बुधवार, 31 अगस्त 2011

जलवायु परिवर्तन से तबाही




- राजकुमार सोनी

अब तक सिर्फ चर्चा होती रही है कि मौसमी बदलाव विश्व में युद्ध का कारण बन सकता है। लेकिन अब बाकायदा एक वैज्ञानिक रिसर्च से इस बात की पुष्टि की गई है कि जलवायु परिवर्तन से तबाही हो रही है। इसकी वजह से कई लोगों की जान गई है। हाल ही में अमेरिका व कनाड़ा में आए आइरीन से इस बात की पुष्टि होती है। भारत में भी जलवायु परिवर्तन को देखा जा रहा है। कहीं अधिक बारिश व तूफान से नुकसान हो रहा है, कहीं सूखा व धरती के गरम होने से परेशानी हो रही है।
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मशहूर वैज्ञानिक पत्रिका नेचर के ताजा अंक में इस रिसर्च का जिक्र है, जिसमें कहा गया है कि अल नीनो से प्रभावित देशों में आंतरिक उथल-पुथल अल नीनो प्रभावित देशों से कहीं ज्यादा होता है। रिसर्चरों का दावा है कि हॉर्न ऑफ अफ्रीका में सूखा और इसकी वजह से गृह युद्ध की जो स्थिति है, वह सीधे- सीधे जलवायु परिवर्तन का नतीजा है।

रिसर्चरों का कहना है कि सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि कुछ जगहों पर मनुष्य निर्मित ग्लोबल वॉर्मिंग है। इसकी वजह से हिंसा फैल रही है, जो आने वाले दशकों में भयावह स्वरूप ले सकती है। कोलंबिया यूनिवर्सिटी के मौसम वैज्ञानिक मार्क केन का कहना है, यह बिना किसी शक के दिखाता है कि मौसम में बदलाव की वजह से लोगों में लडऩे की इच्छा पैदा हो रही है।

अल नीनो का प्रभाव
पहले इस क्षेत्र को अल नीनो सदर्न ऑसिलेशन के नाम से जाना जाता था, जो दो से सात साल के बीच आया करता था और इसका प्रभाव नौ महीने से दो साल तक रहता था। इसकी वजह से खेती, जंगल और मछलीपालन में भारी नुकसान उठाना पड़ता था।
इसके कारण आने वाला अल नीनो बारिश के तरीकों और तापमान में अजीबोगरीब परविर्तन कर देता है। इसकी वजह से अफ्रीका के ज्यादातर हिस्सों, दक्षिण

और दक्षिणपूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया में जबरदस्त गर्मी पड़ती है और शुष्क हवाएं चलती हैं। जब यह चक्र उलटी तरफ चलता है, तो उससे अल नीनो का उद्भव होता है, जो प्रशांत के पूर्वी हिस्सों में भारी बारिश का कारण बनता है। रिसर्च में इन मौसमी बदलाव को 1950 से 2004 के बीच के काल में सीमा संघर्ष और गृह युद्ध जैसी हिंसक घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में देखा गया तो चौंकाने वाले नतीजे आए। इन आंकड़ों में 175 देशों के 234 संघर्षों को शामिल किया गया। इस दौरान हुई लड़ाइयों में 1000 से ज्यादा लोगों की जान गई।

भूख, गरीबी, त्रासदी
कुल मिलाकर अल नीनो की वजह से दुनिया-भर में 21 प्रतिशत गृह युद्ध हुए हैं और इनमें से 30 प्रतिशत देश अल नीनो प्रभावित इलाके में हैं। मुख्य रिसर्चर सोलोमन सियांग का कहना है कि अल नीनो एक अदृश्य कारण है, जिसकी वजह से सीमा संबंधी संघर्ष हुआ। इसकी वजह से फसलों को नुकसान होता है, तूफान आता है, जिससे तबाही होती है, पानी से होने वाली महामारी फैलती है। इससे नुकसान होता है, भूखमरी और बेरोजगारी फैलती है तथा असमानता फैलती है, जो विभाजन और क्षोभ की वजह बनती है। इसके अलावा जोखिम के जो दूसरे कारक हैं, उनमें जनसंख्या वृद्धि और देश की समृद्धि है। यह बात भी मायने रखती है कि सरकार अल नीनो से निपटने में कितनी कारगर है। सियांग का कहना है, हालांकि हम इन सभी मुद्दों पर एक साथ नियंत्रण करने की कोशिश करते हैं, लेकिन हम कह सकते हैं कि अल नीनो की वजह से बड़ी संख्या में गृह युद्ध हो सकता है।

सोमालिया की मिसाल
हालांकि हॉर्न ऑफ अफ्रीका में अभी जो कुछ हो रहा है, उसे रिसर्च में शामिल नहीं किया गया था, लेकिन फिर भी वह इस त्रासदी की सबसे बड़ी मिसाल हो सकती है।


भारत में असर
धरती के बढ़ते तापमान की वजह से हो रहे बदलाव अब साफ तौर पर दिखने लगे हैं। भारत के गर्म इलाकों में पाया जाने वाला एक पौधा अब हिमालय के पर्वतीय इलाकों में फलने-फूलने लगा है। वैज्ञानिकों ने हिमाचल प्रदेश का मुआयना किया।
सोलिवा एंथेमिफोलिआ नाम का यह पौधा गर्म जलवायु वाले इलाकों में पाया जाता रहा, लेकिन अब यह पर्वतीय इलाकों में चट्टानों पर दिखाई पडऩे

लगा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह पौधा समुद्र तल से 630 मीटर की ऊंचाई पर पैदा होता रहा है। लेकिन अब इससे करीब दोगुनी ऊंचाई 13,00
मीटर पर यह मिलने लगा है। इस बदलाव को जलवायु परिवर्तन से जोड़कर देखा जा रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालय के पर्वतीय इलाकों का तापमान भी तेजी से बढ़ रहा है। सोलिवा एंथेमिफोलिआ का पहाड़ों में उगना इस बात का सबूत भी दे रहा है। हिमाचल प्रदेश के पालनपुर को हिल स्टेशन माना जाता रहा है, लेकिन वहां उगे सोलिवा एंथेमिफोलिआ ने गर्म होते मौसम की भविष्यवाणी कर दी है। हिमाचल से पहले उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में भी यह पौधा अचानक सामने आया।

गर्म हो रही है धरती
वनस्पति विज्ञानियों का कहना है कि सोलिवा एंथेमिफोलिआ पक्षियों के जरिए हिमालयी इलाकों तक पहुंचा है, लेकिन उन परिस्थियों में पौधे का फलना-फूलना लोगों को हैरान कर रहा है। इस पर शोध कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है, ऐसा लगता है कि सोलिवा एंथेमिफोलिआ जलवायु परिवर्तन के प्रति बदलाव दिखा रहा है। यह ऊंचे इलाकों की तरफ जाने लगा है। इन बदलावों पर शोध करना अब बेहद अहम् हो गया है। पेड़-पौधे धरती पर किसी भी जन्तु से पहले विकसित हुए। वैज्ञानिक यह पहले ही मान चुके हैं कि पेड़-पौधे ही सबसे पहले और संजीदा ढंग से किसी भी मौसमी बदलाव से सामंजस्य बैठाते हैं।

शांत साइबेरिया उग्र
दुनिया का फ्रीजर कहे जाने वाले साइबेरिया में बर्फ पिघलने से सबसे शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन से पृथ्वी के और अधिक गरम होने की आशंका है। पर्माफ्रास्ट में दबी मीथेन के बाहर आने से भारी तबाही का डर बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार पिघलती बर्फ से वातावरण में मीथेन गैस की अधिकता से तबाही मच सकती है। रूस के साइबेरिया को दुनिया का सबसे ठंडा प्रदेश कहा जाता है। वहां पर्माफ्रास्ट के पिघलने की शुरुआत हो चुकी है। इससे उसमें दबी गैसें वातावरण में मिलने लगी हैं। पर्माफ्रास्ट बर्फ के नीचे दबी मिट्टी की उस परत को कहते हैं, जो कम से कम दो साल तक लगातार शून्य से भी नीचे तापमान में रहती है।

बर्फीली जमीन में छिपी है गैस
साइबेरिया की 80 प्रतिशत भूमि पर्माफ्रॉस्ट जोन में आती है, जिसकी गहराई 1 से 1.5 किलोमीटर तक

है। इस जमी हुई जमीन की परत में दबे कार्बन जीवाश्मों (मृत जीव व सड़ चुके वनस्पति) की अधिकता से इसमें भारी मात्रा में मीथेन गैस बुलबुलों की शक्ल में जमा हो चुकी है। एक अनुमान के मुताबिक साइबेरिया के येडोमा पर्माफ्रास्ट में 500 गीगाटन कार्बन जमा है और मिश्रित पर्माफ्रास्ट में 400 गीगाटन कार्बन दबा हुआ है। यह पर्माफ्रास्ट मुख्य तौर पर दो प्रकार का होता है। पहला मिश्रित मिट्टी और काई बहुल आर्द्रभूमि यानी वेटलैंड से बना होता है, जो 10,000 साल पुराना हो सकता है। इसमें 50 प्रतिशत तक कार्बन यौगिक होते हैं, जो किसी भी मिट्टी के मुकाबले 10 गुना हैं। दूसरा येडोमा कहलाता है और यह पेलिस्टोसिन युग के मिट्टी और बर्फ भंडार होते हैं, जो 50-90 प्रतिशत तक बर्फ से बने होते हैं। इसमें कार्बन यौगिक 2 से 5 प्रतिशत तक हो सकते हैं। पर्माफ्रास्ट साइबेरिया में एक लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैला है तथा इसमें किसी भी मिट्टी के मुकाबले 10 गुना कार्बन घटक जमे हैं। येडोमा की औसत गहराई 25 मीटर तक है। यहां की बिना जमी मिट्टी में भी लगभग 60 गीगाटन कार्बन घटक हैं। कुल मिलाकर साइबेरिया में 730 गीगाटन कार्बन बर्फ के नीचे या जमीन में दबा है, जिसमें लगातार रासायनिक क्रिया के चलते मीथेन गैस बन रही है।

क्या है ग्रीनहाउस इफेक्ट
एक निश्चित मात्रा में कार्बन डायऑक्साइड पृथ्वी के लिए फायदेमंद मानी जाती है, जो पृथ्वी को ठंडा होने से बचाती है। एक तरह से यह गैस पृथ्वी के लिए कंबल का काम करती है। इसके बिना तापमान 10 से 20 डिग्री तक गिर सकता है। पर अत्यधिक उत्सर्जन से इन गैसों की अधिकता से वातावरण अत्यधिक गर्म हो रहा है, जिसे ग्रीनहाउस इफेक्ट कहा जाता है।

समस्या है विकट
अब सबसे बड़ी समस्या है कि पृथ्वी लगातार गरम हो रही है। आर्कटिक सागर पर फैली बर्फ की चादर हर गरमी में पिछले 20 सालों की तुलना में 20 प्रतिशत तक सिकुड़ चुकी है। वहां पाई जाने वाली ब्लू आइस भी पिघलने लगी है, जो हजारों साल से जमी है। इससे आर्कटिक की बर्फीले चादर पतली होती जा रही है। कनाडाई आर्कटिक क्षेत्र में जहाजरानी उद्योग के बढऩे से भी इन क्षेत्रों में बर्फ पिघलने की दर बढ़ी गई आंकी गई है। जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा और सीधा असर पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में देखा जा सकता है।

गरम होता फ्रीजर

आर्कटिक गरम होता जा रहा है और साइबेरिया भी इसका अपवाद नहीं। दुनिया का फ्रीजर कहलाने वाला टुंड्रा प्रदेश अब सफेद से हरा होने लगा है। यहां पर तापमान में पिछले 40 सालों में 0.02 से 0.05 डिग्री सेल्सियस की बढ़त दर्ज की गई। इस रफ्तार से अगर तापमान बढ़ता रहा तो 2050 तक साइबेरिया में तापमान 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा। वातावरण के गर्माने से साइबेरिया की पर्माफ्रास्ट पिघलने लगी है, जिससे वहां बड़ी-बड़ी झीलें बनने लगी हैं। सैटेलाइट चित्रों से पता चलता है कि साइबेरिया के चेस्र्की क्षेत्र की झीलों का क्षेत्रफल 14 प्रतिशत तक बढ़ गया है। इसी प्रकार साइबेरिया के येडोमा पर्माफ्रास्ट जोन में पाई जाने वाली थर्मोकास्र्ट झीलों के क्षेत्र में भी 12 प्रतिशत तक का विस्तार देखा गया है। जब येडोमा पर्माफ्रास्ट पिघलेगी तो उसमें मौजूद मिट्टी और कार्बन घटकों से पिघलने से बड़ी मात्रा में मीथेन का उत्सर्जन होगा। पर्माफ्रास्ट में जमी मीथेन रासायनिक प्रक्रिया कर बाहर आने के लिए जब पानी की सतह पर आती है, तब वे अत्यधिक ठंडे तापमान के कारण बर्फ में बुलबुलों की शक्ल में जम जाती है।

पानी में घुलती आग
अनुसंधान के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि जब इन बुलबुलों को तोड़ा गया तो कई बार घर्षण से झील में से आग की लपटें निकल रही हैं। गौरतलब है कि मीथेन अत्यधिक ज्वलनशील गैस है और साइबेरिया में पर्माफ्रास्ट के पिघलने से मीथेन का बड़ी मात्रा में निकलना किसी भयानक संकट को जन्म दे सकता है। अनुसंधान के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि पिछले 30 साल में थर्मोकास्र्ट झीलों से मीथेन उत्सर्जन 58 प्रतिशत बढ़ा है। इसका कारण है कि झीलों के बनने और विस्तारित होने की प्रक्रिया में अब तक बर्फीली मिट्टी में जमा कार्बन घटक पानी में मिल जाते हैं और वे सडऩे लगते हैं। इस प्रक्रिया में मीथेन गैस का निर्माण होता है। इन झीलों की सतह पर गैस के बुलबुलों का निर्माण होने लगता है, जिसमें 90 प्रतिशत तक मीथेन गैस होती है। अब यहां से मीथेन इतनी बड़ी मात्रा में निकल रही है कि बुलबुले इन झीलों को सर्दियों में भी जमने नहीं दे रहे हैं। कई जगहों पर इन बुलबुलों से बने स्याह हॉटस्पॉट देखे जा सकते हैं। 2006 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार पिघलती पर्माफ्रास्ट सालाना 4 टेराग्राम मीथेन वातावरण में छोड़ रही है, जो किसी भी आद्र्र क्षेत्र के मुकाबले 63 प्रतिशत ज्यादा है। इसके बहुत ही घातक परिणाम हो सकते हैं, क्योकि मीथेन को ग्रीनहाउस गैस माना जाता है, जो कार्बन डायऑक्साइड से 23 गुना शक्तिशाली होती है।


विनाश की आशंका
आशंका है कि साइबेरिया की सारी पर्माफ्रास्ट पिघलने पर वातावरण में 50 गीगाटन मीथेन मिल सकती है, जो वातावरण में अभी मौजूद मीथेन से 10 गुना ज्यादा है। पर्माफ्रॉस्ट पिघलने के विनाशकारी परिणाम होंगे। अत्यधिक मीथेन निकलने से वातावरण अधिक गरम होगा, जिससे ग्लोबल वॉर्मिंग का बढऩा तय है।


आइरीन से विनाश

अमेरिका के प्रमुख तटीय शहर न्यूयार्क में जमकर तबाही मचाने वाले चक्रवाती तूफान आइरीन के कनाडा की तरफ रुख करने के बावजूद अमेरिका में बिजली, पानी और आवागमन की समस्या बदस्तूर जारी है। आइरीन ने अब तक 22 लोगों की जान ले ली है। यह अब भी 50 मील प्रति घंटा की रफ्तार से कनाडा के पूर्वी क्षेत्रों में दस्तक दे रहा है। ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि यह तूफान न्यूयार्क में बरपाए गए कहर की कनाडा में पुनरावृत्ति नहीं करेगा। न्यूयार्क शहर और उसके उपनगरीय इलाकों के लिए तो पिछले कुछ दिन किसी दु:स्वप्न से कम नहीं रहे। तूफानी हवाओं के साथ आई बारिश ने सड़कों को जलमग्न करने के साथ ही लाखों लोगों को अंधेरे में रहने के लिए मजबूर कर दिया था। इस दौरान हुए हादसों में 22 लोग मारे भी गए। अब भी हालात कुछ अधिक नहीं सुधरे हैं, लेकिन बिजली और पानी की आपूर्ति बहाल होना शुरू होने के साथ ही सड़कों पर से भी पानी हटना शुरू हो गया है। मंगलवार को लोग अपने घरों से कार्यस्थल के लिए निकले तो उन्हें सड़कों पर खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। सड़कों पर लगा पानी कम तो हुआ है, लेकिन अब भी पूरी तरह हटा नहीं है। न्यूयार्क शहर में मेट्रो और वायु सेवाएं भी धीरे-धीरे सामान्य हो रही हैं। न्यूजर्सी के गवर्नर क्रिस क्रिस्टी ने लोगों से अभी घरों के भीतर ही रहने की अपील करते हुए कहा कि बुनियादी सेवाएं बहाल होने में अभी समय लगेगा। उन्होंने कहा कि प्रशासन पूरी मशक्कत कर रहा है और न्यूयार्क के 3.7 लाख निवासियों को अपने घर लौटने की इजाजत दे दी गई है।

साढ़े छह करोड़ लोगों पर असर
अमेरिका के पूर्वी तटवर्ती इलाकों में साढ़े छह करोड़ लोगों पर इसका असर पड़ा है। करीब 5 लाख घरों में बिजली नहीं है। आशंका के विपरीत तूफान ने न्

यूयार्क को कम प्रभावित किया है। शहर से निकाले गए करीब तीन लाख लोगों को वापस अपने घरों में जाने की अनुमति दी गई है। हो सकता है कि अंडरग्राउंड ट्रेन सुबह न चले, क्योंकि ट्रैकों की जांच की जा रही है। आइरिन का सबसे अधिक असर न्यू जर्सी और वरमोंट जैसे उपनगरीय शहरों में हुआ है, जहां बारिश और बाढ़ के कारण हजारों घरों को नुकसान पहुंचा है और लाखों घरों में बिजली की आपूर्ति बंद हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चेतावनी देते हुए कहा है कि आइरिन अब तक के सबसे भयानक तूफानों में से एक हो सकता है। नॉर्थ कैरोलीना के सात राज्यों सहित कनेक्टीकट के कई इलाकों में आपातकाल घोषित करते हुए उन्हें पूरी तरह खाली करा लिया गया है। हालांकि तूफान की गति धीमी पड़ी है, फिर भी माना जा रहा है कि आइरिन ने 155 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से प्रवेश किया था।

70 करोड़ डालर का नुकसान
अधिकारियों ने तूफान से होने वाला नुकसान 70 करोड़ डालर आंका है। ज्यादातर सम्पत्ति का नुकसान न्यूयार्क और न्यूजर्सी में हुआ है। इससे प्रभावित राज्यों में उत्तरी कैरोलीन, वर्जीनिया, पेनसिल्वानिया, न्यूजर्सी, कनेक्टीकट और फ्लोरिडा हैं। ओबामा ने कहा कि इस आपदा का असर कुछ दिन और रह सकता है, लेकिन राहत कार्य कई सप्ताह तक चलेगा। उन्होंने कहा कि कुछ इलाकों में कुछ दिन के लिए बिजली गुल रह सकती है और इन इलाकों में बिजली आपूर्ति फिर से बहाल करने के लिए राज्य और स्थानीय लोगों को हरसंभव मदद दी जाएगी। अमेरिका के पूर्वी तट पर आए आइरिन तूफान के कारण वाशिंगटन, न्यूयार्क, फिलाडेल्फिया सहित कई शहरों में 10 लाख मकानों की विद्युत आपूर्ति ठप हो गई। ओबामा ने प्रभावित क्षेत्रों के लोगों से अनुरोध किया कि वे प्रांतीय तथा स्थानीय अधिकारियों के दिशा-निर्देशों का पालन करें। आंतरिक सुरक्षा मंत्री जैनेट नेपोलितानो ने कहा कि उनका प्रशासन आगामी दिनों में इस तूफान से हुए नुकसान से निबटेगा। उन्होंने अमेरिकी जनता से सुरक्षित रहने के लिए जरूरी कदम उठाने के लिए कहा। ओबामा ने अपने संदेश में कहा कि यह तूफान खतरनाक और अर्थव्यवस्था के लिए महंगा साबित होगा। यह ऐसे समय आ रहा है, जब देश 2005 में कैटरीन तूफान के जख्मों से उबर रहा है।


नुकसान से उबरने में वक्त लगेगा
अमेरिका में समुद्री तूफान 'आइरिनÓ से आशंकाओं के मुताबिक भले ही तबाही नहीं हुई, लेकिन राष्ट्रपति

बराक ओबामा ने कहा है कि इससे हुए नुकसान से उबरने में वक्त लगेगा।
व्हाइट हाउस में ओबामा ने कहा, 'मैं लोगों को बताना चाहता हूं कि राहत एवं सहायता का कार्य जारी रहेगा। इससे उबरने के प्रयास अभी जारी रहने वाला है।Ó 'मैं इस बात पर जोर देना चाहता कि इस तूफान को अभी कुछ समय के लिए महसूस किया जा सकेगा और उससे हुए नुकसान से उबरने के लिए प्रयास कुछ हफ्तों तक जारी रहेगा।Ó उन्होंने कहा, 'कई इलाकों में बिजली की कटौती कुछ दिनों के लिए हो सकती है। हम अपने प्रांतों और स्थानीय प्रशासनों के साथ मिलकर पूरी कोशिश करेंगे कि सभी इलाकों में बिजली की आपूर्ति जल्द से जल्द बहाल हो जाए।Ó

साराह ने की निपटने की तैयारी
सेक्स एंड द सिटी के लिए मशहूर साराह जेसिका पार्कर का कहना है कि उन्होंने न्यूयार्क में हरिकेन आइरिन तूफान के आने पर उससे निपटने की पूरी तैयारी कर ली है। उन्होंने अपने घर में आपात तूफान आपूर्ति का भंडारण कर लिया है। तूफान अमेरिका के पूर्वी तट की ओर रुख कर रहा है। डेली एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक 46 वर्षीय साराह और उनके पति मैथ्यु ब्रोडेरिक ने बुरे मौसम से निपटने के लिए सारी तैयारियां कर ली हैं और इसके बिग एप्पल में सप्ताहांत में आने की आशंका है।

अमेरिका की जनसंख्या 1.88 करोड़
न्यूयार्क अमेरिका का सबसे बड़ा और प्रमुख नगर है। यह न्यूयार्क राज्य में है, जो अमेरिका के उत्तरपूर्वी भाग में स्थित है। न्यूयार्क नगर 1790 से अमेरिका का सर्वाधिक जनसंख्या वाला नगर है, जबकि न्यूयार्क का महानगरीय क्षेत्र विश्व के सर्वाधिक जनसंख्या वाले महानगरीय क्षेत्रों में से एक है। यह विश्व का एक प्रमुख महानगर है और विश्व व्यापार, वाणिज्य, संस्कृति, फैशन और मनोरंजन पर इसका बहुत प्रभाव है। संयुक्त राष्ट्र का मुख्यालय यहां स्थित होने के कारण यह अन्तरराष्ट्रीय मामलों का भी एक प्रमुख केन्द्र है। अटलांटिक की ओर मुख किए हुए विशाल बंदरगाह बाले इस महानगर में पांच बरो (प्रशासनिक इकाइयां) हैं ब्रॉन्क्स, ब्रुक्लिन, मैनहटन, क्वींस, और स्टेटन द्वीप। नगर की अनुमानित जनसंख्या लगभग 82 लाख है, जो 790 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में बसी हुई है, जो न्यूयार्क को अमेरिका का सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाला नगर बनाता है। न्यूयार्क महानगरीय क्षेत्र की अनुमानित 1.88 करोड़ की जनसंख्या भी अमेरिका में सर्वाधिक है, जो 17,400 कि.मी. क्षेत्रफल में बसी हुई है।

युगांडा में भूस्खलन से 23 की मौत
पूर्वी युगांडा में 29 अगस्त को तड़के भारी बारिश के बाद भूस्खलन के कारण कम से कम 23 लोग मिट्टी के नीचे दफन हो गए हैं। युगांडा रेडक्रास की प्रवक्ता कैथरीन नताबाडे ने बताया कि बूलमबूली जिले के माबोनो और मेरू गांवों में 23 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हो चुकी है, लेकिन मलबे से केवल 15 शव निकाले जा सके हैं। स्थानीय मीडिया ने अधिकारियों के हवाले से कहा कि मृतकों की संख्या बढ़ सकती है। केन्या की सीमा से लगे इन क्षेत्रों में भारी बारिश और भूस्खलन से सैकड़ों मकानों को नुकसान पहुंचा है। बारिश से कुछ क्षेत्रों में बाढ़ आई है और फसलों को भी काफी नुकसान पहुंचा है।

वेब स्पेस टेलिस्कोप से जानेंगे ब्रह्मांड का रहस्य





- राजकुमार सोनी



ब्रह्मांड का रहस्य जानने के लिए खगोलविद करोड़ों डालर की दूरबीन वेब स्पेस टेलिस्कोप अंतरिक्ष में भेजेंगे। इससे बिग-बैंग के पश्चात ब्रह्माण्ड में बनी सबसे पहली आकाशगंगा, तारे की खोज , आकाशगंगाओं का गठन व विकास, ग्रहीय प्रणालियों को समझना एवं जीवन की उत्पत्ति का अध्ययन किया जाएगा। आज तक अंतरिक्ष में इतनी उन्नत किस्म की कोई दूरबीन नहीं गई है। नासा ने कहा है कि 2018 में अंतरिक्ष में जाने वाली इसकी प्रस्तावित जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप की कीमत 8.7 अरब अमरीकी डॉलर होगी। यह दूरबीन पांच साल तक काम करेगी। अमेरिकी संसद को अनुमोदन के लिए भेजा गया है। यह नया अनुमान पिछले अनुमानों से करीब दो अरब डॉलर जयादा है। जेम्स वेब को अंतरिक्ष में मौजूद हबल दूरबीन के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा है। इस दूरबीन से सृष्टि में मौजूद सबसे पहले तारों के प्रकाश की तस्वीरें खींचने में भी मदद मिलेगी।


देरी से संकट
हालांकि लगातार हो रही देरी और बढ़ती क़ीमत की वजह से यह अभियान संकट में है और कई राजनेता इस अभियान को बंद कर देना चाहते हैं। अमेरिकी संसद के एक सदन की एक समिति ने 2012 के बजट में इस अभियान को बंद कर देने की सिफारिश की है, जबकि दूसरे सदन ने इस बारे में अपना कोई मत नहीं दिया है। नासा खुद इस अभियान की जोरदार वकालत करता है और इसे अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक बताता है। आज तक अंतरिक्ष में इतनी उन्नत किस्म की कोई दूरबीन नहीं गई है।

छिड़ी गई है बहस
जेम्स वेब को अंतरिक्ष में मौजूद हबल दूरबीन के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा है। इन तमाम विवादों के अलावा इस बात पर भी बहस हो रही है कि किस तरह से इतनी बड़ी दूरबीन को अंतरिक्ष में सुरक्षित पहुंचाया जाएगा। इस दूरबीन की कीमत के अलावा इसको अंतरिक्ष में छोड़े जाने की तिथि भी आगे ही बढ़ती ही जा रही है। कुछ जानकार मानते हैं कि यह दूरबीन 2020 के पहले अंतरिक्ष में नहीं जा सकती। लेकिन नासा अपने पूरे अभियान की खुली समीक्षा के लिए तैयार है। इसके अलावा अमेरिका के लिए इस अभियान को रद्द करना अंतरराष्ट्रीय कारणों से भी मुश्किल होगा। इस अभियान में यूरोप और कनाडा भी शामिल हैं। उदाहरण के तौर पर यूरोप इस अभियान के लिए चार महत्वपूर्ण पुर्जे दे रहा है, बदले में इसके खगोलशास्त्रियों को इस दूरबीन के इस्तेमाल का 15 फीसदी समय मिलेगा।

जेम्स वेब खगोलीय दूरदर्शी
जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरदर्शी एक प्रकार की अवरक्त अंतरिक्ष वेधशाला है । यह हबल अंतरिक्ष दूरदर्शी का वैज्ञानिक उत्तराधिकारी और आधुनिक पीढ़ी का दूरदर्शी है, जिसे जून 2014 में एरियन 5 राकेट से प्रक्षेपित किया जाएगा। इसका मुख्य कार्य ब्रह्मांड के उन सुदूर निकायों का अवलोकन करना है जो पृथ्वी पर स्थित वेधशालाओं और हबल दूरदर्शी के पहुंच के बाहर है । जेडब्ल्यूएसटी, नासा और यूनाइटेड स्टेट स्पेस एजेंसी की एक परियोजना है जिसे यूरोपियन स्पेस एजेंसी, केनेडियन स्पेस एजेंसी और पंद्रह अन्य देशों का अन्तरराष्ट्रीय सहयोग प्राप्त है । इसका असली नाम अगली पीढ़ी का अंतरिक्ष दूरदर्शी एनजीएसटी था, जिसका सन 2002 में नासा के द्वितीय प्रशासक जेम्स एडविन वेब ( 1906-1992 ) के नाम पर दोबारा नामकरण किया गया । जेम्स एडविन वेब ने केनेडी से लेकर जोंनसन प्रशासन काल ( 1961-68 ) तक नासा का नेतृत्व किया था। उनकी देखरेख में नासा ने कई महत्वपूर्ण प्रक्षेपण किए , जिसमे जेमिनी कार्यक्रम के अंतर्गत बुध के सारे प्रक्षेपण एवं प्रथम मानव युक्त अपोलो उड़ान शामिल है ।

स्थापित होगा अंतरिक्ष में
जेडब्ल्यूएसटी जब अंतरिक्ष में स्थापित किया जाएगा तो उसकी कक्षा पृथ्वी से परे पंद्रह लाख किलोमीटर दूर लग्रांज बिन्दु एल ड्ब्ल्यू पर होगी अर्थात पृथ्वी की स्थिति हमेशा सूर्य और एल ड्ब्ल्य बिंदु के बीच बनी रहेगी । चूंकि एलडब्ल्यू बिंदु में स्थित वस्तुएं हमेंशा पृथ्वी की आड़ में सूर्य की परिक्रमा करती है इसलिए जेडब्ल्यूएसटी को केवल एक विकिरण कवच की जरुरत होगी जो दूरदर्शी और पृथ्वी के बीच लगी होगी । यह विकिरण कवच सूर्य से आने वाली गर्मी और प्रकाश से तथा कुछ मात्रा में पृथ्वी से आने वाली अवरक्त विकिरणों से दूरदर्शी की रक्षा करेगी। एलडब्ल्यू बिंदु के आसपास स्थित जेडब्ल्यूएसटी की कक्षा की त्रिया बहुत अधिक (8 लाख किमी) है , जिस कारण पृथ्वी के किसी भी हिस्से की छाया इस पर नहीं पड़ेगी । सूर्य की अपेक्षा पृथ्वी से काफी करीब होने के बावजूद जेडब्ल्यूएसटी पर कोई ग्रहण नहीं लगेगा ।

नासा का मिशन
नासा के गोडार्ड में प्रदर्शन के लिए रखा वेब टेलिस्कोप का एक मॉडल है। इस मॉडल का आकर वही है जो वेब टेलिस्कोप का वास्तविक आकार है। जेडब्ल्यूएसटी प्राथमिक वैज्ञानिक मिशन के मुख्य चार घटक है । पहला , बिग-बैंग के पश्चात ब्रह्माण्ड में बनी सबसे पहली आकाशगंगा और सबसे पहले बने तारे की खोज करना । दूसरा , आकाशगंगाओं का गठन और उनके विकास का अध्ययन करना । तीसरा , तारों का गठन और ग्रहीय प्रणालीयों को समझना तथा चौथा , जीवन की उत्पत्ति और ग्रहीय प्रणालीयों का अध्ययन करना । इन सभी कार्यों का विश्लेषण दृश्य प्रकाश की अपेक्षा अवरक्त प्रकाश में अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है । यही कारण है कि जेडब्ल्यूएसटी के उपकरण हबल टेलिस्कोप की तरह दृश्य या पराबैंगनी उपाय वाले नहीं होंगे बल्कि इसमें बड़ी मात्रा में अवरक्त प्रकाश को इक_ा करने की क्षमता होगी । जेडब्ल्यूएसटी की वर्तमान डिजाइन इस प्रकार बनाई गई है कि यह 0.6 ( नारंगी प्रकाश ) से लेकर 28 माइक्रोमीटर की गहरी अवरक्त विकिरण विस्तार की तरंगादैध्र्यों का आसानी से पता लगा लेगी।यह हबल अंतरिक्ष दूरदर्शी का वैज्ञानिक उत्तराधिकारी और आधुनिक पीढ़ी का दूरदर्शी है , जिसे जून 2014 में एरियन 5 राकेट से प्रक्षेपित किया जाएगा। इसका मुख्य कार्य ब्रह्माण्ड के उन सुदूर निकायों का अवलोकन करना है जो पृथ्वी पर स्थित वेधशालाओं और हबल दूरदर्शी के पहुंच के बाहर है ।

हबल के प्राथमिक दर्पण के साथ तुलना
निर्माण के दौरान मुख्य दर्पण का परीक्षण किया जा रहा है। जेडब्ल्यूएसटी का मुख्य दर्पण बेरिलियम धातु पर सोने की कोटिंग कर बनाया गया है । यह षटकोण आकार के 18 खंडों से मिलकर बना है जो एक केंद्र के चारों ओर दो वलयों में व्यवस्थित है। प्रत्येक खंड का व्यास 1.3 मीटर और वजन लगभग 20 किलो है । जेम्स वेब टेलिस्कोप के विज्ञान लक्ष्यों में से एक है समय धारा में पीछे की ओर जाकर उस समय को देखना जब आकाशगंगाएं युवावस्था में थी। वेब यह कार्य सुदूर स्थित उन आकाशगंगाओं के निरीक्षण से करेगा जो हमसे 13 अरब प्रकाशवर्ष दूर है। इस तरह की दूर स्थित बेजान वस्तुओं को देखने के लिए वेब को एक बड़े दर्पण की जरुरत होगी। दर्पण का क्षेत्रफल जितना अधिक होगा वह उतना ही अधिक प्रकाश इकट्ठा कर सकेगा और निरीक्षित वस्तु उतनी ही अधिक बारीकी से देखी जा सकेगी। यदि हबल टेलिस्कोप के 2.4 मीटर दर्पण का आकार बढ़ाकर वेब की आवश्यकताओं के अनुकूल बना दिया जाए तो इतने बड़े और वजनी दर्पण को बनाना और उसको अंतरिक्ष में स्थापित करना अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण कार्य होगा । इससे पहले अंतरिक्ष में इतना बड़ा दर्पण कभी नहीं ले जाया गया है । इस समस्या के हल के लिए वेब दल ने एक नया रास्ता खोजा । उन्होंने एक ऐसा दर्पण बनाने का निश्चय किया जो वजन में हल्का हो और बहुत मजबूत भी हो। आखिरकार उन्होंने दर्पण को बेरिलियम धातु से बनाने का निर्णय लिया ।

बेरिलयम तापमान को रखेगी स्थिर
बेरिलियम एक हल्की धातु है और यह अपने वजन के हिसाब से बहुत मजबूत होती है। इसमे ऐसे अनेक गुण है जो वेब के मुख्य दर्पण की आवश्यकताओं को पूरा करता है। बेरिलियम विभिन्न तापमानों में भी अपने आकार को स्थिर बनाएं रखने में सक्षम है। यह विद्युत और ताप का अच्छा सुचालक है और इसमे चुम्बकीय गुण भी नहीं पाया जाता है । इतने बड़े दर्पण को प्रक्षेपण यान के अंदर रखना भी अपने आप में एक समस्या है । इतना बड़ा दर्पण यान में समा नहीं सकता और प्रकाशिकी इसके आकार को छोटा करने की इजाजत नहीं देता । इस समस्या के हल के लिए वेब दल ने दर्पण को ऐसे कई खण्डों में बनाने का निर्णय लिया जिसे फोल्ड कर इसका आकार इतना छोटा किया जा सके की यह यान में आसानी से समा जाए । वेब दूरदर्शी को उसकी कक्षा में स्थापित करने के बाद दर्पण को खोल दिया जाएगा जिससे यह अपना पूर्व आकार प्राप्त कर लेगा ।

हबल अंतरिक्ष दूरदर्शी
हबल अंतरिक्ष दूरदर्शी वास्तव में एक खगोलीय दूरदर्शी है जो अंतरिक्ष में कृत्रिम उपग्रह के रूप में स्थित है, इसे 25 अप्रैल 1990 में अमेरिकी अंतरिक्ष यान डिस्कवरी की मदद से इसकी कक्षा में स्थापित किया गया था। हबल दूरदर्शी को अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी (नासा) ने यूरोपियन अंतरिक्ष एजेंसी के सहयोग से तैयार किया था। अमेरिकी खगोलविज्ञानी एडविन पोंवेल हबल के नाम पर इसे (हबल) नाम दिया गया। यह नासा की प्रमुख वेधशालाओं में से एक है । वर्ष 1990 में इसे लांच करने के बाद वैज्ञानिकों ने पाया कि इसके मुख्य दर्पण में कुछ खामी रह गई , जिससे यह पूरी क्षमता के साथ काम नहीं कर पा रहा है । वर्ष 1993 में इसके पहले सर्विसिंग मिशन पर भेजे गए वैज्ञानिकों ने इस खामी को दूर किया। यह एक मात्र दूरदर्शी है , जिसे अंतरिक्ष में ही सर्विसिंग के हिसाब से डिजाइन किया गया है । वर्ष 2009 में संपन्न पिछले सर्विसिंग मिशन के बाद उम्मीद है कि यह वर्ष 2014 तक काम करता रहेगा , जिसके बाद जेम्स वेब खगोलीय दूरदर्शी को लांच करने कि योजना है
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अंतरिक्ष में दूरबीन
हबल दूरबीन ने खगोल विज्ञान में क्रांतिकारी परिवर्तन लाते हुए ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ को बदल डाला है। सृष्टि के आरंभ और उम्र के बारे में हबल ने अनेक नए तथ्यों से हमें अवगत कराया है। इसकी नवीनतम उपलब्धि ब्रह्मांड की उम्र के बारे में सबूत जुटाने की है। हबल के सहारे खगोलविदों की एक टोली ने ।000 प्रकाश वर्ष दूर ऊर्जाहीन अवस्था की ओर बढ़ते प्राचीनतम माने जाने वाले तारों के एक समूह को खोज निकाला है। इन तारों के बुझते जाने की रफ्तार के आधार पर ब्रह्मांड की उम्र 13 से 14 अरब वर्ष के बीच आँकी गई है। इसके अतिरिक्त पिछले 12 वर्षों के दौरान इस दूरबीन ने सुदूरवर्ती अंतरिक्षीय पिंडों के हजाारों आकर्षक चित्र भी उपलब्ध कराए हैं।

दूरबीनों की शुरुआत
करीब सौ साल पहले अमरीका में खगोलविदों ने रिफलेक्टरों पर आधारित विशाल दूरबीनों का निर्माण आरंभ किया। उन दूरबीनों में से एक का माउंट विल्सन रिफ्लेक्टर 100 ईंच आकार का था, जिसे उस समय की सबसे बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धियों में से माना जा रहा था। उस विशाल दूरबीन को एडविन हबल नामक खगोलविद ने स्थापित किया था, जिनके सम्मान में पहली अंतरिक्ष दूरबीन को हबल दूरबीन कहा गया। अपनी दूरबीन के सहारे एडविन हबल ने साबित किया कि ब्रह्मांड का लगातार फैलाव हो रहा है। उनकी इस खोज को खगोल विज्ञान में हबल के नियम के नाम से जाना जाता है।
बाद में ब्रह्मांड की उम्र जानने की जिज्ञासा ने खगोलविदों को और बड़ी दूरबीनों के निर्माण के लिए प्रेरित किया और 200 ईंच आकार की रिफ्लेक्टर युक्त दूरबीनें भी बनीं।
लेकिन उन्हें एक ऐसी दूरबीन चाहिए थी जो धरती के वायुमंडल के व्यवधानों से अप्रभावित रहा और इस तरह अंतरिक्ष दूरबीन की बात सामने आई। लेकिन खगोलविदों का यह सपना 1990 में साकार हो सका, जब डिस्कवरी शटल ने हबल दूरबीन को अंतरिक्ष में पहुंचाया गया।

खगोलविदों का सपना साकार
खगोलविद एडविन हबल के सपनों को साकार करने वाली इस दूरबीन पर अमरीका में 1990 के दशक में ही काम शुरू हो चुका था। हबल दूरबीन की नियमित सर्विसिंग की व्यवस्था की गई है। बाल्टिमोर, अमरीका के स्पेस टेलीस्कोप साइंस इंस्टीट्यूट में हबल दूरबीन का विकास किया गया। अमेरिकी अंतरिक्ष शटल चैलेंजर की दुर्घटना के बाद कुछ वर्षों के लिए थमे अंतरिक्ष ट्रैफिक ने हबल परियोजना को बाधित किया। हबल अंतरिक्ष दूरबीन के कहीं विशाल आकार की परिकल्पना की गई थी, लेकिन अंतत: यह मात्र 96 ईंच आकार की परावर्तक सतह वाली दूरबीन साबित हुई। लेकिन वायुमंडल से दूर अंतरिक्ष में होने के कारण हबल दूरबीन धरती पर उपलब्ध कहीं बड़ी दूरबीनों ज्यादा प्रभावी साबित हो रही है। हबल दूरबीन की आयु 21 वर्ष आंकी गई है, यानि हमें वर्ष 2011 तक इसकी सेवा उपलब्ध रहना लगभग तय है। इसकी नियमित रूप से सर्विसिंग की जाती रही है। इसके लिए अमेरिकी अंतरिक्ष संस्था नासा के अंतरिक्ष यानों के सहारे अंतरिक्षयात्रियों को हबल तक पहुंचाया जाता है। इसकी धुंधली पड़ गई परावर्तक सतह को 1993 में बदला गया तथा वर्ष 2004 में इसकी एक बार फिर पूरी सर्विसिंग की गई थी।

ढाई अरब डालर खर्च
नासा ने हबल दूरबीन को अंतरिक्ष में स्थापित करने में करीब ढाई अरब डॉलर खर्च किए हैं। इसकी एक सर्विसिंग पर लगभग 50 करोड़ डॉलर की लागत आती है। धरती की सतह से 600 किलोमीटर ऊपर चक्कर लगा रही हबल 11 टन वजन की है। धरती का एक चक्कर लगाने में इस करीब 100 मिनट लगते हैं। इसकी लंबाई 13.2 मीटर और अधिकतम व्यास 4.2 मीटर है। हबल दूरबीन प्रतिदिन 10 से 15 गिगाबाइट आंकड़े जुटाती है। इसके द्वारा गए आंकड़ों के आधार पर 3000 से ज़्यादा अनुसंधान रिपोर्ट प्रकाशित किए जा चुके हैं।

वैज्ञानिकों ने खोजीं गैलेक्सियां
खगोल वैज्ञानिकों ने देश काल की सीमाओं से परे जाकर आदिम समय की आकाशगंगाओं का पता लगाया है। ये करीब 13 अरब साल पुरानी अल्ट्रा ब्लू गैलेक्सीज हैं, जो बिग बैंग यानी महाविस्फोट के 10 करोड़ साल बाद बनीं थीं। ये तीन छोटी और नीले रंग की चमकती हुई आकाशगंगाएं हमसे इतनी दूर हैं कि इनका प्रकाश हम तक पहुंचने में ही 13 अरब साल लगते हैं। जिस समय की ये आकाशगंगाएं हैं, उस समय ब्रह्मांड अपने आज के वजूद का सिर्फ 4 फीसदी ही था। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफॉर्निया के खगोलविदों ने नासा के हबल टेलिस्कोप की मदद से इन गैलेक्सियों को कैद किया है, जिन्हें पहले कभी नहीं देखा गया था। इस तरह सुदूर अंतरिक्ष की दूरीगत सीमा को तोड़ा गया है। ये गैलेक्सीज शुरुआती तारों, आकाशगंगाओं के निर्माण और उनके विकास संबंधी घटनाओं के बीच रिश्तों को समझने के लिए काफी अहम हैं। इसी के नतीजे में आज के ब्रह्मांड में हमारी मंदाकिनी (मिल्की वे) आकाशगंगा के साथ-साथ अन्य दीर्घ वृत्ताकार और सर्पिलाकार आकाशगंगाएं वजूद में आईं। हबल अल्ट्रा डीप फील्ड 2009 नाम की टीम ने इन आकाशगंगाओं की उम्र, आकार और द्रव्यमान का पता लगाने के लिए हबल से मिले आंकड़ों को नासा के स्पिटजर टेलिस्कोप से मिले आंकड़ों से मिलाया। पता चला कि इनका द्रव्यमान अपनी मिल्की वे का महज 1 प्रतिशत है। यह भी पता चला कि ये आकाशगंगाएं बिग बैंग के 10 करोड़ साल बाद आस्तित्व में आईं। इसका मतलब यह है कि इनमें तारों का निर्माण दसियों लाख साल पहले से शुरू हो गया होगा। डब्ल्यूएफसी-3 कैमरे की मदद से इन आकाशगंगाओं को खोजा गया। खोजी टीम की सदस्य मार्सिला कार्लो कहती हैं कि ये अरबों साल पुरानी गैलेक्सियां आज की मिल्की वे जैसी आकाशगंगाओं के लिए बिल्डिंग ब्लॉक के रूप में रही होंगी।
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ऐसे चित्र लेती है वेधशाला
आपने ब्रह्मांडीय पिंडो की खूबसूरत तस्वीरें देखी होंगी। इन अदभुत,विहंगम,नयानाभिराम चित्रों और उनके मनमोहक रंगों, आकृतियों को देखकर विश्वास नहीं होता कि ब्रह्माण्ड में रंगों की छटा इस तरह बिखरी पड़ी है। हम जानते हैं कि प्रकाश विभिन्न रंगों के मिश्रण के से बना है। दृश्य प्रकाश अर्थात वह प्रकाश जिसे हमारी आंखें देख सकती हैं या महसूस कर सकती है, वास्तविकता में विद्युत चुंबकीय विकिरण के वर्णक्रम का एक छोटा सा भाग है। इस दृश्य प्रकाश मे भिन्न-भिन्न आवृत्ति वाली तरंगें होती हैं, हमारी आंखें हर आवृत्ति की तरंगों को एक अलग रंग में देखती है। मोटे तौर पर हम उन्हें सात रंग में बांटते हैं जो लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला, बैंगनी हैं। इनमें से लाल रंग की आवृत्ति सबसे कम और बैंगनी रंग की आवृति सबसे ज्यादा होती है। वास्तविकता में रंगों की संख्या अनगिनत है, मानव आंखें भी लाखों रंगों को देखने में समर्थ है।

प्रकाश के रंग और विद्युत चुंबकीय विकिरण
दृश्य प्रकाश के रंग
लाल और बैगनी रंग के मध्य के सभी रंग। इन्हें हम देख सकते हंै। इन रंगों के लांखों शेड हैं लेकिन मूल रूप से तीन ही रंग माने गए हैं- लाल, हरा और नीला।
दृश्य प्रकाश बाह्य रंग
इन्हें हम देख नहीं सकते। जब हम इन्हें देख नहीं सकते तो हमें पता कैसे चलेगा कि इनका आस्तित्व है ? एक तरीका फोटोग्राफीक प्लेट का है, जिसमें किसी भी विकिरण के पडऩे पर वह भाग काला हो जाता है। एक्स रे तस्वीर तो आपने देखी ही होगी। एक्स रे मानव आंखों की क्षमता के बाहर है साथ ही अधिक मात्रा में यह हानिकारक भी है। दूसरा तरीका है कि, अदृश्य प्रकाश की एक विशेष आवृत्ति को लिए दृश्य प्रकाश के एक रंग से बदल दिया जाए। इससे जो चित्र बनेगा वह वास्तविक तो नहीं होगा लेकिन हमारे अध्ययन के लिए पर्याप्त होगा जैसे एक्स रे चित्र में बताया जाता है। किसी काले-सफेद कैमरे से लिए गये चित्र मे भी विभिन्न रंगों को काले और सफेद के मध्य के विभिन्न शेडो से बदल दिया जाता है।
हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला से चित्र लेना किसी साधारण रंगीन कैमरे से चित्र लेने से कंही ज्यादा जटिल है। हब्बल रंगीन फिल्म का प्रयोग नही करता है। तथ्य यह है कि हब्बल फिल्म का प्रयोग ही नही करता है। इसके कैमरे ब्रह्माण्ड के प्रकाश को अपने विभिन्न इलेक्ट्रानिक उपकरणो के प्रयोग से दर्ज करते है। ये इलेक्ट्रानिक उपकरण इन ब्रह्माण्डीय चित्रों को रंगीन की बजाये काले-सफेद के मध्य के शेडो मे बनाते है। अंतिम रंगीन चित्र वास्तविकता मे दो या दो से ज्यादा श्वेत-श्याम चित्रों के मिश्रण से निर्मित होते हंै, जिनमें चित्र के संसाधन के दौरान रंग जोड़े जाते है।

चित्रों को किया जाता है निर्धारित
हब्बल के चित्रो के रंग को विभिन्न कारणों से निर्धारित किया जाता है। कुछ स्थितियों में ये चित्र किसी अंतरिक्ष यान की यात्रा से देखी गई छवि से भिन्न हो सकते हैं। ऐसा इसलिए है कि हम रंगों को उस पिंड की विभिन्न विशेषताओं को उभार कर दिखाने के लिए एक उपकरण की तरह प्रयोग करते हैं क्योंकि मानव आंखें सभी रंगों को देख पाने या उनमे अंतर कर पाने मे असमर्थ होती है। एक साधारण चित्र मे हब्बल लाल, हरे और निले फिल्टरो मे से एक समय मे एक फिल्टर का प्रयोग कर तीन श्वेत श्याम चित्र लेता है। इसके बाद दृश्य चित्र अर्थात आंखो से दिखायी देने वाले दृश्य के निर्माण के लिए इन श्वेत श्याम चित्रो मे रंगो का निर्धारण होता है। लाल फिल्टर से लिए गये चित्र मे लाल रंग दिया जाता है, हरे फिल्टर के वाले चित्र लिये हरा, निले फिल्टर वाले चित्र के लिए निला। अंत मे इन तीनो चित्रो के मिश्रण से अंतिम चित्र बनता है। यह चित्र उस पिंड की वास्तविक दृश्य छवी के समीप होता है।
चित्रों में रंगों का प्रयोग
हब्बल के चित्रो मे रंगो का प्रयोग ब्रह्माण्डीय पिंडों के विशिष्ट गुणधर्मों को उभारने के लिए भी किया जाता है। इन रंगों को विभिन्न श्वेत श्याम चित्रों में जोड़ा जाता है जिनके मिश्रण से अंतिम चित्र बनता है। मौलिक श्वेत-श्याम चित्रों से रंगीन चित्रो का निर्माण विज्ञान के अतिरिक्त कला का प्रयोग है।

ये होते हैं कार्य
यदि हमारी आंखें हब्बल दूरबीन के जैसे शक्तिशाली हो तो कोई अंतरिक्ष पिंड कैसे दिखेगा। किसी ब्रह्मांडीय पिंड के उन गुणधर्मो को देखना जिसे मानव आंखों से देखा नहीं जा सकता। किसी पिंड की परिष्कृत छवि का निर्माण किसी पिंड के चित्र को संसाधित करते समय मुख्यत: तीन तरह से रंगों का चयन किया जाता है।
प्राकृतिक रंग
इन रंगो का चयन मानव आंखो को ध्यान मे रख कर किया जाता है। इन रंगों के चयन से निर्मित अंतिम छवि, उस पिंड पर अंतरिक्ष यान द्वारा यात्रा कर आंखों देखी छवि के करीब होती है।
प्रतिनिधि रंग
इस विधि में रंगों का चयन मानव आंखों द्वारा न देखे जा सकने वाले गुणों के चित्रण के लिए किया जाता है। जैसे अवरक्त किरणों से प्राप्त छवि उस पिंड के विभिन्न भागों के तापमान को दर्शाती है। यह छवि वास्तविक छवि से भिन्न होती है। इसे छद्म रंग छवि भी कहते हैं। श्वेत श्याम चित्र या एक्स रे छवि इसका एक उदाहरण है। मौसम समाचारों में पृथ्वी के विभिन्न भागों में तापमान का अंतर दर्शाने इसी का प्रयोग किया जाता है।
उन्नत रंग
किसी पिंड की संरचना दर्शाने के लिए इस विधि का प्रयोग किया जाता है। रंगो का चयन इस तरह से किया जाता है कि कुछ विशिष्ट गुण उभर कर दिखें।


तो खत्म हो जाएगा हबल टेलीस्कोप
यदि अमेरिकी अधिकारियों की चली तो हर्बल टेलीस्कोप भी डिस्कवरी यान की तरह रिटायर (खत्म) हो जाएगा। हर्बल के भविष्य को लेकर हाल ही में यूएस लॉमेकर्स के बीच सर्वे कराया गया। इनमें से अधिकांश अधिकारियों ने हर्बल को नष्ट करने का समर्थन किया। वजह बताई जा रही है इस पर आ रही लागत। हालांकि हबल मिशन को खत्म करने की प्रक्रिया लंबी चलेगी। पहले इसे सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रजेंटिव में पास कराना होगा। फिर राष्ट्रपति बराक ओबामा की मुहर लगने के बाद ही इसे अंतिम रूप दिया जाएगा। धरती की सतह से 600 किलोमीटर ऊपर चक्कर लगा रही हबल दूरबीन का वजन 11 टन है। धरती का एक चक्कर लगाने में इसे करीब 100 मिनट लगते हैं। इसकी लंबाई 13.2 मीटर और अधिकतम व्यास 4.2 मीटर है। नासा ने हबल दूरबीन को अंतरिक्ष में स्थापित करने में करीब 2.5 अरब डॉलर खर्च किए। इसकी एक सर्विसिंग पर लगभग 50 करोड़ डॉलर की लागत आती है। नासा का हबल टेलीस्कोप को खगोल विज्ञान में क्रांति लाने का श्रेय जाता है। संयोग देखिए कि अमेरिका का सबसे पुराना और सबसे अधिक यात्रा करने वाला अंतरिक्ष यान डिस्कवरी हाल ही में रिटायर हुआ है। डिस्कवरी ने ही हबल को अंतरिक्ष में स्थापित किया था।
हबल की उपलब्धियां
-हबल ने जो डाटा भेजे हैं उनके आधार पर 3000 से ज़्यादा अनुसंधान रिपोर्ट अब तक प्रकाशित हो चुकी है।
-इसके द्वारा भेजे गए चित्र से ही ब्रह्मांड की वास्तविक आयु (13 अरब साल) का पता चला।



प्राकृतिक सुपरफूड के चमत्कार




राजकुमार सोनी

>सुपरफूड यानी हमारी सेहत को चमत्कारिक रूप से सेहतमंद बनाने वाले कुछ खाद्यपदार्थ। सुपरफूड की श्रेणी में वे नाम आते हैं, जिनके गुण उंगलियों पर गिनाए नहीं जा सकते। हमारी रोजमर्रा की जटिल हो चुकी जिंदगी के लिए इनमें छिपे फायदे बेहद जरूरी हैं। ये हमें निरोगी, चुस्त, जवान और सेहतमंद रखने की गारंटी के साथ ही बनाए गए हैं। बुढ़ापा इनसे कोसों दूर रहता है। बच्चे से लेकर वयस्क और बुड्ढे भी इन्हें खाकर स्वस्थ जिंदगी की सौगात पाते हैं। इन्हें खाकर हम सुपर हैल्थ के हकदार तो बन ही सकते हैं। आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ प्राकृतिक सुपरफूड के बारे में, जिनमें छिपा है सेहत का खजाना।


जवानी का बीज सोयाबीन
जादुई बीज कहलाने वाला सोयाबीन यौवन बरकरार रखने वाला बीज भी कहा जाता है। कहते हैं लंबे समय तक सोयाबीन खाने वाले लोग बूढ़े नहीं होते। वैज्ञानिकों ने साबित किया है कि सोयाबीन से निकलने वाला इसोफ्लेवोन नामक रसायन बड़ी मात्रा में उन पुरुषों में पाया गया, जो सोयाबीन का सेवन करते हैं और जिनकी उम्र 60 साल से ऊपर है। यह रसायन प्रोस्टेट कैंसर से सुरक्षा में प्रभावी है। यूं तो सोया दालों की श्रेणी में आता है, लेकिन इससे उत्पन्न दूध और दही देखने में और खाने में दूध और दूध की वस्तुओं की तरह ही होते हैं। इसका कम दाम गरीबों के लिए वरदान है। सोयाबीन में विटामिन, धातु व लवण और उच्च श्रेणी के प्रोटीन बड़ी मात्रा में होते हैं। सोयाबीन में प्रोटीन का अंश 43 पर्सेंट रहता है। इसमें जितना प्रोटीन है मांस की तुलना में वह दुगुना, अंडे की तुलना में तिगुना और दूध की तुलना में ग्यारह गुना अधिक है। सोयाबीन में आयरन की प्रचुरता के

कारण यह अनीमिया यानी खून की कमी दूर करता है। इससे स्मरण शक्ति बढ़ती है, सोया स्नायुओं को शांत रखता है और चिड़चिड़े स्वभाव को दूर रखता है। यही नहीं सोयाबीन के दानों में कैल्शियम और फॉस्फोरस की भी भरमार है। सोया दूध में लैक्टोज बिल्कुल नहीं होता, जबकि गाय-भैंस के दूध में लैक्टोज की मात्रा पाई जाती है। इस कारण से भी बच्चों और डायबिटीज के मरीजों के लिए सोया दूध को वरदान कहा जाता है।

कैंसररोधी अलसी के बीज
अलसी के बीजों में 27 प्रकार के कैंसररोधी तत्व खोजे जा चुके हैं। ऊर्जा, स्फूर्ति व जीवटता प्रदान करता है। तनाव के क्षणों में शांत व स्थिर बनाए रखने में सहायक है। कैंसररोधी हार्मोन्स की सक्रियता बढ़ाता है। रक्त में शर्करा तथा कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को कम करता है। जोड़ों का कड़ापन कम करता है। हृदय संबंधी रोगों के खतरे को कम करता है। उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करता है। त्वचा को स्वस्थ रखता है एवं सूखापन दूर कर एग्जिमा आदि से बचाता है। बालों व नाखून की वृद्धि कर उन्हें स्वस्थ व चमकदार बनाता है। रजोनिवृत्ति संबंधी परेशानियों से राहत प्रदान करता है। मासिक धर्म के दौरान ऐंठन को कम कर गर्भाशय को स्वस्थ रखता है। वजन नियंत्रण करने में अलसी सहायक है। चयापचय की दर को बढ़ाता है एवं यकृत को स्वस्थ रखता है। प्राकृतिक रेचक गुण होने से पेट साफ रख कब्ज से मुक्तिदिलाता है।

मधुमेह की काट बीन्स
बीन्स यानी हरी फलीदार सब्जियां। मधुमेह की सबसे बड़ी काट बीन्स में छिपी है। बीन्स से बने उत्पादों का सेवन करके आप अपना मोटापा भी घटा सकते हैं। बीन्स में प्रोटीन,कार्बोहाइड्रेट, विटामिन सी तथा कैल्शियम, फॉस्फोरस, आयरन, कैरोटीन, थायमीन, राइबोफ्लेविन, नियासीन आदि अनेक तरह के मिनरल और विटामिन मौजूद होते हैं। इसमें सोडियम की मात्रा कम तथा पोटेशियम व मैग्नीशियम की मात्रा अधिक होती है, जो सेहत के लिए लाभदायक है। बीन्स फाइबर से भरा होता है यह फाइबर का एक बेहतरीन स्रोत है और फाइबर वजन कम करने में भी सहायक है। शरीर की अनावश्यक चर्बी को कम करने में मदद करता है। फाइबरयुक्त आहार में कैलोरी कम स्तर में होती है और इस आहार को लेने से भूख जल्दी शांत होती है। इससे वजन पर नियंत्रण रहता है। बीन्स लेने से कब्ज की शिकायत नहीं होती, पेट भी साफ रहता है। बीन्स में एन्टीऑक्सिडेंट भी पाया जाता है, जो शरीर में कोशिकाओं की मरम्मत के लिए अच्छा घटक है और इसका सेवन करने से कैंसर की

सम्भावना भी कम हो जाती है। इसमें मौजूद फाइबर ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित रखता है। रोज एक कप बीन्स आपको दिनभर चुस्त रखेगी।

एंटीऑक्सिडेंट का खजाना बेरी
बेरी कई तरह के हैं, लेकिन सभी तरह के बेरी सेहत के लिए वरदान हैं। ब्लूबेरी में छिपे हैं बेहद मजबूत एंटीऑक्सिडेंट। इसकी खटास में में छिपा है दिल की सेहत का राज। दिल की बीमारियों से छुटकारा पाने चाहते हैं तो रोज ब्लूबेरी खाइए। ब्लूबेरी को कैंसर और अल्जाइमर से बचाव में बड़ा मददगार माना जाता रहा है। हफ्ते में दो बार मुट्ठी भर ब्लूबेरी खाना तनाव और उच्च रक्तचाप के लिए रामबाण है। ब्लूबेरीज में पाए जाने वाले बायो-एक्टिव पदार्थ एंथोकायनिंस से हाइपरटेंशन से बचाव होता है। शोध के दौरान पाया गया कि जिन लोगों ने हफ्ते में कम से कम एक बार मुट्ठीभर ब्लूबेरीज खाईं, उनमें दिल की बीमारी का खतरा करीब 10 फीसदी कम पाया गया, जबकि जो लोग हफ्ते में एक बार भी ब्लूबेरी नहीं खाते हैं, उन्हें इस तनाव और दिल की बीमारी का खतरा ज्यादा रहता है। इतना ही नहीं सुपरफूड से कैंसर और अल्जाइमर जैसी बीमारियों की रोकथाम में भी मदद मिलती है।

सेब खाओ डॉक्टर भगाओ
रोज एक सेब खाएं और डॉक्टर को दूर भगाएं। ये कहावत ऐसे ही नहीं बनी। सेब कमाल का सुपरफूड है। सेब के सेवन से हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह के साथ ही दिमागी बीमारियों जैसे पार्किंसन और अल्जाइमर आदि में भी आराम मिलता है। एक सेब रोज खाने से पाचन क्रिया ठीक रहती है, जिससे अनेक रोगों से सुरक्षा रहती है। लाल सेब में सेब की अन्य प्रजातियों की अपेक्षा अधिक एंटी-ऑक्सिडेंट होते हैं, जो मनुष्य को कैंसर, ह्रदय रोगों और मधुमेह, दिमागी तथा याददाश्त संबंधी समस्याओं में फायदा पहुंचाते हैं। लाल सेब में उपस्थित फ्लैवोनोइड तत्व एंटीऑक्सिडेंट का काम करते हैं। यह दिमाग की कोशिकाओं को स्वस्थ रखते हैं, जिससे पार्किंसन और अल्जाइमर जैसे दिमागी रोगों से बचाव होता है। सेब रेशे (फाइबर) वाला फल है। इसमें प्रोटीन और विटामिन की संतुलित मात्रा होती है, लेकिन कैलोरी कम होती है, जिससे यह हृदय को स्वस्थ रखने में सहायक है। उच्च रक्तचाप या किसी अन्य कारण से जो लोग नमक का सेवन कम करते हैं, उनके लिए सेब सुरक्षित है, क्योंकि सेब में सोडियम की मात्रा न के बराबर होती है। सेब शरीर में ग्लूकोज की मात्रा को संतुलित करने का कार्य करता है। इससे मधुमेह के रोगियों को लाभ होता है। सेब स्मरण शक्ति बढ़ाने, शरीर को चुस्त और स्वस्थ रखने में कई स्तरों पर काम करता है।


हरी चाय पियो खुलकर जियो
आपकी और हमारी सुबह चाय से ही शुरू होती है। चाय हमारे लिए वरदान है। चाय में पाए जाने वाले अलग-अलग प्रकार के फ्लेवनायड्स मौजूद होते हैं, जिनकी कार्यप्रणाली भी अलग-अलग होती है। शोधों से स्पष्ट है कि ब्लैक टी पीने के बाद खून में एंटीऑक्सिडेंट क्षमता बढ़ जाती है। वैसे अगर चाय पीनी है तो हरी चाय यानी हर्बल चाय पीजिए। हरी चाय एक औषधि है, जो कैंसर को रोकती है। हरी चाय एक बहुत शक्तिशाली एंटीऑक्सिडेंट भी है। हरी चाय के उपयोग से आपको वजन घटाने में कामयाबी मिलती है। हरी चाय पीने से हमारे शरीर की चयापचय प्रक्रिया 4 फीसदी बढ़ जाती है। यही नहीं शरीर की क्रियाशीलता को यह बढ़ाती है। हरी चाय के सेवन से डाइबिटीज टाइप -2 का खतरा कम होता है। हरी चाय शरीर में खून के थक्के जमने से रोकती है, जिससे हृदय रोग की संभावना घटती है। यदि आप त्वचा संबंधी बीमारियों के घेरे में हैं तो दिन में दो कप हरी चाय जरूर पीजिए। हरी चाय में मौजूद फ्लोराइड आपके और आपके लाड़ले के दांतों के लिए बेहद लाभकारी है।

गुणों की खान टमाटर
टमाटर एक ऐसा सुपरफूड है, जिसे कच्चे या पक्के जिस भी रूप में खाया जाए लाभ ही पहुंचाएगा। अगर किसी को कैंसर हो गया हो तो उसके भोजन में 60 फीसदी हिस्सा टमाटर का कर दीजिए। सच मानिए जितनी कोशिकाएं नष्ट हो चुकी हैं, उनकी संख्या में और बढ़ोतरी नहीं होगी और कैंसर नियंत्रित रहेगा, फैलेगा नहीं। टमाटर लीवर और किडनी को उत्तेजित करता है, जिससे शरीर में उनके कार्य उचित गति से होते रहते हैं। आजकल ज्यादातर लोग किडनी और लीवर के ही मरीज हैं। यही नहीं कच्चे टमाटर की चटनी आपकी आंतों के लिए अमृत के समान है। कच्चे टमाटर में प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम , फॉस्फोरस , एस्कोर्बिक एसिड, राइबोफ्लेविन, निकोतेनिक एसिड, थायमीन, कैरोटिन जैसे तत्व पाए जाते हैं। यही टमाटर अगर पक जाए तो पहले वाले तत्व सोडियम, पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम क्लोरीन, सल्फर, फास्फोरस, आयरन, एल्यूमिनियम, जिंक कोबाल्ट मैगनीज, सिट्रिक एसिड , एमीनो एसिड , मैलिक एसिड, फ्रक्टोज , ग्लूकोज में बदल जाते हैं। आप खुद ही फैसला कर सकते हैं कि रोज टमाटर खाएं या डॉक्टर के पास जाएं। सबसे खास बात ये है कि अन्य सब्जियों की तुलना में टमाटर को पकाने पर उसके पोषक तत्व खत्म नहीं होते, बल्कि बढ़ जाते हैं।

पकाने पर टमाटर वह लाइकोपीन को अच्छे से आब्जर्व कर लेता है। इसमें फाइबर ज्यादा व कैलोरीज कम होती हैं, जो वेट घटाने में मदद करती है। इसमें मौजूद बीटा कैरोटिन भी बॉडी के लिए बेहद फायदेमंद है। दरअसल, यह बॉडी में विटामिन ए में बदल जाता है और यह तो सभी जानते हैं कि विटामिन ए त्वचा, बालों, हड्डियों व दांतों को हेल्दी रखने के बेहद फायदेमंद है।

ऊंटनी का दूध नया सुपर फूड
मध्य पूर्व और अफ्रीकी देशों में चाव से पिया जाता है ऊंटनी का दूध।
यूरोप के बाजारों में आने वाले दिनों में एक नया उत्पाद सुपर फूड का रूप ले सकता है।
ये उत्पाद है ऊंटनी का दूध, जिसकी मांग मध्य पूर्व के देशों में तो है ही, लेकिन अब इसे यूरोप लाए जाने की भी योजना बन रही है।
संयुक्त राष्ट्र ने आह्वान किया है कि ऊंटनी का दूध यूरोप में भी बेचा जाए। ऊंटनी के दूध में गाय के दूध की तुलना में विटामिन बी और सी दस प्रतिशत अधिक होता है। हां गाय के दूध की तुलना में यह दूध थोड़ा नमकीन भी अधिक होता है।
कहा जा रहा है कि हैरड्स के साथ साथ फोर्टनम और मैसन ने इस उत्पाद में दिलचस्पी दिखाई है।
विटामिन और खनिज तत्वों के अलावा ऊंटनी के दूध में ऐसे एंटीबॉडी पाए गए हैं, जो कैंसर, एड्स , एल्जीमर्स रोग और हैपटाइटिस सी से लडऩे में भी शरीर की मदद करते हैं। दूध के व्यापार में अपार संभावनाएं हैं।

दूध ही असली पूंजी है
शोध इस बात की भी हो रही है कि क्या यह दूध डायबिटीज और दिल की बीमारी के लिए कितना प्रभावी सिद्ध हो सकता है।
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन चाहती है कि मौरीतानिया से लेकर कजाकिस्तान के लोग ऊंटनी का दूध पश्चिमी देशों को बेचना शुरू करें।
संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि इसके व्यापार को बढ़ाने में निवेशकर्ता आगे आकर मदद करेंगे।
दूध के व्यापार में अपार संभावनाएं हैं।
अरब देशों में दो करोड़ से अधिक खरीदार हैं तो यूरोप, अमरीका और अफ्रीका में यह संख्या करोड़ों में है।
ऊंटनी के दूध का अलग स्वाद लोकप्रियता कम कर सकता है। अनुमान है कि ऊंटनी के दूध का बाजार तकरीबन साढ़े पांच अरब पाउंड का हो सकता है।
ऊंटनी का दूध गाय के दूध की तुलना में हर लिहाज से बेहतर दिखता है, लेकिन इसकी कीमत और अलग स्वाद इसकी बिक्री और लोकप्रियता की राह में रोड़ा बन सकता है।

तीखी चॉकलेट के मीठे गुण
वैज्ञानिकों का दावा है कि चॉकलेट कई फलों के मुकाबले ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक होती है। उन्होंने इसे 'सुपर फूडÓ की संज्ञा दी है। अमेरिका के हर्शे सेंटर

फॉर हेल्थ एंड न्यूट्रीशियन के शोधकर्ताओं के मुताबिक चॉकलेट में जूस की तुलना में अधिक एंटीऑक्सिडेट और पॉलीफेनोल पाए जाते हंै, जो कैंसर और हृदय रोग की बीमारियों से बचाते हैं। उनके मुताबिक चॉकलेट में उससे कहीं ज्यादा पोषक तत्व होते हैं, जितने पोषक आहार विशेषज्ञ पूर्व में मानते थे।
डार्क चॉकलेट में 60 प्रतिशत कोको का इस्तेमाल होता है। प्रमुख शोधकर्ता डेबरा मिलर ने कहा, यह शोध बताता है कि कोको के बीज को 'सुपर फ्रूटÓ मानना चाहिए और कोको से बनने वाले उत्पादों को जैसे कोको पाउडर और डॉर्क चाकलेट को 'सुपर फूडÓ मानना चाहिए।

दलिया खाकर दिल रखें स्वस्थ
नाश्ते में रोज दलिया खाना स्वास्थ्य के लिहाज से फायदेमंद है। भारतीय परंपरा में यह सदियों से आहार का एक अहम हिस्सा रहा है। अब एक नए वैज्ञानिक शोध में भी इस बात की पुष्टि की गई है कि रोज दलिया खाने से दिल को स्वस्थ रखा जा सकता है। इससे रक्तचाप को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है। यह दावा किया है ब्रिटेन के अबर्डन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने।
अखबार डेली एक्सप्रेस के मुताबिक यदि लोग अपने आहार में रोज दलिया को शामिल करें, तो दिल की बीमारियों में 15 फीसदी और स्ट्रोक में 25 फीसदी की कमी आएगी। इस 'सुपर फूडÓ को आहार में शामिल करने से उच्च रक्तचाप [हाइपरटेंशन] को नियंत्रित किया जा सकता है।
वैज्ञानिकों के दल की अगुवाई करने वाले डॉक्टर
वैज्ञानिकों ने 40 से 50 की उम्र वाले 206 स्वयंसेवकों पर शोध किया। कुछ का वजन सामान्य था, जबकि कुछ मोटे थे। ज्यादातर के रक्तचाप का स्तर बढ़ा हुआ था। इनमें से कुछ स्वयंसेवकों को अपने आहार में दलिया को शामिल करने के लिए कहा गया था। तीन महीने बाद परीक्षण में पाया गया कि जिन लोगों ने अपने आहार में दलिया को शामिल किया था, उनके रक्तचाप में काफी कमी आई। शोध को 'अमेरिकन जर्नल ऑफ क्लीनिकल न्यूट्रीशनÓ में प्रकाशित किया गया है।

अमृत का दूसरा नाम दही
दही घोषित तौर पर अमृत कहा जाता है। दही से मिलने वाला फॉस्फोरस और विटामिन डी शरीर के लिए लाभकारी होता है। दही में कैल्शियम को एसिड के रूप में समा लेने की भी खूबी होती है। रोज 300 मिली. दही खाने से आस्टियोपोरोसिस, कैंसर और पेट के दूसरे रोगों से बचाव होता है। पेट में मिलने वाली आंतों में जब अच्छे किस्म के बैक्टीरिया का अभाव हो जाता है तो भूख न लगने जैसी तमाम बीमारियां पैदा हो जाती हैं। इस स्थिति

में दही सबसे अच्छा भोजन बन जाता है। दही भूख लगने में मदद करता है। इससे पेट में होने वाली बीमारियां अपने आप खत्म हो जाती हैं। दही खाने से पाचन क्रिया सही रहती है, जिससे खुलकर भूख लगती है और खाना सही तरह से पच भी जाता है। दही खाने से शरीर को अच्छी डाइट मिलती है, जिस से स्किन में एक अच्छा ग्लो रहता है। दही खाने से वाइट ब्लड सेल्स मजबूत होते हैं, जो शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं। बढ़ती उम्र के लोगों को दही का सेवन जरूर करना चाहिए। जो लोग लंबी बीमारी से लड़ रहे हैं, उन्हें दही अवश्य खाना चाहिए। सभी डायटीशियन एंटीबायटिक थेरेपी के दौरान दही का नियमित सेवन करने की राय देते हैं। दही के सेवन से हार्ट में होने वाले कोरोनरी आर्टरी रोग से बचाव किया जा सकता है। दही के नियमित सेवन से शरीर में कोलेस्ट्रॉल को कम किया जा सकता है। अल्सर जैसी बीमारी में दही के सेवन से विशेष लाभ मिलता है। दही एक प्रिजर्वेटिव की तरह काम करता है। दही खमीरयुक्त डेयरी उत्पाद माना जाता है। पौष्टिकता के मामले में दही को दूध से कम नहीं माना जाता है। यह कैल्शियम तत्व के साथ ही तैयार होता है। कार्बोहाइडे्रट, प्रोटीन और फैट्स को साधारण रूप में तोड़ा जाता है। इसलिए दही को प्री डाइजेस्टिक सुपरफूड माना जाता है।

गरीबों का मेवा मूंगफली
ये प्रोटीन का एक बहुत अच्छा स्रोत है। मूंगफली में विटामिन 'ईÓ पाया जाता है जो की कैंसर और दिल की बीमारियों के खतरे को कम करता है। मूंगफली में आयरन भी मौजूद होता है, जो कि लाल रक्त कोशिकाओं के ठीक से कार्य करने के लिए आवश्यक है। मूंगफलियों में कैल्शियम भी होता है, जो हड्डियों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए बहुत आवश्यक है। मूंगफलियों में मौजूद फाइबर गुदा के कैंसर की संभावना घटाता है। मूंगफली हार्मोन के विकास में सहायक है। इससे ब्लड में कोलेस्ट्रॉल का लेवल कम होता है। एक दिन में औसतन 67 ग्राम नट्स यानी बादाम और मूंगफली खाने से कुल कोलेस्ट्रॉल लेवल में 51 फीसदी की कमी आती है। इसके अलावा कम घनत्व वाले बैड कोलेस्ट्रॉल यानी लिपोप्रोटीन कोलेस्ट्रॉल का लेवल 7.4 फीसदी कम होता है।

मजबूत पाचन क्रिया के लिए खाओ अदरक
खाने में रोज अदरक खाने से पाचन क्रिया मजबूत होती है। अदरक में मौजूद तत्व गठिया, आर्थराइटिस, साइटिका और सर्वाइकल स्पोंडिलाइटिस से लडऩे में हमारी मदद करते हैं। इसके अलावा भूख न लगना, अमीबिक पेचिश, खांसी, जुकाम, दमा और शरीर में दर्द के साथ बुखार, कब्ज होना, कान में दर्द, उल्टियां होना,

मोच आना, उदर शूल और मासिक धर्म में अनियमितता होने पर अदरक राम जी की दवाई बन जाता है। अदरक कोलेस्ट्रॉल को भी कंट्रोल करता है। दरअसल, यह कोलेस्ट्रॉल को बॉडी में एब्जॉर्व होने से रोकता है। सांस की बीमारी जैसे ब्रोंकाइटिस और अस्थमा में अदरक बेहद कारगर है। मॉर्निंग सिकनेस को दूर करने में यह विटामिन बी 6 की तरह प्रभावशाली साबित होता है। अदरक को मेडिकल फील्ड में दवाई के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है। अदरक के इस्तेमाल से ब्लड सर्कुलेशन ठीक रहता है। साथ ही मसल्स और ब्लड वैसल्स को भी रिलैक्स मिलता है। अदरक खाने से मुंह के हानिकारक बैक्टीरिया भी मर जाते हैं। बच्चों के पेट में कीड़े होने पर अदरक दें, कीड़े भी साफ और आपकी परेशानी भी।

संजीवनी बूटी अनार
अनार खाने से शारीरिक निर्बलता और दिमागी बीमारियां खत्म करने में मदद मिलती है। यदि कोई व्यक्ति दिन में दो-तीन बार 6-10 ग्राम जल के साथ अनार का सेवन करे तो उसके लिए यह संजीवनी बूटी का काम करेगी। जावित्री, काली मिर्च, जायफल, पीपल, सौंठ, दाल-चीनी और लौंग चूर्ण के साथ अनार का जायका बहुत ही फायदेमंद है। वैसे अनार का जूस कई मायनों में फायदेमंद है। यह कैंसर रोकने के साथ ही हार्ट के लिए काफी अच्छा है। एक महीने तक रोजाना एक बोतल अनार का जूस पीने वाले लोगों के पेट की चर्बी की कोशिकाओं में कम वृद्धि पाई गई है। अनार का जूस पीने से रक्तचाप की मात्रा में आई कमी से हृदयाघात और गुर्दे की बीमारी के खतरे को कम करता है।

सेक्स पावर बढ़ाए लहसुन
आमतौर पर लहसुन को सिर्फ खाने का स्वाद बढ़ाने के लिए ही उपयोग में लिया जाता है, लेकिन लहसुन में स्वाद बढ़ाने के अलावा भी कई ऐसी खूबियां होती हैं, जो लहसुन को बेजोड़ और बहुत कीमती बनाती हैं। यदि आप दुर्बलता और नपुंसकता के शिकार हैं तो जरूर नियमित रूप से लहसुन खाइए। विशेषकर ठंड के मौसम में यह कई रोगों से हमें निजात दिलाता है। 10-20 ग्राम लहसुन की कलियां शहद के साथ सुबह-शाम खाने से सेक्स पावर बढ़ जाता है। महिलाएं यदि इसका सेवन करें तो गर्भाशय को मजबूती मिलती है। लहसुन का सेवन करने वालों को टीबी रोग नहीं होता। लहसुन एक शानदार कीटाणुनाशक है, यह एंटीबायोटिक दवाइयों का अच्छा विकल्प है।

औषधि से कम नहीं प्याज
प्याज का इस्तेमाल लगभग हर भारतीय घर में होता है। प्याज स्वाद के लिए ही नहीं, सेहत के लिए भी

उपयोगी है। प्याज खाने से काम शक्तिकी कमी,
दुर्बलता, हस्तमैथुन आदि रोग दूर होते हैं। एक चम्मच शहद और एक चम्मच ताजा प्याज का रस मिलाकर पीने से कामभाव में जादू-सा असर होता है। प्याज में विटामिन ए, बी और सी होता है। यह फोलिक एसिड, कैल्शियम, फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, क्रोमियम, आयरन और फाइबर का अच्छा स्रोत है।


दूध में मिलाकर पिएं छुहारा
छुहारे में ऐसे गुण हैं, जिसे खाने से सेक्स पावर बढ़ जाता है। वीर्य का अभाव होने पर छुहारे को दूध में उबालकर सेवन करने से वीर्य बढ़ता है और शारीरिक ताकत बढ़ती है। इसके अलावा छुहारे शारीरिक कमजोरी दूर करने में मददगार है। छुहारे एक गिलास दूध में उबाल कर ठंडा कर लें। सुबह या रात को सोते समय, गुठली अलग कर दें और छुहारें को खूब चबा-चबाकर खाएं और दूध पी जाएं। लगातार 3-4 माह सेवन करने से शरीर का दुबलापन दूर होता है, चेहरा भर जाता है। सुंदरता बढ़ती है, बाल लंबे और घने होते हैं।

दिमागी ताकत बढ़ाए बादाम
स्वाद से भरपूर बादाम न सिर्फ स्वादिष्ट है, बल्कि यह आपके दिमाग को तेज भी करता है। बादाम खाने से इंसान के बल और वीर्य में बढ़ोतरी होती है। यदि किसी व्यक्ति को नपुंसकता की शिकायत हो तो वह प्रतिदिन 10-20 ग्राम बादाम दूध के साथ सेवन करे। इससे मस्तिष्क और हृदय में बढिय़ा तरीके से रक्तसंचार होता है। बादाम में प्रोटीन और पोटेशियम होने से यह हार्ट के लिए भी फायदेमंद है। बादाम को रात में भिगो कर सुबह में खाली पेट खाना लाभकारी है। इतना ही नही, गर्भवती महिलाओं के लिए यह किसी खजाने से कम नही है। बादाम के इन गुणों के कारण कोलोन कैंसर को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है।

लाख दवा की एक दवा : दाल-चीनी
भारत में सदियों से दालचीनी और शहद के मिश्रण का इस्तेमाल होता चला आ रहा है। हकीम और वैद्य तो इसे लाख दवाओं की एक दवा बताते हैं। दाल-चीनी में चमत्कारी औषधीय गुण पाए जाते हैं। प्रोटीन, फैट, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, फॉस्फोरस, लोहा, विटामिन बी-सी आदि पाए जाते हैं। रात को सोते समय दाल-चीनी का चूर्ण 4 ग्राम की मात्रा में शहद के साथ दूध पीने से वीर्य बढ़ता है। दालचीनी का 2-3 बूंद तेल एक कप पानी में मिलाकर पीने से इन्फ्लूएंजा, आंत्रशूल, हिचकी, उल्टी आदि में खूब फायदेमंद है। े

वेब स्पेस टेलिस्कोप से जानेंगे ब्रह्मांड का रहस्य





- राजकुमार सोनी



ब्रह्मांड का रहस्य जानने के लिए खगोलविद करोड़ों डालर की दूरबीन वेब स्पेस टेलिस्कोप अंतरिक्ष में भेजेंगे। इससे बिग-बैंग के पश्चात ब्रह्माण्ड में बनी सबसे पहली आकाशगंगा, तारे की खोज , आकाशगंगाओं का गठन व विकास, ग्रहीय प्रणालियों को समझना एवं जीवन की उत्पत्ति का अध्ययन किया जाएगा। इसी पर आधारित है आज की कवर स्टोरी।



आज तक अंतरिक्ष में इतनी उन्नत किस्म की कोई दूरबीन नहीं गई है। नासा ने कहा है कि 2018 में अंतरिक्ष में जाने वाली इसकी प्रस्तावित जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप की कीमत 8.7 अरब अमरीकी डॉलर होगी। यह दूरबीन पांच साल तक काम करेगी। अमेरिकी संसद को अनुमोदन के लिए भेजा गया है। यह नया अनुमान पिछले अनुमानों से करीब दो अरब डॉलर जयादा है। जेम्स वेब को अंतरिक्ष में मौजूद हबल दूरबीन के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा है। इस दूरबीन से सृष्टि में मौजूद सबसे पहले तारों के प्रकाश की तस्वीरें खींचने में भी मदद मिलेगी।

देरी से संकट
हालांकि लगातार हो रही देरी और बढ़ती क़ीमत की वजह से यह अभियान संकट में है और कई राजनेता इस अभियान को बंद कर देना चाहते हैं। अमेरिकी संसद के एक सदन की एक समिति ने 2012 के बजट में इस अभियान को बंद कर देने की सिफारिश की है, जबकि दूसरे सदन ने इस बारे में अपना कोई मत नहीं दिया है। नासा खुद इस अभियान की जोरदार वकालत करता है और इसे अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक बताता है। आज तक अंतरिक्ष में इतनी उन्नत किस्म की कोई दूरबीन नहीं गई है।

छिड़ी गई है बहस
जेम्स वेब को अंतरिक्ष में मौजूद हबल दूरबीन के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा है। इन तमाम विवादों के अलावा इस बात पर भी बहस हो रही है कि किस तरह से इतनी बड़ी दूरबीन को अंतरिक्ष में सुरक्षित पहुंचाया जाएगा। इस दूरबीन की कीमत के अलावा इसको अंतरिक्ष में छोड़े जाने की तिथि भी आगे ही बढ़ती ही जा रही है। कुछ जानकार मानते हैं कि यह दूरबीन 2020 के पहले अंतरिक्ष में नहीं जा सकती। लेकिन नासा अपने पूरे अभियान की खुली समीक्षा के लिए तैयार है। इसके अलावा अमेरिका के लिए इस अभियान को रद्द करना अंतरराष्ट्रीय कारणों से भी मुश्किल होगा। इस अभियान में यूरोप और कनाडा भी शामिल हैं। उदाहरण के तौर पर यूरोप इस अभियान के लिए चार महत्वपूर्ण पुर्जे दे रहा है, बदले में इसके खगोलशास्त्रियों को इस दूरबीन के इस्तेमाल का 15 फीसदी समय मिलेगा।

जेम्स वेब खगोलीय दूरदर्शी
जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरदर्शी एक प्रकार की अवरक्त अंतरिक्ष वेधशाला है । यह हबल अंतरिक्ष दूरदर्शी का वैज्ञानिक उत्तराधिकारी और आधुनिक पीढ़ी का दूरदर्शी है, जिसे जून 2014 में एरियन 5 राकेट से प्रक्षेपित किया जाएगा। इसका मुख्य कार्य ब्रह्मांड के उन सुदूर निकायों का अवलोकन करना है जो पृथ्वी पर स्थित वेधशालाओं और हबल दूरदर्शी के पहुंच के बाहर है । जेडब्ल्यूएसटी, नासा और यूनाइटेड स्टेट स्पेस एजेंसी की एक परियोजना है जिसे यूरोपियन स्पेस एजेंसी, केनेडियन स्पेस एजेंसी और पंद्रह अन्य देशों का अन्तरराष्ट्रीय सहयोग प्राप्त है । इसका असली नाम अगली पीढ़ी का अंतरिक्ष दूरदर्शी एनजीएसटी था, जिसका सन 2002 में नासा के द्वितीय प्रशासक जेम्स एडविन वेब ( 1906-1992 ) के नाम पर दोबारा नामकरण किया गया । जेम्स एडविन वेब ने केनेडी से लेकर जोंनसन प्रशासन काल ( 1961-68 ) तक नासा का नेतृत्व किया था। उनकी देखरेख में नासा ने कई महत्वपूर्ण प्रक्षेपण किए , जिसमे जेमिनी कार्यक्रम के अंतर्गत बुध के सारे प्रक्षेपण एवं प्रथम मानव युक्त अपोलो उड़ान शामिल है ।

स्थापित होगा अंतरिक्ष में
जेडब्ल्यूएसटी जब अंतरिक्ष में स्थापित किया जाएगा तो उसकी कक्षा पृथ्वी से परे पंद्रह लाख किलोमीटर दूर लग्रांज बिन्दु एल ड्ब्ल्यू पर होगी अर्थात पृथ्वी की स्थिति हमेशा सूर्य और एल ड्ब्ल्य बिंदु के बीच बनी रहेगी । चूंकि एलडब्ल्यू बिंदु में स्थित वस्तुएं हमेंशा पृथ्वी की आड़ में सूर्य की परिक्रमा करती है इसलिए जेडब्ल्यूएसटी को केवल एक विकिरण कवच की जरुरत होगी जो दूरदर्शी और पृथ्वी के बीच लगी होगी । यह विकिरण कवच सूर्य से आने वाली गर्मी और प्रकाश से तथा कुछ मात्रा में पृथ्वी से आने वाली अवरक्त विकिरणों से दूरदर्शी की रक्षा करेगी। एलडब्ल्यू बिंदु के आसपास स्थित जेडब्ल्यूएसटी की कक्षा की त्रिया बहुत अधिक (8 लाख किमी) है , जिस कारण पृथ्वी के किसी भी हिस्से की छाया इस पर नहीं पड़ेगी । सूर्य की अपेक्षा पृथ्वी से काफी करीब होने के बावजूद जेडब्ल्यूएसटी पर कोई ग्रहण नहीं लगेगा ।

नासा का मिशन
नासा के गोडार्ड में प्रदर्शन के लिए रखा वेब टेलिस्कोप का एक मॉडल है। इस मॉडल का आकर वही है जो वेब टेलिस्कोप का वास्तविक आकार है। जेडब्ल्यूएसटी प्राथमिक वैज्ञानिक मिशन के मुख्य चार घटक है । पहला , बिग-बैंग के पश्चात ब्रह्माण्ड में बनी सबसे पहली आकाशगंगा और सबसे पहले बने तारे की खोज करना । दूसरा , आकाशगंगाओं का गठन और उनके विकास का अध्ययन करना । तीसरा , तारों का गठन और ग्रहीय प्रणालीयों को समझना तथा चौथा , जीवन की उत्पत्ति और ग्रहीय प्रणालीयों का अध्ययन करना । इन सभी कार्यों का विश्लेषण दृश्य प्रकाश की अपेक्षा अवरक्त प्रकाश में अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है । यही कारण है कि जेडब्ल्यूएसटी के उपकरण हबल टेलिस्कोप की तरह दृश्य या पराबैंगनी उपाय वाले नहीं होंगे बल्कि इसमें बड़ी मात्रा में अवरक्त प्रकाश को इक_ा करने की क्षमता होगी । जेडब्ल्यूएसटी की वर्तमान डिजाइन इस प्रकार बनाई गई है कि यह 0.6 ( नारंगी प्रकाश ) से लेकर 28 माइक्रोमीटर की गहरी अवरक्त विकिरण विस्तार की तरंगादैध्र्यों का आसानी से पता लगा लेगी।यह हबल अंतरिक्ष दूरदर्शी का वैज्ञानिक उत्तराधिकारी और आधुनिक पीढ़ी का दूरदर्शी है , जिसे जून 2014 में एरियन 5 राकेट से प्रक्षेपित किया जाएगा। इसका मुख्य कार्य ब्रह्माण्ड के उन सुदूर निकायों का अवलोकन करना है जो पृथ्वी पर स्थित वेधशालाओं और हबल दूरदर्शी के पहुंच के बाहर है ।

हबल के प्राथमिक दर्पण के साथ तुलना
निर्माण के दौरान मुख्य दर्पण का परीक्षण किया जा रहा है। जेडब्ल्यूएसटी का मुख्य दर्पण बेरिलियम धातु पर सोने की कोटिंग कर बनाया गया है । यह षटकोण आकार के 18 खंडों से मिलकर बना है जो एक केंद्र के चारों ओर दो वलयों में व्यवस्थित है। प्रत्येक खंड का व्यास 1.3 मीटर और वजन लगभग 20 किलो है । जेम्स वेब टेलिस्कोप के विज्ञान लक्ष्यों में से एक है समय धारा में पीछे की ओर जाकर उस समय को देखना जब आकाशगंगाएं युवावस्था में थी। वेब यह कार्य सुदूर स्थित उन आकाशगंगाओं के निरीक्षण से करेगा जो हमसे 13 अरब प्रकाशवर्ष दूर है। इस तरह की दूर स्थित बेजान वस्तुओं को देखने के लिए वेब को एक बड़े दर्पण की जरुरत होगी। दर्पण का क्षेत्रफल जितना अधिक होगा वह उतना ही अधिक प्रकाश इकट्ठा कर सकेगा और निरीक्षित वस्तु उतनी ही अधिक बारीकी से देखी जा सकेगी। यदि हबल टेलिस्कोप के 2.4 मीटर दर्पण का आकार बढ़ाकर वेब की आवश्यकताओं के अनुकूल बना दिया जाए तो इतने बड़े और वजनी दर्पण को बनाना और उसको अंतरिक्ष में स्थापित करना अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण कार्य होगा । इससे पहले अंतरिक्ष में इतना बड़ा दर्पण कभी नहीं ले जाया गया है । इस समस्या के हल के लिए वेब दल ने एक नया रास्ता खोजा । उन्होंने एक ऐसा दर्पण बनाने का निश्चय किया जो वजन में हल्का हो और बहुत मजबूत भी हो। आखिरकार उन्होंने दर्पण को बेरिलियम धातु से बनाने का निर्णय लिया ।

बेरिलयम तापमान को रखेगी स्थिर
बेरिलियम एक हल्की धातु है और यह अपने वजन के हिसाब से बहुत मजबूत होती है। इसमे ऐसे अनेक गुण है जो वेब के मुख्य दर्पण की आवश्यकताओं को पूरा करता है। बेरिलियम विभिन्न तापमानों में भी अपने आकार को स्थिर बनाएं रखने में सक्षम है। यह विद्युत और ताप का अच्छा सुचालक है और इसमे चुम्बकीय गुण भी नहीं पाया जाता है । इतने बड़े दर्पण को प्रक्षेपण यान के अंदर रखना भी अपने आप में एक समस्या है । इतना बड़ा दर्पण यान में समा नहीं सकता और प्रकाशिकी इसके आकार को छोटा करने की इजाजत नहीं देता । इस समस्या के हल के लिए वेब दल ने दर्पण को ऐसे कई खण्डों में बनाने का निर्णय लिया जिसे फोल्ड कर इसका आकार इतना छोटा किया जा सके की यह यान में आसानी से समा जाए । वेब दूरदर्शी को उसकी कक्षा में स्थापित करने के बाद दर्पण को खोल दिया जाएगा जिससे यह अपना पूर्व आकार प्राप्त कर लेगा ।

हबल अंतरिक्ष दूरदर्शी
हबल अंतरिक्ष दूरदर्शी वास्तव में एक खगोलीय दूरदर्शी है जो अंतरिक्ष में कृत्रिम उपग्रह के रूप में स्थित है, इसे 25 अप्रैल 1990 में अमेरिकी अंतरिक्ष यान डिस्कवरी की मदद से इसकी कक्षा में स्थापित किया गया था। हबल दूरदर्शी को अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी (नासा) ने यूरोपियन अंतरिक्ष एजेंसी के सहयोग से तैयार किया था। अमेरिकी खगोलविज्ञानी एडविन पोंवेल हबल के नाम पर इसे (हबल) नाम दिया गया। यह नासा की प्रमुख वेधशालाओं में से एक है । वर्ष 1990 में इसे लांच करने के बाद वैज्ञानिकों ने पाया कि इसके मुख्य दर्पण में कुछ खामी रह गई , जिससे यह पूरी क्षमता के साथ काम नहीं कर पा रहा है । वर्ष 1993 में इसके पहले सर्विसिंग मिशन पर भेजे गए वैज्ञानिकों ने इस खामी को दूर किया। यह एक मात्र दूरदर्शी है , जिसे अंतरिक्ष में ही सर्विसिंग के हिसाब से डिजाइन किया गया है । वर्ष 2009 में संपन्न पिछले सर्विसिंग मिशन के बाद उम्मीद है कि यह वर्ष 2014 तक काम करता रहेगा , जिसके बाद जेम्स वेब खगोलीय दूरदर्शी को लांच करने कि योजना है
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अंतरिक्ष में दूरबीन
हबल दूरबीन ने खगोल विज्ञान में क्रांतिकारी परिवर्तन लाते हुए ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ को बदल डाला है। सृष्टि के आरंभ और उम्र के बारे में हबल ने अनेक नए तथ्यों से हमें अवगत कराया है। इसकी नवीनतम उपलब्धि ब्रह्मांड की उम्र के बारे में सबूत जुटाने की है। हबल के सहारे खगोलविदों की एक टोली ने ।000 प्रकाश वर्ष दूर ऊर्जाहीन अवस्था की ओर बढ़ते प्राचीनतम माने जाने वाले तारों के एक समूह को खोज निकाला है। इन तारों के बुझते जाने की रफ्तार के आधार पर ब्रह्मांड की उम्र 13 से 14 अरब वर्ष के बीच आँकी गई है। इसके अतिरिक्त पिछले 12 वर्षों के दौरान इस दूरबीन ने सुदूरवर्ती अंतरिक्षीय पिंडों के हजाारों आकर्षक चित्र भी उपलब्ध कराए हैं।

दूरबीनों की शुरुआत
करीब सौ साल पहले अमरीका में खगोलविदों ने रिफलेक्टरों पर आधारित विशाल दूरबीनों का निर्माण आरंभ किया। उन दूरबीनों में से एक का माउंट विल्सन रिफ्लेक्टर 100 ईंच आकार का था, जिसे उस समय की सबसे बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धियों में से माना जा रहा था। उस विशाल दूरबीन को एडविन हबल नामक खगोलविद ने स्थापित किया था, जिनके सम्मान में पहली अंतरिक्ष दूरबीन को हबल दूरबीन कहा गया। अपनी दूरबीन के सहारे एडविन हबल ने साबित किया कि ब्रह्मांड का लगातार फैलाव हो रहा है। उनकी इस खोज को खगोल विज्ञान में हबल के नियम के नाम से जाना जाता है।
बाद में ब्रह्मांड की उम्र जानने की जिज्ञासा ने खगोलविदों को और बड़ी दूरबीनों के निर्माण के लिए प्रेरित किया और 200 ईंच आकार की रिफ्लेक्टर युक्त दूरबीनें भी बनीं।
लेकिन उन्हें एक ऐसी दूरबीन चाहिए थी जो धरती के वायुमंडल के व्यवधानों से अप्रभावित रहा और इस तरह अंतरिक्ष दूरबीन की बात सामने आई। लेकिन खगोलविदों का यह सपना 1990 में साकार हो सका, जब डिस्कवरी शटल ने हबल दूरबीन को अंतरिक्ष में पहुंचाया गया।

खगोलविदों का सपना साकार
खगोलविद एडविन हबल के सपनों को साकार करने वाली इस दूरबीन पर अमरीका में 1990 के दशक में ही काम शुरू हो चुका था। हबल दूरबीन की नियमित सर्विसिंग की व्यवस्था की गई है। बाल्टिमोर, अमरीका के स्पेस टेलीस्कोप साइंस इंस्टीट्यूट में हबल दूरबीन का विकास किया गया। अमेरिकी अंतरिक्ष शटल चैलेंजर की दुर्घटना के बाद कुछ वर्षों के लिए थमे अंतरिक्ष ट्रैफिक ने हबल परियोजना को बाधित किया। हबल अंतरिक्ष दूरबीन के कहीं विशाल आकार की परिकल्पना की गई थी, लेकिन अंतत: यह मात्र 96 ईंच आकार की परावर्तक सतह वाली दूरबीन साबित हुई। लेकिन वायुमंडल से दूर अंतरिक्ष में होने के कारण हबल दूरबीन धरती पर उपलब्ध कहीं बड़ी दूरबीनों ज्यादा प्रभावी साबित हो रही है। हबल दूरबीन की आयु 21 वर्ष आंकी गई है, यानि हमें वर्ष 2011 तक इसकी सेवा उपलब्ध रहना लगभग तय है। इसकी नियमित रूप से सर्विसिंग की जाती रही है। इसके लिए अमेरिकी अंतरिक्ष संस्था नासा के अंतरिक्ष यानों के सहारे अंतरिक्षयात्रियों को हबल तक पहुंचाया जाता है। इसकी धुंधली पड़ गई परावर्तक सतह को 1993 में बदला गया तथा वर्ष 2004 में इसकी एक बार फिर पूरी सर्विसिंग की गई थी।

ढाई अरब डालर खर्च
नासा ने हबल दूरबीन को अंतरिक्ष में स्थापित करने में करीब ढाई अरब डॉलर खर्च किए हैं। इसकी एक सर्विसिंग पर लगभग 50 करोड़ डॉलर की लागत आती है। धरती की सतह से 600 किलोमीटर ऊपर चक्कर लगा रही हबल 11 टन वजन की है। धरती का एक चक्कर लगाने में इस करीब 100 मिनट लगते हैं। इसकी लंबाई 13.2 मीटर और अधिकतम व्यास 4.2 मीटर है। हबल दूरबीन प्रतिदिन 10 से 15 गिगाबाइट आंकड़े जुटाती है। इसके द्वारा गए आंकड़ों के आधार पर 3000 से ज़्यादा अनुसंधान रिपोर्ट प्रकाशित किए जा चुके हैं।

वैज्ञानिकों ने खोजीं गैलेक्सियां
खगोल वैज्ञानिकों ने देश काल की सीमाओं से परे जाकर आदिम समय की आकाशगंगाओं का पता लगाया है। ये करीब 13 अरब साल पुरानी अल्ट्रा ब्लू गैलेक्सीज हैं, जो बिग बैंग यानी महाविस्फोट के 10 करोड़ साल बाद बनीं थीं। ये तीन छोटी और नीले रंग की चमकती हुई आकाशगंगाएं हमसे इतनी दूर हैं कि इनका प्रकाश हम तक पहुंचने में ही 13 अरब साल लगते हैं। जिस समय की ये आकाशगंगाएं हैं, उस समय ब्रह्मांड अपने आज के वजूद का सिर्फ 4 फीसदी ही था। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफॉर्निया के खगोलविदों ने नासा के हबल टेलिस्कोप की मदद से इन गैलेक्सियों को कैद किया है, जिन्हें पहले कभी नहीं देखा गया था। इस तरह सुदूर अंतरिक्ष की दूरीगत सीमा को तोड़ा गया है। ये गैलेक्सीज शुरुआती तारों, आकाशगंगाओं के निर्माण और उनके विकास संबंधी घटनाओं के बीच रिश्तों को समझने के लिए काफी अहम हैं। इसी के नतीजे में आज के ब्रह्मांड में हमारी मंदाकिनी (मिल्की वे) आकाशगंगा के साथ-साथ अन्य दीर्घ वृत्ताकार और सर्पिलाकार आकाशगंगाएं वजूद में आईं। हबल अल्ट्रा डीप फील्ड 2009 नाम की टीम ने इन आकाशगंगाओं की उम्र, आकार और द्रव्यमान का पता लगाने के लिए हबल से मिले आंकड़ों को नासा के स्पिटजर टेलिस्कोप से मिले आंकड़ों से मिलाया। पता चला कि इनका द्रव्यमान अपनी मिल्की वे का महज 1 प्रतिशत है। यह भी पता चला कि ये आकाशगंगाएं बिग बैंग के 10 करोड़ साल बाद आस्तित्व में आईं। इसका मतलब यह है कि इनमें तारों का निर्माण दसियों लाख साल पहले से शुरू हो गया होगा। डब्ल्यूएफसी-3 कैमरे की मदद से इन आकाशगंगाओं को खोजा गया। खोजी टीम की सदस्य मार्सिला कार्लो कहती हैं कि ये अरबों साल पुरानी गैलेक्सियां आज की मिल्की वे जैसी आकाशगंगाओं के लिए बिल्डिंग ब्लॉक के रूप में रही होंगी।
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ऐसे चित्र लेती है वेधशाला
आपने ब्रह्मांडीय पिंडो की खूबसूरत तस्वीरें देखी होंगी। इन अदभुत,विहंगम,नयानाभिराम चित्रों और उनके मनमोहक रंगों, आकृतियों को देखकर विश्वास नहीं होता कि ब्रह्माण्ड में रंगों की छटा इस तरह बिखरी पड़ी है। हम जानते हैं कि प्रकाश विभिन्न रंगों के मिश्रण के से बना है। दृश्य प्रकाश अर्थात वह प्रकाश जिसे हमारी आंखें देख सकती हैं या महसूस कर सकती है, वास्तविकता में विद्युत चुंबकीय विकिरण के वर्णक्रम का एक छोटा सा भाग है। इस दृश्य प्रकाश मे भिन्न-भिन्न आवृत्ति वाली तरंगें होती हैं, हमारी आंखें हर आवृत्ति की तरंगों को एक अलग रंग में देखती है। मोटे तौर पर हम उन्हें सात रंग में बांटते हैं जो लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला, बैंगनी हैं। इनमें से लाल रंग की आवृत्ति सबसे कम और बैंगनी रंग की आवृति सबसे ज्यादा होती है। वास्तविकता में रंगों की संख्या अनगिनत है, मानव आंखें भी लाखों रंगों को देखने में समर्थ है।

प्रकाश के रंग और विद्युत चुंबकीय विकिरण
दृश्य प्रकाश के रंग
लाल और बैगनी रंग के मध्य के सभी रंग। इन्हें हम देख सकते हंै। इन रंगों के लांखों शेड हैं लेकिन मूल रूप से तीन ही रंग माने गए हैं- लाल, हरा और नीला।
दृश्य प्रकाश बाह्य रंग
इन्हें हम देख नहीं सकते। जब हम इन्हें देख नहीं सकते तो हमें पता कैसे चलेगा कि इनका आस्तित्व है ? एक तरीका फोटोग्राफीक प्लेट का है, जिसमें किसी भी विकिरण के पडऩे पर वह भाग काला हो जाता है। एक्स रे तस्वीर तो आपने देखी ही होगी। एक्स रे मानव आंखों की क्षमता के बाहर है साथ ही अधिक मात्रा में यह हानिकारक भी है। दूसरा तरीका है कि, अदृश्य प्रकाश की एक विशेष आवृत्ति को लिए दृश्य प्रकाश के एक रंग से बदल दिया जाए। इससे जो चित्र बनेगा वह वास्तविक तो नहीं होगा लेकिन हमारे अध्ययन के लिए पर्याप्त होगा जैसे एक्स रे चित्र में बताया जाता है। किसी काले-सफेद कैमरे से लिए गये चित्र मे भी विभिन्न रंगों को काले और सफेद के मध्य के विभिन्न शेडो से बदल दिया जाता है।
हब्बल अंतरिक्ष वेधशाला से चित्र लेना किसी साधारण रंगीन कैमरे से चित्र लेने से कंही ज्यादा जटिल है। हब्बल रंगीन फिल्म का प्रयोग नही करता है। तथ्य यह है कि हब्बल फिल्म का प्रयोग ही नही करता है। इसके कैमरे ब्रह्माण्ड के प्रकाश को अपने विभिन्न इलेक्ट्रानिक उपकरणो के प्रयोग से दर्ज करते है। ये इलेक्ट्रानिक उपकरण इन ब्रह्माण्डीय चित्रों को रंगीन की बजाये काले-सफेद के मध्य के शेडो मे बनाते है। अंतिम रंगीन चित्र वास्तविकता मे दो या दो से ज्यादा श्वेत-श्याम चित्रों के मिश्रण से निर्मित होते हंै, जिनमें चित्र के संसाधन के दौरान रंग जोड़े जाते है।

चित्रों को किया जाता है निर्धारित
हब्बल के चित्रो के रंग को विभिन्न कारणों से निर्धारित किया जाता है। कुछ स्थितियों में ये चित्र किसी अंतरिक्ष यान की यात्रा से देखी गई छवि से भिन्न हो सकते हैं। ऐसा इसलिए है कि हम रंगों को उस पिंड की विभिन्न विशेषताओं को उभार कर दिखाने के लिए एक उपकरण की तरह प्रयोग करते हैं क्योंकि मानव आंखें सभी रंगों को देख पाने या उनमे अंतर कर पाने मे असमर्थ होती है। एक साधारण चित्र मे हब्बल लाल, हरे और निले फिल्टरो मे से एक समय मे एक फिल्टर का प्रयोग कर तीन श्वेत श्याम चित्र लेता है। इसके बाद दृश्य चित्र अर्थात आंखो से दिखायी देने वाले दृश्य के निर्माण के लिए इन श्वेत श्याम चित्रो मे रंगो का निर्धारण होता है। लाल फिल्टर से लिए गये चित्र मे लाल रंग दिया जाता है, हरे फिल्टर के वाले चित्र लिये हरा, निले फिल्टर वाले चित्र के लिए निला। अंत मे इन तीनो चित्रो के मिश्रण से अंतिम चित्र बनता है। यह चित्र उस पिंड की वास्तविक दृश्य छवी के समीप होता है।
चित्रों में रंगों का प्रयोग
हब्बल के चित्रो मे रंगो का प्रयोग ब्रह्माण्डीय पिंडों के विशिष्ट गुणधर्मों को उभारने के लिए भी किया जाता है। इन रंगों को विभिन्न श्वेत श्याम चित्रों में जोड़ा जाता है जिनके मिश्रण से अंतिम चित्र बनता है। मौलिक श्वेत-श्याम चित्रों से रंगीन चित्रो का निर्माण विज्ञान के अतिरिक्त कला का प्रयोग है।

ये होते हैं कार्य
यदि हमारी आंखें हब्बल दूरबीन के जैसे शक्तिशाली हो तो कोई अंतरिक्ष पिंड कैसे दिखेगा। किसी ब्रह्मांडीय पिंड के उन गुणधर्मो को देखना जिसे मानव आंखों से देखा नहीं जा सकता। किसी पिंड की परिष्कृत छवि का निर्माण किसी पिंड के चित्र को संसाधित करते समय मुख्यत: तीन तरह से रंगों का चयन किया जाता है।
प्राकृतिक रंग
इन रंगो का चयन मानव आंखो को ध्यान मे रख कर किया जाता है। इन रंगों के चयन से निर्मित अंतिम छवि, उस पिंड पर अंतरिक्ष यान द्वारा यात्रा कर आंखों देखी छवि के करीब होती है।
प्रतिनिधि रंग
इस विधि में रंगों का चयन मानव आंखों द्वारा न देखे जा सकने वाले गुणों के चित्रण के लिए किया जाता है। जैसे अवरक्त किरणों से प्राप्त छवि उस पिंड के विभिन्न भागों के तापमान को दर्शाती है। यह छवि वास्तविक छवि से भिन्न होती है। इसे छद्म रंग छवि भी कहते हैं। श्वेत श्याम चित्र या एक्स रे छवि इसका एक उदाहरण है। मौसम समाचारों में पृथ्वी के विभिन्न भागों में तापमान का अंतर दर्शाने इसी का प्रयोग किया जाता है।
उन्नत रंग
किसी पिंड की संरचना दर्शाने के लिए इस विधि का प्रयोग किया जाता है। रंगो का चयन इस तरह से किया जाता है कि कुछ विशिष्ट गुण उभर कर दिखें।


तो खत्म हो जाएगा हबल टेलीस्कोप
यदि अमेरिकी अधिकारियों की चली तो हर्बल टेलीस्कोप भी डिस्कवरी यान की तरह रिटायर (खत्म) हो जाएगा। हर्बल के भविष्य को लेकर हाल ही में यूएस लॉमेकर्स के बीच सर्वे कराया गया। इनमें से अधिकांश अधिकारियों ने हर्बल को नष्ट करने का समर्थन किया। वजह बताई जा रही है इस पर आ रही लागत। हालांकि हबल मिशन को खत्म करने की प्रक्रिया लंबी चलेगी। पहले इसे सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रजेंटिव में पास कराना होगा। फिर राष्ट्रपति बराक ओबामा की मुहर लगने के बाद ही इसे अंतिम रूप दिया जाएगा। धरती की सतह से 600 किलोमीटर ऊपर चक्कर लगा रही हबल दूरबीन का वजन 11 टन है। धरती का एक चक्कर लगाने में इसे करीब 100 मिनट लगते हैं। इसकी लंबाई 13.2 मीटर और अधिकतम व्यास 4.2 मीटर है। नासा ने हबल दूरबीन को अंतरिक्ष में स्थापित करने में करीब 2.5 अरब डॉलर खर्च किए। इसकी एक सर्विसिंग पर लगभग 50 करोड़ डॉलर की लागत आती है। नासा का हबल टेलीस्कोप को खगोल विज्ञान में क्रांति लाने का श्रेय जाता है। संयोग देखिए कि अमेरिका का सबसे पुराना और सबसे अधिक यात्रा करने वाला अंतरिक्ष यान डिस्कवरी हाल ही में रिटायर हुआ है। डिस्कवरी ने ही हबल को अंतरिक्ष में स्थापित किया था।
हबल की उपलब्धियां
-हबल ने जो डाटा भेजे हैं उनके आधार पर 3000 से ज़्यादा अनुसंधान रिपोर्ट अब तक प्रकाशित हो चुकी है।
-इसके द्वारा भेजे गए चित्र से ही ब्रह्मांड की वास्तविक आयु (13 अरब साल) का पता चला।



शनिवार, 27 अगस्त 2011

कोई घूस मांगे तो गिफ्ट करें अन्ना टोपीः किरन बेदी



नई दिल्ली।। टीम अन्ना की सदस्य किरण बेदी ने रामलीला मैदान में आए अन्ना समर्थकों से कहा है कि आप हमेशा अन्ना टोपी साथ रखें और कोई आपसे घूस मांगे तो उसे यह गिफ्ट करें। उन्होंने कहा कि अन्ना टोपी को आइडेंटिटी कार्ड बना लेना चाहिए। उन्होंने समर्थकों को हिदायत दी कि अन्ना टोपी पहनकर दादागीरी मत करना। अगर यह टोपी पहनते हो तो हमेशा अन्नागीरी करो।

उन्होने रामलीला मैदान में मौजूद अन्ना समर्थकों से कहा कि आप यहां से संकल्प लेकर जाएं कि निजी जीवन में किसी तरह के भ्रष्टाचार में शामिल नहीं होंगे। उन्होंने कहा कि आप न घूस देंगे और न घूस लेंगे और अगर कोई रिश्वत मांगे तो आप उसे अन्ना टोपी गिफ्ट करें और उसे अन्नागीरी की सीख दें। उन्होंने कहा कि आप अन्ना अन्ना की टोपी को हमेशा अपने बैग में रखें और कहीं भी अन्याय हो तो वहां आप अन्नाय करनेवाले को अन्ना की टोपी गिफ्ट करें।

उन्होंने यह भी कहा कि आप दफ्तर में जाएं और वहां आपको ईमानदार अफसर मिले और आपका काम जल्दी कर दे तो उसको भी अन्ना की टोपी गिफ्ट करें और कहें मैं भी अन्ना तू भी अन्ना। इस तरह से आप ईमानदार अफसरों का मनोबल बढ़ा सकते हैं।

अन्ना की अगस्त क्रांति की जीत




रविवार सुबह 10 बजे अनशन तोड़ेंगे अन्ना

नई दिल्ली।। सरकार अन्ना की शर्तों पर वोटिंग कराने के लिए तैयार हो गई है। संसद में प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित होगा। इस मामले पर प्रधानमंत्री के कमरे में महत्वपूर्ण बैठक हुई और इसके बाद यह फैसला लिया गया। टाइम्स नाउ के अनुसार टीम अन्ना को सरकार का यह फैसला मंजूर है। हालांकि सूत्रों ने जानकारी दी है कि अन्ना का अनशन आज नहीं टूटेगा। अन्ना रविवार सुबह 10 बजे अनशन तोड़ेंगे। कुछ ही देर में वोटिंग होगी। पहले राज्य सभा में प्रस्ताव पास होगा उसके बाद लोकसभा में आएगा। ध्वनिमत में एक-एक सांसद को अलग से वोट नहीं देना पड़ता है बल्कि मौखिक तौर पर हां और ना में सामूहिक वोटिंग हो जाती है।

आज नहीं टूटेगा अन्ना का अनशन
टीम अन्ना से जुड़े सूत्रों ने जानकारी दी है कि अन्ना का अनशन आज नहीं टूटेगा। सूत्रों का कहना है कि अन्ना रविवार सुबह 10 बजे अनशन तोड़ेंगे। ऐसा कहा जाता है कि आयुर्वेद के मुताबिक रात में अनशन तोड़ना सेहत के लिए ठीक नहीं होता।



इससे पहले बीजेपी नेता सुषमा स्वराज ने कहा था कि सरकार लोकपाल पर जो भी प्रस्ताव लाएगी पार्टी दोनों सदनों में उसके पक्ष में वोटिंग करेगी। उन्होंने कहा कि सरकार टीम अन्ना को गुमराह न करे। इसके बाद प्रधानमंत्री के साथ लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी, विधि मंत्री सलमान खुर्शीद और संसदीय कार्यमंत्री पवन बंसल की मीटिंग हुई और मीटिंग के बाद फैसला हुआ।

इससे पहले, अन्ना हजारे के करीबी सहयोगी प्रशांत भूषण ने कहा था कि सरकार की ओर से हमें बताया गया है कि अन्ना की शर्तों पर संसद में जो चर्चा हुई है उस पर ना तो कोई प्रस्ताव आएगा और न ही वोटिंग होगी। उन्होंने कहा था कि सरकार का कहना है कि संसद में नियम 193 के तहत लोकपाल पर बहस हुई है, इसमें वोटिंग का प्रावधान नहीं है।

कुछ शर्तों के साथ कांग्रेस भी राजी

नई दिल्ली।। लोकसभा में लोकपाल पर बहस की शुरुआत करते हुए सदन के नेता प्रणव मुखर्जी ने अन्ना हजारे की टीम के साथ हुई कोशिशों का जिक्र तो किया लेकिन सरकार का रुख साफ नहीं किया। उन्होंने उलटे सदन के पाले में गेंद डालते हुए सदस्यों से अपील की कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र आज चौराहे पर खड़ा है, आप जो भी निर्णय करे वह संसद की गरिमा और सर्वोच्चता का ध्यान रखते हुए संविधान के दायरे में हो।


डीएमके के टीकेएस इलनगोवन ने कहा कि उनकी पार्टी राज्यों को स्वायत्तता के पक्ष में है इसलिए लोकायुक्तों के गठन का फैसला राज्यों पर छोड़ा जाए। निचले स्तर के अधिकारियों को भी लोकपाल के दायरे में लाने से लंबित मामलों का बोझ बढ़ेगा। हालांकि, उन्होंने मांग की कि लोकपाल को उच्च अधिकारियों को अन्य कर्मचारियों पर कार्रवाई करने का निर्देश देने का अधिकार दिया जा सकता है।

सिटीजन चार्टर के मुद्दे पर इलनगोवन ने कहा कि पूरी तरह उचित जांच के बाद ही सजा का अधिकार मिले। उन्होंने प्रधानमंत्री समेत सभी राजनीतिक कार्यालयों को भी लोकपाल के दायरे में लाने की डीएमके की मांग दोहराई।

सीपीएम के वासुदेव आचार्य ने प्रभावी, मजबूत और विश्वसनीय लोकपाल के गठन की मांग करते हुए कहा कि सरकार द्वारा पेश विधेयक कमजोर है। उन्होंने लोकपाल के साथ चुनाव में धन के दुरुपयोग को रोकने की प्रणाली, न्यायिक आयोग की जरूरत, कर प्रणाली में सुधार की जरूरत और प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने की मांग की।

हालांकि, उन्होंने एक ही विधेयक के जरिये केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्तों की नियुक्त पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इससे संघीय ढांचे को नुकसान होगा। निचले स्तर की नौकरशाही को उन्होंने सतर्कता विभाग के अधीन ही रहने की मांग करते हुए कहा कि उसे लोकपाल, लोकायुक्तों को निगरानी का अधिकार होना चाहिए। सिटीजन चार्टर के मुद्दे पर उन्होंने जनता की शिकायतों के लिए अलग तंत्र का सुझाव दिया।

बीजेडी के भृतुहरि महताब ने न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में नहीं लाने का सुझाव देते हुए न्यायिक जवाबदेही कानून जल्द से जल्द लाने की मांग की। उन्होंने सांसदों को लोकपाल के दायरे से अलग रखने की मांग की। उन्होंने भी अन्य सदस्यों की तरह लोकायुक्त का गठन राज्यों के कानूनों के आधार पर किये जाने की वकालत की। उन्होंने सिटीजन चार्टर को समय की जरूरत बताया।


तृणमूल कांग्रेस के सुदीप बंदोपाध्याय ने कहा कि सभी सरकारी कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाने पर उनकी पार्टी को कोई आपत्ति नहीं है और वह राज्यों में लोकायुक्तों के पक्ष में भी हैं लेकिन उसके लिए उन्होंने राज्यों के विशेषाधिकार का जिक्र किया। बंदोपाध्याय ने कहा कि जनता की शिकायत को निपटाने की प्रणाली को भी कुछ संशोधनों के बाद लाया जा सकता है।


जनता दल यूनाइटेड के नेता शरद यादव ने अन्ना की तीनों शर्तों का समर्थन किया लेकिन सवाल उठाया कि क्या पिछड़े-कमजोर वर्ग का भी लोकपाल में कोई स्थान है? यादव ने कहा कि यह आंदोलन नौजवानों को सड़कों पर ले आया, लेकिन सामाजिक बराबरी, बाबा साहब अम्बेडकर और ज्योति बा फुले का नारा रामलीला मैदान में नहीं उठा। उन्होंने सवाल उठाया कि 40 साल में मार्टिन लूथर किंग का आंदोलन रंग लाया पर भारतीय समाज में रंग क्यों नहीं आता। यादव ने टीम अन्ना पर प्रहार करते हुए कहा कि अन्ना जी ने वर्तमान केंद्रीय मंत्री और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रह चुके विलासराव देशमुख के खिलाफ कभी अनशन नहीं किया। किरन बेदी के बारे में उन्होंने कहा कि जिंदगी भर पुलिस में रही हैं, आप हमें बताएंगी कि राजनीति क्या होती है।


समाजवादी पार्टी के रेवती रमण सिंह ने कहा कि आबादी के अनुपात के अनुसार लोकपाल में अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायापालिका के लिए अलग से आयोग बने जो जजों की नियुक्ति से लेकर न्यायपालिका के क्रियाकलापों पर निगाह रखे।

बीएसपी के दारा सिंह चौहान ने भी लोकपाल में अनुसूचित जाति-जनजाति, पिछड़ों और अकलियतों की हिस्सेदारी की मांग की और कहा कि लोकायुक्त बनाने के राज्यों के अधिकार क्षेत्र काअतिक्रमण नहीं किया जाए।

लोकसभा में सदन के नेता प्रणव मुखर्जी के बयान के बाद जब लोकपाल के मुद्दे पर चर्चा शुरू हो रही थी तो लालू ने इस चर्चा के औचित्य पर ही सवाल उठाया और कहा कि जो मामला पहले ही स्थायी समिति के पास है, ऐसे मामले पर चर्चा कर सरकार क्या संसदीय सर्वोच्चता का उल्लंघन नहीं कर रही है?


बहस में भाग लेते हुए कांग्रेस की ओर से संदीप दीक्षित ने मोर्चा संभाला। उन्होंने कुछ शर्तों के साथ अन्ना हजारे की तीनों शर्तों पर सहमति जताई। उन्होंने कहा कि लोकपाल चयन समिति पर सबकी सहमति बने और लोकायुक्त का मॉडल बनाकर राज्यों को दे दिया जाए। उन्होंने कहा कि टीम अन्ना का यह रुख सही है कि निचले स्तर की नौकरशाही के भ्रष्टाचार से आम आदमी को सबसे ज्यादा भुगतना पड़ता है। सिटीजन चार्टर पर संदीप दीक्षित ने कहा कि जरूरी नहीं कि काम हो रही देरी की वजह भ्रष्टाचार ही हो। उन्होंने न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में न रखने की पैरवी की और कहा कि इस बारे में अन्ना हजारे की टीम के सुझाव को न्यायिक जवाबदेही कानून में शामिल किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि सीबीआई को लोकपाल के दायरे में लाना या नहीं लाने पर अभी और चर्चा की जरूरत है, ऐसे में भ्रष्टाचार की जांच सीबीआई के दायरे से बाहर लेने पर भी विचार किया जा सकता है।

बहस में भाग लेते हुए विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने अन्ना हजारे की तीनों शर्तों को माने जाने का समर्थन किया, जिसको लेकर गतिरोध बना हुआ है। उन्होंने कहा कि सिटीजन चार्टर और सभी सरकारी कर्मचारी लोकपाल के दायरे में होना चाहिए। उन्होंने जनलोकपाल के मसौदे का समर्थन करते हुए लोकपाल और लोकायुक्त की नियुक्ति एक साथ होनी चाहिए।

हालांकि, सुषमा ने सिटीजन चार्टर में जनलोकपाल के तहत सरकारी कर्मचारी की सजा के प्रावधान से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि इसे बिहार और मध्य प्रदेश की लोकसेवा प्रदायी कानून की तर्ज पर बनाया जा सकता है, जिसमें कोई सरकारी कर्माचारी नियत समय के भीतर किसी का काम नहीं करता है तो जुर्माना उसके वेतन से वसूला जाए।

सुषमा स्वराज ने प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने की जोरदार वकालत की और कहा कि हमारा कानून छोटे-बड़े का फर्क नहीं करता तो फिर भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए बनाए जाने वाले कानून से उन्हें बाहर क्यों रखा जाए। उन्होंने सवाल से पूछा कि कि क्या ऐसा भेदभाव वाला कानून क्या हमारी जनता स्वीकार करेगी?

उन्होंने कहा कि एक तो हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बोलते ही कम हैं, लेकिन जब आज वह कह रहे हैं कि यह होना चाहिए तो कोई उनकी सुन नहीं रहा। विपक्ष की नेता कहा कि जिम्मेदार विपक्ष के नाते हम चाहते हैं कि दो शर्तों के साथ पीएम को लोकपाल के दायरे में लाया जाए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और जन व्यवस्था के लिए प्रधानमंत्री को बहुता सारे ऐसे फैसले करने होते हैं, जिन्हें सार्वजनिक दायरे में नहीं लाया जा सकता।

न्यायपालिका के मसले पर उन्होंने कहा कि जजों को लोकपाल के दायरे में लाना समस्या का हल नहीं है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका जवाबदेही कानून से भी भ्रष्ट जजों के आचरण पर रोक नहीं लगेगी, इसलिए हमने राष्ट्रीय न्यायिक आयोग बनाने का सुझाव दिया है।

सीबीआई के दुरुपयोग का मसला उठाते हुए उन्होंने कहा कि बीजेपी चाहती है कि इस जांच संस्था को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करने के लिए लोकपाल के दायरे में लाया जाए। उन्होंने जांच एजेंसी के दुरुपयोग का जिक्र करते हुए कहा कि जब सदन में वोटिंग के नियमों के तहत चर्चा होती है तो सीबीआई कांग्रेस बचाओ इंस्ट्टि्यूशन बन जाती है। सुषमा ने कहा कि क्या सारे भ्रष्ट नेता विपक्ष में ही हैं, कांग्रेस कौन सी गंगा है जिसमें डुबकी लगाते ही सब पवित्र हो जाते हैं।


सुषमा स्वराज ने कहा कि हम 43 सालों से 9 बार पेश करने के बावजूद लोकपाल कानून नहीं बना पाए हैं, लेकिन अब इसे पास करने का वक्त आ गया है। उन्होंने कहा कि जनलोकपाल बिल को लेकर हमारे मन में भी शंकाएं थीं लेकिन बातचीत से सहमति बनी। स्वराज ने सरकारी बिल को कमजोर करार दिया और कहा कि मजबूत लोकपाल की मांग अब जन आंदोलन बन चुका है। उनके मुताबिक, ऐसे में सरकार के बिल ने आग में घी डालने का काम किया।

विपक्ष की नेता ने राहुल गांधी ने शून्यकाल में 'राहुल गांधी के देश के नाम प्रवचन' देने पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि शून्यकाल में अहम मुद्दों पर सवाल उठाने की इजाजत दी जाती है देश के नाम संदेश देना गलत है।



वित्त मंत्री मुखर्जी ने कहा कि इस मुद्दे को लेकर संसद और संसद के बाहर काफी बहस चल रही है। उन्होंने कहा कि सरकार को उम्मीद है कि अन्ना का अनशन आज खत्म हो जाएगा। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि कानून बनाने का हक केवल संसद को है। सर्वदलीय बैठक में भी सभी दलों ने इसकी वकालत की।

बहस की शुरुआत करते हुए प्रणव ने इस मुद्दे पर सरकार की ओर से की गई कोशिशों का जिक्र करते हुए कहा कि 8 अप्रैल को सरकार और सिविल सोसायटी की जॉइंट ड्राफटिंग कमिटी बनाई गई थी। प्रणव ने कहा कि 40 मुद्दों पर चर्चा हुई, जिसमें से 6 मुद्दों पर सरकार और सिविल सोसयाटी में मतभेद थे-लोकपाल की नियुक्ति, राज्यों में लोकायुक्त, प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने, न्यायपालिक को लोकपाल के दारये में लाने, सदन में सांसदों का आचरण और निचले स्तर की नौकरशाही को लोकपाल के दायरे में लाने।

लोकसभा में सदन के नेता प्रणव मुखर्जी के बयान के बाद बहस से निकले निष्कर्ष को लोकपाल कानून का अध्ययन कर रही स्टैंडिंग कमिटी में भेजा जाएगा। इससे पहले प्रधानमंत्री ने लोकसभा में जाने से पहले कहा कि उन्हें उम्मीद है कि आज गतिरोध खत्म हो जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि बहस के बाद वह अन्ना हजारे को चिट्ठी भी लिखेंगे।

अन्ना की तीनों मांगों पर सैद्धांतिक रूप से सहमति
नई दिल्ली, एजेंसी
First Published:27-08-11 02:00 PM
Last Updated:27-08-11 08:49 PM
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पिछले 12 दिन से अनशन पर बैठे अन्ना हजारे से उपवास समाप्त करने का आग्रह करते हुए संसद ने लोकपाल विधेयक में गांधीवादी नेता की तीन प्रमुख मांगों पर सैद्धांतिक रूप से सहमति जताते हुए उन्हें आगे के विचार के लिए संसद की संबंधित स्थायी समिति को भेजने का रविवार को फैसला किया।

संसद में लोकपाल के गठन के बारे में दिनभर चली चर्चा के बाद दोनों सदनों में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा कि पूरे दिन की बहस के बाद सदन की यह भावना उभर कर आई है कि यह सदन तीन मांगों सिटीजन चार्टर, राज्यों में लोकायुक्तों के गठन तथा एक समुचित तंत्र के जरिए निचले स्तर की नौकरशाही को लोकपाल के दायरे में लाने को सैद्धांतिक रूप से स्वीकार करता है।

इस बीच, दोनों सदनों द्वारा यह भावना जाहिर किए जाने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद परिसर में संवाददाताओं से कहा कि संसद ने अपनी बात कह दी है। संसद की इच्छा, जनता की इच्छा है।

मुखर्जी ने कहा कि इन तीनों मुद्दों पर बनी सैद्धांतिक सहमति के आधार पर अन्ना हजारे से उनका अनशन समाप्त करने का अनुरोध किया जा सकता है। उन्होंने दोनों सदनों के आसन से आग्रह किया कि वह सदन की भावना तथा आज की कार्यवाही के बारे में लोकपाल पर विचार कर रही स्थायी समिति को अवगत कराएं ताकि मजबूत एवं प्रभावी लोकपाल बनाने में मदद मिल सके। उनकी इस घोषणा का दोनों सदनों में उपस्थित सभी दलों के सदस्यों ने मेजें थपथपा कर जोरदार स्वागत किया।

रूहानी शक्तियां लड़ेंगी युद्ध





- राजकुमार सोनी

अब दुनिया में युद्ध रूहानी शक्तियों से लड़ा जाएगा। विज्ञान और अध्यात्म के नियमों का इस्तेमाल करते हुए वैज्ञानिक सिंथेटिक टेलीपैथी और तकनीक के मिश्रण के जरिए इसे मुमकिन बनाने में जुटे हुए हैं। अतीन्द्रिय दर्शन यानी बिना किसी बाहरी साधनों के दूर दराज तक देख सुन और जान लेने की क्षमता अब कल्पना या किस्से कहानियों की बात नहीं रही। इसकी सचाई इस कदर प्रमाणित हो रही है कि अतीन्द्रिय सामथ्र्य का सैनिक उपयोग करने के प्रयोग भी शुरू होने लगे हैं। अमेरिकी सेना को अब ऐसा लग रहा है कि उसके जवान भी इस क्षमता से लैस हो सकते हैं। इसके लिए अमेरिकी सेना के साथ वैज्ञानिकों, भविष्य वक्ताओं, माइंड रीडर और संचारकर्ताओं की एक टीम दिन रात जुटी हुई है। योजना को अंजाम देने में अमेरिकी सेना के साथ जुटे हैं 39 वर्षीय युवा जैव चिकित्सा वैज्ञानिक और एल्बेनी मेडिकल कालेज में न्यूयार्क स्टेट डिपार्टमेंट के स्वास्थ्य विभाग में ब्रेन कंप्यूटर के प्रमुख गेर्विन शाल्क।

योजना प्रारंभिक चरण में
योजना फिलहाल बुनियादी चरण में है, जिसके तहत गुफाओं जैसे माहौल में संकेत भेजने और पता लगाने की तकनीक पर काम चल रहा है। पूरी उम्मीद है कि वह युद्ध रूहानी शक्तियों के माध्यम से लड़ा जाएगा।
एक खास प्रकार के सोचने वाले हैलमेट (एक ऐसा यंत्र जो सैनिकों के बिना बोले भी संवाद को अंजाम दे सकने में सक्षम हो) को भी बनाने में जुटे हैं ताकि एक दूसरे के दिमाग को पढ़ सकने की योजना को अंजाम तक पहुंचाया जा सके। अतीन्द्रिय सूचना और संवाद या टेलीपैथी के लिए
कुछ लोग टैक्नोपैथी की बात करते हैं। उनका मानना है कि भविष्य में एसी तकनीक विकसित हो जाएगी जिससे टेलीपैथी संभव हो। इंग्लैंड के रैडिंग विश्वविद्यालय के कैविन वॉरिक का शोध इसी विषय पर है कि किस तरह एक व्यावहारिक और सुरक्षित उपकरण तैयार किया जाए जो मनुष्य के स्नायु तंत्र को कंप्यूटरों से और एक दूसरे से जोड़े। योग और अध्यात्म के विद्वानों ने भी इस मिशन में मदद करने की पहल की है।

मनुष्य की चेतना चमत्कारी
मनुष्य स्वयं ही एक जादू है। उसकी चेतना चमत्कारी है। उसकी दौड़ जिधर भी चल पड़ती है, उधर ही चमत्कारी उपलब्धियां प्रस्तुत करती है। बाह्य जगत की अपेक्षा अंतर्जगत की शक्ति अदृश्य होकर भी कहीं अधिक प्रखर और प्रभावपूर्ण होती है। मस्तिष्क में क्या विचार चल रहे होते हैं यह दिखाई नहीं देता, पर क्रिया व्यापार की समस्त भूमिका मनोजगत में ही बनती है। अंतर्जगत विशाल और विराट है, उससे एक व्यक्ति ही नहीं, बड़े समुदाय भी प्रेरित और प्रभावित होते हैं।
लोग जानकारी प्राप्त करने के लिये सामन्यत: अपनी पांच इन्द्रियों- आंख, कान, नाक, जीभ तथा त्वचा का प्रयोग करते हैं। किन्तु संसार में ऐसे व्यक्ति भी हैं जो कि इन्द्रियों के प्रयोग के बिना ही असामान्य विधियों से जानकारी प्राप्त कर लेते हैं।
असामान्य विधियों के द्वारा जानकारी प्राप्त करने की इस क्षमता को परामनोविज्ञान अतीन्द्रिय बोध की संज्ञा देता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अतीन्द्रिय बोध किसी व्यक्ति की छठी इन्द्रिय है। अतीन्द्रिय बोध से प्राप्त जानकारी वर्तमान, भूत या भविष्य में से किसी भी काल की हो सकती है।

अतीन्द्रिय बोध का इतिहास
सन् 1870 में जियोलाजिकल सोसाइटी के फैलो सर रिचार्ड बर्टन ने सर्वप्रथम अतीन्द्रिय बोध शब्द का प्रयोग किया। पुन: 1870 में ही अतीन्द्रिय बोध शब्द का प्रयोग फ्रांसीसी शोधकर्ता के द्वारा किया गया। 1892 में डॉ. पाल जोरी द्वारा इस शब्द का प्रयोग सम्मोहन से प्रभावित व्यक्तियों के वर्णन के लिए किया गया। यह एक सामान्य विश्वास है कि सम्मोहन से प्रभावित व्यक्ति अतीन्द्रिय बोध का प्रदर्शन करता है। म्युनिख के आप्थालमोलाजिस्ट डॉ. रुडोल्फ टिश्नर ने चैतन्यता के भौतिकीकरण के लिए सन् 1920 के दशक में अतीन्द्रिय बोध शब्द का प्रयोग किया। अंतत: सन् 1930 में अमेरिका के परामनोवैज्ञानिक जेबी रिने ने अतीन्द्रिय बोध शब्द को लोकप्रिय बना दिया। रिने ही पहले परामनोवैज्ञानिक थे जिन्होंने अतीन्द्रिय बोध पर प्रयोगशाला में अनेकों प्रयोग किए।
अतीन्द्रिय बोध के प्रदर्शनों से ज्ञात होता है कि भौतिक नियमों के द्वारा इसकी व्याख्या करना अत्यन्त दुष्कर है।

विचार की तरंग
मन में जब कोई तरंग उठती है तो मनुष्य को इसका अहसास नहीं रहता कि वह क्या कर रहा है और उसे क्या करना है? विचार की ऐसी तरंग का प्रभाव विचित्र होता है। पर, इसके उलट असर एकाग्रता का होता है। एकाग्रता बहुत बड़ी शक्ति है। जिस व्यक्ति में एकाग्रता की शक्ति विकसित हो जाती है, उसकी सारी शक्ति केंद्रित हो जाती है और वह केंद्रित शक्ति विस्फोट करती है। जैसे किसी शिलाखंड को निकालने के लिए बारूद का विस्फोट किया जाता है, वैसे ही शक्ति के आवरण को हटाने के लिए यह विस्फोट किया जाता है।

अतीन्द्रिय साधना के उपाए
अतीन्द्रिय ज्ञान की साधना के अनेक उपाय हैं। उनमें दो हैं-इन्द्रिय का संयम और स्थिरीकरण या एकाग्रता। स्थिरीकरण मन का भी होता है और वाणी तथा शरीर का भी। यही एकाग्रता है। जब मन, वाणी और शरीर की चंचलताएं समाप्त होती है, तब बाधाएं दूर हट जाती हैं। चंचलता सबसे बड़ी बाधा है। हिलते हुए दर्पण में मुंह दिखाई नहीं देता। स्थिर दर्पण में ही मुंह देखा जा सकता है। जब चेतना स्थिर होती है, तब इसमें बहुत चीजें देखी जा सकती हैं। जब चेतना चंचल होती है, तब उसमें कुछ भी दिखाई नहीं देता।

निर्विकल्प और एकाग्रता
तीसरा उपाय है- निर्विकल्प होना। निर्विकल्प का अर्थ है, विचारों का तांता टूट जाए। एकाग्रता और निर्विकल्पता में बहुत बड़ा अंतर है। एकाग्रता का अर्थ है, किसी एक बिंदु पर टिक जाना। यह भी एक प्रकार की चंचलता तो है ही। हम अहं या ओम् पर स्थिर हो गए, फिर भी चंचलता है। वहां न कोई विकल्प होता है, न शब्द, न चिंतन और मनन।
निर्विकल्प अवस्था में न स्फूर्ति रहती है, न कल्पना रहती है। बाहर का कोई भान नहीं रहता। इसमें केवल अंतर्मुखता, आत्मानुभूति, गहराई में डुबकियां लेना होता है। इस स्थिति में आवरण बहुत जल्दी टूटता है। आवरण को बल मिलता है विकल्पों के द्वारा। विकल्प, विकल्प को जन्म देता है। तरंग-तरंग को पैदा करती है। जब विकल्प समाप्त हो जाता है, तब आवरण को पोषण नहीं मिल पाता। वह स्वत: क्षीण हो जाता है। आहार के अभाव में जैसे शरीर क्षीण होता है, वैसे ही पोषण के अभाव में आवरण क्षीण होता जाता है।
जिन लोगों ने एकाग्रता साधी है, निविर्कल्पता और समता साधी है, उन्हें ही अतीन्द्रिय ज्ञान की प्राप्ति हुई है। अतीन्दिय ज्ञान के तीन प्रकार हैं -अवधिज्ञान, मन:पर्यवज्ञान और केवलज्ञान। इन सबकी प्राप्ति के लिए समता की साधना एक अनिवार्य शर्त है। जब तक राग-द्वेष या प्रियता-
अप्रियता के द्वंद्व में आदमी उलझा रहता है, तब तक आवरण को पोषण मिलता रहता है। जब समता सध जाती है, तब आवरण पुष्ट नहीं होता। आवरण की क्षीणता में ही अतीन्दिय चेतना जागती है।
भगवान महावीर, महात्मा बुद्ध, ईसा मसीह, मोहम्मद साहब आदि जितने भी विशिष्ट व्यक्ति हुए हैं और जिन-जिन को विशिष्ट ज्ञान या बोधि की प्राप्ति हुई है, वह साधना के द्वारा ही हुई है। उस विशिष्ट साधना का एक महत्वपूर्ण अंग है समता।

समता की साधना
समता की साधना का अर्थ है -इंद्रिय संयम की साधना। इसके अंतर्गत आहार-संयम की बात स्वत: प्राप्त हो जाती है। आहार का संयम हमारी भीतरी शक्ति को जगाने में सहायक होता है। आहार शरीर पोषण के लिए आवश्यक है, तो आहार संयम ज्ञान के स्त्रोतों को प्रवाहित करने के लिए अनिवार्य है। भोजन से मैल जमता है और वह इतना सघन हो जाता है कि अतीन्द्रिय चेतना के जागरण की बात दूर रह जाती है, इन्द्रिय चेतना भी अस्त-व्यस्त हो जाती है। हमारा शरीर अतीन्द्रिय ज्ञान का स्रोत है। कभी-कभी अचानक कोई घटना घटती है और वे स्रोत उद्घाटित हो जाते हैं, तब आदमी को अतीन्द्रिय ज्ञान की प्राप्ति का अनुभव होने लग जाता है। साधना और आकस्मिकता, ये दोनों अतीन्द्रिय ज्ञान की प्राप्ति में सहायक होते हैं। साधना की अपनी विशेषता है, क्योंकि उसकी एक निश्तित प्रक्रिया होती है। आकस्मिकता कभी-कभार होती है।

ऐसे जागेगी अतीन्द्रिय चेतना
अतीन्द्रिय चेतना को जगाने की शर्तें
1. बुरे विचार न आएं।
2. अनावश्यक विचार न आएं।
3. विचार बिलकुल न आएं।
यही विकास का क्रम है। यह न समझें कि आज ध्यान करने बैठे हैं और आज ही विचार आना बंद हो जाएगा। यह संभव नहीं है, क्योंकि हमने अनगिनत संबंध जोड़ रखे हैं। व्यक्ति घर में बैठा है और कारखाना मन में चल रहा है। दुकान में बैठा है और परिवार पीछे चल रहा है। ध्यान-शिविर में आप अकेले आए हैं, पत्नी पीछे है, आपका मन उसकी चिंता में उलझा हुआ है। संबंध जोड़ रखा है हजारों चीजों के साथ और विचार किसी का न आए, यह कैसे संभव है।

संबंध और विचार
संबंध और विचार-दोनों परस्पर जुड़े हुए हैं। जहां संबंध है, वहां विचार का आना अनिवार्य है। यदि ध्यान के लिए आते समय सारे संबंधों से मुक्त होकर आते तो संभव भी हो सकता था, किन्तु बंध कर आते हैं, इसलिए इतना जल्दी छूट पाना संभव नहीं है। इस सूत्र पर ध्यान दें- जितने ज्यादा
संबंध मुक्ति का भाव, उतना ज्यादा निर्विचार। आप विचारों को रोकने का प्रयत्न न करें, पहले संबंधों को कम करने का प्रयत्न करें। आपने अनुबंध कर लिया-तीन बजे मिलना है तो ढाई बजे ही आपका मानसिक भाव बदल जाएगा और आप घड़ी देखना शुरू कर देंगे। किसी और काम में फिर मन नहीं लगेगा। अगर आधा घंटा की देरी हो जाए तो आपकी झुंझलाहट बढ़ जाएगी। आप इस भ्रम में न रहें- एक ही दिन में मन के सारे संकल्प-विकल्प समाप्त हो जाएंगे। ऐसा कभी न सोचें। एक-दो या पांच-सात दिनों को ध्यान से भी ऐसा संभव नहीं होगा। बिलकुल यथार्थवादी होकर चलें, सच्चाई को समझकर चलें। हमने अपने अनुबंधों का जितना विस्तार किया है, संबंधों को जितना विस्तृत किया है, उनके प्रति जब तक हमारी र्मूच्छा कम नहीं होगी, वे संबंध कम हीं होंगे, तब तक विचारों के प्रवाह को भी रोका नहीं जा सकेगा।

विचार की चिंता छोड़ें
ध्यान करने वाले के लिए यह अपेक्षित है कि वह विचारों की चिंता छोड़े, पहले मूच्र्छा को कम करने की बात सोचें। यदि विचार आते हैं तो वे आपका क्या बिगाड़ते हैं? आप उनके साथ जुड़ते हैं, तभी आपका कुछ बनता-बिगड़ता है, अन्यथा आपको उसे कुछ भी लाभ-हानि नहीं होगी। आप अनुबंधों में फंसते हैं, विचारों में उलझते हैं, उनकी चिंता करते हैं। उनसे प्रभावित होते हैं, तो फिर आपका नुकसान होना ही है, परेशानी बढऩी ही है। हमें विचारों के साथ जुडऩा नहीं है, विचारों के साथ बहना नहीं है। विचार आया और गया। जुड़ें नहीं, मात्र देखें। यदि ऐसा हुआ तो फिर विचार कोई कठिनाई पैदा नहीं कर सकेगा। आप तटस्थ बन जाएं, मध्यस्थ बन जाएं, दृष्टा और ज्ञाता बन जाएं, विचारों को जानते-देखते रहें, उनकी प्रेक्षा करते रहें, वे आपकी परेशानी और उद्विग्नता का कारण कभी नहीं बनेंगे। जिन लोगों को ध्यानकाल में बहुत विचार आते हैं, उन्हें विचारप्रेक्षा का प्रयोग करना चाहिए। हर शहर के रास्ते से दिन-रात कितनी गाडिय़ां, वाहन दौड़ते रहते हैं। सड़क के किनारे की दुकान का दुकानदार अगर उन्हीं पर ध्यान देता रहे तो पागल हो जाए। वह ध्यान देता है। अपने धंधे पर। बाकी सब चीजों को वह देखकर भी अनदेखा कर देता है। ध्यान के साधक को भी यही करना है। यदि यह जागरूकता बनी रहे, दृष्टिकोण सही हो जाए तो सब ठीक हो जाए।

हमारे शरीर में अपार शक्ति
ध्यान की अवस्था में बहुत बुरे विचार आते हैं तो ध्यान ही नहीं हो पाता और यदि कोई विचार न आता तो हम समाधि की अवस्था में चले जाते, ध्यान की जरूरत ही न रह जाती। इसलिए हमारी यह ध्यान की क्रिया बस ठीक-ठाक है। मध्य का मार्ग है यह। न हम अति कल्पना करें और न निराश हों, केवल अपनी जागरूकता पर ध्यान दें, उसे निरंतर बढ़ाएं। देखने में बड़ी शक्ति है। हम देखने का अभ्यास बढ़ाएं। देखने का तात्पर्य हमारी जागरूकता से है। जैसे-जैसे प्रेक्षा की शक्ति बढ़ेगी, विचार आने भी कम हो जाएंगे। जहां आदर नहीं होगा, वहां कोई क्यों आएगा? अगर आप विचार का स्वागत करेंगे, उसे अपनापन जोड़ेंगे तो वे आपकी स्थायी मेहमान बनने की कोशिश करेंगे। उपेक्षा करेंगे तो वे स्वत: चले जाएंगे। जैसे-जैसे यह जागरूकता बढ़ेगी, विचार की समस्या समाहित होती चली जाएगी।

मवेशियों का चुम्बकीय सामना
गूगल अर्थ सेटेलाइट इमेजेस की सहायता से किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि मवेशियों के झुंड प्राय: पृथ्वी के चुम्बकीय उत्तर-दक्षिण दिशा में खड़े होने का प्रयास करते हैं। विश्व के 308 स्थानों में 8,510 मवेशियों पर किए गए अध्ययन के निष्कर्ष के अनुसार यही पता चला है कि प्राय: मवेशी पृथ्वी के चुम्बकीय उत्तर-दक्षिण का ही सामना करते हैं। चेज रिपब्लिक में किए गए एक अन्य शोध के अनुसार 2,974 पर किए गए अध्ययन से पता चला है कि, सिर्फ मवेशी ही नहीं, हिरण भी पृथ्वी के चुम्बकीय उत्तर-दक्षिण दिशा का सामना करना पसंद करते हैं। भारत में प्राचीन काल से ही दक्षिण दिशा की ओर सिर तथा उत्तर दिशा की ओर पैर कर के सोने की परम्परा रही है क्योंकि हमारे यहां यह माना जाता है कि इस प्रकार से सोने या लेटने से मनुष्य की जीवनी शक्ति में वृद्धि होती है और यही कारण है कि हिन्दुओं में मृत्यु के समय व्यक्ति को जमीन पर उत्तर दिशा की ओर सिर तथा दक्षिण दिशा की ओर पैर करके लिटाने का रिवाज है जिससे कि मरने वाले व्यक्ति की जीवनी शक्ति का हृास हो और उसके प्राण आसानी के साथ निकल सकें।

मन से मन का संपर्क
योगनिद्रा का प्रयोग आज एस्ट्रोनोट्स को ट्रेंड करने के लिए दिया जा रहा है। क्योंकि योगनिद्रा के अभ्यास से आप अपनी अतीन्द्रिय शक्ति को जाग्रत कर सकते हैं, छठी इंद्री को जाग्रत कर सकते हैं। टेलीपैथिक कम्यूनीकेशन कर सकते हैं।
अब हवाई जहाज में कोई फेलियर हो जाए, कोई तकनीकी खराबी आ जाए, धरती के सेंटर से संपर्क टूट जाए तो इन अंतरिक्ष यात्रियों को ट्रेंड किया जा रहा है कि वे मन से मन का संपर्क कर सकें और अपनी समस्या बता सकें, संपर्क साध सकें। यंत्रों से नहीं, मन से। दूर का दर्शन, दूर का श्रवण, ये काल्पनिक शक्तियां नहीं हैं, अत्यंत वास्तविक हैं। आप में से बहुत लोगों ने यह अनुभव किया होगा कि आपके मन में एक बात उठती है, एक प्रश्न उठता है और ठीक
उसी समय तुम्हें मुझसे उत्तर मिल जाता है। तीन चार पत्र आज आए हुए थे। उन्होंने कहा, 'ऐसा कैसे हुआ, हमारे मन में एक विचार आया, आपने उसी का जवाब दे दिया। यह कैसे हुआ?Ó
जो कुछ तुम सोच रहे हो वह यहां मेरे तक पहुंच रहा है और यह कोई खास शक्ति नहीं है। इसको तुम भी प्राप्त कर सकते हो। योग निद्रा के माध्यम से हम अपनी अतीन्द्रिय शक्तियों को जाग्रत कर सकते हैं। सबसे बढिय़ा बात, जिनका चित्त विश्राम में है, मन विश्राम में है, ऐसे व्यक्ति जब सत्संग सुनते हैं, जब ज्ञान श्रवण करते हैं तो वह ज्ञान उनके लिए फलित होता है। तुम तोते नहीं रह जाते हो। फिर तुम्हारे लिए कथा सुनना एक मनोरंजन नहीं रह जाता। यह तुम्हारे लिए परिवर्तन की क्रिया हो जाती है। अभी मैं जो कुछ बोलती हूँ, सच यह है कि शायद उसका पाँच प्रतिशत ही आपके अंदर तक पहुंचता है। बाकी तो बस आया और गया।

शक्तियों को करें जागृत
आप अपने ज्ञान को जीवन में लागू नहीं कर पाते। कारण, मन बड़ा बिखरा हुआ है। पर योगनिद्रा से इस बिखरे हुए मन का उपचार किया जा सकता है।
चित्त में चैन या विश्राम के साथ जब तुम प्रार्थना करने लगोगे तो तुम्हारी प्रार्थना में भी बल होगा। मतलब, तुम्हारी प्रार्थना तुम्हें अदभुत आनंद और अदभुत अनुभूतियों को प्रदान करेगी। अगर तुम भक्त हो तो तुम्हारी भक्ति में गहराई आ जाएगी। अगर तुम ज्ञान के साधक हो तो ज्ञान चिंतन तुम्हारा अच्छा हो जाएगा। अब अगर आपका प्राण शरीर स्वस्थ और उन्नत हो तो आप एक बड़ी चमत्कारिक शक्ति प्राप्त कर लेते हैं। दुनिया में चमत्कार को नमस्कार है, ज्ञान को नहीं। इसके लिए किसी चमत्कारिक बाबा के पीछे घूमने की जरूरत नहीं, तुम नियमित योगनिद्रा का अभ्यास करो, अद्भुत शक्तियां जाग्रत होने लग जाएंगी। एक बात के लिए सावधान रहिए कि रजोगुणी और तामसिक व्यक्ति के पास जब शक्ति आती है तो वह अपना ही नास कर लेता है। इसलिए शक्ति आए इसके पूर्व आपका चित्त सात्विक होना चाहिए और ईश्वर में जुड़ा हुआ होना चाहिए। सच तो यह है, जिनमें ये चीज नहीं है, उनकी शक्ति जागृत भी नहीं होती। जिनमें ईश्वर प्रणिधान यानी ईश्वर के प्रति एकाग्रता और समर्पण तथा सात्विकता होती है, उनकी शक्तियां सहज से जागने लग जाती हैं। आप अपने अंदर छिपी हुई इन रहस्यमयी शक्तियों को जाग्रत करिए। ऐसी शक्तियों के माध्यम से आप पाश्विक जीवन से ऊपर उठकर देवताओं जैसा जीवन जी सकते हो। जब तुम स्वयं ऋषि हो सकते हो तो फिर पशु की भांति, एक आम इंसान की भांति हंसते-रोते, क्रोधी, कामी, लोभी होते हुए क्यों जिएं। ऐसी कोई चीज नहीं है जो तुम्हारे लिए प्राप्त करना संभव नहीं। सब चीज तुम प्राप्त कर सकते हो। फिलहाल तो तुम्हारा दिमाग इसमें है कि पैसा कैसे कमाया जाए। धन के पुजारी, पदार्थवादी, भोगवादी लोग कहते हैं कि धन कहाँ से आए? धन भी कमाया जा सकता है।

एकाग्र चित्त रखें मन को
जब तुम संयमित और एकाग्र चित्त के साथ अपने व्यवसाय को, अपने बिजनेस को चलाओगे तो निश्चित रूप से तुम्हें ऐसे फार्मूले सूझने लगेंगे, जिनसे तुम्हारा व्यापार दिन दुगुनी रात चौगुनी उन्नति करने लग जाएगा। एक चीज समझ लें, जो सफल उद्योगपति हैं या सफल धनपति हैं वे इसलिए सफल हो सके क्योंकि उनके पास संकल्पबद्ध और एकाग्र मन था। धैर्य और संतोष के साथ उन्होंने अपने क्षेत्र में काम किया इसलिए सफलता मिली। जिस व्यक्ति के पास यह शक्ति नहीं है, वह किसी भी क्षेत्र में सफल नहीं हो सकता। धन चाहते हो धन कमाओ। शक्ति चाहते हो शक्ति प्राप्त करो। परंतु अंत में आपको यह बात समझनी होगी कि धन से आप पदार्थ तो खरीद सकते है, धन से आप मन का विश्राम नहीं खरीद सकते। शक्ति से आप दूसरों को दबा तो सकते हैं, पर उस शक्ति का क्या लाभ जिससे तुम अपने अंधकार और अपने उद्दंडी मन को दबा न सको। शक्ति वही जिससे आप सार्थक और रचनात्मक उन्नति करें। ज्ञान पूर्वक अपने जीवन को जिएं। धन बुरा नहीं है, शक्ति बुरी नहीं, पदार्थ का सुख भी बुरा नहीं, पर तुम्हें मालूम होना चाहिए कि इसकी एक सीमा है। ये सब इससे अधिक तुम्हें नहीं दे सकते। सत्य पथ पर चलें। सत्य को समझते हुए सत्य की साधना करें तो आप अपने अंदर एक निर्भयता, फियरलैसनैस और शाश्वत आनंद विकसित कर सकते हैं। यह हमेशा आपके पास रहेगा और कभी आपको छोड़ कर नहीं जाएगा।