन भारत में पोलो हैचबेक भी लाने जा रही है जो सुजुकी स्विफ्ट और हुंडाई आई20 जैसी अन्य हैचबेक गाडिय़ों की प्रतिस्पर्धा में उतारी जाएगी। ये गठबंधन टाटा मोटर्स की डीजल कारों इंडिका विस्टा और इंडिगो के समक्ष भी प्रतिस्पर्धा पेश करेंगी। सुजुकी डीजल इंजन तकनीक को जर्मनी से आयात करने पर विचार कर रही है। सुजुकी के पास डीजल तकनीक नहीं है। हालांकि दोनों कंपनियों का यह वैश्विक करार का मतलब यह नहीं है कि दोनों कंपनियां वितरण और डीलर नेटवर्क को शेयर करेंगी।

फोर्ड मोटर कंपनी 2014 में लाएगी कारें
गुजरात सरकार के साथ प्लांट लगाने के लिए एक समझौते पर दस्तखत करने के बमुश्किल एक महीने के भीतर फोर्ड मोटर कंपनी ने अपनी नई साणंद इकाई में ग्लोबल छोटी कार विकसित करना शुरू कर दिया है। फोर्ड की नई छोटी कार जो कि मारुति सुजुकी की ए स्टार और हुंडई आइ-10 की तरह की है, वह कंपनी की सबसे अब तक बनाई गई सबसे सस्ती कार होगी। फोर्ड की साणंद इकाई टाटा के नैनो प्लांट के पास ही है। यह इकाई चीन और ब्राजील के साथ निर्यात के बड़े केंद्र के तौर पर शुमार होगी। तीन से चार लाख रुपए के बीच की इस कार के भारतीय बाजार में साल 2014 की शुरुआत में आने की उम्मीद है। फोर्ड नई छोटी कार की पोजिशनिंग अपने फिगो मॉडल से नीचे करेगी। फोर्ड इंडिया ने दशक के मध्य तक 8 नए उत्पाद लाने का एलान किया है। हमने हाल में ही ग्लोबल फिएस्टा लॉन्च की है, जो कि इस सीरीज की कड़ी में पहली लॉन्चिंग है। इस गाड़ी को काफी समर्थन मिल रहा है।
कंपनी ने पहले कहा था कि साणंद इकाई से पहला वाहन साल 2014 की शुरुआत में आ जाने की उम्मीद है। फोर्ड का ब्राजील में रिसर्च और डेवलपमेंट केंद्र इस वक्तकार को विकसित कर रहा है और कंपनी ने इस कार के लिए भारत में कंपोनेंट बनाने वाली

कंपनियों से संपर्क साधा है। इस कार का कूट नाम बी562 है। इस
कार को पूरी तरह से नए प्लेटफॉर्म पर बनाया जाएगा और इसमें एक लीटर वाला ईकोबूस्ट पेट्रोल इंजन हो सकता है।




छोटी कारों के मेले में दिग्गज

कंपनी कार कीमत
पेट्रोल डीजल
जीएम इंडिया बीट 3.34 -
फोर्ड इंडिया फिगो 3.49 4.48
मारुति सुजूकी रट्ज 3.98 4.74
मारुति सुजूकी स्विफ्ट 4.00 4.83
हुंडई मोटर आई 10 4.04 -
फोक्सवैगन पोलो 4.42 5.42

नदियों की नई धारा




- राजकुमार सोनी


दुनियाभर में प्राचीन नदियों को लेकर लगातार शोध कार्य जारी हैं। हाल ही में चीन ने ब्रह्मपुत्र, सिंधु, सालवीन व इर्रावडी के बारे में नई जानकारियां जुटाई हैैं। वैज्ञानिकों ने हरियाणा में अदृश्य नदी सरस्वती को फिर से धरती पर लाने की कवायद शुरू कर दी है। इस बीच ब्राजील के वैज्ञानिकों का कहना है कि अमेजन नदी के लगभग चार हजार मीटर नीचे भूगर्भ में उतनी ही विशाल एक और नदी बह रही है।
ब्रह्मपुत्र पर बांध समेत तिब्बत में कई जल परियोजनाओं को अंजाम देने को तैयार चीन के वैज्ञानिकों ने तिब्बत की सीमा से बहने वाली नदियों के उद्गम स्थल और उनके मार्ग की लंबाई का व्यापक उपग्रह अध्ययन पूरा कर लिया है। चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज (सीएएस) के वैज्ञानिकों ने ब्रह्मपुत्र के मार्ग का उपग्रह से ली गई तस्वीरों का विश्लेषण करने के साथ भारत-पाकिस्तान से बहने वाली सिंधु और म्यांमार से होकर बहने वाली सालवीन व इर्रावडी के बहाव के संबंध में भी पूरा विवरण जुटा लिया है।

ब्रह्मपुत्र का उद्गम
ब्रह्मपुत्र का उद्गम स्थल आंग्सी ग्लेशियर है।
इसके पहले चार नदियों के उद्गम कभी स्पष्ट नहीं हुए थे और इनकी लंबाई और क्षेत्र के बारे में आई जानकारियों ने शोधकर्ताओं को सालों तक भ्रम में रखा था। इस कार्य में प्राकृतिक परिस्थितियों से जुड़ी बाधाएं आती थीं और सर्वेक्षण की तकनीक सीमित थी। लियु ने अपने विश्लेषण के आधार पर बताया कि ब्रह्मपुत्र का उद्गम स्थल तिब्बत के बुरांग काउंटी स्थित हिमालय पर्वत के उत्तरी क्षेत्र में स्थित आंग्सी ग्लेशियर है, न कि चीमा-युंगडुंग ग्लेशियर, जिसे भूगोलविद् स्वामी प्रणवानंद ने 1930 के दशक में ब्रह्मपुत्र का उद्गम बताया था।

ब्रह्मपुत्र की लंबाई
नए शोध परिणामों के मुताबिक ब्रह्मपुत्र नदी 3,848 किलोमीटर लंबी है और इसका क्षेत्रफल 712,035 वर्ग किलोमीटर है। जबकि पहले के दस्तावेजों में नदी की लंबाई 2,900 से 3,350 किलोमीटर और क्षेत्रफल 520,000 से 17 लाख 30 हजार वर्ग किलोमीटर बताया गया था। इस आंकड़े का इस्तेमाल भारत और चीन के बीच विशेषज्ञ स्तर की पांचवीं बातचीत में हो सकता है। चीन ने तिब्बत में लगभग एक अरब 80 करोड़ डॉलर की लागत से जल परियोजनाएं शुरू करने की घोषणा की हैं। सिंधु नदी का उद्गम तिब्बत के गेजी काउंटी में कैलाश के उत्तर-पूर्व से होता है। सिंधु नदी भारत से होकर गुजरती है, लेकिन भारत-पाक जल संधि के तहत इसका ज्यादा इस्तेमाल पाक करता है।

बांग्लादेश होकर बहती है
ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत, भारत तथा बांग्लादेश से होकर बहती है। ब्रह्मपुत्र का उद्गम तिब्बत के दक्षिण में मानसरोवर के निकट चेमायुंग दुंग नामक हिमवाह से हुआ है। इसका नाम तिब्बत में सांपो, अरुणाचल में डिहं तथा असम में ब्रह्मपुत्र है। यह नदी बांग्लादेश की सीमा में यमुना के नाम से दक्षिण में बहती हुई गंगा की मूल शाखा पद्मा के साथ मिलकर बंगाल की खाड़ी में जाकर मिलती है। सुवनश्री, तिस्ता, तोर्सा, लोहित, बराक आदि ब्रह्मपुत्र की उपनदियां हैं। ब्रह्मपुत्र के किनारे स्थित शहरों में प्रमुख हैं डिब्रूगढ़, तेजपुर एवं गुवाहाटी। प्राय: भारतीय नदियों के नाम स्त्रीलिंग में होते हैं, पर ब्रह्मपुत्र एक अपवाद है। संस्कृत में ब्रह्मपुत्र का शाब्दिक अर्थ ब्रह्मा का पुत्र होता है ।

भगवान ब्रह्मा का पुत्र
ब्रह्मपुत्र हमारे हिन्दू भगवान ब्रह्मा का पुत्र है। आज के समय में ब्रह्मपुत्र के बारे में अत्यधिक कहानियां प्रचलित हैं, पर सबसे अधिक प्रचलित कहानी कलिका पुराण में मिलती है। यह समझा जाता है कि परशुराम, भगवान विष्णु के एक अवतार जिन्होंने अपनी माता को फरसे के सहारे मारने के पाप का पश्चाताप एक पवित्र नदी में नहाकर किया। उल्लेख है कि पिता ने उनकी माता पर शक किया था, इसलिए उन्होंने एक फरसे के सहारे अपनी माता का शीश धड़ से अलग कर दिया। इस कुकर्म के कारण वह फरसा उनके हाथ से ही चिपक गया। परशुराम अनेक मुनि-योगी की सलाह से अनेक आश्रम में गए। आखिर में वह परशुराम कुंद आश्रम पहुंचे। यहां पर उन्होंने लोगों के लिए उस पवित्र पानी को निकाला। इस कारण परशुराम पाप से मुक्त हो गए।


नदी की गहराई
ब्रह्मपुत्र नदी की औसत गहराई 832 फीट (252 मीटर) है। नदी की अधिकतम गहराई 1020 फीट (318 मीटर) है। शेरपुर और जमालपुर में है, अधिकतम गहराई 940 फुट (283 मीटर) तक पहुंचने में यह 85 फीट की खाड़ी में (26 मीटर) बहती है। तिब्बत में यह अधिकतम गहराई 1068 फीट (321 मीटर) है। आरंभ में यह तिब्बत के पठारी इलाके में यार्लुंग सांगपो नाम से लगभग 4000 मीटर की औसत ऊंचाई पर 1700 किलोमीटर तक पूर्व की ओर बहती है। इसके बाद नामचा बार्वा पर्वत के पास दक्षिण-पश्चिम की दिशा में मुड़कर भारत के अरुणाचल प्रदेश में घुसती है, जहां इसे सियांग कहते हैं।

दिहांग से भी प्रचलित
ऊंचाई को तेजी से छोड़ यह मैदानों में दाखिल होती है, जहां इसे दिहांग नाम से जाना जाता है। असम में नदी काफी चौड़ी हो जाती है और कहीं-कहीं तो इसकी चौड़ाई 10 किलोमीटर तक है। डिब्रूगढ़ तथा लखीमपुर जिले के बीच नदी दो शाखाओं में विभक्त हो जाती है। असम में ही नदी की दोनों शाखाएं मिलकर मजूली द्वीप बनाती हैं, जो दुनिया का सबसे बड़ा नदी-द्वीप है। असम में नदी को प्राय: ब्रह्मपुत्र नाम से ही बुलाते हैं, पर बोड़ो लोग इसे भुल्लम-बुथुर भी कहते हैं, जिसका अर्थ है- कल-कल की आवाज निकालना ।


सरस्वती आएगी पृथ्वी पर
हरियाणा में आदि अदृश्य नदी सरस्वती को फिर से धरती पर लाने की कवायद शुरू हो गई है। इसके लिए राज्य के सिंचाई विभाग ने सरस्वती की धारा को दादूपुर नलवी नहर का पानी छोडऩे की योजना बनाई है। देश के अन्य राज्य में भी इस पर काम चल रहा है। अगर यह महती योजना लागू हो जाती है तो इससे हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के तकरीबन 20 करोड़ लोगों की काया पलट जाएगी। इस नदी से जहां राज्यों के लोगों को पीने का पानी उपलब्ध हो सकेगा, वहीं सिंचाई जल को तरस रहे खेत भी लहलहा उठेंगे।

सुरंग में नदी
सरस्वती नदी पर चल रहे शोध में सैटेलाइट से मिले चित्रों से पता चला है कि अब भी सरस्वती नदी सुरंग के रूप में मौजूद है। बताया जाता है कि हिमाचल शृंगों से बहने वाली यह नदी करीब 1600 किलोमीटर हरी-की दून से होती हुई जगाधरी,

कालिबंगा और लोथल मार्ग से सोमनाथ के समीप समुद्र में मिलती है। सरस्वती शोध संस्थान के अध्यक्ष दर्शनलाल जैन के मुताबिक सैटेलाइट चित्रों से प्राचीन सरस्वती नदी के जलप्रवाह की जानकारी मिलती है। यह भी पता चला है कि यह सिंधु नदी से ज्यादा बड़ी और तीव्रगामी थी। नदी का प्रवाह शिवालिक पर्वतमालाओं से जगाधरी के समीप आदिबद्री से शुरू होता है, जिसका मूल स्रोत हिमालय में है।
नदी तटों के साथ इसकी ईसा पूर्व 3300 से लेकर ईसा पूर्व 1500 तक 1200 से भी ज्यादा पुरातात्विक प्रमाण मिले हैं।

लोगों को मिलेगा पानी
हरियाणा के सिंचाई विभाग ने मुर्तजापुर के पास सरस्वती नदी की बुर्जी आरडी 36284 से 94000 किलोमीटर तक पक्का कर इसमें दादूपुर नलवी नहर का पानी प्रवाहित करने की योजना बनाई है। राज्य के सिंचाई मंत्री कैप्टन अजय यादव का मानना है कि सरस्वती नदी में नहर का पानी आ जाने के बाद इससे रजबाहे निकाले जाएंगे, ताकि लोगों को पानी मिल सके। सैटेलाइट से मिले सरस्वती के चित्र के आधार पर काम शुरू किया जाएगा।

भूविज्ञानी व नासा का सहयोग
योजना की कामयाबी के लिए कुछ विदेशी भू-विज्ञानी और नासा भी योगदान दे रहे हैं। इस अनुसंधान में सरस्वती शोध संस्थान, रिमोट सैंसिंग एजेंसी, भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर, सेंट्रल वाटर कमीशन, स्टेट वाटर रिसोर्सेज, सेंट्रल एरिड जोन रिसर्च इंस्टीटयूट, हरियाणा सिंचाई विभाग, अखिल भारतीय इतिहास संगठन योजना और इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (अहमदाबाद ) आदि काम कर रहे हैं।

तीन परियोजनाओं पर काम
केंद्र सरकार ने 2000 में सरस्वती नदी को प्रवाहित करने के लिए तीन परियोजनाओं को चालू करने का काम अपने हाथ में लिया था, जो राज्य सरकारों की मदद से पूरा किया जाना है। चेन्नई स्थित सरस्वती सिंधु शोध संस्थान के अधिकारियों के मुताबिक इस दिशा में पहली परियोजना हरियाणा के यमुनानगर जिले में सरस्वती के उद्गम माने जाने वाले आदिबद्री से पिहोवा तक उस प्राचीन धारा के मार्ग की खोज है। दूसरी परियोजना का संबंध भाखड़ा की मुख्य नहर के जल को पिहोवा तक पहुंचाना है। इसके लिए कैलाश शिखर पर स्थित मान सरोवर से आने वाली सतलुज जलधारा का इस्तेमाल किया जाएगा। सर्वे ऑफ इंडिया के मानचित्रों में आदिबद्री

से पिहोवा तक के नदी मार्ग को सरस्वती मार्ग दर्शाया गया है। तीसरी परियोजना सरस्वती नदी के प्राचीन जलमार्ग को खोलने और भू-जल स्रोतों का पता लगाना है। इसके लिए मुंबई के भाभा परमाणु अनुसंधान संस्थान और राजस्थान के जोधपुर के रिमोट सैंसिंग एप्लीकेशन केंद्र के विज्ञानी काम में जुटे हैं। इसके अलावा सरस्वती घाटी में पश्चिम गढ़वाल में स्थित हर-की दून ग्लेशियर से सोमनाथ तक प्रवाहित होने वाली प्राचीन जलधारा मार्ग की खोज पर भी जोर दिया जा रहा है।


थार रेगिस्तान में खोज
तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी ) राजस्थान के थार रेगिस्तान में सरस्वती नदी की खोज का काम कर रहा है। निगम के अधिकारियों का कहना है कि सरस्वती की खोज के लिए पहले भी कई संस्थाओं ने काम किया है और कई स्थानों पर खुदाई भी की गई है, लेकिन 250 मीटर से ज्यादा गहरी खुदाई नहीं की गई थी। निगम जलमार्ग की खोज के लिए कम से कम एक हजार मीटर तक खुदाई करने पर जोर दे रहा है। दुनिया के अन्य हिस्सों में रेगिस्तान में एक हजार मीटर से भी ज्यादा नीचे स्वच्छ जल के स्रोत मिले हैं।

धाराओं को जमीन पर लाएं
सरस्वती नदी को फिर से प्रवाहित किए जाने की तमाम कोशिशों के बावजूद इसके शोध में जुटी संस्थाएं सरकार से काफी खफा हैं। सरस्वती शोध संस्थान के अध्यक्ष दर्शनलाल जैन का कहना है कि आदिबद्री और कलायत में सरस्वती नदी का पानी मौजूद होने के बावजूद इसमें नहर का पानी प्रवाहित करना दु:ख की बात है। सरकार को चाहिए सरस्वती की कलायत में फूट रही सरस्वती की धाराओं को जमीन के ऊपर लाया जाए। महज नदी के एक हिस्से को पक्का करने की बजाय आदिबद्री से लेकर सिरसा तक नदी को पक्का कर पानी प्रवाहित किया जाए। साथ ही कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड की तर्ज पर सरस्वती विकास प्राधिकरण का गठन किया जाए। अगर सरकार चाहे तो तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम अपने खर्च पर हरियाणा में सरस्वती नदी की खुदाई करने को तैयार है।


नदी के नीचे नदी
अमेजन दुनिया की सबसे बड़ी नदी है।
ब्राजील के वैज्ञानिकों का कहना है कि अमेजन नदी के लगभग चार हजार मीटर नीचे भूगर्भ में उतनी ही

विशाल एक और नदी बह रही है।
ब्राजील के रियो डी जनेरो शहर में हुए एक सम्मेलन में दिलचस्प और आश्चर्यजनक खोज के बारे में जानकारी दी गई। एलिजाबेथ तावारेस पिमेंटल ने बताया कि अमेजन की तरह ही ये नदी भी पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है, लेकिन इसकी गति अमेजन के मुकाबले काफी कम है।
इस नदी का नाम उन्हीं के सुपरवाइजर के नाम पर हमजा रखा गया है। अमेजन के जंगलों में कई आदिम जातियां रहती हैं। ब्राजील की राष्ट्रीय भूगर्भ संस्था के मुताबिक संभवत: इसी नदी के कारण अमेजन के उद्गम स्थल के आसपास के पानी में खारापन कम है। अमेजन दुनिया की सबसे बड़ी नदी है और इसके जरिए रोजाना 17 अरब मीट्रिक टन पानी अटलांटिक महासागर में जाता है।
हमजा नदी की लंबाई भी लगभग छह हजार किलोमीटर आंकी गई है।

बंद पड़े तेल कुओं से लगा पता
दरअसल, इस नदी का पता 241 तेल के बंद पड़े कुओं के अध्ययन से चला। इन कुओं की खुदाई सत्तर और अस्सी के दशक में की गई थी।
वैज्ञानिकों ने उनके अलग-अलग स्तरों पर तापमान का अध्ययन करके ये नतीजा निकाला है कि अमेजन के नीचे एक और नदी का अस्तित्व हो सकता है। इस शोध टीम के प्रमुख हमजा बताया कि अभी ये अध्ययन शुरुआती चरण में ही है. लेकिन उन्होंने उम्मीद जाहिर की कि 2014 तक वो ठोस रूप से इस भूमिगत नदी के अस्तित्व की पुष्टि कर पाएंगे।


नदियों का अस्तित्व
खतरे में
गंगा और यमुना कोई साधारण नदियां नही हैं। सदियों से यह हिंदुओं की आस्था का केंद्र रही हैं। पर आज इन नदियों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। पिछले 56 वर्षों में गंगा के पानी में बीस फीसदी की कमी आई है। आगामी दशकों में इस कमी के बढऩे की पूरी संभावना है। यही हाल रहा तो अगले 50 सालों में गंगा नदी सूख जाएगी। यह निष्कर्ष नदियों के आकार प्रकार पर शोध करने वाले विशेषज्ञों के एक दल ने निकाला है। इस प्रमुख नदी की 27 धाराओं में से अब तक 11 धाराएं विलुप्त हो चुकी हैं और 11 धाराओं में जलस्तर में तेजी से कमी आ रही है। पर्यावरण की दृष्टि से यह स्थिति भयावह है। इसका कारण गंगोत्री ग्लेशियर का तेजी से पिघलना बताया गया है। गंगा के यदि हम धार्मिक महत्व को छोड़ दें,

तो भी गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक इसके किनारे बसी हुई तीस करोड़ से अधिक आबादी और तमाम जीव-जंतुओं, वनस्पतियों के जीवन का मूल आधार गंगा ही है। गंगा के बिना गंगा की घाटी में जीवन संभव नहीं है, इसलिए इसकी रक्षा, इसे निर्मल बनाए रखने की चिंता और प्रयास जो नहीं करता है, वह अपने साथ ही आत्मघात कर रहा है। वेदों से लेकर वेदव्यास तक, वाल्मीकि से लेकर आधुनिक कवियों और साहित्यकारों ने इसका गुणगान किया है। इसका भौगोलिक, पौराणिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और साथ-साथ आध्यात्मिक महत्व है। गंगा को शास्त्रों ने एक स्थावर, सुगम नित्य तीर्थ कहा है। वेदों और पुराणों में गंगा को बारम्बार तीर्थमयी कहा गया है।

गंगा करती है पापों का नाश
महाभारत में कहा गया है कि गंगा अपना नाम उच्चारण करने वाले के पापों का नाश करती है, दर्शन करने वाले का कल्याण करती है तथा स्नान-पान करने वाले की सात पीढिय़ों तक पवित्र करती हैं। यह वारि-प्रवाह आकाश से पृथ्वी पर यों ही नहीं आया। इसके लिए भगीरथ ने बहुत तप किया था। भगीरथ की जिस गंगा में कभी निर्मल जल की धारा बहती थी, आज वहां सड़ांध और दुर्गंध के भभके उठते रहते हैं। कानपुर में तो इस नदी ने एक तरह से नाले का रूप ले लिया है और वह अपने स्थान से भी खिसक रही है। अपनी नदियों को प्रदूषण से बचाना हमारा कर्तव्य है। पर गंगा और यमुना जैसी पावन नदियों को भी प्रदूषण से मुक्त कराने की चिंता अब शायद सरकार को नहीं है, इसीलिए इसके लिए अदालतों को बार-बार पहल करनी पड़ती है। सरकार यदि इन पावन नदियों की साफ-सफाई भी नहीं कर सकती है, तो फिर उसके होने न होने से क्या फर्क पड़ता है। जब तक योजनाओं और घोषणाओं को पूरी इच्छा शक्ति से लागू नहीं किया जाएगा और लोगों को जागरूक नहीं किया जाएगा, तब तक हम गंगा-यमुना जैसी जीवनदायी नदियों को नहीं बचा सकते हैं।

27 धाराओं को जन्म
गंगोत्री के गोमुख से निकलने के बाद गंगा नदी ने 27 धाराओं (उपनदियों) को जन्म दिया, जो विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग नामों से जानी जाती है। गंगा की धाराओं में 11 धाराएं-रुद्र गंगा, खांडव गंगा, नवग्राम गंगा, शीर्ष गंगा, कोटगंगा, हेमवंती गंगा, शुद्ध तरंगणी गंगा, धेनु गंगा, सोम गंगा और दुग्ध गंगा विलुप्त हो चुकी हैं। गणेश गंगा, गरुण गंगा और हेम गंगा की धारा सूख गई है। विश्व की विभिन्न रूप रचनाओं में जो सारस्वत एवं सर्वनिष्ठ सत्ता निवास करती है, उसी एक की गति चेतना को गंगा कहा

जाता है-
जगत्प्रवाहे बहुरूपभिन्न
यदेकरूपं भवतीह गंगा।
भारतीयों के हृदय में गंगा के प्रति इतनी श्रद्धा है कि वे सभी नदियों में गंगा का ही दर्शन करते हैं। जैसे तुलसी की घोषणा है कि जगत के सभी नर-नारी सियाराम मय हैं, वैसे ही मार्कण्डेय पुराण का कहना है कि सवा गंगा समुद्रगा अर्थात समुद्र से मिलने वाली सारी नदियां गंगा का ही रूपांतर हैं। वैसे भी जल को जीवन का वायु के बाद दूसरा सबसे बड़ा आधार माना गया है। जल जीवन का पर्याय है। अत: समस्त जीवन-धारा को प्रतीकात्मक रूप से गंगा-प्रवाह कहा जाता है। दुनिया की किसी नदी ने गंगा की भांति न तो मानवता को प्रभावित किया है और न भौतिक सभ्यता तथा सामाजिक नैतिकता पर इतना प्रभाव डाला है। जितने व्यक्तियों और जितने क्षेत्रों को गंगा के जल से लाभ मिलता है, उतना संसार की किसी और नदी से नहीं पहुंचता है। यह वस्तुत: भारतीय संस्कृति का मेरुदंड बन गई है। गंगा के प्रवाह के चढ़ाव-उतार ने अनेक
साम्राज्यों के चढ़ाव-उतार को देखा है। हस्तिनापुर, कान्यकुब्ज, प्रतिष्ठान, पाटलिपुत्र, काशी, चंपा आदि इस तट पर बसे थे।

इन्हीं धाराओं से जल व्यापार
भारत के जल व्यापार और नौ-शक्ति का प्रारंभ इसी की धाराओं से हुआ था। लगभग चार लाख वर्ग मील की भूमि इसके पानी से सींची और उर्वर बनाई जाती है। भारत की एक तिहाई आबादी इसी के तट पर बसती है। इसकी महिमा फाह्यान, ह्वेनसांग, इत्सिंग आदि विदेशियों ने और रसखान, रहीम, ताज, मीर आदि मुसलमानों ने भी गाई है। इन सारी बातों को छोड़ दें तो भी इसके अमृत के समान जल के कारण यह नदी भारत की जीवनदात्री है।

गंगा सबसे पवित्र
वैज्ञानिक अनुसंधानों से भी यह सिद्ध हो गया है कि दुनिया की नदियों में गंगा ही सबसे पवित्रतम नदी है। इसके जल में कीटाणुओं के उन्मूलन की क्षमता सबसे अधिक है। शरीर के विभिन्न अंगों के रोग इसके पवित्र जल से दूर हो जाते हैं। शुद्ध गंगाजल इस धरती पर एक दुर्लभ द्रव्य है। कुछ वर्ष पूर्व यूनेस्को के एक वैज्ञानिक दल ने हरिद्वार के निकट गंगा के पानी के अध्ययन के बाद कहा था कि जिस स्थान में पानी की धारा में मुर्दे, हड्डियां आदि दूषित वस्तुएं बह रही थीं, वहीं कुछ फुट नीचे का जल पूर्ण शुद्ध था। अनुसंधानों से यह भी पता चला है कि गंगा के जल में हैजे के कीटाणु तीन चार घंटे में स्वत: मर जाते हैं। गंगाजल की पवित्रता अक्षुण्ण बनी रहे,

इसीलिए शास्त्रों ने कहा है कि इसके तट पर मानव-
वास नहीं होना चाहिए। गंगा के तट से सात किलोमीटर की जमीन को गंगा क्षेत्र कहते हैं। इस सीमा के भीतर रहने वाले को गंगा के जल और वायु से विशेष लाभ पहुंचता है।

दूषित करने वाला पातकी
पद्म पुराण के अनुसार गंगा तट को मल, मूत्र, थूक आदि से दूषित करने वाला व्यक्ति पातकी होता है। अपनी नदियों और जलस्रोतों को साफ-सुथरा रखने का कर्तव्य हर व्यक्ति का होना ही चाहिए। वैश्वीकरण की नीतियों को लागू किए जाने के बाद से भारत दुनिया के विकसित देशों का कूड़ाघर बनता जा रहा है। एक तरफ बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपना कचरा यहां की नदियों में बहा रही हैं तो दूसरी तरफ भारत में विकसित देशों ने अपने औद्योगिक अपशिष्ट को बेचने की जो प्रक्रिया पिछले कई वर्षों से अपना रखी थी, उस पर भारत के उच्चतम न्यायालय ने जनहित में फैसला देते हुए 1997 में पूरी तरह रोक लगा दी थी, लेकिन इसके बावजूद पता नहीं किन अज्ञात संधियों और कूटनीतिक समझौतों के अंतर्गत यह अत्यंत विषैला कचरा लगातार अलग-अलग माध्मयों से भारत में निरंतर आता रहा है। उच्चतम न्यायालय की रोक के बावजूद यह सिलसिला जारी है। भारी मात्रा में शीशे के अलावा परमाणु रिएक्टरों तथा परमाणु बमों में नियंत्रक तत्व के रूप में प्रयोग की जाने वाली कैड्मियम धातु भी गंगाजल में बड़ी मात्रा में पाई जा रही है, लेकिन इसकी सफाई के लिए चलाई जा रही योजनाओं का अभी तक कोई नतीजा सामने नहीं आया है। इस चुनौती का मुकाबला किए बिना हमारा उद्धार गंगा नहीं कर सकती हैं।