शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

स्‍पीक एशिया के सीईओ भारत छोड़ दुबई भागे

मुंबई। स्‍पीक एशिया के खिलाफ मुंबई पुलिस में धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज होने के बाद क्राइम ब्रांच की टीम ने सक्रियता दिखाते हुए सीओओ तारक बाजपेयी को धर दबोचा। तारक के पुलिस हिरासत में जाने के तुरंत बाद कंपनी के चीफ एक्जिक्‍यूटिव ऑफीसर (सीईओ) फरार मनोज कुमार फरार हो गया है। मुंबई के असिस्‍टेंट पुलिस कमिश्‍नर ने बताया कि मनोज कुमार दुबई भाग गया है।

देश के 12 लाख लोगों को करोड़ों का चूना लगा चुकी स्‍पीक एशिया का पैसों का महल आखिरकार ढह गया। मुंबई प‍ुलिस के हरकत में आते ही कंपनी के सीओओ के साथ टेक्निकल हेड राजीव मल्‍होत्रा, टेक्निकल एक्जिक्‍यूटिव रईस और अकाउंटेंट रवि खन्‍ना पुलिस के शिकंजे में आ गये। असिस्‍टेंट पुलिस कमिश्‍नर हिमांशु राय ने बताया कि ये चारों लोग 4 अगस्‍त तक पुलिस हिरासत में रहेंगे।

पुलिस के मुताबिक इस कंपनी ने देश के करीब 12 लाख लोगों से 1 लाख 320 करोड़ रुपए इकठ्ठा किये। कंपनी के सभी खाते फ्रीज किये जा चुके हैं। पुलिस कंपनी के अन्‍य लोगों की धरपकड़ के लिए संदिग्‍ध ठिकानों पर दबिश डाल रही है।

गौरतलब है कि स्‍पीक एशिया का सदस्‍य बनने के लिए 11 हजार रुपए देने होते हैं। उसके बाद स्‍पीक एशिया पर एक अकाउंट बन जाता है। हर सप्‍ताह एक सर्वे आपके पास आयेगा, जिसे पूरा कर आपको भेजना होता है। प्रत्‍येक सर्वे से प्रत्‍येक माह आपको 4 हजार रुपए मिलेगा। कंपनी के इसी दावे के साथ लाखों लोगों ने पैसा लगा दिया।

स्‍पीक एशिया के सीओओ हिरासत में, निवेशकों में हड़कंप
मुंबई। ऑनलाइन सर्वे कंपनी स्‍पीक एशिया के सीओओ तारक बाजपेयी को को प्रवर्तन निदेशालय ने पूछताछ के लिए हिरासत में लिया है। प्रवर्तन निदेशालय ने यह कदम सीआईडी द्वारा कंपनी के बैंक खाते फ्रीज़ किये जाने के दो दिन बाद उठाया। विभागीय अधिकारी बाजपेयी से गहन पूछताछ कर रहे हैं। इन सबके चलते एक बार फिर स्‍पीक एशिया के निवेशक हलकान हैं, उन्‍हें अपने पैसे के डूबने की चिंता फिर से सताने लगी है।

जनता की जेब से कई करोड़ रुपए अंदर कर चुकी सर्वे कंपनी स्‍पीक एशिया के सीओओ को क्राइम ब्रांच की टीम ने गुरुवार रात इंदौर से हिरासत में लिया। यहां से टीम उन्‍हें मुंबई ले गई, जहां उनसे पूछताछ की जा रही है। साथ ही विभाग की एक अन्‍य टीम दस्‍तावेजों व खातों को खंगाल रही है। कोर्ट से स्‍टे मिल चुका है, लिहाजा बाजपेयी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। हम आपको बता दें कि कंपनी के खिलाफ फर्जीवाड़ा करने का आरोप है। मुंबई, दिल्‍ली, लखनऊ, इंदौर, समेत कई शहरों में स्‍पीक एशिया के खिलाफ मामले दर्ज हैं।

सीओओ के हिरासत में लिये जाने के बाद से निवेशक काफी हैरान-परेशान दिख रहे हैं। क्‍योंकि तमाम आरोप लगने व रिजर्व बैंक द्वारा अकाउंट फ्रीज़ किये जाने के बाद निवेशक काफी परेशान हो गये थे। तभी कंपनी ने अपने निवेशकों को ईमेल और एसएमएस के जरिये भरोसा दिलाया कि कंपनी कहीं भागेगी नहीं, निवेशकों का पैसा डूबेगा नहीं। कुछ दिन की जांच-पड़ताल के बाद सभी का पैसा मिलेगा।

यही नहीं कंपनी ने इस बीच अपनी सदस्‍यता के नियमों में भी परिवर्तन किया, जिसके बाद लोगों का विश्‍वास पहले से ज्‍यादा हो गया। पहले जहां बिना किसी हस्‍ताक्षर या कागजात के लोग सदस्‍य बन जाते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब आपको अपनी फोटो, पैन कार्ड की कॉपी, आईडी प्रूफ, एड्रेस प्रूफ, आदि देना होगा। उसके बाद ही आप सदस्‍य बन सकते हैं। नये नियमों के अंतर्गत अब पैसे का लेन-देन कंपनी और निवेशक के बीच सीधे तौर पर होगा, कोई बिचौलिया या अन्‍य सदस्‍य बीच में नहीं पड़ेगा।

दो महीने पहले अकाउंट फ्रीज होने के बाद भी निवेशक अपने सर्वे पूरे करते हुए कंपनी को भेजते रहे। कुछ निवेशकों को कंपनी ने भुगतान भी किया। लेकिन अब सीओओ के हिरासत में लिये जाने के बाद यही निवेशक फिर से परेशान हो गये हैं। निवेशकों को लग रहा है कि यदि अगर स्‍पीक एशिया के खाते डीफ्रीज़ नहीं किये गये, तो क्‍या होगा।

रॉक संगीत की स्टॉर-लेडी गागा


- राजकुमार सोनी




पॉप संगीत की मलिका लेडी गागा ने चर्चित गायक जस्टिन बीबर, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और ब्रिटनी स्पीयर्स जैसी विश्वभर की नामचीन हस्तियों और संगठनों को पीछे छोड़ते हुए माइक्रो ब्लागिंग वेबसाइट ट्विटर पर एक करोड़ फालोवर्स जोड़ लिए हैं। लेडी गागा कम उम्र की पहली ऐसी स्टार हैं जिनके चाहने वालों की संख्या एक करोड़ के जादुई आंकड़े को पार कर गई है। फेमकाउंट डॉट काम वेबसाइट के मुताबिक लेडी गागा सोशल मीडिया की दुनिया में एक बार फिर से इतिहास रचते हुए पहली ऐसी हस्ती बन गई हैं, जिनके फालोवर्स की संख्या एक करोड़ को पार कर गई। लेडी गागा ने शनिवार रात यह उपलब्धि हासिल की।



तीसरी बड़ी उपलब्धि

एक करोड़ फालोवर होने पर लेडी गागा ने मजाकिया लहजे में कहा- एक करोड़ शैतान। मेरे पास शब्द नहीं हैं। हमने यह कर दिखाया। लेडी गागा के इस समय 10,087,546 फालोवर्स हैं। फेमकाउंट वेबसाइट के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया की दुनिया में लेडी गागा की यह तीसरी बड़ी उपलब्धि है।


प्रारंभिक सफर
लेडी गागा का असली नाम स्टेफनी जोअन्ने एंजेलीना जर्मोन्ता है। लेडी गागा अमेरिकी गायिका व संगीतकार है। उन्होंने अपना रॉक संगीत गायिका का सफर न्यूयार्क शहर से सन् 2003 में किया था, और जब से ले कर अब तक गागा संगीत जगत के कई प्रसिद्ध पुरस्कार जीत चुकी हैं। गागा ग्रैमी पुरस्कार के लिए 12 बार नामांकित हुई हैं जिसमें से बार पुरस्कार इन्हें मिल चुका है, इनके नाम दो गिनीज बुक आफ वल्र्ड रिकार्ड भी हैं।

जीवन और संगीत जीविका
लेडी गागा का जन्म 28 मार्च 1986 को न्यूयॉर्क में एक इतालवी-अमेरिकी धार्मिक परिपाटियों पर चलने वाले रुढि़वादी मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। पिता छोटे से व्यवसायी थे, मां भी बाहर नौकरी करती थीं।। न्यूयॉर्क की एक साधारण-सी बस्ती में उनका अपना मकान था। गागा ने अपनी शिक्षा मैनहटन के कट्टर कैथोलिक स्कूल से गृहण की थी, जो केवल लड़कियों के लिए था। गागा को बचपन से ही संगीत का बहुत शोक था। महज चार साल की उम्र में वह पियानो में पारंगत हो गईं। कुछ और बड़ा होते-होते नृत्य कला व 17 साल की उम्र में गाने लिखने लगीं, म्यूजिक की रचना करने लगीं। इसी उम्र में उन्हें उनकी प्रतिभा न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के उस स्कूल ऑफ आर्ट्स में ले गई।

क्लबों में परफॉर्म
2007 में वह क्लबों में लेडी गागा के नाम से परफॉर्म करने लगीं। अमेरिकी म्यूजिक इंडस्ट्री के लोगों की नजर उन पर पड़ी। सही मायनों में उन्हें आगे बढ़ाया पॉप सुपर स्टार एकॉन ने। वह एकॉन के दल में गाने भी लगीं। साथ में संगीत कंपनी इंटरस्कोप के लिए गाने भी लिखतीं। इसी दौरान इंटरस्कोप के साथ उन्होंने अपने पहले सोलो गाने जस्ट डांस की तैयारी शुरू की। इसे अप्रैल 2008 में रेडियो पर रिलीज किया। लेकिन पूरा गाना अगस्त तक रिलीज हो पाया। जस्ट डांस ने धीमे-धीमे गति पकड़ी। बिलबोर्ड हॉट 100 में जगह बनाने के बाद गागा की विख्याति दुनियाभर मे फैल गई। जनवरी 2009 तक ये दुनिया के कई देशों जैसे ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, नीदरलैंड, आयरलैंड, युनाइटेड किंगडम, और संयुक्त राज्य अमेरिका के चार्ट पर नंबर वन बन गया था।


लेडी गागा की प्रसिद्ध डिस्कोग्राफी
-द् फेम (2008)
-द् मॅान्स्टर (2009)
-बोर्न दिस वे (2011)

सिडनी की नागरिकता
पॉप स्टार लेडी गागा को समलैंगिकों, लेस्बियनों, उभयलिंगियों और किन्नरों (जीएलबीटी) को समर्थन दिए जाने की वजह से 13 जुलाई 2011 को सिडनी की मानद नागरिकता से नवाजा गया है। सिडनी के मेयर क्लोवर मूरे ने इस बात के लिए लेडी गागा की तारीफ की है कि उन्होंने अपनी मशहूर शख्सियत का इस्तेमाल कर जीएलबीटी समुदाय को समर्थन दिया है। मूरे का कहना है कि लेडी गागा सिडनी में समलैंगिकों और लेस्बियन समुदाय की शक्तिशाली समर्थक रही हैं और हम उन नागरिकों का सम्मान करते हैं जिनकी उपलब्धि से हमारे शहर के आदर्शों और भावनाओं को सम्मान मिलता है।

स्टाइलिश आइकॉन लेडी
स्टाइलिश आइकॉन लेडी गागा शोहरत की बुलंदियों पर रहना जानती हैं। कभी अपनी शोख अदाओं, तो कभी अपने मस्त अंदाज से, कभी भारी भरकम खरीदारी, तो कभी बेड से लेकर घर के रखरखाव से, जहां वह जो भी काम करती हैं, छा जाती हैं, उनका हालिया रिकार्ड सोशल साइट ट्वीटर पर रिकार्ड समर्थकों का है। पॉप गायिका लेडी गागा 19 मई 2011 को विश्व की सबसे शक्तिशाली हस्ती चुनी गई थीं। 'फोब्र्सÓ पत्रिका द्वारा कराए गए सर्वेक्षण सर्वेक्षण के बाद जारी की गई शक्तिशाली हस्तियों की सूची में गागा का नाम शीर्ष पर था। वेबसाइट 'कांटेक्टम्यूजिक डॉट कॉमÓ के मुताबिक 'फोब्र्सÓ पत्रिका हर साल दुनिया की 100 सबसे शक्तिशाली हस्तियों की सूची जारी करती है। इस साल गागा ने टीवी प्रस्तोता ओपराह विनफ्रे को पीछे कर शीर्ष स्थान हासिल किया था। बीते चार सालों से विनफ्रे शीर्ष स्थान पर काबिज थीं। इस बार की सूची में विनफ्रे दूसरे स्थान पर रही थीं। पत्रिका में एक वक्तव्य में कहा गया था, लेडी गागा हमारी सूची में शीर्ष पर केवल इसलिए नहीं हैं कि उन्होंने नौ करोड़ डॉलर की कमाई की, बल्कि इसलिए भी हैं कि 'फेसबुकÓ पर उनके 3.2 करोड़ प्रशंसक हैं और 'ट्विटरÓ पर एक करोड़ लोग उनसे जुड़े हुए हैं। इन प्रशंसकों के कारण ही गागा के लोकप्रिय गीत 'बॉर्न दिस वेÓ की पांच दिन के अंदर ही 10 लाख से ज्यादा प्रतियां खरीदी गईं। सबसे शक्तिशाली हस्तियों की इस सूची में तीसरे स्थान पर जस्टिन बीवर, चौथे स्थान पर यू-2 बैंड और पांचवें स्थान पर सर एल्टन जॉन हैं।

अंडाकार घर बनाएंगी

'पोकर फेसÓ की गायिका गागा के नाम एक और अनोखा रिकार्ड दर्ज किया गया है जिसमें उनके वीडियो को यू-ट्यूब पर एक अरब लोगों ने उन्हें देखा। पॉप स्टार लेडी गागा अपने घर को नया रूप देने के लिए 10 लाख 20 हजार पाउंड खर्च कर रही हैं। यह 25 वर्षीय गायिका मंच पर प्रस्तुत किए गए अपने हाल के प्रदर्शन में इस्तेमाल किए गए 'अंडाकारÓ बिस्तर से इतनी प्रभावित हुई हैं कि उसे ही अपने घर में भी इस्तेमाल के लिए बनवा रही हैं।
दुनिया भर में ज्यादातर लोग झड़ते हुए बालों के कारण परेशान रहते हैं। इस लिस्ट में लेडी गागा का नाम भी जोड़ लीजिए। 24 वर्षीय गागा जो स्टाइल ऑइकॉन मानी जाती हैं ने खुद इस बात पर से परदा हटाया है। इससे पहले गागा ने अपने प्रशंसकों को यह कह कर चौंका दिया था की उनके बाल झड़ रहे हैं। गागा का कहना है कि उनके बाल गिरने लगे हैं। इसका कारण भी उन्हें पता है। गागा के मुताबिक वे बहुत ज्यादा डाई करती हैं, जिससे बालों कर विपरीत असर हो रहा है और उनके बाल गिरने लगे हैं। गागा ने जब अपना करियर शुरू किया था तब से वे लगातार अपने बालों को डाई कर रही हैं। गागा ने यह कहकर भी चौंका दिया है कि वे सोते वक्त भी अपना मेकअप नहीं उतारती हैं। इसका असर उनकी त्वचा पर होने लगा है। इस काम के लिए गागा फैशन निर्देशक निकोला फॉर्मिचेटी और अपने मित्र रिक जेनेस्ट की मदद ले रही हैं।

फिर तनहा हैं
पॉप गायिका लेडी गागा के बारे में 14 मई 2011 को खबर छपी थी कि वह अपने ब्वायफ्रेंड लक कार्ल के साथ शादी करने की योजना बना रही हैं लेकिन एक साल तक चले रोमांस के बाद आखिरकार दोनों में अलगाव हो गया। कॉनटैक्ट म्यूजिक ने खबर दी है कि गागा (25) ने कहा कि वह अब अकेली हैं और फिलहाल किसी के साथ डेटिंग नहीं कर रही हैं। गौरतलब है कि गागा का रोमांस कभी कुलांचे भरता है तो कभी सुस्त पड़ जाता है।

गंजी नहीं होना चाहतीं

पॉप सनसनी लेडी गागा गंजी नहीं होना चाहतीं, इसीलिए वह आजकल बालों का झडऩा रोकने वाली दवाएं ले रही हैं। 26 जुलाई 2011 को जारी सन ऑनलाइन की रिपोर्ट के अनुसार अधिक केमिकल्स इस्तेमाल करने के कारण 25 वर्षीय इस गायिका के बाल झडऩे लगे हैं। लेडी गागा ने अनेक केमिकल्स का इस्तेमाल किया है और इससे उनके बालों को बहुत नुकसान पहुंचा है। वह इन दिनों रोगेन का इस्तेमाल कर रहीं हैं, ताकि इस नुकसान से बचा जा सके। पॉप गायिका गागा अपने अलग-अलग विग्स के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने कहा कि उनके सुनहरे बाल झडऩे लगे थे, इसलिए उन्हें केमिकल हेयरकट कराना पड़ा।

डगमगाता है आत्मविश्वास
दिग्गज पॉप गायिका लेडी गागा ने स्वीकार किया है कि उनमें भी कई आत्मविश्वास की कमी हो जाती है और इसलिए वह हर दिन 15 मिनट सकारात्मक सोच को देती हैं। अपने बिंदास अंदाज के लिए पहचानी जाने वालीं 25 वर्षीय गायिका ने कहा कि उनके आत्मविश्वास में कमी आती है तो वह सकारात्मक सोच के लिए समय देती हैं। उन्होंने कहा मैं हमेशा आत्मविश्वास से भरी नहीं रहती। मेरी सलाह है कि आपको अपने बारे में सकारात्मक सोच को लेकर 15 मिनट देने चाहिए।

लेडी गागा की दीवानी प्रियंका
यह सभी जानते हैं कि ऐक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा को गाने का बहुत शौक है। तभी तो उन्हें जब भी सिंगर्स से मिलने का मौका मिलता है, तो वह कोई चांस मिस नहीं करतीं। कुछ दिनों पहले प्रियंका न्यूयॉर्क में लेडी गागा के कंसर्ट में पहुंचीं। इस दौरान लेडी गागा की परफॉर्मेंस उन्हें इतनी पसंद आई कि वह उनसे मिलने बैक स्टेज पहुंच गईं। यही नहीं, बातों-बातों में प्रियंका ने लेडी गागा को इंडिया आने तक का न्योता दे डाला। प्रियंका ने अपनी मुलाकात के बारे में बताया कि गागा इंडिया में आने को लेकर बेहद एक्साइटेड हैं। दरअसल, वह जानती हैं कि इंडिया में उनके तमाम फैन्स हैं। यही वजह है कि वह जल्दी ही इंडिया में कंसर्ट करने या अलबम लॉन्चिंग की प्लानिंग कर रही हैं।

जन्म नाम स्टेफनी जोअन्ने एंजेलीना जर्मोन्ता
चर्चित नाम लेडी गागा
जन्म 28 मार्च 1986
न्यूयॉर्क शहर, संयुक्त राज्य अमेरिका
शैली पॉप, नृत्य
व्यवसाय गायिका-संगीतकार, प्रदर्शन कलाकार, रिकार्ड निर्माता, नर्तकी, व्यवसायिका
वाद्य मौखिक, पियानो, सिंथेसाइजऱ
सक्रिय वर्ष 2005 से अब तक
वेबसाइट: ladygaga.com

छठी इंद्री से जानें मन की बात


- राजकुमार सोनी




योगनिद्रा विज्ञान से अतीनिद्रय शक्ति को जगाया जा सकता है


छठी इंद्री को जाग्रत कर हर मनुष्य दूसरे के मन की बात को आसानी से जान सकता है। यह अति प्राचीनतम विधा है। ऋषि-संत इसी विद्या का प्रयोग कर एक दूसरे की मन की बात समझकर मन ही मन समाचार का संप्रेषण करते थे।

मन से साधो
इस अदभुत योगनिद्रा विज्ञान का प्रयोग आज एस्ट्रोनोट्स को ट्रेंड करने के लिए दिया जा रहा है। क्योंकि योगनिद्रा के अभ्यास से आप अपनी अतीन्द्रिय शक्ति को जाग्रत कर सकते हैं, टेलीपैथिक कम्युनिकेशन कर सकते हैं। मान लो कि, हवाई जहाज में कोई फेलियर हो जाए, कोई तकनीकी खराबी आ जाए, धरती के सेंटर से संपर्क टूट जाए तो इन अंतरिक्ष यात्रिओं को ट्रेंड किया जा रहा है कि वे मन से मन का संपर्क कर सकें और अपनी समस्या या दिक्कत रख सकें, संपर्क साध सकें। यंत्रों से नहीं, मन से।

क्या है अतिन्द्रिय शक्तियां
अतीन्द्रिय शक्तियाँ दूर का दर्शन, दूर का श्रवण, ये काल्पनिक शक्तियां नहीं हैं, अत्यंत वास्तविक हैं। आप में से बहुत लोगों ने यह अनुभव किया होगा कि आपके मन में एक बात उठती है, एक प्रश्न उठता है और ठीक उसी समय तुम्हें मुझसे उत्तर मिल जाता है। तीन चार पत्र आज आए हुए थे। उन्होने कहा, 'ऐसा कैसे हुआ, हमारे मन में एक विचार आया, आपने उसी का जवाब दे दिया। यह कैसे हुआ?Ó यही अतिन्द्रिय शक्तियां हैं।

जो सोचा, वो पहुंचा

जो कुछ तुम सोच रहे हो वह यहां मेरे तक पहुंच रहा है और यह कोई खास शक्ति नहीं है। इसको तुम भी प्राप्त कर सकते हो। योग निद्रा के माध्यम से हम अपनी अतीन्द्रिय शक्तियों को जाग्रत कर सकते हैं। सबसे बढिय़ा बात, जिनका चित्त विश्राम में है, मन विश्राम में है, ऐसे व्यक्ति जब सत्संग सुनते हैं, जब ज्ञान श्रवण करते हैं तो वह ज्ञान उनके लिए फलित होता है। तुम तोते नहीं रह जाते हो। फिर तुम्हारे लिए कथा सुनना एक मनोरंजन नहीं रह जाता। यह तुम्हारे लिए परिवर्तन की क्रिया हो जाती है। अभी मैं जो कुछ बोलती हूँ, सच यह है कि शायद उसका पांच प्रतिशत ही आपके अंदर तक पहुंचता है। बाकी तो बस आया और गया। आप अपने ज्ञान को जीवन में लागू नहीं कर पाते। कारण, मन बड़ा बिखरा हुआ है। पर योगनिद्रा से इस बिखरे हुए मन का उपचार किया जा सकता है।

प्रार्थना में बल होगा

चित्त में चैन या विश्राम के साथ जब तुम प्रार्थना करने लगोगे तो तुम्हारी प्रार्थना में भी बल होगा। मतलब, तुम्हारी प्रार्थना तुम्हें अदभुत आनंद और अदभुत अनुभूतियों को प्रदान करेगी। अगर तुम भक्त हो तो तुम्हारी भक्ति में गहराई आ जाएगी। अगर तुम ज्ञान के साधक हो तो ज्ञान चिंतन तुम्हारा अच्छा हो जाएगा। अगर आपका प्राण शरीर स्वस्थ और उन्नत हो तो आप एक बड़ी चमत्कारिक शक्ति प्राप्त कर लेते हैं। दुनिया में चमत्कार को नमस्कार है, ज्ञान को नहीं। आज किसी चमत्कारिक बाबा के पीछे घूमने की जरूरत नहीं, तुम नियमित योगनिद्रा का अभ्यास करो, अदभुत शक्तियां जाग्रत होने लग जाएंगी। एक बात के लिए सावधान रहिए कि रजोगुणी और तामसिक व्यक्ति के पास जब शक्ति आती है तो वह अपना ही नाश कर लेता है। इसलिए शक्ति आए इसके पूर्व आपका चित्त सात्विक होना चाहिए और ईश्वर में जुड़ा हुआ होना चाहिए। सच तो यह है, जिनमें ये चीज नहीं है, उनकी शक्ति जागृत भी नहीं होती। जिनमें ईश्वर प्रणिधान यानी ईश्वर के प्रति एकाग्रता और समर्पण तथा सात्विकता होती है, उनकी शक्तियां सहज से जागने लग जाती हैं।

सच्चाई का दर्पण

अमृतसर में गुरु रामदास हरिमंदिर साहिब की सेवा करा रहे थे। सरोवर की खुदाई हो रही थी। मंदिर की नींव पड़ रही थी और दूर-दूर से गुरुनानक घर के प्रेमी इस सेवा में शामिल होने आए थे। एक महिला अफगानिस्तान से आई थी। संगत ने देखा कि बड़ी अजीब सी बात है, हर थोड़ी देर में वह अपना हाथ हवा में हिला देती। रहा नहीं गया, एक ने पूछा, 'माता जी! यह क्या कर रहे हो?Ó कहती, 'कुछ नहीं, मेरा बच्चा पालने में सो रहा है, उसके पालने को धक्का दे रही हूँ।Ó
बच्चा पालने में है! कहाँ? कहती, 'अफगानिस्तान में।Ó कहाँ? काबुल में। अमृतसर से बैठे हुए काबुल में पालने में पड़े बच्चे को यहां से थपकी दे रहे हो। यह कैसे संभव है! झूठ बोल रही है। गप मार रही है। लोगों ने गुरु रामदास से पूछा, 'गुरुदेव! यह महिला ऐसा कह रही है, क्या यह संभव है?Ó
गुरु रामदास ने कहा, 'बिल्कुल , यह सम्भव है। मन की शक्ति अपार है। मन के लिए शरीर, स्थान, देश और काल की सीमा कोई अर्थ नहीं रखती है। जिसने अपनी मनसा शक्ति को, प्राण शक्ति को विकसित किया है, उसके लिए कुछ भी असम्भव नहीं है।Ó

रहस्यमयी शक्तियों को अपनाएं

आप अपने अंदर छिपी हुई इन रहस्यमयी शक्तियों को जाग्रत करिए। ऐसी शक्तियों के माध्यम से आप पाश्विक जीवन से ऊपर उठकर देवताओं जैसा जीवन जी सकते हो। जब तुम स्वयं ऋषि हो सकते हो तो फिर पशु की भांति, एक आम इंसान की भांति हंसते-रोते, क्रोधी, कामी, लोभी होते हुए क्यो जिएं। ऐसी कोई चीज नहीं है जो तुम्हारे लिए प्राप्त करना संभव नहीं। सब चीज तुम प्राप्त कर सकते हो। फिलहाल तो तुम्हारा दिमाग इसमें है कि पैसा कैसे कमाया जाए। धन के पुजारी, पदार्थवादी, भोगवादी लोग कहते हैं कि धन कहां से आए? धन भी कमाया जा सकता है।

बनोगे धनवान भी

जब तुम संयमित और एकाग्र चित्त के साथ अपने व्यवसाय को, अपने बिजनेस को चलाओगे तो निश्चित रूप से तुम्हें ऐसे फार्मूले सूझने लगेंगे, जिनसे तुम्हारा व्यापार दिन दुगुनी रात चौगुनी उन्नति करने लग जाएगा। एक चीज समझ लें, जो सफल उद्योगपति हैं या सफल धनपति हैं वे इसलिए सफल हो सके क्योंकि उनके पास संकल्पबद्ध और एकाग्र मन था। धैर्य और संतोष के साथ उन्होंने अपने क्षेत्र में काम किया इसलिए सफलता मिली। जिस व्यक्ति के पास यह शक्ति नहीं है, वह किसी भी क्षेत्र में सफल नहीं हो सकता। धन चाहते हो धन कमाओ। शक्ति चाहते हो शक्ति प्राप्त करो। परंतु अंत में आपको यह बात समझनी होगी कि

धन से आप पदार्थ तो खरीद सकते है, धन से आप मन का विश्राम नहीं खरीद सकते। शक्ति से आप दूसरों को दबा तो सकते हैं, पर उस शक्ति का क्या लाभ जिससे तुम अपने अंधकार और अपने उद्दंडी मन को दबा न सको। शक्ति वही जिससे आप सार्थक और रचनात्मक उन्नति करें। ऊधर्वगामी हों।
ज्ञान पूर्वक अपने जीवन को जिएं। धन बुरा नहीं है, शक्ति बुरी नहीं, पदार्थ का सुख भी बुरा नहीं, पर तुम्हें मालूम होना चाहिए कि इसकी एक सीमा है। ये सब इससे अधिक तुम्हें नहीं दे सकते। सत्य पथ पर चलें। सत्य को समझते हुए सत्य की साधना करें तो आप अपने अंदर एक निर्भयता, फियरलैसनैस और शाश्वत आनंद विकसित कर सकते हैं। यह हमेशा आपके पास रहेगा और कभी आपको छोड़ कर नहीं जाएगा।

अब नहीं हैं चंबल के बीहड़ों में डाकू

- राजकुमार सोनी

चंबलघाटी से डाकुओं का खात्मा होने के बाद बड़े-बड़े इनामी डाकुओं ने महानगरों में रोजी-रोटी की तलाश में डेरा जमाना शुरू कर दिया है, लेकिन वे पुलिस के लंबे हाथों से बच नहीं पा रहे हैं। मध्य प्रदेश उत्तर प्रदेश, और राजस्थान पुलिस के संयुक्त अभियान का अब नतीजा यह सामने आया है कि चंबल घाटी में डाकुओं का लगभग खात्मा हो गया है। इससे चंबल घाटी के बाशिंदों में खुशी जैसा वातावरण देखा जा रहा है।

2003 से शुरू हुआ था अभियान
2003 में चंबल के बीहड़ों में डकैत विजया को मार गिराने का सिलसिला शुरू किया गया। इसकी कमान इटावा जिले के इकदिल इलाके में एसएसपी अखिलेश मेहरोत्रा की टीम ने संभाली थी। उसके बाद 5 जनवरी 2005 को चंदन यादव जिसकी तूती इटावा और आसपास के जिलों में बोलती थी, को पुलिस मुठभेड़ में मार गिराने के बाद एक के बाद एक तमाम छोटे-बड़े डकैतों का सफाया हो गया, लेकिन बड़े-बड़े डाकुओं के मारे जाने के बाद डाकू गैंग के सदस्य रोजी रोटी की तलाश में बीहड़ों से निकल कर शहरी इलाकों यानी बड़े-बड़े महानगरों की ओर चल दिए। बड़े-बड़े महानगरों में इन डाकुओं ने छोटी मोटी नौकरी करके अपने आप को बचाने में लगे हुए हैं।

500 डाकुओं का था आतंक
एक समय चंबल घाटी में एक अनुमान के अनुसार करीब 500 से अधिक छोटे बड़े डाकुओं का आंतक देखा जा रहा था लेकिन धीरे-धीरे बड़े और छोटे डाकू पुलिस का मुकाबला करते हुए या तो मारे गये या फिर पुलिस का दबाब बढ़ता देख आत्मसर्मपण करके अपने आप को बचाने में कामयाब हो गए। महेन्द्र सिंह परिहार के पकड़े जाने के बाद इस बात की पुष्टि हुई कि डाकू नौकरी करके अपने आपको बचाने में लगे हैं। ऐसा ही प्रेम सिंह के मामले में देखा गया। इनामी डाकू होकर प्रेमसिंह साधु बनकर लोगों की सेवा करने में जुट गया। बड़े-बड़े महानगरों में डाकुओं के काम करने का खुलासा तब हुआ जब इटावा पुलिस ने करीब 17 हजार रुपए के इनामी डाकू महेन्द्र सिंह परिहार को पकडऩे का दावा किया है। महेंद्र सिंह 2006 में मध्यप्रदेश के मुरैना में एक मुठभेड़ में मारे गए जगजीवन डाकू गैंग का खूंखार डाकू रहा है। उसने अपने दो भाइयों को खोने के बाद खुद को चंबल के बीहड़ों के हवाले किया था। बीहड़ फिलहाल डकैतों से खाली है और उसने कुख्यात दस्यु सरगना जगजीवन परिहार की मौत पर उठ रहे सवालों पर भी यह कहकर विराम लगा दिया कि जगजीवन परिहार मारा जा चुका है।

बकीला गुर्जर

बकीला गुर्जर चंबल के बीहडों में आतंक का पर्याय बन चुके एक लाख रुपए का इनामी डकैत बकीला गुर्जर पुलिस मुठभेड़ में मारा गिराया था। बकीला पिछले कुछ अरसे से चंबल के बीहडों का नया नाम था। बकीला अपने गिरोह के साथ मध्यप्रदेश के मुरैना, भिंड, शिवपुरी और राजस्थान के धौलपुर आदि में सक्रिय था और कई वारदातों को अंजाम दे चुका था। उस पर मध्यप्रदेश पुलिस ने एक लाख रुपये का इनाम घोषित किया था।

वीरान पड़ा चमन
चंबल जो कि खूंखार डकैतों के शरण स्थली के रुप में जाना जाता था, आजकल वीरान सा है। उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश के ज्यादातर दस्यु गिरोहों के खात्मे के चलते दस्युओं का खौफ जो ग्रामीणों के सिर चढ़कर बोलता था अब नजर नहीं आता, चंबल के निकट बसे ग्रामीण अधिकतर डकैतों को डकैत नहीं बल्कि बागी कहना ज्यादा पसंद करते हैं। ग्रामीणों के मुताबिक चंबल के डाकुओं के अपने आदर्श और सिद्धांत हुआ करते थे, अमीरों को लूटना और गरीबों की मदद करना चंबल के डाकुओं का शगल हुआ करता था। अन्याय और शोषण के खिलाफ विद्रोह करने वाले दस्यु भले ही पुलिस फाइलों में डकैत के नाम से जाने जाते हों, लेकिन उनके नेक कामों से लोग उन्हें सम्मान से बागी ही मानते हैं। डकैत मान सिंह गरीबी और जमीन बंटवारे व भेदभाव के कारण अपराध का रास्ता अपनाया। 1939 और 1955 के बीच मान सिंह पर करीब एक हजार एक सौ बारह डकैती और (32 पुलिस अधिकारियों की हत्या सहित) 185 हत्याओं का आरोप था।



दस्यु फूलन देवी के द्वारा 14 फरवरी 1981 को किए गए बेहमई कांड में फूलन ने एक साथ करीब 22 ठाकुरों को लाइन में खड़ाकर मौत के घाट उतार दिया था, जिसका बदला कुसमा ने 23 मई को उत्तर प्रदेश के औरैया जिले के मईअस्ता गांव के 13 मल्लाहों को लाइन में खड़ाकर फूलन के तर्ज पर ही गोलियों से भून कर लिया था।

अस्सी के दशक में महिलाएं डकैत
चंबल के पुरानी पीढ़ी के डकैत महिलाओं का बहुत सम्मान करते थे। पहले के डकैत महिलाओं को हाथ नहीं लगाते थे, महिलाओं का मंगलसूत्र कभी नहीं लूटते थे। पहली और दूसरी पीढ़ी के डकैत इस सिद्धांत और आदर्श को मानते थे। तब गिरोह में किसी महिला सदस्य का प्रवेश वर्जित था। लेकिन तीसरी पीढ़ी के डाकुओं ने अपने आदर्श बदल लिए। चंबल के बीहड़ों में लंबे समय तक कार्यरत रहे एक पूर्व पुलिस अधिकारी के मुताबिक तीसरी पीढ़ी के डकैत महिलाओं को अगवा कर बीहड़ों तक भी ले गए।

पुतलीबाई

अस्सी नब्बे के दशक में जितनी महिला डकैत हुईं, उनमें से अधिकतर डकैत गिरोहों के सरदारों द्वारा अपहरण कर लाई गई थीं। चंबल में पुतली बाई का नाम पहली महिला डकैत के रूप में दर्ज है।

गौहरबानो
गरीब मुस्लिम परिवार में जन्मी गौहरबानो को परिवार का पेट पालने के लिए नृत्यांगना बनना पड़ा। खूबसूरत पुतलीबाई पर सुल्ताना डकैत की नजर पड़ी। वह गिरोह के मनोरंजन के लिए पुतली को जबरन बुलाने लगा। पुतलीबाई अपना घर-बार छोड़ कर सुल्ताना के साथ बीहड़ों में रहने लगी। पुलिस इनकाउंटर में सुल्ताना के मारे जाने के बाद पुतलीबाई गिरोह की सरदार बनी। 1950 से 1956 तक बीहड़ों में उसका जबरदस्त आतंक रहा। पुतली बाई की गिरोह के सरदार के रूप में सबसे ज्यादा पुलिस से मुठभेड़ हुई। बीहड़ में अपनी निडरता और साहस के लिए जानी जाने वाली पुतली बाई 23 जनवरी, 1956 को शिवपुरी के जंगलों में पुलिस द्वारा इनकांउटर में मारी गई।

511 डकैतों का समर्पण

पुराने दस्यु सरगनाओं में तहसीलदार सिंह, मोहर सिंह और माधो सिंह का नाम भी आता है। मोहर सिंह और माधो सिंह 1972 में 511 डकैतों के साथ आत्मसमर्पण के बाद समाज सेवा में जुट गए। पुतली बाई के बाद फूलन देवी व कुसमा नाइन को खूंखार दस्यु सुंदरियों के रूप में जाना जाता है। विक्रम मल्लाह का साथ फूलन ने और फक्कड़ का साथ कुसमा ने अंत तक नहीं छोड़ा। गिरोह बंटने पर कुसमा नाईन कुछ दिनों लालाराम गिरोह में भी रही किंतु सीमा परिहार से लालाराम की निकटता के चलते वह राम आसरे उर्फ फक्कड़ के साथ जुड़ गई। सालों फक्कड़ के साथ बीहड़ों में बिताने के बाद 8 जून, 2004 को भिंड में मध्य प्रदेश पुलिस के सामने उसने आत्म समर्पण कर दिया। फिलहाल दोनों जेल में हैं। 1976 से 1983 तक चंबल में फूलन ने राज किया और 12 फरवरी, 1983 को मध्य प्रदेश पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। सीमा परिहार के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। फूलन की तर्ज पर चलने वाली सीमा परिहार भी दस्यु सुंदरी के रूप में बीहड़ों में काफी चर्चित रहीं। दस्यु सरगना लालाराम सीमा परिहार को उठाकर बीहड़ लाया था और बाद में लालाराम ने गिरोह के एक सदस्य निर्भय गुर्जर से सीमा की शादी करवा दी। लेकिन दोनों जल्दी ही अलग हो गए। सीमा परिहार के मुताबिक उसे लाला राम से प्रेम हो गया था, फिर उसने लाला राम से शादी कर ली जिससे उसे एक बेटा भी है। 18 मई, 2000 को कानपुर देहात में पुलिस मुठभेड़ में लालाराम के मारे जाने के बाद 30 नवंबर, 2000 को सीमा परिहार ने भी आत्म समर्पण कर दिया। फिलहाल वह जमानत पर रिहा हैं और औरैया में रहते हुए राजनीति में सक्रिय है। सीमा फूलन देवी के ही चुनाव क्षेत्र मिर्जापुर से लोकसभा का चुनाव भी लड़ चुकी हैं। अपनी कहानी पर बनी एक फिल्म में भी वे अपना किरदार निभा चुकी है, साथ ही रियलिटी शो बिग बॉस में भी काम कर चुकी है। इन दस्यु सुंदरियों में रज्जन गुजर के साथ रही लवली पांडे का भी काफी आतंक था। लवली उत्तर प्रदेश के इटावा के भरेह गांव की रहने वाली थी। 1992 में लवली की शादी हो गई थी, लेकिन पति ने उसे तलाक दे दिया। पिता की मौत और पति द्वारा ठुकराए जाने से आहत लवली की मुलाकात दस्यु सरगना रज्जन गुर्जर से हुई और दोनों में प्यार हो गया। रज्जन से रिश्ते को लेकर लवली को गांव वालों के भला-बुरा कहने पर रज्जन ने भरेह के ही एक मंदिर में डाकुओं की मौजूदगी में लवली से शादी कर ली। आतंक की पर्याय बनी 50 हजार की इनामी यह दस्यु सुंदरी 5 मार्च 2000 को अपने प्रेमी रज्जन गुर्जर के साथ पुलिस मुठभेड़ में मारी गई। श्याम जाटव को डकैत निर्भय गुर्जर ने अपना दत्तक पुत्र घोषित किया था। औरैया की रहने वाली नीलम गुप्ता का निर्भय ने 26 जनवरी, 2004 को अपहरण कर लिया था। महिलाओं के शौकीन निर्भय ने नीलम को अपना रखैल बना लिया, लेकिन जवानी व अल्लहड़पन में खोई दस्यु सुंदरी नीलम को बाबाओं की तरह दाढ़ी रखे निर्भय पसंद नहीं आए और उसने निर्भय के दत्तक पुत्र से ही आखें चार करनी शुरू कर दी। नीलम और श्याम जाटव का प्यार ऐसा परवान चढ़ा कि दोनों ने निर्भय के खौफ के बावजूद शादी कर ली। बाद में निर्भय ने दोनों की हत्या के काफी प्रयास भी किए, लेकिन निर्भय से बचने के लिए दोनों ने उत्तर प्रदेश पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। फिलहाल दोनों जेल में हैं, जबकि निर्भय करीब डेढ़ दशक पूर्व मारा गया। दस्यु निर्भय लगभग 239 गंभीर अपराधों में आरोपित था। हत्याएं, अपहरण, जबरन वसूली, सशस्त्र डकैती के सैकड़ों वारदातों को अंजाम दे चुका था।

ददुआ-ठोकिया गिरोह
एसटीएफ द्वारा दस्यु ददुआ और दस्यु ठोकिया को मुठभेड़ में मार गिराया गया। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश पुलिस ने 40 हजार रुपए के इनामी डकैत शंकर कोली को भी चित्रकूट जिले में पुलिस ने मुठभेड में मार गिराया। इन सबके अलावा सलीम गूजर-सुरेखा, चंदन यादव-रेनू यादव, मानसिंह-भालो तिवारी, सरनाम सिंह-प्रभा कटियार, तिलक सिंह-शीला, जयसिंह गुर्जर-सुनीता बाथम, बंसती पांडेय की जोडिय़ां बीहड़ों में काफी चर्चित रहीं। इनमें से सीमा परिहार और सुरेखा तथा रेनू यादव ने तो अपने प्रेमियों की निशानी के रूप में बच्चे को भी जन्म दिया। हत्या, अपहरण, लूट और डकैती जैसे 70 से ज्यादा जघन्य अपराधों के आरोपी और 15 सालों से तीन राज्यों की पुलिस को नाकों चने चबाने वाले दुर्दांत डकैत जगन ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया ताकि वह अपनी प्रेमिका और दस्यु सुंदरी कोमेश के साथ रह सके। राजस्थान के धौलपुर जिले के पूर्व सरपंच छीतरिया गुर्जर की बेटी कोमेश अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिए बंदूक उठा कर बीहड़ों में आई। गिरोह में साथ-साथ रहने के बाद जगन और कोमेश एक दूसरे के करीब हो गए। साढ़े चार फुट लंबी 28 वर्षीय कोमेश गिरोह में जगन की ढाल मानी जाने लगी। पिछले साल नवंबर में मध्य प्रदेश की मुरैना पुलिस के साथ मुठभेड़ में गोली लगने से कोमेश घायल हो गई। जगन उसे पुलिस की नजरों से बचाकर अपने साथ ले गया। लेकिन राजस्थान के धौलपुर के समरपुरा के एक नर्सिंग होम में 5 नवंबर, 2008 को इलाज करा रही कोमेश को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। कोमेश की जुदाई जगन से बर्दाश्त नहीं हुई और उससे मिलने को बेचैन जगन ने 31 जनवरी, 2009 को राजस्थान के करौली जिले के कैमरी गांव के जगदीश मंदिर में राजस्थान से सांसद सचिन पायलट के सामने इस शर्त पर आत्मसमर्पण कर दिया कि उसे और कोमेश को एक ही जेल में रखा जाए।

सौतिया डाह में गोलियों की तड़तड़ाहट
पुलिस फाइलों में इन दस्यु सरगनाओं व महिला डकैतों के अपराधों के किस्से तो दजऱ् हैं, लेकिन, उनके प्रेम और समर्पण की मिसालें नहीं। कई बार चंबल में दस्यु सरगनाओं के बीच गुटबंदी व दस्यु सुंदरियों के बीच पनपे सौतिया डाह को लेकर भी गोलियों की तड़तडा़हट हुई। कभी सीमा परिहार को ठिकाने लगाने का मन कुसमा नाइन ने बनाया तो कभी बसंती ने नीलम को। आज चंबल में न तो दस्यु सुदरियों की चूडिय़ां खनकती हैं और न ही अब गोलियों की तड़तड़ाहट ही सुनाई पड़ती है। शीर्ष के ज्यादातर डकैत मारे जा चुके हैं। कुछ छोटे गिरोह जो बचे भी हैं वे चुपचाप गिरोह को मजबूती देने में लगे हैं।

छोटे गिरोहों का भी खात्मा
कुछ और इनामी डकैतों से छुटकारा मिला
तराई क्षेत्र में आतंक का पर्याय रहे ददुआ और ठोकिया गिरोह की तरह ही छोटे-छोटे गिरोह द्वारा प्रदेश में आतंक फैलाने की होड़ मची हुई है। लेकिन पिछले कुछ समय से पुलिस कई ऑपरेशन के जरिए काफी हद तक इनका खात्मा करने में कामयाब रही है।


नए डकैत गिरोह

कई बड़े गिरोह के सरदारों से गुण सीखने वाला सुरेश गौड़ उर्फ बिज्जू मामा डकैत बनने के बाद राजाखान गैंग के साथ काम करता था। आपसी मतभेद के चलते सुरेश ने इस गिरोह से निकलकर अपना खुद का गिरोह बना लिया था। सुरेश के साथ मारे गए मनोज यादव, रामदयाल और ओमप्रकाश यादव पर भी पुलिस द्वारा इनाम घोषित था। धारकुण्डी थाने के कजरा गांव का रहने वाला सुरेश गौड़ ठोकिया गैंग में भी शामिल रहा है। अपना अलग गिरोह बनाने के बाद वह इस क्षेत्र में अपनी सल्तनत कायम करना चाहता था। राजा खान ने जब सती अनसुईया आश्रम में साधु संतों को गाली दी और फिर फायरिंग भी की तो इससे नाराज होकर सुरेश गौड़ ने अपना अलग गिरोह बना लिया। इसके पहले कि सुरेश गौड़ क्षेत्र में आतंक का पर्याय बन पाता, सतना पुलिस की टीम ने उसकी जीवन लीला समाप्त कर दी। विंध्यक्षेत्र में कुछ छोटे गिरोह अब भी सक्रिय हैं, जिनकी सघनता के साथ तलाश की जा रही है। बीहड़ ऊपर से भले ही शांत दिखाई दे रहा हो लेकिन यहां सब कुछ शांत नहीं है। तमाम बड़े डकैतों के मारे जाने के बाद भी अभी उनके हथियार और साथी सुरक्षित हैं। यह सही है कि अभी इन साथियों ने अपनी गतिविधियों को शांत कर रखा है लेकिन इसे बड़ी तैयारी भी माना जा रहा है। आगरा, धौलपुर और मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सों में आतंक का पर्याय रामविशेष गुर्जर, जगन गुर्जर के साथी संगठित हो रहे हैं तो चित्रकूट में भी रागिया, केवट गैग के बचे साथियों ने संगठित होना शुरू कर दिया है। इटावा और औरैया का बीहड़ अभी कुछ शांत है।


डाकुओं पर फिल्में
देश दुनिया मे अपराध के नए-नए तौर तरीकों के ईजाद हो जाने के बाद भी आज सिनेमा की दुनिया के निर्माता-निर्देशकों का मोह चंबल के बीहड़ों से अलग नहीं हुआ है। यह बात अलग है कि बीहड़ पर फिल्म बना कर हकीकत की तस्वीर आम दर्शकों को फिल्मकार दिखाना चाहते हों, लेकिन इससे एक बात साफ हो चली है कि कभी ऐसी फिल्मों के जरिए ही चंबल में डकैतों ने एक से एक नए-नए अपराध करके पुलिस के सामने चुनौती खड़ी की है। कभी चंबल के खूंखार डाकुओं में शुमार रहे निर्भय गुर्जर की जिंदगी पर चंबल के बीहड़ों में फिल्मांकन हुआ है। इस फिल्म को 1978 से 2005 तक का चंबल के डाकू दौर को बखूबी उकेरा गया है। निर्भय गुर्जर की जिंदगी पर बनने वाली इस फिल्म में वैसे तो 1978 से लेकर 2005 तक चंबल में रहे सभी डाकुओं को उनके प्रभाव के मुताबिक निर्माता कृष्णा मिश्रा ने सिनेमाई पर्दे पर उतारा गया है। चंबल के बीहड़ों को लेकर वैसे तो कई फिल्मों को चंबल के इन बीहड़ों ने जीवनदान दिया है। इससे पूर्व डाकू, बैंडिट क्वीन और वुंडेड फिल्में प्रदर्शित हो चुकी हैं। बीहड़ का अपना एक अलग ही लुक होता है, इसी वजह से फिल्मकार बीहड़ का मोह आज तक नहीं छोड़ पाये हैं। बीहड़ नाम की इस फिल्म में एक ऐसे सीन को फिल्माया जा रहा है, जिसे आज तक डाकुओं की किसी दूसरी फिल्म मे नहीं फिल्माया गया है। यह सीन है फूलन देवी के बेहमई कांड के बदले में किये गये कुसमा नाइन नामक महिला डकैत के मई अस्ता गांव में खूनी नरसंहार का। बेहमई कांड जहां 14 फरवरी 1981 को हुआ, वहीं मई अस्ता कांड 23 मई 1984 को बेहमई कांड के बदले स्वरूप किया गया है। बेहमई कांड में जहां फूलन देवी ने 22 ठाकुरों को मौत के घाट उतारा, वहीं कुसमा नाइन ने बेहमई कांड का बदला लेने के लिये 14 मल्लाहों को मौत के घाट उतार दिया। बेहमई कांड कानुपर देहात के राजपुर के इलाके में हुआ था, तब बेहमई वारदात के समय कानपुर देहात अस्तित्व मे नहीं था। वहीं मई अस्ता कांड आज के औरैया जिले के अयाना इलाके के मईअस्ता गांव मे हुआ। वारदात के समय औरैया जिला अस्तित्व मे नहीं था, तब इटावा जिले की औरैया तहसील हुआ करती थी। पुतली बाई के बाद कुसमा नाइन को चंबल की खूंखार दस्यु सुंदरी के रूप मे जाना जाता है। कुसमा नाइन ने संतोष और राजबहादुर नाम के मल्लाह बिरादरी के दो युवको की आंखें निकाल कर क्रूरता का एक नमूना पेश किया था।

चंबल के डाकुओं पर किताब

चंबल क्षेत्र खूंखार दस्युओं निर्भय गुर्जर, सुल्ताना डाकूऔर फूलन देवी के नाम से अभी भी जाना जाता है और इस क्षेत्र में राशन दुकानों से ज्यादा बंदूकें और कारतूसों की दुकानें हैं। लेखक एनी जैदी ने अपनी किताब नोन टर्फ बेंटरिंग विद बेंडिटस एंड अदर ट्रू टेल्स में अपने अनुभव लिखे हैं और बताया है कि इस इलाके के छोटे से शहर भिंड की बात करें तो यहां कम से कम हथियार की 150 दुकानें हैं और कारतूस भी आसानी से उपलब्ध हैं। इलाके में बंदूक रखने वालों को इन्हें रखने या इस्तेमाल करने में कोई झिझक नहीं है। हालांकि उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश के बीच चंबल क्षेत्र में चल रही बसों में आपको अक्सर लिखा दिख जाएगा कि कृपया बसों में लॉडेड बंदूकों के साथ यात्रा नहीं करें। एक जानी-मानी पत्रिका में संवाददाता के तौर पर वर्ष 2004 में चंबल के अनेक डकैतों से बातचीत कर चुके जैदी ने लिखा है, दरअसल इसी क्षेत्र में स्थानीय प्रशासन ने एक बार विचार रखा था कि परिवार नियोजन में शामिल होने वाले पुरुषों को इसके बदले बंदूकें मुफ्त दी जाएं। पुलिस के समक्ष समर्पण करने वाले डकैतों से साक्षात्कारों में जैदी ने डकैती की ओर ले जाने वाले ऐतिहासिक, भौगोलिक, सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक हालात का जिक्र किया है।


बीहड़ के डकैतों को आशिकी ले डूबी!
चंबल से लेकर बुंदेलखड तक के बीहड़ों पर बागियों का कब्जा रहा है। दूसरों का घर उजाडऩे से लेकर जान लेने तक में हिचक न दिखाने वाले कई बागी आशिक मिजाज रहे हैं। इनकी एक नहीं बल्कि कई कई महबूबाएं रही हैं। कुछ ने तो प्रेमिकाओं से विवाह रचाया तो कुछ उनके पतन का कारण बन गईं। बीहड़ में उतरे डकैतों की पहचान खून-खराबा करने की रही है। वे लूटपाट और खून-खराबा तो करते ही थे, दिल के मामले में भी बागी पीछे नहीं रहे। किसी ने गिरोह में आई लड़की से दिल लगा लिया तो किसी ने प्रेमिका को ही अपने गिरोह का सदस्य बना डाला। फूलन देवी को लोग खूंखार डकैत के रूप में जानते हैं मगर वह भी विक्रम मल्लाह से मुहब्बत करती थी। यह प्रेम कहानी सिर्फ गिरोह तक ही सीमित नहीं रही बल्कि बीहड़ की चर्चा बन गई।

निर्भय गुर्जर के तीन अफेयर
चम्बल के बीहड़ में आतंक का पर्याय बने निर्भय सिंह गुर्जर ने एक नहीं बल्कि तीन-तीन से प्यार किया। सीमा परिहार और मुन्नी पांडे ज्यादा दिन उसके साथ नहीं रही मगर नीलम ने उसके बेटे श्याम से ही मुहब्बत कर ली और निर्भय की मौत का बड़ा कारण भी बनी। इसी तरह रामआसरे उर्फ फक्कड़ ने कुसमा नाइन से मुहब्बत की। अरबिन्द गुर्जर ने लवली को अपनाया तो रज्जन गुर्जर की प्रेमिका लवली पांडे बनी। चंदन यादव और रेणु यादव की प्रेम कहानी खूब चर्चाओं में रही। सलीम गुर्जर की तो एक नहीं सात प्रेमिकाएं थीं। उसे तो बीहड़ का अय्याश कहा जाता था।

घनश्याम केवट भी थे आशिक
अभी हाल में चित्रकूट में मारे गए डकैत घनश्याम केवट भी आशिकी के मामले में पीछे नहीं था। उसका एक नहीं कई महिलाओं से रिश्ते थे। जमोली गांव में हालांकि उसका ससुराल भी था लेकिन बताया जाता है कि यहां वह अपनी प्रेमिका से मिलने आया था और मारा गया।


जन्मदिन का तोहफा

चंबल का डाकू जिसकी मौत की खबर तत्कालीन प्रधानमंत्री को उनके जन्मदिन के तोहफे के रूप में दी गई थी। फिल्म शोले में गब्बर सिंह का किरदार और यह डायलॉग कि जब पचास-पचास कोस दूर कोई बच्चा रोता है तो उसकी मां कहती है.... वास्तव में उस असली गब्बर या गब्बरा सिंह से प्रेरित था जिसका चंबल में पचास के दशक में आतंक था। गब्बरा (गब्बर सिंह के साथी अपने सरदार को इसी नाम से पुकारते थे) का जन्म मध्य प्रदेश के भिंड में एक गरीब गुज्जर परिवार में हुआ था और बीस साल की उम्र में वह कुख्यात डाकूकल्याण सिंह के गुट में शामिल हुआ। लेकिन जल्दी ही उसने खुद अपना गुट बना लिया। चंबल में अपनी धाक जमाने के लिए गब्बरा ने कई गांवों में बेवजह हत्याएं की, अपहरण किए और ताबड़तोड़ डकैतियां कीं। गब्बरा ने अपना आतंक कायम करने के लिए एक और रणनीति अपनाई। कहा जाता है कि वह ग्रामीणों को पकड़कर उनकी नाक काट देता था और उसने अपने जीवनकाल में दर्जनों लोगों की नाक काटी थी। इन घटनाओं का असर यह हुआ कि इस डाकूका नाम चंबल के साथ-साथ दिल्ली में केंद्र सरकार के लिए भी क्रूरता का पर्याय बन गया और तब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने खुद मध्य प्रदेश पुलिस प्रमुख केएफ रुस्तम को इस डकैत का सफाया करने की योजना पर काम करने को कहा था। कहा जाता है कि 1957 में गब्बरा ने एक गांव के 22 बच्चों को लाइन में खड़ा करके सिर्फ इसलिए गोली मार दी थी कि उसे शक था कि गांव के लोग उसकी मुखबिरी करते हैं। इस डकैत पर राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सरकारों ने कुल पचास हजार का इनाम घोषित किया था। इस डकैत के आतंक का अंत 1959 में हुआ जब मध्य प्रदेश पुलिस के एक विशेष दस्ते ने एक मुठभेड़ में उसे मार दिया। यह मुठभेड़ 13 नवंबर को हुई थी और इसकी सूचना देते हुए रुस्तम ने नेहरू को संदेश दिया था कि यह उनके जन्मदिन का तोहफा है।


डाकुओं की सूची

तहसीलदार सिंह
मोहर सिंह
माधो सिंह
मान सिंह
फूलन देवी
कुसमा नाईन
विजया
विक्रम मल्लाह
महेंद्र सिंह परिहार
प्रेमसिंह
लालाराम
जगजीवन
सुल्ताना
गौहरबानो
पुतलीबाई
सीमा परिहार
राम आसरे उर्फ फक्कड़
निर्भय गुर्जर
रज्जन गुजर
लवली पांडे
नीलम और श्याम
ददुआ-ठोकिया गिरोह
शंकर कोली
सलीम गूजर-सुरेखा
चंदन यादव-रेनू यादव
मानसिंह-भालो तिवारी
सरनाम सिंह-प्रभा कटियार
तिलक सिंह-शीला
जयसिंह गुर्जर-सुनीता बाथम
बंसती पांडेय
जगन-कोमेश

अन्ना को नहीं मिली अनशन की इजाजत

नई दिल्ली।। दिल्ली पुलिस ने अन्ना हजारे को 16 अगस्त से जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन अनशन के लिए अनुमति नहीं दी। मजबूत लोकपाल बिल के लिए सरकार पर दबाव बनाने में जुटी अन्ना की टीम को इससे जोर का झटका लगा है। गौरतलब है कि सरकारी लोकपाल बिल को कमजोर बताते हुए अन्ना ने 16 अगस्त से जंतर-मतर पर अनशन पर बैठने की घोषणा की थी।


दिल्‍ली पुलिस ने अन्‍ना को जंतर-मंतर पर अनशन से मना करते हुए सुप्रीम कोर्ट के 2009 में दिए गए एक आदेश का हवाला दिया है। पुलिस का कहना है कि वह कोर्ट के आदेश के मुताबिक दिल्‍ली में किसी भी स्‍थान पर बेमियादी धरना की इजाजत नहीं दे सकती। पुलिस का कहना है कि चूंकि उस समय संसद का सेशन चल रहा होगा, ऐसे में किसी को जंतर-मंतर पर पूरा जगह घेरने की इजाजत नहीं दी जा सकती है क्‍योंकि कई अन्‍य संगठन भी विरोध प्रदर्शन के लिए वहां जुट सकते हैं।

अन्‍ना की ओर धरने की इजाजत के लिए लिखी गई चिट्ठी के जवाब में दिल्‍ली पुलिस ने कहा है कि वे चाहें तो दिल्‍ली के बाहरी इलाकों में उन्हें अनशन करने की इजाजत दी जा सकती है या फिर फिर एक निश्चित समय-सीमा दे जिस दौरान उन्‍हें धरना-प्रदर्शन की इजाजत दी जा सके।

तिवारी सैंपल दे, वरना पिता घोषित कर देंगे'

नई दिल्ली ।। आंध्र प्रदेश के पूर्व राज्यपाल नारायण दत्त तिवारी की हाई कोर्ट ने खिंचाई करते हुए कहा है कि अगर उन्होंने डीएनए के लिए ब्लड सैंपल देने से इनकार किया तो उन्हें गंभीर नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अगर तिवारी सैंपल नहीं देते हैं अदालत उन्हें रोहित शेखर का पिता घोषित कर देगी। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में जानबूझकर देरी की जा रही है। कोर्ट ने कहा कि पहले के निर्देश के मुताबिक दस्तावेज पेश किए जाएं वरना तिवारी को पेश होने का निर्देश दिया जाएगा। अगली सुनवाई 2 अगस्त को होगी।


याद होगा , रोहित शेखर ने याचिका दायर करके तिवारी का बेटा होने का दावा किया है। कोर्ट ने इसकी जांच के लिए तिवारी से डीएनए टेस्ट के लिए ब्लड सैंपल देने को कहा है। लेकिन तिवारी आनाकानी कर रहे हैं।

हाईकोर्ट की जस्टिस गीता मित्तल ने गुरुवार को मामले की सुनवाई करते हुए तल्ख टिप्पणी की। उन्होंने नारायण दत्त तिवारी के वकील की दलीलों को खारिज करते हुए कहा , उन्हें (एनडी) पहले ही निर्देश दिया जा चुका है कि ब्लड का सैंपल दें , ताकि डीएनए जांच से यह तय हो सके कि रोहित उनका पुत्र है या नहीं। अगर आप (एनडी) जांच नहीं करवाते हैं तो अदालत इस तरह का आदेश जारी कर सकती है कि याचिकाकर्ता उनका (तिवारी) बेटा है।

रोहित ने कुछ फोटो भी पेश किए हैं। उनका दावा है कि इन तस्वीरों में उनके साथ दिख रहा शख्स तिवारी है। कोर्ट ने तिवारी से हलफनामा मांगा है कि वह इन तस्वीरों में अपनी मौजूदगी को स्वीकार करें या इनकार करें। कोर्ट ने तिवारी के वकील से पूछा कि हलफनामा क्यों नहीं दायर किया जा रहा है।

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

स्टार प्रचारक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान

शिवराज सिंह चौहान वर्तमान में मध्यप्रदेश प्रांत के मुख्यमंत्री हैं। आप भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्पित कार्यकर्ता हैं।


जीवन परिचय
शिवराज सिंह चौहान का जन्म मार्च १९५९ को हुआ। उनके पिता का नाम श्री प्रेमसिंह चौहान और माता श्रीमती सुंदरबाई चौहान हैं। उन्‍होंने भोपाल के बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर (दर्शनशास्त्र) तक स्वर्ण पदक के साथ शिक्षा प्राप्‍त की। सन् १९७५ में मॉडल हायर सेकेंडरी स्कूल के छात्रसंघ अध्यक्ष। आपात काल का विरोध किया और १९७६-७७ में भोपाल जेल में निरूद्ध रहे। अनेक जन समस्याओं के समाधान के लिए आंदोलन किए और कई बार जेल गए। सन् १९७७ से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक हैं। वर्ष १९९२ में उनका श्रीमती साधना सिंह के साथ विवाह हुआ। उनके दो पुत्र हैं।

राजनीतिक करियर
सन् १९७७-७८ में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संगठन मंत्री बने। सन् १९७५ से १९८० तक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के मध्य प्रदेश के संयुक्त मंत्री रहे। सन् १९८० से १९८२ तक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रदेश महासचिव, १९८२-८३ में परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारणी के सदस्य, १९८४-८५ में भारतीय जनता युवा मोर्चा, मध्य प्रदेश के संयुक्त सचिव, १९८५ से १९८८ तक महासचिव तथा १९८८ से १९९१ तक युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रहे।


जनप्रतिनिधि के रूप में
श्री चौहान १९९० में पहली बार बुधनी विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने। इसके बाद १९९१ में विदिशा संसदीय क्षेत्र से पहली बार सांसद बने। श्री चौहान १९९१-९२ मे अखिल भारतीय केशरिया वाहिनी के संयोजक तथा १९९२ में अखिल भारतीय जनता युवा मोर्चा के महासचिव बने। सन् १९९२ से १९९४ तक भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश महासचिव नियुक्त। सन् १९९२ से १९९६ तक मानव संसाधन विकास मंत्रालय की परामर्शदात्री समिति, १९९३ से १९९६ तक श्रम और कल्याण समिति तथा १९९४ से १९९६ तक हिन्दी सलाहकार समिति के सदस्य रहे। श्री चौहान ११ वीं लोक सभा में वर्ष १९९६ में विदिशा संसदीय क्षेत्र से पुन: सांसद चुने गये। सांसद के रूप में १९९६-९७ में नगरीय एवं ग्रामीण विकास समिति, मानव संसाधन विकास विभाग की परामर्शदात्री समिति तथा नगरीय एवं ग्रामीण विकास समिति के सदस्य रहे। श्री चौहान वर्ष १९९८ में विदिशा संसदीय क्षेत्र से ही तीसरी बार १२ वीं लोक सभा के लिए सांसद चुने गये। वह १९९८-९९ में प्राक्कलन समिति के सदस्य रहे। श्री चौहान वर्ष १९९९ में विदिशा से चौथी बार १३ वीं लोक सभा के लिये सांसद निर्वाचित हुए। वे १९९९-२००० में कृषि समिति के सदस्य तथा वर्ष १९९९-२००१ में सार्वजनिक उपक्रम समिति के सदस्य रहे। सन् २००० से २००३ तक भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। इस दौरान वे सदन समिति (लोक सभा) के अध्यक्ष तथा भाजपा के राष्ट्रीय सचिव रहे। श्री चौहान २००० से २००४ तक संचार मंत्रालय की परामर्शदात्री समिति के सदस्य रहे। श्री शिवराज सिंह चौहान पॉचवी बार विदिशा से १४वीं लोक सभा के सदस्य निर्वाचित हुये। वह वर्ष २००४ में कृषि समिति, लाभ के पदों के विषय में गठित संयुक्त समिति के सदस्य, भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव, भाजपा संसदीय बोर्ड के सचिव, केन्द्रीय चुनाव समिति के सचिव तथा नैतिकता विषय पर गठित समिति के सदस्य और लोकसभा की आवास समिति के अध्यक्ष रहे।


मुख्‍यमंत्री के रूप में
श्री चौहान वर्ष २००५ में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किये गये। श्री चौहान को २९ नवंबर २००५ को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई। प्रदेश की तेरहवीं विधानसभा के निर्वाचन में श्री चौहान ने भारतीय जनता पार्टी के स्टार प्रचारक की भूमिका का बखूबी निर्वहन कर विजयश्री प्राप्त की। श्री चौहान को १० दिसंबर २००८ को भारतीय जनता पार्टी के १४३ सदस्यीय विधायक दल ने सर्वसमति से नेता चुना। श्री चौहान ने १२ दिसंबर २००८ को भोपाल के जंबूरी मैदान में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद और गोपनीयता की शपथ ग्रहण की।



आम को खास बनाने के प्रणेता है श्री शिवराजसिंह चौहान

शिवराजसिंह चौहान ने मध्यप्रदेश की बागडोर उस समय सम्हाली जब राजनीतिक ज्वार-भाटे ने प्रदेश के सरकार रूपी जहाज को किनारे का रूख करने को विवश कर दिया था। राजनैतिक उठा-पठक का वातावरण और प्रशासनिक अनुभवहीनता के ठप्पे की आशंकाओं के मध्य मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री की कमान फूलों का सिंहासन नहीं था। विधानसभा निर्वाचन की चुनौती भी दूर नहीं थी। यह चुनौतियाँ आज पीछे मुड़कर देखने पर ये मामूली या आसान प्रतीत होती है इतिहास गवाह है ऐसी चुनौतियों ने कई दिगगजों को धराशायी किया है।

श्री शिवराजसिंह चौहान ने न केवल प्रशासनिक आशंकाओं और राजनीतिक अटकलों को विराम दिया, वहीं प्रदेश की जनता को संवेदनशील और आत्मीय शासन-प्रशासन का अहसास भी कराया। शासन सूत्रों के संचालन की स्थापित मान्यताएँ और प्रचलित औपनिवेशिक धारणाओं को अपनी सहज सादगी और दिल की बोली "मैं हूँ ना " से नया स्वरूप देने का कार्य सफल किया है। उन्होंने पिछले पांच साल में प्रशासन के फोकस में आम आदमी को खास बनाने का गैेरमामूली कार्य बिना किसी शोर-शराबे और आत्म वचना के कर दिखाया है। श्री शिवराजसिंह चौहान ने आम को खास बनाने के लिये पूरी सर्तकता और सहजता के साथ लोक सेवा प्रदान गांरटी विधेयक के रूप में वो करिश्मा कर दिखाया है जिसने आम आदमी को कलम के कुछ शब्दों से याचक से दाता का दर्जा दिला दिया है।

आम आदमी को मिलने वाले सेवाओं के विभागों की 26 सेवाओं की गारंटी देकर शिवराजसिंह चौहान ने प्रदेश प्रत्येक नागरिक को "मैं हूँ ना " का भरोसा दिया है। निश्चित समय में सेवा नहीं देने वाले सरकारी सेवक को अपने वेतन से विलंब की क्षतिपूर्ति के रूप में राशि देनी होगी। यह राशि 250 रूपये प्रतिदिन के मान से 5 हजार रूपये तक हो सकती है। विशेषता यह है कि जुर्माने की यह राशि सरकारी खजाने में जमा नहीं होती बल्कि कार्य में विलंब से पीड़ित आवेदक को ही दे दी जाती । "मैं हूँ ना " के भरोसे का यह स्वप्रमाणित उदाहरण है। पहले बाबू साहेब के पास आय-प्रमाण पत्र के लिये अनुनय विनय के या फिर परिजन की मौत से जीवन पर लगे प्रश्न चिन्ह में आर्थिक सहायता की गुहार करते मृतक के परिजन ऐसे दृश्य शासकीय कार्य की दिनचर्या में आसानी से दिखाई देते थे। वर्षों से स्थापित यह व्यवस्था मध्यप्रदेश में खत्म हो गई है बिना किसी क्रांति और करतब के।


श्री शिवराजसिंह चौहान के जमीनी हकीकतों से जुड़े होने और मानवीय गुणों को समझने की अद्भुत क्षमता ही इस उपलब्धि का एकमात्र और अंतिम कारण है। सबको लेकर चलने की कला के पारखी शिवराज ने लोक सेवाओं की निश्चित समय में पूर्ति की गारंटी से प्रदेश के प्रशासनिक संगठन में आमूल-चूल परिवर्तन की ऐसी प्रक्रिया प्रारंभ हो गई है जिसमें सही मायने में जनता के हाथों में राजसत्ता सौंपने की करिश्माई कामयाबी श्री चौहान को मिली है। जन को जर्नादन और तंत्र को सेवक की बात नहीं बल्कि दर्जा ही मध्यप्रदेश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार बन गया है। आम को खास बनाने के लिए श्री शिवराजसिंह चौहान की कार्यशैली "मैं हूँ ना" और आम आदमी के साथ आत्मीय संबंधों पर आधारित शासन सूत्र संचालन की व्यवस्था है। बच्चों के मामा, बहनों के भाई और माताओं के बेटे ने जमीनी अनुभवों से नौकरशाहों को जनता या यूँ कहें कि आम आदमी का सेवक बना दिया है जिसे जनता के आदेशों का पालन समय-सीमा में करना होगा अन्यथा जुर्माना देना पड़ेगा।

आम आदमी को व्यवस्था में खास का दर्जा दिलाने की श्री शिवराजसिंह की कार्यशैली में अन्त्योदय मेलों के आयोजन की व्यवस्था एक और दूरगामी पहल है। समय-सीमा में कार्यों की गारंटी से एक कदम आगे की व्यवस्था अन्त्योदय मेले है। आम आदमी को सरकार की सेवाओं और योजनाओं के लाभों के लिए किसी के चक्कर नहीं काटने पड़े। सरकार की सहायता और अनुदान की पात्रता और उपयुक्तता के लिए खोजने-बीनने का काम नहीं करना पड़े इस व्यवस्था का नाम ही अन्त्योदय मेला है। इसमें शासकीय सेवक विभिन्न योजनाओं के पात्र व्यक्तियों को चिन्हित कर आगे बढ़कर लाभान्वित कर रहे हैं। यही कारण है कि प्रदेश में अभी तक लगे 15 अन्त्योदय मेलो में 9 लाख 63 हजार 155 हितग्राहियों को 462 करोड़ रूपये की अनुदान और सहायता राशि उपलब्ध कराई गई है। आम को खास बनाने की नीयत के साथ नजरिए में भी बदलाव श्री शिवराजसिंह चौहान ने किया है। मेलों की आयोजन व्यवस्थाओं में आम आदमी को खास व्यक्ति का स्थान मिले, आयोजकों का व्यवहार शालीन और अनुशासित हो, मेलों की आयोजन व्यवस्थाओं के लिए आयोजकों को "हिकमतअमली" या 'जुगाड़' का जतन नहीं करना पड़े, इसलिए 15 करोड़ रूपये का बजट में प्रावधान किया गया है। इस बात की बारीक पकड़ श्री शिवराजसिंह चौहान की प्रशासनिक समझदारी और जमीनी हकीकतों से वाकिक निजाम की काबिलियत दिखाती है।

व्यवस्था में खास आदमी या अमीर तो हर जगह एडजस्ट होते हैं या हो जाते हैं। सरकार की सबसे अधिक जरूरत आम आदमी या गरीब को होती है। इसी "फन्डे" पर चलते हुए श्री शिवराजसिंह चौहान ने प्रदेश के गरीबों और जरूरतमंदों के कल्याण के लिए संचालित किए जाने वाले कार्यक्रमों-योजनाओं को सतत स्वरूप देने और उनके लिए राशि की कमी नहीं हो इसकी पुख्ता व्यवस्था कर दी है। इस वर्ष बजट में 50 प्रतिशत राशि गरीबों के लिए आरक्षित रखने का उचित निर्णय किया है। वहीं छात्रवृत्ति, राहत आदि के रूप में दी जाने वाली राशि के निर्धारण के लिए उसे बाजार मूल्य सूचकांकों से जोड़ कर दिए जाने की व्यवस्था कर सहायता और छात्रवृत्ति को समसामयिक स्वरूप दे दिया है। आम आदमी को खास बनाने के श्री शिवराजसिंह चौहान के कार्यों की श्रंखला काफी लंबी है। एम.पी. ऑन लाइन, परख के कार्यक्रमों के द्वारा आम को खास बनाने के कार्य को गति मिली है। आम को खास बनाने में शिवराजसिंह चौहान की प्रशासनिक क्षमता भी शामिल है उत्कृष्ट प्रबंधक के रूप में उन्होंने विकास की योजनाओं के लिए धन राशि की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ ही बेहतर वित्तीय प्रबंधन द्वारा मध्यप्रदेश की वृद्धि दर को विगत दो वर्षों में 8.67 प्रतिशत और 8.49 प्रतिशत रखने की उपलब्धि हासिल की है, इसमें विशिष्ट तथ्य यह है कि राज्य की वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है।

श्री शिवराजसिंह का "मैं हूँ ना " का भरोसा आमजन को विकास की धारा में शामिल करने और तंत्र को भी प्रबंधन कौशल से सजग और सक्रिय कर वित्तीय चिंताओं से मुक्त रखने में सफल रहा है। यही कारण है कि श्री चौहान ने मुख्यमंत्री के रूप में समाज के कमजोर निर्धन वर्ग के लिए प्रसूति, बच्चों की पढ़ाई, बीमारी, आकस्मिक दुर्घटना, विवाह और अन्त्येष्टि जैसे सभी शुभ-अशुभ कार्यों में आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के लिए मुख्यमंत्री मजदूर सुरक्षा योजना, भवन संन्निर्माण कर्मकार कल्याण मण्डल की निर्माण श्रमिक योजनाओं, मण्डी हम्माल एवं तुलावटी कल्याण योजना, शहरी घरेलू कामकाजी बहनों के कल्याण की योजना और हाथ ठेला तथा रिक्शा चालक कल्याण योजना का संचालन शुरू किया है। हाल ही में उन्होंने शहरों में रैनबसेरों में रहने वाले गरीबों को मात्र 5 रूपये की दर पर भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी राम-रोटी योजना में कर दी है। आम को खास बनाने के श्री चौहान के प्रयासों का यह अंत नहीं आरंभ है। अभी और कई तीर उनकी तरकश मे हैं जिनमें भ्रष्टाचारी की सम्पत्ति को राजसात करने, आधुनिक निजी शिक्षण संस्थाओं में गरीबों के लिए स्थान का आरक्षण आदि शामिल है। गरीबों की आशाओं और अपेक्षाओं को पूरा करने के लिये -

"बड़ी-बड़ी बातें नहीं मैं हूँ ना, बस ये शब्द ही काफी हैं
बदलाव के लिए, बहुत नहीं, बस शिवराज ही काफी है"



मप्र के मुख्यमंत्रियों की सूची

मध्य प्रदेश के गठन के बाद से अब तक कुल 28 मुख्यमंत्री हुए हैं और 29 वे मुख्यमंत्री के तौर पर शिवराज सिंह चौहान हैं अब तक हुए 28 मुख्यमंत्रियों की सूची में 21 कांग्रेस के और 7 गैर कांग्रेसी रहे हैं। कांग्रेस के श्यामाचरण शुक्ल और अजरुन सिंह तीन-तीन बार, भगवंत राव मंडलोई, कैलाश नाथ काटजू, द्वारका प्रसाद मिश्र, प्रकाश चन्द सेठी, मोतीलाल वोरा और दिग्विजय सिंह दो-दो बार और रविशंकर शुक्ल, गोविन्द नारायण सिंह, नरेश चन्द्र सिंह एक-एक बार मुख्यमंत्री बने हैं। भाजपा के सुन्दरलाल पटवा दो बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं मगर 10 साल के अंतर से। इसके अलावा भाजपा के कैलाश जोशी, वीरेन्द्र सखलेचा, उमा भारती और बाबूलाल गौर भी एक-एक दफा प्रदेश की कमान संभाल चुके हैं।

उल्लास के लोकपर्व

- राजकुमार सोनी

भारत विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों और धर्मों का देश है, जिसके हृदय-स्थल मध्यप्रदेश में स्थित है- वीरप्रसू भूमि बुंदेलखण्ड। सम्पूर्ण भारत की भांति बुन्देलखण्ड में भी सभी राष्ट्रीय, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक तीज-त्यौहार रक्षाबंधन, दशहरा, दीपावली, होली, रामनवमी, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस आदि बड़े उल्लासपूर्वक मनाए जाते हैं। इन सभी पर्वों, त्यौहारों का राष्ट्रीय महत्व है, किंतु बुन्देलखण्ड के कुछ अपने अलग अनोखे त्यौहार हैं जिनकी धाक देश-विदेशों में धमक रही है।

ÓजवारेÓ

चैत्रमास के दूसरे (शुक्ल) पक्ष की प्रतिपदा से आरम्भ होने वाला यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है। चैत्र और क्वांर मास का नवदुर्गा पूजन Óजवारों का पर्वÓ कहलाता है, जो दोनों माहों के शुक्ल पक्षों में प्रतिपदा से लेकर नवमी तक मनाया जाता है। ÓजवारेÓ शक्तिपूजा के रूप में असीम श्रद्धा के परिचायक है। चैत्र और क्वांर के महीनों में नवदुर्गा की समाप्ति पर नवमी को ये जलूस निकाले जाते हैं। बच्चे, युवक और वृद्ध अपने मुखों तथा अन्य अंगों में त्रिशूल या सांग छिदाकर, मोरपंखों के चंवर, मस्ती से हिलाते-झूमते माता के मंदिर तक जाते हैं। इनके पीछे-पीछे घटो (घड़ों) को, जिनमें गेहूं के ÓजवारेÓ उगे होते हैं, सिर पर धारण किए हुए नर-नारियां माता के भजन गाते जुलूस में चलते हैं-
दिन की ऊरन, किरन की फूटन,
सुरहिन बन को जायें हो मांय।
एक बन चाली सुरहिन, दो बन चाली,
तिज बन पोंची जाय हो मांय।।
इस गायन को 'अंचरीÓ कहा जाता है। यह पर्व शक्ति-पूजा का पर्व कहलाता है क्योंकि शक्ति की प्रतीक-देवी दुर्गा इस पर्व की इष्ट देवी हैं।


चैती पूनो
बुन्देलखंड में चैत मास की पूर्णिमा को यह पर्व मनाया जाता है। उस दिन चैक पूजकर मिट्टी के कोरे घड़े में लड्डू या खुरमा बना कर भरे जाते हैं। हल्दी-चन्दन-अक्षत आदि उस घड़े पर लगा कर होम-दीप से पूजन होता है और प्रसाद वितरित किया जाता है।

गनगौर-पूजन
बुन्देलखंड का गनगौर-पूजन पर्व चैत्र शुक्ल तृतीया को मनाया जाने वाला स्त्रियों का प्रमुख पर्व है। इसमें सुहागिन स्त्रियां दिन-भर व्रत रखती हैं और रात्रि में गौरी पूजा करती हैं। बेसन का पकवान ÓगनगौराÓ इस पर्व पर प्रमुख रूप से बनाया जाता है, जो आभूषण की भांति मां गौरी की प्रतिमा को पहनाया जाता है। यही इस पर्व का नैवेद्य (प्रसाद) है, जो केवल स्त्रियों में वितरित होता है।

आसमाई

बैशाख माह के कृष्ण पक्ष की दौज को मनाया जाने वाला आसमाई त्यौहार भी स्त्रियों से जुड़ा है। स्त्रियां इस दिन गुड़ के घोल में आटा माड़कर जो पूडिय़ां बनाती हैं, उन्हें ÓआसÓ कहा जाता है। व्रत धारण करने वाली स्त्रियां सात ÓआसेंÓ पटे पर रखती हैं और पहले से ही पूरे (बनाये) गए चैक पर उस पटे को रक्खा जाता है। फिर पानी की भरी गगरी और चार कौडिय़ों की पूजा होती है। किसी छोटे बालक द्वारा उन कौडिय़ों को पासों की भाँति पारा (फेंका) जाता है। तदोपरांत व्रतधारक स्त्री उन 'आसोंÓ को खाकर पूजा की गगरी का जलपान करती है। गनगौर की भांति ही पूजा के बाद स्त्रियाँ कहानी भी कहती हैं।

सिड़ौरा
वैशाख माह की अमावस्या को यह पर्व मनाया जाता है। इसमें स्त्री-पुरुष सभी समान रूप से सहभागिता करते हैं। कृषक-गण इस त्यौहार को चैक पूरते हैं, उस पर भरा हुआ कलसा रखते हैं। कलसे पर गुड़ तथा सत्तू किसी कटोरे में भरकर रखा जाता है। तदोपरांत भूमि-पूजन कर बैलों और हरवारे को तिलक लगाया जाता है। इस तरह कृषिकार्य का उद्घाटन हो जाता है, जिसे Óहरायतें लेनाÓ कहा जाता है।

अकती (अक्षय तृतीया)

बैशाख मास के शुक्ल पक्ष में तीज के दिन का यह पर्व कुंवारी कन्याओं एवं विवाहित महिलाओं के लिए अलग-अलग महत्व रखता है। इस पर्व को कृषक भी बड़े उत्साह और उल्लासपूर्वक मनाते हैं। सबसे पहले चार कलशों में पानी भरकर, पूरे गए चैक पर रखा जाता है। इन घड़ों पर वर्षा के चार माहों- क्रमश: असाढ़, सावन, भादों तथा कुंआर के नाम लिखे जाते हैं। इन घड़ों पर अमियां (कच्चे आम) और रोटियां रखी जातीं हैं तथा प्रत्येक घड़े में चनों के दाने डाल दिए जाते हैं। तत्पश्चात पूजा-होम आदि करके प्रतीक्षा की जाती है कि दूसरे दिन जिस घड़े के चने फूल जाते हैं, उस घड़े पर अंकित मास में ही वर्षा होगी, ऐसा अनुमान व विश्वास किसानों में होता है। इस तरह ही इस त्यौहार से कृषि-वर्ष का आरम्भ माना जाता है।
उधर कन्याएं और स्त्रियां संध्या होते ही ÓअकतीÓ के गीत गाते हुए किसी सरोवर या नदी पर जाती हैं और सोन (गले हुए देवल) वितरित करतीं हैं। कन्यायें पुतलियां सजातीं हैं और उनकी पूजा करतीं हैं। बालक पतंग उड़ाते हैं। स्त्रियां परस्पर हास्य-विनोद करती हुई, अपने-अपने पतियों के नाम जोड़कर इस प्रकार रसमग्न होती हैं-
Óटाठी भरो घिऊ, हमाओ और
को एकई जिऊ।Ó

बरा-बरसात

अकती-पूजन के बाद ज्येष्ठ मास में प्रथम पक्ष की अमावस्या को बरा-बरसात का पावन पर्व बुंदेलखंड की स्त्रियां बरगद की पूजा कर मनातीं हैं। इस दिन गाती-बजाती महिलायें बरगद बृक्ष के समीप जाती हैं और बृक्ष के तने को सूत के धागों से लपेटतीं और श्रद्धापूर्वक पूजन करतीं हैं। सूत का इस तरह प्रयोग शायद सूत कातने के प्रति रुचि जागृत करने की दृष्टि से होता है। इस पर्व पर मान्य अतिथियों को भोजन पर आमंत्रित करने की परम्परा है।

असाढ़ी देवी-देवता
असाढ़ मास से वर्षा का प्रारंभ माना जाता है। ऐसी किवदंती है कि आगामी चार मासों में वर्षा की विकटता को देखकर देवी-देवतागण पाताल में राजा बलि के यहां-पाताल में चले जाते हैं। इसी मान्यता को दृष्टि में रख कर ही लोग, गाँव के बाहर जाकर समस्त देवी-देवताओं की पूजा करते हैं और वही ÓगकरियांÓ बनाकर खाते हैं तथा पिकनिक जैसा आनंद लेते हैं।

कुनघूसी पूनें
बुन्देलखण्ड का यह पर्व असाढ़ मास की पूर्णिमा को हर घर में गृह-लक्ष्मियों की पूजा करके मनाया जाता है। इस उत्सव में सास घर की दीवार पर उतनी ही पुतलियां बनाती है जितनी उसकी बहुयें होती हैं और फिर उनकी पूजा करती है। पूजा के पश्चात इष्ट देवी से प्रार्थना करती है- Óहे परमेश्वरी बहू ! घर में लक्ष्मी बनकर तू इस घर को धन-धान्य और सन्तान से भर दे।Ó कुनघुसूं पूनें को गुरुपूर्णिमा के रूप में भी मनाया जाता है।


हरी ज्योति-पर्व
इस पर्व के दिन माताएं, भाभियां तथा घर की अन्य बड़ी जेठी महिलायें दीवार पर कन्याओं की पुतलियां बनातीं हैं तथा उनकी पूजा करतीं हैं। यह त्यौहार कन्याओं के प्रति सम्मान प्रकट करने वाला है।

श्रावण तीज

श्रावण शुक्ल तृतीया को मनाया जाने वाला यह पर्व Óझूला-पर्वÓ कहलाता है। वृक्षों पर झूले डाल कर स्त्री-पुरुष, सावन-राग गाते हुए झूलने का पूरा आनंद उठाते हैं। वर्षा की बहार इस माह में पूर्ण यौवन पर होती है। चकरी, भौंरा, चपेटा, बांसुरी आदि से खेलते लोग आनंद राग में खूब मौज मस्ती से सारे श्रावण-मास को सरस बना देते हैं। इसका अभिप्राय अच्छी फसल को आमंत्रण देना होता है। महिलाएं अपने हाथ की हथेलियों पर मेहदी रचातीं हैं।

श्रावण शुक्ल-नवमी पर्व
स्त्रियों का यह पर्व सावन मास में शुक्ल पक्ष की नवमी को होता है। स्त्रियां आज के दिन व्रत रखती हैं और कुठिया (अनाज रखने का मिट्टी से बना एक पात्र) या कुठलिया को गोबर और पोतनी मिट्टी से लीप-पोतकर उसके ऊपर नौ पुतरियां बनातीं हैं, उनकी श्रद्धापूर्वक पूजा करती हैं और पकवान, मिष्ठान्न चढ़ाकर परस्पर कहानी सुनाती हैं।

मामुलिया
श्रावण-भादों में सर्वाधिक पर्व मनाए जाते हैं। जिनमें एक है-लड़कियों का पर्व माहुलिया या मामुलिया, जिसे लड़कियां खेल के रूप में मनाती हैं। लड़कियां बेरी की कांटेदार डाल के प्रत्येक कांटे पर रंग-बिरंगे अनेकानेक पुष्प, खीरे की फांकें, जलेबियां आदि सजा-संवार कर पिरोती हैं, जिसे ÓमामुलियाÓ का नाम देती हैं। इस सजी-संवरी हुई डाल को भूमि पर सीधा खड़ा करतीं हैं। उसको घेरकर नाचती, गाती, बजाती है। फिर उसी प्रकार गाती-बजाती, उचकती, कूदती, नाचती हुई गांव में घूमती हैं। गीत-
मामुलिया ! मोरी मामुलिया !
कहाँ चली मोरी मामुलिया।
मामुलिया के आए लिवौआ,
झमक चलीं मोरी मामुलिया।।
ले आओ-ले आओ
चम्पा चमेली के फूल,
सजाओ मोरी मामुलिया।
ले आओ-ले आओ घिया,
तुरैया के फूल,
सजाऔ मोरी मामुलिया।।
जहां राजा अजुल जू के बाग,
झमक चलीं मोरी मामुलिया।
मामुलिया ! मोरी मामुलिया !
कहां चलीं मोरी मामुलिया।।
ये लड़कियां गाती-नाचती हुई, गांव का चक्कर लगाकर, किसी तालाब में ÓमामुलियाÓ को सिरा देती हैं। फिर ककड़ी-खीरे खाकर अपने-अपने घरों को लौट जाती हैं। इस समय वे पीछे घूमकर नहीं देखतीं क्योंकि उनका विश्वास है कि पीछे घूम कर देखेंगी तो उन्हें भूत लग जाएगा। इसलिए वे यह कहती हुई भागती हैं- Óपन्ना के भूत लगे तीन।Ó लड़कियाँ इस खेल-ÓमामुलियाÓ को वर्ष में कई बार खेलती हैं।

कजली या भुजरियां
इस पर्व का ऐतिहासिक महत्व है। बुन्देली वीर काव्य आल्हा के प्रसंगानुसार, पृथ्वीराज द्वारा महोबा घेरने पर आल्हा-ऊदल ने जोगी के वेष में आकर चन्द्रावली की कजरी सिरवाई थी। इस पर्व पर पत्तों के छोटे-छोटे दोनों अथवा मिट्टी के पात्रों में गेहूं या जौ के पौधे उगाए जाते हैं। आठ दिनों के अंदर विकसित इन पौधों को श्रावण मास की पूर्णिमा तथा भाद्रपद की प्रथम प्रतिपदा को गांव के बाहर स्थिर सरोवर में सिराया जाता है। आल्हा-ऊदल के नगर महोबा में यह पर्व बड़े उत्साह और उल्लासपूर्वक मनाया जाता है।

हरछठ
यह पर्व भादों बदी छठ को स्त्रियां मनाती हैं, जो श्रीकृष्ण के अग्रज बलराम का जन्मदिन भी है। संतान-हित में मनाये जाने वाले इस पर्व पर स्त्रियां व्रत रखतीं हैं और स्वयं उत्पन्न हुई खाद्य-वस्तुएं तथा भैंस का दूध, दही, मक्खन, घी आदि खातीं हैं। इस पर्व पर जोत-बोकर पैदा किया गया-अन्न या फल ही खाया जाता है।

संतान सप्तमी
भाद्र पद शुक्ल की सप्तमी को यह पर्व अपनी संतति की आयुवृद्धि हेतु स्त्रियां मनाती हैं। दिन भर व्रत रखके उस दिन सात पुआ अथवा सात मीठी पूडिय़ां वे खाती हैं। सोना या चांदी की उतनी चूडिय़ाँ बनवाकर, जितनी संतानें होतीं हैं, हर स्त्री उनकी (चूडिय़ों की) पूजा करती है और पहनती है।

नौरता और झिंझिया
क्वांर मास के शुक्ल पक्ष की परवा से नवमी तक मनाया जाने वाला यह पर्व कुंवारी (अविवाहित) कन्याओं का त्यौहार है। कई दिनों पूर्व से इस त्यौहार के लिए कन्यायें पत्थर, गिट्टी को महीन पीसकर चूरा (दुधि) बनाती हैं जिसमें विविध प्रकार के रंग मिलाकर रंग-बिरंगे चूरे से नौ दिन तक अपने पड़ोस के, चुने हुए चबूतरे पर, विभिन्न प्रकार के चैक पूरतीं हैं। मां गौरी की प्रतिमा सजाकर उसकी पूजा करती है और सुआटा खेलती हैं। प्रात:काल नित्य नौ दिनों तक यह कार्यक्रम चलता है जिसके साथ-साथ वे लड़कियां प्रात: की मधुर बेला को अपने इस गीत से और सरस बना देती हैं-
हिमांचल जू की कुंवरि लड़ायती, नारे सुआटा,
मेरी गौरा बेटी नेबाती बनइयो बेटी नौ दिना,
नारे सुआटा, दसारे दिन करहों सिंगार।
उठौ, उठौं सूरजमल भैया भोर भये, नारे सुअटा,
मालिनीं खड़ीं हैं तेरे द्वार।
इन्दरगढ़ की मालिनीं नारे सुअटा,
हाटई हाट विकाय।
उठो, उठो चन्द्रामल भैया भोर भये, नारे सुअटा,
मालिनीं खड़ीं हैं, तेरे द्वार।
इन गीतों की डोर काफी लम्बी होती है। जिसे ये लड़कियां निरंतर गाती हुई, अपने-अपने चैक पूरतीं रहती है। इन लम्बे गीतों में अपने भाई-बहिनों तथा उनके आभूषणों के नाम जुड़ते चले जाते हैं। साथ ही अपनी गौर की अच्छाई और पराई गौर की बुराई का बखान होता चलता है। सात दिनों तक चलती इस प्रक्रिया के क्रम में आठवें दिन थोड़ा परिवर्तन होता है। तब कन्याएं ÓसुअटाÓ न खेलकर रात्रि में झिंझिया का खेल खेलती है। यह खेल ÓझिंझियाÓ गीत-गायन करते हुए संध्या के उपरांत खेला जाता है। इसमें एक कोरे घड़े में अनेक छेद कर लिए जाते हैं। उस घड़े में जलता हुआ दिया रखकर, लड़कियां उसे सर पर रखे हुए, झिंझिया गीत गाती हुई द्वार-द्वार जाकर आटा, अनाज व पैसों की उगाही करतीं है जिसे ÓढिरियाÓ मांगना कहा जाता है। गीत की शुरुआत इस तरह होती है-
पूंछत-पूंछत (बूझत-बूझत) आए हैं,
नारे सुअटा, कौन गली तोरी पौर,
बड़ी अटारी बड़े ढवा,
नारे सुअटा, बड़ेई तुम्हारे नांव।
यह गीत काफी लम्बा है जो ये लड़कियां गाती हुई गांव का चक्कर लगातीं हैं। फिर किसी सरोवर या सरिता में ÓढिरियाÓ सिरा दी जाती हैं और अपनी वसूली से ÓगोटÓ या Óहप्पूÓ (एक प्रकार की बुन्देलखंडी लोक पिकनिक) का सामूहिक आयोजन करती हैं। ÓसुअटाÓ और ÓढिरियाÓ गीतों के बीच-बीच में गौरी पूजन के समय लड़कियां आरती गाती हैं-
झिलमिल झिलमिल आरती,
महादे तोरी पारती।
को बऊ नौनी, चन्दाबलि नौनी,
सुरजावलि नौनी,
नौनी तो नौनी, भौजी भौत सलौनी।
विरन हमाए भौजी कन्त तुमाये,
झिलमिल झिलमिल आरती।।

महालक्ष्मी और इच्छा नौमी
क्वांर मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को स्त्रियां महालक्ष्मी पर्व लक्ष्मी-पूजन करके तथा कार्तिक सुदी नवमी को इच्छा नौमी का पर्व आंवले के वृक्ष की पूजा करके मनाती हैं। आंवले के वृक्ष की इतनी पवित्रता मानी जाती है कि इस दिन उसके नीचे ब्राह्मण भोज कराने से किसी का भी धन-हरण का पाप मिट जाता है तथा मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।


ÓटेसूÓ पर्व
क्वांर मास में शुक्ल पक्ष के आरम्भ होते ही ÓनौरताÓ अथवा ÓसुअटाÓ का खेलोत्सव जिस प्रकार कन्याएं मनाती हैं, उसी प्रकार अष्टमी के दिन बुन्देलखण्ड के बालक ÓटीसूÓ या ÓटेसूÓ का खेलोत्सव मनाते हैं, जिसमें ये लड़के मिट्टी, बांस, खपच्ची आदि सामग्री से तीन टांग वाला पुतला बनाकर उसे रुई अैर रंग-बिरंगे कपड़ों व कागजों से बढिय़ा सजाते हैं और फिर उत्साह तथा उल्लासपूर्वक गीत गाते हुए जुलूस निकालते है। तीन टांगों और चार भुजाओं वाले साज-सज्जित, इस पुतले के साथ ही एक बालक को भी टेसू की भांति सजाया जाता है जो अपने ÓटेसूÓ की स्तुति-गान करता चलता है। एक ओर जहाँ कन्यायें झिंझिया गीत गाती हुई, अपनी सरस स्वर लहरियों द्वारा मानस के मन को मोहती चलती हैं, तो दूसरी ओर ये किशोर बालक टेसू गीत गाते हुए, जनमानस का मनोरंजन करते द्वार-द्वार घूमते हैं-
टेसू अगड़ करें, टेसू बगड़ करें।
टेसू झगड़ करें, टेसू लेई के टरें।।
टेसू मारें घर बल्लाएं,
चकिया-चूल्हे सब वह जाये।
पानी पीते तीन घड़ा, खाने को चाहिए तीन पड़ा।
टेसू बब्बा हेंई अड़े, खाने को मांगे दही बड़े।
दही बड़े में मिर्ची भौत, टेसू पहुँचे कानी हौद।।
टेसू बब्बा कों के? धरम पुरा के।
टेसू जाते द्वार द्वार, हाथ लिए पैनी तलवार।।
टेसू लिए बीर कौ रूप, वे हैं बुन्देलखंड के भूप।
उनकी अजब निराली शान, भागें नर या हों शैतान।।
इसलिए दैदो इनकी चैथ, चाहे थोंड़ी ही या भौत।
इससे बे टकराते पामर, जिनकी खड़ी सामने मौत।।
इस प्रकार एकत्र किया गया-अन्न-धन, शरद पूर्णिमा के दिन वीर ÓटेसूÓ और ÓझींझियाÓ सुन्दरी के विवाह के उपलक्ष में आयोजित प्रीतिभोज पर व्यय होता है। ऐसा लगता है कि यह उत्सव बच्चों के भावी जीवन की तैयारी सिखाने का पर्व है।

करवा-चौथ
कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को सौभाग्यवती नारियां अपने पति की रक्षार्थ जो व्रतोत्सव मनाती हैं, वह सम्पूर्ण बुन्देलखंड में करवा-चैथ के नाम से जाना जाता है। स्त्रियाँ स्नान करके चौक पूरती हैं। उस पर पटा रखती हैं। उस पटे पर जलभरा लोटा रखा जाता है। मिट्टी का एक करवा भी रखा जाता है, जिसमें गेहूं भरे होते हैं। करवे पर रखे ढक्कन में कुछ रुपए-पैसे और चीनी भर दी जाती है। फिर रोली, गुड़, चावल आदि से पूजन होता है। करवे का टीका तेरह बार किया जाता है, तथा उसे पटे के चारों ओर घुमाकर उसी पर रख देते हैं। तब लोटे को, जिसे श्री गणेश जी का कलश कहते हैं, गुड़, चावल आदि स्त्रियों द्वारा ही चढ़ाया जाता है। हाथों में गेहूँ के तेरह दाने लेकर स्त्रियां करवा-चौथ पर्व की कथा का श्रवण करतीं हैं। कथा सुनने के बाद करवा पर हाथ फेरती हैं और फिर अपनी-अपनी सासों के चरण स्पर्श करतीं हैं। हाथों में लिए गेहूं के दानों और कलश को फिर यथा स्थान रख देती हैं। रात्रि में चन्द्रदर्शन के उपरांत उसे अध्र्य देकर प्रसाद ग्रहण करतीं हैं। इस तरह दिनभर रखा गया स्त्रियों का व्रत रात्रि में खुलता है और वे प्रसन्नतापूर्वक वस्त्राभरण धारण कर खूब सजती-संवरतीं हैं।

बुंदेलखंड के अन्य लोकपर्व
इन लोक-पर्वों के अलावा तीजा, ऋषि-पंचमी, गड़ालेनी आठें, ढोल ग्यारस, मैराईछठ, बाबू की दोज, अनंत चैदस आदि तीज-त्यौहार भी श्रद्धा-विश्वास के साथ मनाए जाते हैं। दशहरा, दीपावली, होली आदि धार्मिक सामाजिक पर्वों के साथ-साथ स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, गाँधी जयंती आदि राष्ट्रीय पर्व भी हर्षोल्लास के साथ मनाए जाते हैं। इन सबमें होली और दीपावली पर्वों में बुन्देली-छाप क्रमश: फाग-गायन और मौनिया लोकनृत्यों में दर्शनीय होती है। होली पर राई नृत्य और फाग-गायन की अनोखी परम्परा बुन्देलखंड में ही देखने को मिलती है। बुन्देलखंड के इन लोकपर्वों में लोकसंस्कृति कूट-कूटकर भरी हुई है जो वैज्ञानिक दृष्टि से भी अति महत्वपूर्ण है।

देश के अमीर मंदिर

- राजकुमार सोनी


दुनिया के सबसे अमीर मंदिर भारत में ही हैं। भारत में 10 लाख से भी ज्यादा मंदिर हैं और इनमें से 100 मंदिर ऐसे हैं, जिनका सालाना चढ़ावा भारत के बजट के कुल योजना व्यय के बराबर होगा। अकेले 10 सबसे ज्यादा धनी मंदिरों की ही संपत्ति देश के 100 मध्यम दर्जे के टॉप 500 में शामिल उद्योगपतियों से ज्यादा हैं। धन और धार्मिक मान्यता के लिहाज से भारत के धनी मंदिरों की अगुवाई हालांकि तिरुमाला का वेंकटेश्वर मंदिर करता है। लेकिन अब तिरुवनंतपुरम का पद्मनाभ स्वामी मंदिर देश का सबसे अमीर मंदिर बन गया है। भगवान बालाजी तिरुपति को धन के मामले में पीछे छोड़ते हुए इस मंदिर ने देश के सबसे अमीर मंदिर होने का गौरव पा लिया है।




सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पद्मनाभ स्वामी मंदिर के धन का आकलन शुरू किया गया और अब यह तय हो गया है कि यही भारत का सबसे अमीर मंदिर है। मंदिर के पास पांच लाख करोड़ रुपए के सोने की र्मूिर्तयां, हीरे- जवाहरात, आभूषण और सोने-चांदी के सिक्के पाए गए हैं। यह राशि तिरुपति मंदिर के खजाने की कई गुना अधिक है। जबकि पदमनाथ मंदिर का छठा तिलिस्म तहखाना शुक्रवार को खुलेगा। इसमें लगभग 25 लाख करोड़ का खजाना मिलने की आशंका व्यक्त की जा रही है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में वीडियोग्राफी और कार्रवाई की जा रही है।

गुप्त गर्भगृहों में अपार दौलत
केरल की राजधानी थिरुअनंतपुरम के पद्मनाभस्वामी मंदिर में अरबों रुपए का खजाना मिला है। शयन मुद्रा में विराजमान विष्णु भगवान की मूर्ति वाले मंदिर के पास पांच लाख करोड़ रुपए के हीरे-जवाहरात, आभूषण और सोने के सिक्के पाए गए हैं। पद्मनाभस्वामी मंदिर दुनिया का सबसे अमीर मंदिर है। त्रावणकोर के शाही परिवार ने यह दौलत अंग्रेजों से बचाने के लिए मंदिर के गुप्त गर्भगृहों में रखा था। मंदिर के खजाने का ऑडिट चल रहा है। केरल हाईकोर्ट के आदेश पर भेजे गए रिटायर्ड जजों की देखरेख में हीरे-जवाहरात तथा आभूषणों की गिनती का काम किया गया। अब तक यहां कई मन जवाहरात, लाखों सिक्के, हीरे के मुकुट, हजारों सोने के हार, अंगूठियां वगैरह मिली हैं। सोने का एक हार तो 28 फुट लंबा है और उसकी कीमत करोड़ों में है। उम्मीद है कि गर्भगृहों में बेशुमार दौलत और निकल सकती है।


सुप्रीम कोर्ट करेगा देखरेख
त्रावणकोर के तत्कालीन महाराजा ने अपनी काफी बड़ी दौलत मंदिर के कई गर्भगृहों में छुपाई थी। लेकिन उनके वंशजों की प्रशंसा करनी होगी जिन्होंने इस संपत्ति में कभी हाथ नहीं लगया। अब इस संपत्ति को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार ही रखना होगा। इसका वारिस कौन होगा यह सुप्रीम कोर्ट ही तय करेगा। अब तक त्रावणकोर के महाराजा का परिवार ही इस मंदिर की देखरेख करता था। पूरे धन का पता चल जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट आगे सुनवाई करेगा।

मंदिरों में 7 अरब डालर का सोना
भारत के प्रमुख धनी मंदिरों के पास इतना सोना है, जितना सोना शायद आरबीआई के पास भी न हो। अकेले टॉप 100 मंदिरों के पास ही 7 अरब अमेरिकी डॉलर के बराबर का सोना है। बालाजी का मंदिर देश का अकेला धनी मंदिर नहीं है। देश में और भी कई मोटा पैसा बनाने वाले मंदिर हैं। केरल का गुरुवयूर मंदिर, शिरडी के साई बाबा का मंदिर, मुंबई का सिद्धिविनायक मंदिर, जम्मू का माता वैष्णो मंदिर, गांधी नगर का अक्षरधाम मंदिर, विशाखापट्टनम का सीमाचल मंदिर, पुरी का जगन्नाथ मंदिर, कोलकाता का काली मंदिर और अमृतसर का स्वर्ण मंदिर ऐसे ही मंदिरों में शामिल हैं।

गुरुवायूर मंदिर
केरल देवासन बोर्ड के अधीन भगवान कृष्ण के गुरुवायर मंदिर की सालाना आय 2.5 करोड़ रुपए है और लगभग 125 करोड़ रुपए फिक्स्ड डिपॉजिट में जमा है।
गुरुवयूर देवस्थानम एक्ट 1971 के जरिए संचालित सबरीमाला पहाडिय़ों में स्थित केरल का यह मंदिर यों तो चढ़ावे के मामले में भले बालाजी के सामने न टिकता हो, लेकिन इस मायने में यह अनोखा मंदिर है कि जनवरी 2010 में महज 15 दिनों में ही यहां 120 करोड़ रुपए से ज्यादा का चढ़ावा चढ़ गया। यहां भगवान अयप्पा स्वामी के भक्त दिल खोलकर दान करते हैं। दुनिया में अगर किसी एक मंदिर में एक साल में सबसे ज्यादा श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं तो वह यही गुरुवयूर मंदिर ही है। जहां औसतन 5 से 5.5 करोड़ लोग हर साल दर्शन करने पहुंचते हैं। यह संख्या इसलिए मायने रखती है, क्योंकि यह मंदिर पूरे साल नहीं खुलता। साल के कुछ दिनों में ही खुलता है। त्रिशूर जिला स्थित इस मंदिर में विशिष्ट पूजा के लिए वर्ष 2049 तक की बुकिंग हो चुकी है। यह तब है, जबकि यह विशिष्ट पूजा 50,000 रुपए में होती है। गुरुवयूर मंदिर के 125 करोड़ रुपये विभिन्न बैंकों में फिक्स डिपोजिट करके रखे गए हैं।


तिरुपति बालाजी
भारत के धनी मंदिरों की लिस्ट में तिरुपति बालाजी नंबर वन पर हैं। भगवान का खजाना पूरे जमाने के राजा-महराजाओं को भी मात देने वाला है। तिरुपति के खजाने में आठ टन ज्वेलरी है। 650 करोड़ रुपए की वार्षिक आय के साथ तिरूपति बालाजी भारत में दूसरा सबसे अमीर देवता है। अलग-अलग बैंकों में मंदिर का 3000 किलो सोना जमा और मंदिर के पास 1000 करोड़ के रुपए फिक्स्ड डिपॉजिट हैं।
300 ईसवी के आसपास बने भगवान विष्णु के वेंकटेश्वर अवतार के इस मंदिर में रोज करीब 50 हजार से एक लाख लोग आते हैं। साल के कुछ खास दिनों विशेषकर नवरात्र के दिनों में तो यहां 20 लाख तक लोग हर दिन दर्शन करने पहुंचते हैं। बड़ी संख्या में यहां सिर्फ श्रद्धालु ही नहीं आते, बल्कि उनका चढ़ावा भी बहुत भारी-भरकम होता है। नवरात्र के दिनों में ही 12 से 15 करोड़ रुपए नकद और कई मन सोना चढ़ जाता है। बालाजी के मंदिर में इस समय लगभग 50,000 करोड़ रुपए की संपत्ति मौजूद है, जो भारत के कुल बजट का 50वां हिस्सा है। तिरुपति के बालाजी दुनिया के सबसे धनी देवता हैं, जिनकी सालाना कमाई 600 करोड़ रुपए से ज्यादा है। यहां चढ़ावे को इकट्ठा करने और बोरियों में भरने के लिए बाकायदा कर्मचारियों की फौज है। पैसों की गिनती के लिए एक दर्जन से ज्यादा लोग मौजूद हैं और लगातार उनकी शिकायत बनी हुई है कि उन पर काम का बोझ बहुत ज्यादा है। किसी-किसी दिन तो ऐसा भी होता है कि तीन से चार करोड़ रुपए तक का चढ़ावा चढ़ जाए और रुपये-पैसे गिनने वाले कर्मचारी काम के भारी बोझ से दब जाएं। यह तो तब है, जब बालाजी के मंदिर में आमतौर पर लोग छोटे नोट नहीं चढ़ाते। यहां सोना, चांदी, हीरे, जवाहरात व प्लेटिनम की ज्वेलरी तो चढ़ती ही है, सुविधा के लिए भक्त इनका बांड भी खरीदकर चढ़ा सकते हैं। बालाजी के मंदिर में हर साल 350 किलोग्राम से ज्यादा सोना और 500 किलोग्राम से ज्यादा चांदी चढ़ती है। यह स्थिति तब थी जब अंग्रेज भारत आए थे। वह बालाजी मंदिर की शानो-शौकत और चढ़ावा देखकर दंग रह गए थे। कहते हैं ईस्ट इंडिया कंपनी बड़े पैमाने पर बालाजी मंदिर से चांदी खरीदती थी। वर्ष 2008-09 का बालाजी मंदिर का बजट 1925 करोड़ था। इस मंदिर की देखरेख करने वाले तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम ट्रस्ट ने 1000 करोड़ रुपए की फिक्स डिपोजिट कर रखी है। कुछ महीनों पहले कर्नाटक के पर्यटन मंत्री जनार्दन रेड्डी ने हीरा जडि़त 16 किलो सोने का मुकुट भगवान बालाजी को चढ़ाया था। जिसकी घोषित कीमत 45 करोड़ रुपए थी। दरअसल, येदयुरप्पा सरकार की नाक में दम करने वाले बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं ने खनन कारोबार में 4,000 करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया था। उसी मुनाफे का 1 प्रतिशत इन्होंने भगवान बालाजी को बतौर कमीशन अदा किया था, लेकिन आप यह न सोचें कि भगवान वेंकटेश्वर या बालाजी को पहली बार इतना महंगा मुकुट किसी भक्त ने भेंट किया होगा। वास्तव में बालाजी के मुकुटों के भंडार में यह 8वें नंबर पर ही आता है। इस तरह के उनके पास पहले से ही करीब 15 मुकुट हैं। भारत के सबसे अमीर मंदिर तिरुपति के संरक्षकों ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के पास करोड़ों रुपए का सोना जमा किया है। इनसे मंदिर को आर्थिक आय होगी। तिरुमला तिरुपति देवस्थानम् ट्रस्ट के चेयरमैन जे सत्यनारायण ने 1,175 किलो सोना स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के हैदराबाद सर्किल के जीएम टीएस कृष्णा स्वामी को सौंपा। ट्रस्ट के एक्जीक्युटिव ऑफिसर आईवाईआर कृष्णा राव और सदस्य नागी रेड्डी भी मौजूद थे। तिरुपति के पास भारत में सबसे ज्यादा सोना है और उसने इसे तिजोरियों में रखने की बजाय बैंकों में रखना शुरू किया है। इससे उसे ब्याज मिलता है। सन् 2009 में भी उसने 1,075 किलो सोना स्टेट बैंक ऑफ इडिया में रखा था। ट्रस्ट चाहता है कि सभी बैंक उसका सोना रखें।

गहनों का बीमा
दुनिया के सबसे दौलतमंद भगवान कहे जाने वाले तिरुपति बालाजी के गहनों का 52 हजार करोड़ रुपए का बीमा कराया जा रहा है। तिरुपति की संपत्ति की रक्षा के लिए तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम बोर्ड ने भगवान वेंकटेश्वर के गहने का लगभग 52 हजार करोड़ रुपए का बीमा कराने का फैसला किया है। ये रकम आंध्र प्रदेश की कुल बजट एक लाख करोड़ रुपए की आधी है। एक अनुमान के मुताबिक तिरुपति बालाजी मंदिर में हर दिन लगभग 70 हजार श्रद्धालु भगवान का दर्शन करने आते हैं। बताया जाता है कि हर महीने मंदिर को सिर्फ चढ़ावे से नौ करोड़ से भी ज्यादा की आमदनी होती है। इसके अलावा प्रसाद बिक्री, टिकट बिक्री और नीलामी से भी भगवान को करोड़ों की आमदनी होती है। तिरुपति मंदिर के पास 20 टन से ज्यादा सोने और हीरे के गहने मौजूद हैं।

वैष्णो देवी मंदिर
तिरूपति बालाजी मंदिर के बाद देश में सबसे ज्यादा लोग वैष्णो देवी मंदिर में माता के दर्शन के लिए जाते हैं। माता वैष्णो देवी मंदिर का सालाना आय 500 करोड़ रुपए है। धनी मंदिरों की कतार में माता वैष्णो देवी का मंदिर भी शामिल है, जिसकी सालाना कमाई 500 करोड़ से ऊपर है। मंदिर का इतिहास बहुत पुराना नहीं है, जैसा कि दक्षिण के अमीर मंदिरों का है। नया नवेला होने के बावजूद वैष्णो देवी का मंदिर
दक्षिण के हजारों साल पुराने मंदिरों के वैभव से टक्कर लेता है। इस मंदिर की देखरेख माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड करता है। जिला जम्मू में कटरा के निकट स्थित माता वैष्णो देवी का मंदिर देश का दूसरा ऐसा मंदिर है, जहां सबसे ज्यादा भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं। जबकि मंदिर सीधी 5,200 फीट की चढ़ाई के ऊपर स्थित एक गुफा में है। यह मंदिर जिस पहाड़ी पर स्थित है, उसका नाम त्रिकुट भगवती है। इस मंदिर के सीईओ आरके गोयल ने 2009 में बताया था कि हर गुजरते दिन के साथ मंदिर की आय बढ़ती जा रही है।

शिरडी के साईं बाबा मंदिर
सत्य साईं के निधन के बाद उनके कमरे से चौंकाने वाली जानकारी लगातार सामने आ रही है। पुट्टापर्थी में सत्य साईं के यजुमंदिर के ग्यारह प्राइवेट कमरों से 77 लाख रुपए कीमत के सोने चांदी और हीरे जवाहरात मिले। इससे पहले भी सत्य साईं के कमरे से करीब चालीस करोड़ रुपए की संपत्ति मिली थी। शिरजी स्थित साईं बाबा का मंदिर महाराष्ट्र के सबसे अमीर मंदिरों में से एक है। सरकारी जानकारी के मुताबिक इस प्रसिद्ध मंदिर के पास 32 करोड़ रुपए के अभूषण हैं और ट्रस्ट ने 450 करोड़ रुपए का निवेश कर रखा है।
धनी मंदिरों की फेहरिस्त में इन दिनों चरम लोकप्रियता की तरफ बढ़ रहे शिरडी का साई बाबा मंदिर भी शामिल है, जिसकी दैनिक आय 60 लाख रुपए से ऊपर है और सालाना आय 210 करोड़ रुपए की सीमा पार कर चुकी है। शिरडी साई बाबा सनातन ट्रस्ट द्वारा संचालित यह मंदिर महाराष्ट्र का सबसे धनी मंदिर है, जिसकी कमाई लगातार बढ़ रही है। मंदिर के प्रबंधकों के मुताबिक 2004 के मुकाबले अब तक 68 करोड़ रुपए से ज्यादा की सालाना बढ़ोतरी हो चुकी है। यहां भी बड़ी तेजी से चढ़ावे में सोने और हीरे के मुकुटों का चलन बढ़ रहा है। चांदी के आभूषणों की तो बात ही कौन करे।

सिद्धिविनायक मंदिर

मुंबई में स्थित सिद्धिविनायक मंदिर, महाराष्ट्र राज्य में दूसरा सबसे अमीर मंदिर है। सिद्धिविनायक मंदिर की सालाना आय 46 करोड़ रुपए है वहीं 125 करोड़ रुपए फिक्स्ड डिपॉजिट में जमा है।
महाराष्ट्र में ही एक और धनी मंदिर स्थित है, मुंबई का सिद्धिविनायक मंदिर। इस मंदिर की सालाना कमाई 46 करोड़ रुपए वर्ष 2009 में पहुंच चुकी थी, जिसमें मंदी के बावजूद इस साल इजाफा ही हुआ है। सिद्धिविनायक मंदिर का भी 125 करोड़ रुपए का फिक्स डिपोजिट है। महाराष्ट्र के इस दूसरे सर्वाधिक धनी मंदिर की सालाना कमाई कुछ साल पहले 3 करोड़ रुपए थी जो पिछले साल एक दशक में बहुत तेजी से बढ़ी है। मंदिर के सीईओ हुनमंत बी जगताप के मुताबिक देश और विदेश में भक्तों की आय बढऩे के कारण मंदिर की भी आय में भारी इजाफा हुआ है। इस इंटरनेट के जमाने में मंदिर दर्शन कराने के मामले में ही नहीं, चंदा वसूल करने के मामले में भी हाईटेक हो चुका है। यही कारण है कि मंदिर में 1 लाख रुपए से लेकर 6 लाख रुपए तक के सोने और प्लेटिनम के कार्ड उपलब्ध हैं। यानी अगर आप चाहें तो 6 लाख रुपए का कूपन खरीद कर सिद्धिविनायक भगवान गणेश को चढ़ा सकते हैं, उन्हें कूपन भी पसंद है।

अक्षर धाम मंदिर

कमाई के लिहाज से भले अपनी बड़ी पहचान न रखता हो, लेकिन स्थापत्य की भव्यता और समृद्धि के चमचमाते आकर्षण के कारण अक्षरधाम मंदिर ने बड़ी तेजी से भारतीयों के बीच पहचान बनाई है। फिर चाहे वह गांधीनगर (गुजरात) का अक्षरधाम हो या दिल्ली का। गांधी नगर स्थित अक्षरधाम मंदिर की सालाना आय 50 लाख से 1 करोड़ रुपए के बीच है। बोचासनवासी अक्षर पुरषोत्तम संस्थान द्वारा संचालित राजधानी दिल्ली का अक्षरधाम मंदिर दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर है। इसके पहले यह खिताब कंबोडिया के अंकोरवाट मंदिर को हासिल था। धनी मंदिरों की इस सूची में देश-विदेश के और भी पचासों मंदिर शामिल हैं।

अन्य धनी मंदिर
पुरी का जगन्नाथ मंदिर, गुवाहाटी का कामाख्या मंदिर, झारखंड स्थि देवघर का बाबा वैद्यनाथ का मंदिर, कोलकाता स्थित काली मंदिर, केरल का प्राचीन अयप्पा मंदिर, तमिलनाडु का मुरुगन मंदिर, वृंदावन स्थित बांकेबिहारी का मंदिर, उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर, भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर, बनारस का बाबा विश्वनाथ मंदिर, गुजरात स्थित सोमनाथ का मंदिर आदि। ये मंदिर भी चढ़ावे की दृष्टि से काफी संपन्न हैं। हिंदू मंदिरों की ही तरह बौद्धमठों और गुरुद्वारों में भी काफी चढ़ावा चढ़ता है। गुरुद्वारे तो खासतौर पर इस मामले में काफी संपन्न हैं। यह अलग बात है कि तमाम संपन्नता के बावजूद ये संपन्न मंदिरों की बराबरी कर पाने में असमर्थ हैं, लेकिन अमृतसर का स्वर्ण मंदिर और दिल्ली के तीन प्रमुख गुरुद्वारे रकाबगंज, बंगला साहिब और गुरुद्वारा शीशगंज भी चढ़ावे की दृष्टि से बड़े संपन्न गुरुद्वारे हैं।

मस्जिदों में चढ़ावा
इस्लाम में चढ़ावे का चलन नहीं हैं, इसलिए मस्जिद में चढ़ावे को स्वीकार करने की कोई व्यवस्था नहीं होती, लेकिन अपने को इस्लाम का ही एक हिस्सा मानी जाने वाली मजारों में बड़ी तादाद में हर हफ्ते चढ़ावा चढ़ता है। अजमेर शरीफ और पीराने कलियर देश में चढ़ावे के लिहाज से सबसे संपन्न मजारें हैं। कुल मिलाकर हिंदुस्तान भले गरीब हो, यहां दुनिया के सबसे संपन्न मंदिर, गुरुद्वारे और मजारें हैं। कहा जा सकता है कि भारत वह गरीब देश है, जहां अमीर भगवान बसते हैं।

खजराना गणेश मंदिर
केरल का पद्मनाभ मंदिर जहां लगातार दौलत उगल रहा है वहीं इंदौर के खजराना गणेश मंदिर आय के मामले में पीछे नहीं हैं। हालांकि दक्षिण भारत के मंदिरों की तुलना में यहां चढऩे वाली राशि नगण्य है। चढ़ावे के मामले में खजराना गणेश मंदिर पर भक्तों की श्रद्धा ज्यादा है।
गणेश मंदिर के पास नकद के अलावा जमीन भी है। होलकरों द्वारा राजबाड़ा के अंदर स्थापित मल्हारी मरतड मंदिर चढ़ावे में आने वाली राशि के मामले काफी पीछे है।
खजराना गणेश मंदिर की सालाना आय-करीब सवा करोड़ रुपए, बैंक खाते में करीब 25 लाख रुपए जमा। जमीन- 12.5 बीघा ग्राम गरोठा तहसील देपालपुर, 11 एकड़ अधिग्रहित, 1 हेक्टेयर पर कुछ अतिक्रमण। चांदी का छत्र 2 किलो 6 सौ ग्राम, चांदी के कुछ सिक्के।
साईं मंदिर: साईं मंदिर की सालाना आय-12 से 15 लाख रुपए, अभी खाते में करीब 1 लाख रु.। शिर्डी में 6 हजार स्क्वेयर फीट पर धर्मशाला और 12 हजार स्क्वेयर फीट का प्लॉट।
मल्हारी मरतड : खासगी ट्रस्ट सचिव केएस राठौर के अनुसार मल्हारी मरतड की सालाना आय-राजबाड़ा और माणिकबाग मंदिर की कुल आय 1.25 से 1.5 लाख रुपए।
गोम्मटगिरि दिगंबर जैन मंदिर की सालाना आय-एक लाख रुपए। सोने-चांदी के रूप में चढ़ावा-सालाना 50 हजार रुपए। जमीन-करीब 55 एकड़।
रणजीत हनुमान मंदिर: सालाना आय- 6 से 8 लाख रुपए, बैंक खाते में करीब 6-7 लाख रुपए जमा।
गोपाल मंदिर: सालाना आय-करीब 2.5 से 3 लाख रुपए, बैंक खाते में करीब 63 हजार रुपए।

दान-पुण्य सबसे अधिक

जिस तरह से पद्मनाभ स्वामी मंदिर से लगातार खजाना निकल रहा है उससे एक बात तो साबित होती है कि भारत में धर्म के नाम पर दान करने की प्रवृति कम नहीं हुआ है। समय जरुर बदला है पर लोग अब भी अपने सामथ्र्य के मुताबिक दान-पुण्य कर रहे है।

प्रेग्नेंट अभिनेत्रियां और बॉलीवुड

-राजकुमार सोनी


हुस्न की मल्लिका ऐश्वर्या राय के प्रेग्नेंट के बाद

बॉलीबुड में तहलका मच गया कि क्या गर्भवती होने के पश्चात अभिनेत्रियों को फिल्मी दुनिया से विदा ले लेनी चाहिए या इस कैरियर को जारी रखना चाहिए। इसी पर केंद्रित है स्टोरी।

ऐश्वर्या राय की प्रेग्नेंसी की खबर के कारण मधुर भंडारकर की फिल्म हीरोइन का निर्माण रुक गया है। यूटीवी ने इस बात की औपचारिक घोषणा भी कर दी है कि ऐश्वर्या राय स्टारर फिल्म हीरोइन की शूटिंग अनिश्तिकाल के लिए टाल दी गयी है। ऐश्वर्या की अचानक प्रेग्नेंसी ने प्रोडक्शन हाउस यूटीवी के करोड़ों रुपए के प्रोजेक्ट को अधर में लटका दिया है। हिंदी सिनेमा जगत में अभिनेत्रियों की प्रेग्नेंसी पहले भी निर्देशकों के लिए बाधक बनती रही है।


प्रेग्नेंट अभिनेत्री नहीं कर सकती काम
ऐश्वर्या राय बच्चन के प्रेग्नेंट होने की खबर ने सबको खुश तो बहुत कर दिया मगर फिल्म हीरोइन के निर्माताओं की इस बात से नींद उड़ गई। इस फिल्म पर काफी पैसा लगा हुआ था मगर ऐश के प्रेग्नेंट होने की वजह से यह फिल्म अब अनिश्चितकालीन समय के लिए बंद कर दी गई है।
अब तो निर्माता-निर्देशक अभिनेत्रियों को साइन करने से पहले कांट्रेक्ट में यह बात जोडऩे की सोच रहे हैं कि फिल्म में काम करने के दौरान न वो शादी करेंगी और न ही प्रेग्नेंट होंगी। ऐश के बाद करीना कपूर और विद्या बालन जैसी बड़ी अभिनेत्रियां भी जल्द घर बसाने के बारे में सोच रही हैं।

अभिनेत्रियों पर लगाम
ऐसे में उन्हें अंदेशा है कि ऐश जैसा केस दोबारा भी हो सकता है इसलिए वह इस कांट्रेक्ट के जरिए अभिनेत्रियों पर लगाम कसने की तैयारी में हैं। वैसे आपको बता दें कि हिंदी सिनेमा के इतिहास में एक बार ऐसा हुआ था जब सुभाष घई ने माधुरी दीक्षित से अपनी फिल्म खलनायक में काम करने से पहले एक कांट्रेक्ट साइन करवाया था। उन्हें शक था कि उस समय संजय दत्त के साथ रोमांस फरमा रही माधुरी फिल्म में काम करने के दौरान कहीं शादी न कर लें और गर्भवती न हो जाएं इसलिए कांट्रेक्ट में साफ- साफ इस बात का उल्लेख करा कर उन्होंने माधुरी से इस बात की हामी भरवा ली कि वह फिल्म में काम करने के दौरान न शादी करेंगी और न ही प्रेग्नेंट होंगी।
पहला मामला था
यह बॉलीवुड में अब तक का पहला मामला था इसके बाद किसी निर्माता ने अभिनेत्री के साथ ऐसा कांट्रेक्ट साइन नहीं कराया मगर अब वह ऐसा कांट्रेक्ट साइन करने पर एक बार फिर गंभीरता से विचार कर रहे हैं।

शिल्पा और लारा भी प्रेग्नेंट
लगता है, इस समय बॉलीवुड में बेबी टाइम चल रहा है। अभिनेत्री ऐश्वर्या राय बच्चन की प्रेग्नेंसी की खबर के बाद बच्चन परिवार को अभी भी बधाई संदेश देने का सिलसिला थमा भी नहीं है और अब दो और अभिनेत्रियों के प्रेग्नेंट होने की खबरें आने लगी हैं।
जी हां, मॉडल से अभिनेत्री और फिर निर्माता बनी लारा दत्ता अपने परिवार को विस्तार देने की तैयारी में है। खबर है कि हाल ही में साल की शुरुआत में टेनिस प्लेयर महेश भूपति से शादी करने वाली अभिनेत्री लारा दता मां बनने वाली है। दोनों अपने प्रोफेशन की वजह से काफी व्यस्त रहते हैं, लेकिन अब उन्हें लग रहा है कि मम्मी-पापा बनने का ये सबसे अच्छा समय है। लारा जिन्होंने हाल ही में डॉन-2 की शूटिंग खत्म की है और अब अपनी दूसरी होम प्रोडक्शन फिल्म पर काम कर रही है। हालांकि लारा-महेश ने अभी इस बात की पुष्टि नहीं की है। वहीं दूसरी तरफ बॉलीवुड की एक और हॉट अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी की प्रेग्नेंसी की खबर आ रही है। शिल्पा आईफा अवार्ड की वजह से अभी टोरंटो में है, टोरंटो जाने से पहले वह ब्रांदा स्थित एक सितारा प्रसूति डॉक्टर के पास नियमित रूप से मिलने जाती थी। शिल्पा के पति राज बिंद्रा जाने-माने उद्योगपति है। हालांकि हालिया बयान में उन्होंने कहा है कि न तो मैं प्रेग्नेंट हूं और न ही हमारे पति का किसी के साथ अफेयर चल रहा है। यह बात कितनी सच है ये तो आने वाला समय ही बताएगा।

अभिनेत्री का मां बनना
ऐश्वर्या की प्रेग्नेंसी ने मधुर भंडारकर के महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट हीरोइन को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। इस वजह से इंडस्ट्री के निर्माता कांट्रैक्ट में ऐसे क्लॉज को शामिल करने की मांग कर रहे हैं जिसमें यह बात लिखी हो कि फिल्म में काम करने के दौरान अभिनेत्रियां प्रेग्नेंट न हों। इस कांट्रैक्ट को लेकर इंडस्ट्री में सभी की अलग-अलग राय है, लेकिन सभी यह कहना नहीं भूलते कि फिल्म से जुड़ जाने के बाद हीरोइनों को इस तरह की निजी खुशी से दूर ही रहना चाहिए, क्योंकि फिल्म का हित इसी में है।

कांट्रैक्ट बनाना मूर्खता
अपनी बेबाक राय रखने वाले फिल्म निर्माता महेश भट्ट का कहना है कि इस तरह का कांट्रैक्ट बनाना मूर्खतापूर्ण है। मुझे लगता है कि यह अभिनेत्री का पर्सनल मामला है, लेकिन साथ ही एक एक्ट्रेस होने के नाते उसे अपने प्रोफेशन की जरूरत को समझना भी होगा। एक एक्ट्रेस को परदे पर ग्लैमरस नजर आना होता है। एक प्रोफेशनल एक्ट्रेस होने के नाते यह उस अभिनेत्री की जिम्मेदारी बनती है कि वह अपनी खुशी के लिए फिल्म को अधर में न डाले। फिल्म साइन करने के बाद फिल्म को समय पर पूरा करना उसकी प्राथमिकता होनी चाहिए।

क्लॉज बनाने की जरूरत
फिल्मकार और निर्देशक विपुल शाह का कहना है कि सितारों की प्राइवेसी को भंग न करते हुए मुझे लगता है कि हमारी इंडस्ट्री को भी कुछ एक ऐसे नियमों की जरूरत है, क्योंकि किसी भी फिल्म की मेकिंग में करोड़ों रुपए लगते हैं। वैसे यह सिर्फ एक्ट्रेस की प्रेग्नेंसी का ही मामला नहीं है, इसमें कई अन्य मुद्दे भी हैं, जिन पर क्लॉज बनाने की जरूरत है। जिस तरह से हॉलीवुड में सितारों की प्राइस मनी पर कंट्रोल करने के लिए एक क्लॉज है। कोई कभी भी अपनी प्राइस मनी नहीं बढ़ा सकता है। हॉलीवुड ही क्यों साउथ फिल्म इंडस्ट्री भी इससे अछूती नहीं है। काम करने के तरीके को ज्यादा से ज्यादा अनुशासित करने के लिए वहां भी ऐसे कई क्लॉज हैं। जो भी स्टार उन्हें तोड़ता है, उसे कुछ समय के लिए इंडस्ट्री बैन तक कर देती है। मुझे लगता है कि ऐसे कुछ क्लॉज की जरूरत हिंदी सिनेमा को भी है। हालांकि निर्माताओं के ऐसे क्लॉज को सुष्मिता अभिनेत्रियों के प्रोफेशनलिज्म का अपमान मानती हैं। इस तरह के कांट्रैक्ट और क्लॉज पर उन्हें आपत्ति है।

करोड़ों रुपए दांव पर
ट्रेड विशेषज्ञ तरन आदर्श का कहना है कि मैं फिल्म हीरोइन या ऐश पर कमेंट नहीं कर रहा हूं, लेकिन मुझे लगता है कि सितारों और इंडस्ट्री को ऐसे क्लॉज की जरूरत है, क्योंकि फिल्मों पर करोड़ों रुपयों का दांव लगा होता है। प्रेग्नेंसी जैसी अवस्था में फिल्म की शूटिंग लंबी खींचती जायेगी, जिससे आर्थिक तौर पर निर्माता की परेशानी बढ़ेगी।




प्रेग्नेंसी में सक्रिय रहीं अभिनेत्रियां

यूटीवी प्रोडक्शन हाउस के प्रवक्ता ने फिल्म हीरोइन की शूटिंग को अनिश्चितकाल के लिए टाल देने के साथ यह भी कहा कि ऐश्वर्या के स्वास्थ्य से बढ़कर कुछ नहीं है। इसलिए फिल्म की शूटिंग रोक दी गई है। लेकिन अगर हिंदी सिनेमा के इतिहास पर गौर करें तो प्रेग्नेंसी के दौरान भी अभिनेत्रियों का अभिनय करना कोई नयी बात नहीं है।
शोले में जया बच्चन
शोले की शूटिंग के वक्त ही ऐश्वर्या राय बच्चन की सासू मां जया बच्चन ने अमिताभ से शादी रचायी थी और इस फिल्म की शूटिंग के वक्त ही उन्होंने पहले श्वेता और फिर अभिषेक को जन्म दिया। गौरतलब है कि शोले को बनने में आठ साल का लंबा वक्त लगा था।
हेमा मालिनी भी सक्रिय
इस फिल्म में जया भादुड़ी के साथ सहअभिनेत्री रही हेमा मालिनी भी अपनी दोनों प्रेग्नेंसी के वक्त लाइट कैमरा और एक्शन की दुनिया में सक्रिय थीं। इशा के जन्म के वक्त वे क्रांति जैसी फिल्म का हिस्सा थी। इस फिल्म में उन्होंने बोट पर रस्सी में बंधे हुए जिंदगी की न टूटे लड़ी गीत पर परफार्म भी किया था, जो उनकी प्रेग्नेंसी के लिहाज से काफी चुनौतीपूर्ण दृश्य था। इशा के बाद छोटी बेटी आहना की प्रेग्नेंसी के दौरान उन्होंने परदे पर रजिया सुल्तान जैसे ऐतिहासिक किरदार को परदे पर उतारा।
जुदाई के सेट पर श्रीदेवी
ड्रीम गर्ल से कम तो श्रीदेवी भी नहीं थी। अपनी दूसरी प्रेग्नेंसी के वक्त उन्होंने फिल्म जुदाई के सेट पर ही आठ से दस घंटे बिताये थे।
मलाइका अरोरा ने किया था डांस
आयटम बाला मलाइका अरोरा खान भी फिल्म कांटे की शूटिंग के दौरान प्रेग्नेंट थीं। इस फिल्म में उन्होंने पोल डांस भी किया था।
वी आर फैमिली में काजोल
हाल में रिलीज हुई करन जौहर की फिल्म वी आर फैमिली की शूटिंग के दौरान काजोल प्रेग्नेंट थीं।

बीते दौर की अभिनेत्रियां
बीते दौर की अभिनेत्रियों में नरगिस से स्मिता पाटिल तक कई अभिनेत्रियों ने प्रेग्नेंसी के दौरान बतौर एक्ट्रेस अपनी जिम्मेदारी को सफलतापूर्वक निभाया। वैसे काम के जुनून और निर्माताओं की मांग की वजह से कभी-कभी अभिनेत्रियों को
खामियाजा भी भुगतना पड़ा है। कभी खुशी कभी गम की शूटिंग के दौरान काजोल और देवदास की शूटिंग के वक्त प्रेग्नेंट माधुरी दीक्षित गर्भपात का शिकार भी हुई थीं।

नई हीरोइनें न्याय नहीं कर सकतीं
ऐश्वर्या प्रेग्नेंट हो जाने के बाद हीरोइन जैसी फिल्म के साथ न्याय नहीं कर सकती। फिल्म का सब्जेक्ट बिल्कुल अलग है। इस तरह की मधुर की बातें बहुत हद तक जायज लगती हैं, लेकिन ऐश की प्रेग्नेंसी पर रामगोपाल वर्मा का यह बयान कहीं से भी पल्ले नहीं पड़ता है कि खूबसूरत लड़कियों को कभी मां नहीं बनना चाहिए।

अभिनेत्रियों की निजी जिंदगी बाधित
अगर गौर करें तो निर्देशक की इसी सोच ने हमेशा ही अभिनेत्रियों की निजी जिंदगी को बाधित किया है। खलनायक की शूटिंग के समय निर्माता सुभाष घई ने माधुरी दीक्षित के साथ करार किया था कि वे फिल्म की शूटिंग पूरी होने से पहले न तो शादी कर सकती हैं और न ही प्रेग्नेंट हो सकती हैं। उस फिल्म के दौरान माधुरी संजय दत्त के साथ रिलेशनशिप में थीं। उन्हें डर था कि कहीं वे फिल्म की शूटिंग पूरी होने से पहले संजय से शादी न कर ले।

स्टारडम की कीमत चुकाई
निर्माताओं की ऐसी सोच की वजह से एक समय था जब अभिनेत्रियां अपनी शादी और रिलेशनशिप को हमेशा परदे में ही रखती थीं या फिर कह सकते हैं कि स्टारडम के मोह में वे अपनी शादी और निजी जिंदगी को हमेशा ही दूसरी प्राथमिकता देती थीं। अगर साफ शब्दों में कहें तो अभिनेत्रियों ने हमेशा ही स्टारडम की कीमत चुकाई है। हालांकि आज स्थिति में कुछ सुधार जरूर आया है।

मिल रहे अच्छे ऑफर
काजोल और ऐश्वर्या जैसी अभिनेत्रियों को शादी के बाद भी अच्छे रोल ऑफर हो रहे हैं, लेकिन गौर करें तो शादी और फिर मां बन जाने के बाद कहीं न कहीं उनके लिए रोल का दायरा सीमित हो जाता है। मां बनने के बाद भी फिल्मों में सक्रिय काजोल भी खुद इस बात से इनकार नहीं करती कि वे अब सिमरन जैसे किरदार नहीं निभा सकती हैं, जबकि हॉलीवुड में एंजेलिना जोली और हैले बेरी जैसी अभिनेत्रियां हर तरह के रोल में फिट हैं। शायद रोल के सीमित होते दायरों की वजह से ही करीना, विद्या जैसी अभिनेत्रियों ने खुद को शादी से दूर रखा है।

स्मृति इरानी (अभिनेत्री)
मैं किसी महिला के विपक्ष में नहीं हूं, लेकिन जहां बात फिल्म की होती है तो मैं निर्माताओं से सहमत हूं। प्रेग्नेंट अभिनेत्रियों को फिल्म से दूर ही रहना चाहिए, क्योंकि फिल्मों के बनने में लाखों-करोड़ों रुपए लगते हैं।

साजिद नाडियाडवाला ( निर्माता )
मैंने अब तक किसी अभिनेत्री के साथ कभी ऐसे कांट्रैक्ट नहीं बनाये हैं। लोग ऐसा क्यों कहते हैं कि फिल्म प्रोडक्शन जोखिम का काम है। जब वे जोखिम नहीं उठा सकते तो इस फील्ड में आते क्यों हैं।

एकता कपूर ( निर्माता )
एक निर्माता के तौर पर सोचूं तो क्लॉज की बात सही लगती है, लेकिन एक महिला के तौर पर मुझे यह बात गलत लगती है। प्रेग्नेंसी निजी मामला है फिर चाहे वह एक्ट्रेस हो या आम औरत।

भूषण कुमार ( निर्माता )
एक निर्माता के तौर पर मुझे भी लगता है कि ऐसे क्लॉज की हमें जरूरत है, लेकिन इसके साथ मैं यह भी कहना चाहूंगा कि ऐसे क्लॉज हमारे यहां ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाएंगे, क्योंकि हमारी इंडस्ट्री में हम प्रोफेशनल कम पर्सनल तौर पर एक-दूसरे से ज्यादा जुड़े हैं। इसलिए उनकी खुशी या गम हम सभी के होते हैं।

वजीर सिंह ( फिल्म विश्लेषक)
मुझे नहीं लगता कि इस तरह के क्लॉज की हमारी इंडस्ट्री को जरूरत है। एक लीडिंग एक्ट्रेस अपने पूरे कैरियर में एक या दो बार ही मां बनती है। हमारी इंडस्ट्री रिलेशनशिप बेस्ड इंडस्ट्री है। मुझे लगता है कि इतनी छूट अपनी एक्ट्रेस को देने की जिम्मेदारी निर्माताओं की बनती ही है।

कैरियर अहम है : श्रीदेवी
बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि 13 अगस्त 1963 को तमिल परिवार में जन्मी श्रीदेवी ने अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत मात्र चार साल की उम्र में ही कर दी थी। कंधन करुणाई नामक इस फिल्म में श्रीदेवी ने भगवान शिव की भूमिका निभाई थी। युवावस्था तक पहुंचते-पहुंचते श्रीदेवी हर तरह की भाषा की फिल्मों में काम कर चुकी थी। तमिल, तेलगु, कन्नड़ बॉलीवुड में श्रीदेवी को पहला ब्रेक मिला 1978 में आई फिल्म सोलहवां सावन से। लेकिन श्रीदेवी को टिकट खिड़की पर पहचान मिली 1983 में रिलीज हुई फिल्म हिम्मतवाला से, जिसमें उन्होंने जितेंद्र के साथ पहली बार काम किया। इसके बाद तो यह बॉलीवुड की सबसे कामयाब जोडिय़ों में गिनी जाने लगी। जितेंद्र के साथ श्रीदेवी ने तोहफा, मवाली, जस्टिस चैधरी जैसी हिट फिल्में दी। जब श्रीदेवी का कैरियर पूरी बुलंदी पर था, तभी उन्होंने निर्माता बोनी कपूर के साथ 1996 में शादी कर ली। इसके बाद श्रीदेवी ने गर्भवती होने के बाद भी 1997 में जुदाई जैसी हिट फिल्म दी और फिर उसके बाद शीर्ष पर रहते हुए बॉलीवुड को अलविदा कह दिया। चंद साल पहले वे राजकुमार संतोषी की फिल्म हल्ला बोल में मेहमान भूमिका में नजर आई थी, लेकिन कुल मिलाकर अब श्रीदेवी पारिवारिक जिंदगी में ही खुश हैं। फिल्मों में श्रीदेवी की बेटी
खबर आ रही है कि सदाबहार अभिनेत्री श्रीदेवी की बेटी जाह्न्वी भी फिल्मों में कदम रखने जा रही है। खबर है कि 13 साल की जाहन्वी तेलगू फिल्म जागादेका वीरूदू अथिलोका सुंदरी की साक्वेल से शुरुआत करने जा रही है। इस फिल्म के पार्ट वन में श्रीदेवी और चिरंजीव और श्रीदेवी लीड रोल में थे। ये एक ब्लाक ब्लास्टर मूवी थी।
अब इसके सीक्वेल में श्रीदेवी की बेटी काम करेगी। और उनके हीरो होंगे नागाजुर्न के बेटे अखिल। ये फिल्म में जादू का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलेगा।

जयाप्रदा : फैमिली के साथ काम भी
जयाप्रदा ने महज 30 वर्षीय फिल्म कैरियर के दौरान 300 फिल्मों को पूरा किया है। 1986 में, उन्होंने निर्माता श्रीकांत नाहटा से शादी की, जो पहले से ही चंद्रा के साथ विवाहित थे, जिनके साथ उनके 3 बच्चे हुए। कहने की जरूरत नहीं है, इस शादी ने काफी विवादों को जन्म दिया, विशेषकर इसलिए कि नाहटा ने अपनी वर्तमान पत्नी को तलाक नहीं दिया और अपनी पहली पत्नी के साथ, जयाप्रदा से शादी करने के बाद भी बच्चे पैदा किए। इस दौरान जयाप्रदा ने फिल्मों में काम जारी रखा।

माधुरी दीक्षित : बच्चों के साथ कैरियर भी
माधुरी दीक्षित का कहना है कि पिछले दस-बारह वर्षों से हीरोइनें समझ रही हैं कि वे बच्चों की परवरिश के साथ-साथ कैरियर का भी खयाल रख सकती हैं। मैं नई पीढ़ी की मां हूं। मेरा बड़ा बेटा रायन साढ़े तीन साल का है और छोटा आरिन दो साल का। मेरी राय में, यदि स्त्री चाहे, तो बच्चों के साथ-साथ कैरियर के साथ भी न्याय कर सकती है। यह कहने में मुझे कोई हिचक नहीं कि हम सभी बहनों को मां के आदर्श और संस्कार मिले हैं। सभी ने शादी के बाद सबसे पहले जहा अपने बच्चों को प्राथमिकता दी। वहीं अपने कैरियर के साथ भी न्याय किया है।
रायन और आरिन के परवरिश में मेरे और पति श्रीराम की सोच एक जैसी है। उन्होंने मुझे इस बात की पूरी आजादी दी कि मैं चाहूं, तो फिल्मी कैरियर फिर से आरंभ कर सकती हूं, लेकिन मुझ पर मेरी मां के संस्कार हैं। मैंने सबसे पहले बच्चों की परवरिश पर ध्यान दिया। मेरे लिए शादी के बाद और खासकर मां बनने के बाद कैरियर कोई मायने नहीं रखता था। मैंने अपने बच्चों को पूरा वक्त दिया। बात उनके नैप्पीज बदलने की हो या उन्हें दूध पिलाने की। श्रीराम हमेशा यथासंभव मदद करते रहे। मेरे डेनहर (अमेरिका) वाले घर में कोई नौकर नहीं है। बच्चों को नहलाने, खिलाने, प्रार्थना सिखाने, लोरियां गाकर सुलाने, उनके मीठे-मीठे बोल सुनकर जो मातृत्व सुख मुझे मिला, वह किसी अवार्ड या रुपये-पैसों में नहीं मिला। मेरे बच्चे मराठी में ही बातें करते हैं हमसे। मेरी और श्रीराम की राय में बच्चों को जितनी आसानी मातृभाषा सीखने में होती है, अन्य भाषा सीखने में नहीं होती। अपने बच्चों की परवरिश व कैरियर ही मेरे जीवन की प्राथमिकता है। जब भी अमेरिका से मुंबई अपने माता-पिता से मिलने आऊंगी, तब फिल्मों के अच्छे प्रस्ताव उन छुट्टियों के दौर में सोचे जा सकते हैं। यह कहना बड़ा मुश्किल है कि रायन और आरिन आगे चलकर क्या बनना पसंद करेंगे? हो सकता है, अभिनय का पेशा अपनाएं या फिर अपने पिता की तरह डॉक्टर बनें या फिर किसी अन्य पेशे में जाएं। वैसे, मैं अपने बच्चों की हमेशा पथ-प्रदर्शक बनूंगी।

हेमामालिनी: प्रेग्नेंट में भी की शूटिंग
रूपहले पर्दे से लेकर संसद तक और नृत्य समारोहों के मंच से लेकर छोटे पर्दे तक हेमामालिनी हर जगह अपनी आकर्षक उपस्थिति से दर्शकों का ध्यानाकर्षण करती रही हैं। अनुभवी, खूबसूरत और प्रतिभाशाली हेमामालिनी भारतीय कला-जगत की अमूल्य धराहर हैं। जीवन के सातवें दशक में प्रवेश कर चुकी हेमामालिनी की खूबसूरती आज भी नयी नवेली अभिनेत्रियों की ईष्र्या का विषय बन सकती है। वे आज भी दर्शकों को अपने मोहपाश में बांधने की क्षमता रखती हैं।
स्वप्न सुंदरी हेमामालिनी का निजी जीवन भी बेहद रोचक रहा है। सहकलाकार जितेंद्र और संजीव कुमार के साथ प्रेम-प्रसंग की अफवाहों के बीच हेमामालिनी ने हिंदी फिल्मों के हीमैन की उपाधि से संबोधित किए जाने वाले अभिनेता धर्मेद्र से विवाह रचाया। कई फिल्मों में सह-कलाकार रह चुके धर्मेद्र के साथ अपने प्रेम-संबंध के प्रति समर्पण का प्रमाण देकर हेमा ने उनकी दूसरी पत्नी बनना भी स्वीकार कर लिया। धर्मेद्र-हेमा की जोड़ी हिंदी फिल्मों के उन प्रेमी-युगलों की सूची में शामिल हैं जो फिल्मी पर्दे के साथ-साथ निजी जीवन में भी सफल रही हैं। उन्होंने प्रेग्नेंट के बाद भी दो हिन्दी फिल्मों में काम किया। बाद में दो बेटियों एशा और अहाना के व्यक्तित्व को मातृत्व की छांव में संवारने के साथ ही हेमामालिनी राजनीतिक परिदृश्य में भी सक्रिय रहीं। अभिनेत्री, निर्मात्री, निर्देशिका और सांसद होने के साथ ही हेमामालिनी अंतरराष्ट्रीय स्तर की शास्त्रीय नृत्यांगना भी हैं। लुप्त हो रही नृत्य शैली मोहिनीअट्टम के अस्तित्व को बनाए रखने में हेमामालिनी का योगदान उल्लेखनीय है।
नृत्य-कला में पारंगत अपनी पुत्रियों के साथ हेमा देश-विदेश में नृत्य-नाटिकाएं प्रदर्शित करती रहती हैं। हेमामालिनी के व्यक्तित्व का आकर्षण नयी पीढ़ी को भी सम्मोहित करने की क्षमता रखता है। आज भी फिल्मों में उनकी उपस्थिति मात्र से दर्शक सिनेमाघरों में खींचे चले आते हैं। जीवन के हर क्षेत्र में सफल हेमामालिनी का नाम अब विशेषण बन गया है।

प्रेग्नेंट बन छा जाती हैं
बॉलीवुड हसीनाएं
सुजोय घोष की आनेवाली फिल्म कहानी में विद्या बालन एक प्रेग्नेंट महिला की भूमिका निभाते नजर आएंगी। इस पूरी फिल्म में वह अपने बेबी बंप के साथ ही नजर आएंगी।
वैसे विद्या के अलावा ऐसी कई अन्य अभिनेत्रियां हैं जो ऑन स्क्रीन बेबी बंप के साथ नजर आईं। इन्होने मां के किरदार को बखूबी निभाया। बेबी बंप के साथ उनका लुक और भी सेक्सी हो गया। आइये नजर डालते हैं कुछ ऐसी ही अभिनेत्रियों पर।
तारा शर्मा
तारा शर्मा ऑन स्क्रीन अपना बेबी बंप दिखने से बिलकुल नहीं हिचकिचाई। उन्होंने फिल्म सुनो ना...एक अपने बेबी बंप को दिखाया जब वह खुद चार महीने की गर्भवती थी। उन्होंने अपने बेबी बंप के साथ एक फोटो शूट भी कराया।

विद्या बालन
विद्या बालन एक ऐसी अभिनेत्री हैं जो फिल्मों में अपने रोल्स के साथ एक्सपेरिमेंट करने से बिलकुल नहीं हिचकिचाती। सुजॉय घोष की आनेवाली फिल्म 'कहानीÓ में विद्या छह महीने की प्रेग्नेंट विधवा महिला के किरदार में नजर आएंगी जो कि अपने पति की मौत का बदला लेती है। जिसकी शूटिंग इन दिनों मुंबई के महबूब स्टूडियों में चल रही है।
फिल्म में विद्या के पति लंदन से इंडिया आने के दौरान रहस्यमई ढंग से गायब हो जाते हैं। जिसके बाद विद्या उन्होंने खोजने के लिए लंदन से कोलकाता आती है। इस फिल्म में पहली बार विद्या बिलकुल डिफरेंट अंदाज में नजर आएंगी।
सेट पर एक प्रेग्नेंट महिला कि तरह ही व्यवहार करने लगी थी। वह किरदार में इतना रम गई थीं कि उन्हें देखकर लगता था कि वजह सच में कोई प्रेग्नेंट महिला हैं। सुजॉय ने हाल ही में प्रेग्नेंट विद्या बालन कि तस्वीरें माइक्रो ब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर शेयर की हैं।

प्रिटी जिंटा
प्रिटी जिंटा ने भी फिल्म क्या कहना, चोरी-चोरी, चुपके-चुपके, सलाम नमस्ते में एक गर्भवती महिला का किरदार निभाया और बेबी बंप के साथ नजर आईं। वह बेबी बंप के साथ ऑन स्क्रीन बेहद सेक्सी नजर आईं और बेबी बंप ने उनकी चुलबुली पर्सनालिटी में चार चांद लगा दिए।

शीना
नई अदाकार शीना ने भी अपनी पहली फिल्म तेरे संग में एक टीनेजर प्रेग्नेंट लड़की की भूमिका अदा की। उन्हें पूरी फिल्म में बेबी बंप के साथ दिखाया गया। यहां तक कि पोस्टर में भी शीना के बेबी बंप वाले लुक को ही जगह दी गई।

करीना कपूर
आनेवाली फिल्म रा.1 में भी करीना कपूर बेबी बंप के साथ नजर आएंगी। इस फिल्म में करीना ने एक घरेलू महिला का किरदार निभाया है जबकि शाहरुख एक सुपर हीरो के किरदार में नजर आएंगी।